तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)
Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा
पृष्ठ 58, कुल 174 में से
संदर्भ में पढ़ेंचरित्र गठन और मानसिक उन्नति
भीतरके संयमके बिना बाहरका संयम स्थायी नहीं
होता। और एक बात है, व्यायामसे जैसे शरीरकी
उन्नति होती है, उसी प्रकार साधनासे सद्वृत्तियां जाग-
रित होती हैं और भीतरी शत्रुओंका नाश होता है।
साधनाके उद्देश्य दो हैं—भीतरी शत्रु-भय, काम, स्वार्थ-
परतापर विजय पाना (२) प्रेम, शक्ति, बुद्धि, त्याग
आदि गुणोंका विकाश होना।
काम जयका प्रधान उपाय है स्त्री मात्रमें मातृरूपका
दर्शन करना और स्त्री मूर्त्ति (दुर्गा, काली आदि) में
भगवानका चिन्तन करना। स्त्रीमूर्त्तिमें गुरु या गोविन्द-
का ध्यान करनेसे मनुष्य स्त्री मात्रमें भगवान देखनेका
अभ्यस्त हो जाता है। इसीलिये महाशक्तिको मूर्त्त करते
समय हमारे पूर्व पुरुषोंने स्त्री मूर्त्तिकी कल्पना की थी।
व्यावहारिक जीवनमें स्त्री मात्रको मा के भावसे देखते
रहनेसे मन क्रमशः पवित्र और शुद्ध हो जाता है।
भक्ति और प्रेमसे मनुष्य निस्वार्थ हो जाता है। मनु-
ष्यके हृदयमें जब किसी आदर्शके प्रति प्रेम और भक्ति
बढ़ती है, तब उसी अनुपातमें स्वार्थपरता कम हो जाती
है। प्रेम करते करते भक्त क्रमशः सम्पूर्ण संकीर्णता
छोड़कर विश्वमें लीन हो जाता है। मनुष्य जिस विषय
५७