तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)
Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा
समाज-सेवा और गृह-शिल्प
लेखकों और भले आदमियोंसे किताबें संग्रह करनेका
प्रयत्न करो।
अनिलबाबूसे कहना,कि पुस्तकालयके लिये hap-haz
ardly पुस्तकें एकत्र न कर,एक method से संग्रह करें।
हां, बिना दाम जो किताबें मिलें, वे रखी जा सकती हैं।
तब भी एक प्रणाली होना चाहिये। पहले बंगला, अंग्रेजी
और यूरोपीय साहित्यके प्रसिद्ध लेखकोंकी किताबें
संग्रह करना चाहिये। इसके बाद भारतका इतिहास तथा
पृथ्वीके सब देशों'का इतिहास संग्रह करो। इसके बाद
विज्ञान सम्बन्धी पुस्तक और महापुरुषोंकी जीवनी संग्रह
करो। साथ ही साथ कृषि, राजनीति, वाणिज्य संबंधी
पुस्तकें भी संग्रह करना चाहिये। एक साथ सब तरह-
की पुस्तकें संग्रह की जा सकें तो बहुत अच्छा है। लगभग
सभी विषयों'की पुस्तकें रखना चाहिये ताकि चाहे जिस
तरहकी रुचिका आदमी हो, मांगनेपर किताब पा सके
रद्दी उपन्यास रखनेकी जरूरत नहीं है, मगर अच्छे उप-
न्यास अवश्य रखने वाहिये। यानी कम खर्चमें एक आदर्श
पुस्तकालय होना चाहिये।
❊ ❊ ❊ ❊
दूर देशसे सूत खरीदकर बहुत समयतक weaving
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तरुणके स्वप्न
depot नहीं चलाया जा सकता। जिनकी सहायता करते
हों उनके घरमें तथा समितिके सदस्योंके घरमें सूत
उत्पादनकी चेष्टा करना चाहिये। भवानीपुर या उसके
आसपाससे थोड़ा सूत भी न मिल सका तो तुम्हारा
परिश्रम व्यर्थ है। और भी एक बात जान लेना चाहिये
कि यदि स्थानीय लोग संस्थाकेलिये सूत तैयार करने
लगें तो समझना चाहिये कि संस्थाके प्रति उनकी वास्त-
विक सहानुभूति है। स्थानीय सहानुभूतिके अभावमें
कोई भी प्रतिष्ठान अधिक दिनतक नहीं चल सकता।
ऐसे आदमी भी मिल सकते हैं जो सूत कातेंगे पर
बेचेंगे नहीं, किन्तु उनके काते हुए सूतसे धोती साड़ी
बनाकर दे सको तो वे सूत कातकर देते रहेंगे। पहले
अनेक सूत देकर धोती या साड़ी बनवाते थे। आजकल
की हालत मैं नहीं जानता। तब भी मैं समझता हूं सूत
लेकर धोती साड़ी तैयार करवाकर देनेकी व्यवस्था होना
चाहिये। प्रत्येक सदस्यके घरमे सूत काता जाय इसका
ध्यान रखना चाहिये। इति—
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चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
(दक्षिण कलकत्ता सेवक समितिके श्री हरिचरण
बागचीको लिखे गये पत्रका अंश)
माण्डला जेल
तुमने जो लिखा ठीक है, वास्तविक कार्यकर्त्ताका
बड़ा अभाव है। तब भी जैसा उपादान मिलता है उसे
लेकर ही काम चलाना पड़ता है। जीवन न देनेसे जैसे
जीवन नहीं पाया जाता, प्रेम किये बिना प्रतिदानमें जैसे
प्रेम नहीं मिलता, वैसे ही स्वयं आदमी बने बिना आदमी-
को “आदमी” नहीं बनाया जा सकता।
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तरुणके स्वप्न
राजनीति का स्रोत क्रमशः जिस प्रकार पंकिल होता
जा रहा है उससे मनमें यही होता है कि कुछ समय तक
राजनीतिसे देशका विशेष उपकार नहीं हो सकता।
सत्य और त्याग—ये दो आदर्श राजनीतिसे जितने ही दूर
होते जाते हैं राजनीतिकी कार्यकारिताका उतना ही ह्रास
होता जाता है। राजनैतिक आन्दोलन नदीके स्रोतकी तरह
कभी स्वच्छ, कभी पंकिल, सभी देशोंमें हो जाता है।
बङ्गालमें राजनीतिकी अवस्था जैसी भी हो, तुम उस तरफ
ध्यान न देकर सेवा कार्यमें अग्रसर होते जाओ।
✱ ✱ ✱
तुम्हारे मनकी वर्तमान असन्तोष पूर्ण अवस्थाका
कारण क्या है, यह तुम समझ सके हो या नहीं, मालूम
नहीं, पर मैं समझ सका हूं। सिर्फ कामसे मनुष्यका
आत्म-विकास सम्भव नहीं हो सकता। बाहरी कामके
साथ लिखने-पढ़ने और ध्यान धारणाकी भी जरूरत है।
कामसे जैसे बाहरकी उच्छृंखलता नष्ट हो जाती है और
मनुष्य संयत हो जाता है, उसी प्रकार लिखने-पढ़ने और
ध्यान-धारणासे internal discipline, यानी आन्तरिक
संयम प्रतिष्ठित होता है।
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चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
भीतरके संयमके बिना बाहरका संयम स्थायी नहीं
होता। और एक बात है, व्यायामसे जैसे शरीरकी
उन्नति होती है, उसी प्रकार साधनासे सद्वृत्तियां जाग-
रित होती हैं और भीतरी शत्रुओंका नाश होता है।
साधनाके उद्देश्य दो हैं—भीतरी शत्रु-भय, काम, स्वार्थ-
परतापर विजय पाना (२) प्रेम, शक्ति, बुद्धि, त्याग
आदि गुणोंका विकाश होना।
काम जयका प्रधान उपाय है स्त्री मात्रमें मातृरूपका
दर्शन करना और स्त्री मूर्त्ति (दुर्गा, काली आदि) में
भगवानका चिन्तन करना। स्त्रीमूर्त्तिमें गुरु या गोविन्द-
का ध्यान करनेसे मनुष्य स्त्री मात्रमें भगवान देखनेका
अभ्यस्त हो जाता है। इसीलिये महाशक्तिको मूर्त्त करते
समय हमारे पूर्व पुरुषोंने स्त्री मूर्त्तिकी कल्पना की थी।
व्यावहारिक जीवनमें स्त्री मात्रको मा के भावसे देखते
रहनेसे मन क्रमशः पवित्र और शुद्ध हो जाता है।
भक्ति और प्रेमसे मनुष्य निस्वार्थ हो जाता है। मनु-
ष्यके हृदयमें जब किसी आदर्शके प्रति प्रेम और भक्ति
बढ़ती है, तब उसी अनुपातमें स्वार्थपरता कम हो जाती
है। प्रेम करते करते भक्त क्रमशः सम्पूर्ण संकीर्णता
छोड़कर विश्वमें लीन हो जाता है। मनुष्य जिस विषय
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तरुणके स्वप्न
का अधिक ध्यान करता है, वैसा ही हो जाता है। जो
अपनेको दुर्बल और पापी समझता है वह दुर्बल हो जाता
है। जो हमेशा अपनेको पवित्र और शक्तिमान अनुभव
करता है वह शक्तिमान और पवित्र हो जाता है। कहा
भी है, "यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी।"
भय जय करनेका उपाय शक्ति-साधना है। दुर्गा,
काली आदि मूर्ति शक्तिका रूप विशेष है। शक्तिके किसी
भी रूपकी मनमें कल्पना करने और उससे शक्ति पानेकी
प्रार्थना करने, उसके चरणोंमें मनकी सम्पूर्ण मलिनता
और दुर्बलता बलिदान करनेसे मनुष्य शक्ति-लाभ कर
सकता है। हमारे अन्दर अनन्त शक्ति निहित है। उसी
शक्तिको जगाना होगा। पूजाका उद्देश्य है मनमें शक्ति-
को जगाना। हर एकको शक्तिका ध्यान कर पांचों
इन्द्रियों तथा काम आदि रिपुओंका उसके चरणोंपर
बलिदान करना चाहिये। पंच प्रदीपका अर्थ है पांचों
इन्द्रियां। पांचों इन्द्रियोंकी सहायतासे माकी पूजा होती
है। हमारे आंखें हैं इसीलिये हम रूपकी कल्पना करते हैं,
नाक है इसलिये धूपादि सुगन्धित द्रव्य जलाते हैं आदि।
बलिका अर्थ है, कामादि रिपुओंकी बलि करना। बकरा
कामका ही रूप विशेष है।
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चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
साधनासे एक तरफ शत्रुओंका नाश दूसरी तरफ
सद्वृत्तियोंका विकास होता है। रिपुओंके नाशके साथ
ही साथ हृदय दिव्य भावसे पूर्ण हो उठता है। तथा
जैसे ही दिव्य भाव हृदयमें प्रवेश करते हैं, दुर्बलताएं
भाग जाती हैं।
रोज (संभव हो तो) इसी प्रकार ध्यान करना।
कुछ दिन अभ्यास करनेके बाद हृदयको शक्ति मिलेगी,
शान्तिभी अनुभव करोगे। स्वामी विवेकानन्दकी किताबें
पढ़ सकते हो, उनके पत्र और व्याख्यान सब कुछ मिलेंगे।
“पत्रावलि” और व्याख्यान पढ़े बिना और किताबें पढ़ना
ठीक नहीं। Philosophy of Relegion, jnan yoga” इस
तरहकी किताबें पहले मत पढ़ना। इसके बाद साथ-साथ
“श्री श्री रामकृष्ण कथामृत” पढ़ सकते हो। रवि बाबूकी
अनेक कविताओंमें काफी inspiration मिलेगा। डी०
एल राय की, मेवाड़ पतन, दुर्गादास आदि किताबें पढ़ने-
से शक्ति मिलती है। बंकिमबाबू और रमेशदत्तके ऐति-
हासिक उपन्यास खूब शिक्षाप्रद हैं। नवीनसेनका ‘पलासी-
का युद्ध’ पढ़ सकते हो। शिखेर बलिदान, शायद श्रीमती
कुमुदनी वसुकी लिखी हुई अच्छी किताब है। Victor
Hugo का Les Mesrables संभवतः पुस्तकालयमें होगी,
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तरुणके स्वप्न
पढ़ना, अच्छी सीख मिलेगी। जल्दीमें अभी अधिक
किताबोंकी तालिका नहीं दे सका। समय मिलनेपर
सोचकर एक तालिका भेजूंगा। इति—
२
मान्डला जेल
स्वास्थ्योन्नतिकेलिये रोज व्यायाम करो तो बड़ा
उपकार होगा। Mullar की ‘My System’ नामक
किताब कहींसे लेकर उसके अनुसार व्यायाम करना
अच्छा होगा। मैं मूलरके बताये व्यायाम अक्सर किया
करता हूं, उनसे लाभ पाता हूं। मूलरके बताये व्यायाम-
की विशेषताएँ हैं कि (१) कुछ खर्च नहीं होता और
थोड़ी ही जगहमें व्यायाम हो जाता है (२) व्यायाममें
अतिरिक्त परिश्रम नहीं होता इसलिये अधिक परिश्रमसे
होनेवाली क्षति नहीं होती (२) सिर्फ अंगविशेषकी चालना
नहीं होती बल्कि सभी मांसपेशियोंकी कसरत होती है।
(४) परिपाक शक्ति बढ़ती है।
मेरा ख्याल है, हमारे देशमें, विशेषकर छात्रोंमें मूलर-
के व्यायामका विशेष प्रचार हो तो बहुत उपकार हो।
रोजमर्राका काम करके ही सन्तोष कर लेनेसे कुछ
नहीं होगा। इन सब कामोंका जो उद्देश्य या आदर्श है,
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चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
यानी आत्म-विकास-साधन, उसे नहीं भूलना चाहिये ।
काम करते रहना ही जीवनका मूल उद्देश्य नहीं है, बल्कि
कामके बीचमेंसे चरित्रका विकास और चरित्रका सर्वा-
ङ्गीण विकास आवश्यक है । यद्यपि प्रवृत्ति और व्यक्तित्व-
के अनुसार व्यक्तिको एक तरफ विशेषत्व प्राप्त करना
होगा, किन्तु इस विशेषत्वके मूलमे सर्वाङ्गीण विकास
चाहिये । जिस व्यक्तिकी सर्वाङ्गीण उन्नति नहीं होती
उसके मनको शांति प्राप्त नहीं होती, वह भीतरसे सुखी
नहीं होता, उसके मनमे एक शून्यता, एक अभाव आखिर-
तक रह जाता है । इस सर्वाङ्गीण विकासकेलिये आव-
श्यक है; (१) व्यायाम चर्चा (२) नियमित अध्ययन (३)
दैनिक ध्यान और चिन्तन । कार्यकी अधिकतासे बीच-
बीचमे इनकी तरफसे नजर फिर जाती है या ध्यान रहने-
पर भी समय नहीं रहता, किन्तु कार्यभार कम होते ही
इनकी तरफ ध्यान देना चाहिये । दैनिक काम करके
ही निश्चिन्त हो जानेसे नहीं चलेगा, उसीमें से व्यायाम,
पठनपाठन और ध्यान चिन्तनकेलिये भी समय निका-
लना होगा । इन तीनों अत्यावश्यक कामोंकेलिये यदि
आदमी प्रति दिन डेढ़ दो घण्टे भी निकाल सके तो बड़ा
लाभ हो । मूलरका कहना है कि रोज उसके कहनेके
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तरुणके स्वप्न
अनुसार पन्द्रह मिनट भी व्यायाममें खर्च करे तो यथेष्ट
हैं और पन्द्रह मिनट ध्यान चिन्तामें लगावे तो कुल आधा
घण्टा हुआ। एक घण्टा पढ़नेके लिये रखा जाय तो कुल
डेढ़ घण्टा हुआ, इसमें रोजाना अखबार पढ़ना शामिल
नहीं है। फिर जितना ज्यादा समय दे सको, उतना ही
लाभ होगा। हर एकको अपनी सुविधाके अनुसार डेढ़
घण्टा निकाल लेना होगा। ध्यान धारणाके सम्बन्धमें
पिछले पत्रमें कुछ लिखा है, इसीलिये इस पत्रमें नहीं
लिख रहा हूं। मैं पुस्तकोंकी तालिका दे रहा हूं। ये
किताबें सालभर पढ़नेके लिये काफी हैं।*
प्राथमिक शिक्षा और उच्च शिक्षाका एक बड़ा फर्क
यही है कि प्राथमिक शिक्षामें facts का परिचय रहता
है और उच्च शिक्षामें उसके साथ विश्लेषण और व्याख्या
जुड़ जाती है। प्राथमिक शिक्षामें ऐन्द्रिक शक्तिपर
विशेष निर्भर रहना पड़ता है। उच्च शिक्षामें ऐसी बातें
सिखलायी जाती हैं जिसे छात्र देख नहीं पर समझ सकता
है। और एक बात है सिखानेके समय इन्द्रियकी सहा-
यता जितनी अधिक ली जायगी, सीखनेवालेको सीखने-
में उतनी ही आसानी होगी। जैसे-बांसुरी या इसी
- मूल पुस्तकमें कुछ बंगला पुस्तकोंका उल्लेख है।
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तरहका बाजा सिखाना हो तो, छात्र यदि बांसुरीको
देखे, छुए, बजाकर उसकी आवाज कानसे सुने तो
बांसुरी बजाना बहुत शीघ्र जान जायगा। क्योंकि दृष्टि-
शक्ति, श्रवण शक्ति, स्पर्श शक्तिको उसने एक साथ
काममें लगाया। गोदका बच्चा कोई चीज देखते ही उसे छूना
चाहता है, खाना चाहता है, उसका कारण यही है कि
बालक सब इन्द्रियोंसे बाहरका ज्ञान प्राप्त करना चाहता
है। इसलिये प्रकृतिके नियमके अनुसार यदि सब इन्द्रियों-
से ज्ञान प्राप्त करनेका प्रयत्न किया जाय तो बहुत ही
शीघ्र फल मिलेगा। गणित मुखस्थ न कराकर यदि हम
छात्रको ईंट पत्थर या काठके टुकड़ोंसे उसे इस विषय-
की शिक्षा दें तो वह आसानीसे समझ सकता है।
और एक बात है, मानसिक शिक्षाके साथ ही साथ
शिल्प शिक्षाकी व्यवस्था भी होना चाहिये। खिलौने
बनाना, मिट्टीसे मानचित्र बनाना, तसवीर बनाना, रंगों-
का व्यवहार करना, गाना सिखाना आदिकी व्यवस्था
भी होना चाहिये। इससे शिक्षा सर्वांग पूर्ण होगी
यह नहीं बल्कि लिखने पढ़नेमे भी विशेष उन्नति होगी।
पांच तरहकी चीजें सिखानेसे बालकोंकी बुद्धि बढ़ती है,
लिखने पढ़नेमें मन लगता है और वे पढ़नेका नाम सुनते
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तरुणके स्वप्न
ही भगाते नहीं हैं। पांच तरहकी चीज न सीखकर यदि
“रट्टू” पढ़ाई ही पढ़ाई जाय तो बालक लिखने पढ़नेसे
दूर भगाता है और उसकी बुद्धि विकसित नहीं होती।
बालककी आंखें, नाक, कान, हाथ यदि उपयोग और
जाननेकी चीज पायेंगे तो ये सब इन्द्रियां सजग हो
जायंगी, जिसके फलस्वरूप उसकी बुद्धि और मन जाग-
रित होगा और सब तरहका ज्ञान पानेके कारण लिखने
पढ़नेमें उसका मन लगेगा। Manual traning के बिना
शिक्षाकी जड़में मट्ठा पड़ जाता है। अपने हाथसे कोई
चीज बनानेमें जो आनन्द मिलता है वैसा आनन्द पृथ्वी-
पर कम ही है। सर्जन करनेमें गम्भीर आनन्द निहित है।
इसी joy of creation का, बच्चे अपने हाथसे जब
कोई चीज तैयार करते हैं, तब अनुभव करते हैं। चाहे बगीचेमें
पेड़ पौधे लगाकर या मिट्टीके खिलौने बनाकर यानी
किसी भी नयी चीजको बनाकर बच्चे परम प्रसन्न होते
हैं। बच्चे छोटी उम्रमें ही इस तरहका आनन्द प्राप्त कर
सकें ऐसी व्यवस्था होना चाहिये। इसी प्रकार उनकी
Originality या व्यक्तित्वका विकास होगा। वे लिखने
पढ़नेसे न डरकर उसका आनन्द उठाना सीखेंगे। विला-
यतके अधिकांश स्कूलोंमें बच्चे बागवानी, व्यायाम, ड्रिल
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चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
खेल, गाना बजाना सीखते हैं, Route march करते हैं,
जत्थे बनाकर सड़कोंपर घूमते हैं, कथाच्छलसे नाना
देशोंके हाल जानते हैं। बच्चे ये न समझे कि वे लिखना
पढ़ना सीख रहे हैं, बल्कि यह समझें कि वे कहानी सुन
रहे हैं या खेल करते हैं। प्रथमावस्थामें Text Book की
बिलकुल जरूरत नही है। पेड़, पत्ते, फूलोंके बारेमें जो
कुछ बतलाया जाय वह पेड़, पौधे, फूल आदि सामने रख
कर। आकाश, तारे आदिके बारेमें जब शिक्षा दी जाय
तब मुक्त आकाशके नीचे ले जाकर। जिस चीजकी शिक्षा
दो वह सब इन्द्रियोंके सामने उपस्थित हो। भूगोल
सिखानेके समय ग्लोब, मानचित्र आदि रहना चाहिये।
इतिहास सिखलानेके समय सुविधा अनुसार म्युजियम
आदिमें ले जाना चाहिये। मामूली ढङ्गपर भी विद्यालय
हो तो गानेकी शिक्षा, Painting, drawing, garden-
ing आदि की शिक्षा देना चाहिये। असल बात यह है
कि पाठ्य वस्तुका वास्तविक ज्ञान होना चाहिये, पाठ
रट लेना उतना प्रयोजनीय नहीं है।
मैंने प्राथमिक शिक्षाके Principles या नीतिके स-
म्बन्धमें कुछ कहा। Text Book की बात ऐसे ही नहीं
कह दी। Text Book का प्रयोजन कम है ही, जो पाठ्य
५ ६५
तरुणके स्वप्न
पुस्तकें रखना होगा, उनका Importance खूब कम है,
अच्छे अध्यापकके बिना प्राथमिक शिक्षा सफल नहीं हो
सकती। शिक्षाको सर्वप्रथम शिक्षाका Fundamental
principles समझना होगा। उसके बाद नवीन शिक्षा
प्रणाली चलायी जा सकती। उसे अपने प्रेम और सहा-
नूभूतिसे विद्यार्थियोंकी पूरी देख भाल करना होगा।
यदि शिक्षक छात्रकी अवस्थामें अपने आपको नहीं रखेगा
तो वह किस तरह छात्रोंकी Difficulty और भूल भ्रांति
समझ सकेगा। और Personality of teacher सबसे
मुख्य बात है। शिक्षाके तीन प्रधान उपादान हैं। (१)
शिक्षकका व्यक्तित्व (२) शिक्षाकी प्रणाली (३) शिक्षा-
का विषय और पाठ्य पुस्तक। शिक्षकमें व्यक्तित्व न हो
तो किसी तरहकी शिक्षा संभव नहीं हो सकती। चरित्र-
वान व्यक्तित्व सम्पन्न शिक्षक मिलनेपर हमें शिक्षाप्रणाली
निर्धारित करना होगा। योग्य शिक्षक मिले और शिक्षा
प्रणाली निर्धारित हो जाय तो किसी भी विषयकी
पुस्तक पढ़ायी जा सकती है।
आशा है तुम प्रसन्न होगे। इति
३
तुम्हारा पत्र यथा समय मिला, उत्तर देनेमें बिलम्ब
हुआ, कुछ खयाल न करना। आशा करता हूं तुम मान-
६६
चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
सिक अशांति दूरकर प्रसन्नचित हो सब काम करते
रहोगे। Milton ने कहा है। "The mind is its own
place and can make a hell of heaven and a
heaven of hell." निश्चय ही इस उक्तिको व्यवहारमें
लाना हर समय संभव नहीं होता। किन्तु आदर्शको
सामने रखे बिना जीवनमे आगे बढ़ना असम्भव है।
वस्तुतः जीवनकी कोई भी अवस्था अशांतिहीन नहीं है,
यह बात भूलनेसे काम नहीं चलेगा।
अपने छुटकारेकी बात अब मैं नही सोचता, तुम लोग
भी मत सोचना भगवानकी कृपासे यहां मुझे मानसिक
शांति मिली है, जरूरत होनेपर यहां सारा जीवन व्यतीत
कर सकता हूं, ऐसी ताकत पा गया हूं, यही विश्वास
होता है। मेरी शुभेच्छाका कोई प्रभाव नहीं है, किन्तु
विश्वजननीका शुभाशीर्वाद चर्मकी तरह सर्वदा तुम्हारी
रक्षा करें। और मैं क्या लिखूं ? विश्वजननीमें विश्वास
और भरोसा रखना। तुम उसकी कृपासे सम्पूर्ण विपत्ति
और मोहसे उत्तीर्ण हो जाओगे। मनमें सुख शांति न
रहने पर, बाहरका अभाव दूर होनेपर भी मनुष्य सुखी
नहीं हो सकता। इसलिये संसारके सब काम करते रहने-
पर भी विश्वजननीके प्रति हृदयको अर्पण करना चाहिये।
इति।
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तरुणके स्वप्न
〰〰〰〰〰〰〰
("आत्म शक्ति" सम्पादक श्रीगोपाल लालको लिखे
हुए पत्रका अंश)
इनसिन जेल
५ अप्रैल, १६२७
परम प्रीति भाजनेषु,
आपका ५ वीं चैत्रका पत्र पाकर आनन्दित हुआ,
आपने अनेक प्रश्न किये हैं क्या उत्तर दूं, मालूम नहीं।
बहुत बातें लिखनेकी इच्छा होती है, पर लिखी जा सकती
है क्या ?
शरीरके सम्बन्धमें कोई नयी बात नहीं कहना है,
"यथा पूर्वम् तथा परम्" परिणाम क्या होगा मालूम नहीं;
अब शरीरकी चिन्ता नहीं करता। पिछले महिनोंमें मेरे
मनकी गति कुछ भिन्न धाराओंकी तरफ द्रुत वेगसे गयी
है। मेरी यह धारणाबद्ध मूल होती जा रही है कि जीवन-
को सोलहों आना देनेके लिये तैयार न होने पर मेरुदण्ड-
को सीधा रखना मुश्किल है। जीवन प्रभातमें यही
प्रार्थना हृदयमें रखकर अवतीर्ण हुआ था,—"तोमार
पोताका जारे दाओ तारे बोहिबार दाओ शक्ति।" भविष्य-
की बात तो नहीं कह सकता पर अभीतक वह शक्ति भग-
बान देते आ रहे हैं। इसीलिये मैं बहुत सुखी हूं, बीच-
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चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
बीचमें मनमें सवाल होता है, मेरे समान सुखी दुनियांमें
कितने हैं ? इस समय वक्ताकार उन्नत प्राचीरसे निकलने-
की आशा जितनी दूर जा रही है, उसी अनुपातसे मेरा
चित्त शान्त और उद्व ग शून्य हो रहा है । आत्मस्थ होना
और अपने आत्म-विकासके श्रोतमें जीवन नौका
वहा देनेमें परम शान्ति है और अधिक समयतक बन्द
रहनेमें भीतरी शान्ति ही एकमात्र सहारा है। अधिक
कालतक कारावासमें रहनेकी सम्भावनामें मैंने अपूर्व
शान्ति पायी है Emerson ने कहा है, We must live
wholly from within इसका अक्षर अक्षर सत्य है और
इस सत्यके प्रति मेरा विश्वास दिन-दिन दृढ़ होता जा
रहा है ।
मेरे समान जिनका जीवन है वे यदि बाहरकी घटना-
से जीवनकी सफलता और विफलता निद्धारित करें तो;
‘मृत्युरेव न संशयः’ जिस कांटेसे हमारी ( बन्दियोंकी )
हालत वजन की जाती है, वह कांटा बाहरका नहीं भीतर-
का होना चाहिये । क्योकि बाहरी हिसाबसे तो हमारा
जीवन शून्य है। यहीं यदि यवनिका पात हो तो संसार-
पर तो हमारे जीवनकी स्थायी छाप नहीं भी रह सकती
है । किन्तु जीवनमें यदि और काम न भी कर सकू ं तो,
६६
तरुणके स्वप्न
आदर्शको वास्तव द्वारों प्रस्फुटित न कर सकूँ तो भी
जीवन व्यर्थ न होगा। महान आदर्शको यदि प्राणोंमें रखे
रहूँ, आदर्शके साथ अपना जीवन मिला दूँ तो मैं सन्तुष्ट
हूँ। मेरा जीवन दुनियाकी नजरोंमें व्यर्थ होनेपर भी, मेरी
नजरोंमें (मालूम होता है भगवानकी दृष्टिमें भी) व्यर्थ
न होगा। दुनियामें सभी चीज क्षणभंगुर हैं, सिर्फ एक
चीज अविनाशी है, नष्ट नहीं होती, वह है भाव या
आवेग। हमारा आदर्श, हमारी आशा, आकांक्षा, चिन्ता-
धारा अविनाशवर है। आपको क्या दिवालोंसे घेरकर
कोई रख सकता है ?
पूर्ण रूपसे उत्सर्ग करनेके लिये दूसरी तरफ आदर्श-
को पूर्ण रूपसे ग्रहण करना होगा। यानी आदर्शकी पूर्ण
प्राप्तिके लिये अपना पूर्णोत्सर्ग चाहिये। त्याग और उप-
लब्धि,—renunciation and realisation एक ही
चीजके दो पहलू हैं। इस समय आदर्शको सम्पूर्णतः
उत्सर्ग करनेके लिये मेरे प्राण व्याकुल हो उठे हैं।
जिन्होंने इतनी दुर्बलताके बीचमे मुझे शक्तिके उच्च
चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
बहुत दिन हुए systemetic study छोड़नेके लिये
बाध्य हुआ हूं, राष्ट्रीयताकी भित्ति स्वरूप जो कुछ मूल
समस्याएं हैं उनके समाधानके लिये लिखना-पढ़ना और
गवेषणा शुरू की थी। आजकल वह काम बन्द है। फिर
कब शुरू कर सकूं'गा मालूम नहीं। बाहर निकळनेपर यह
काम न कर सकूं'गा इसलिये यहीं काम खत्म कर लेना
चाहता हूं। मेरे कारावासका काम शायद अभीतक समाप्त
नही हुआ इसलिये जानेमे विलम्ब हो रहा है।
भगवान आप सबको प्रसन्न रखें तथा उनका
आशीर्वाद हमेशा आपको प्राप्त हो यही मेरी प्रार्थना है,
इति—
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जेल और कैदी
[ श्री दिलीपकुमार रायको लिखे गये दो पत्र ]
माण्डला जेल
२—५—२५
प्रिय दिलीप,
तुम्हारी २४-३-२५ की चिट्ठी पाकर आनन्दित हुआ।
तुमने शंका की थी कि बीच-बीचमें जैसा होता रहता है,
चिट्ठियोंको भी "double distiletion" के बीचमेंसे आना
होगा किन्तु इस बार ऐसा नहीं हुआ इसलिये बहुत
प्रसन्न हूं।
तुम्हारी चिट्ठी हृत्तन्त्रीका इस प्रकार कोमल भावसे
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