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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 174 में से

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चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
यानी आत्म-विकास-साधन, उसे नहीं भूलना चाहिये ।
काम करते रहना ही जीवनका मूल उद्देश्य नहीं है, बल्कि
कामके बीचमेंसे चरित्रका विकास और चरित्रका सर्वा-
ङ्गीण विकास आवश्यक है । यद्यपि प्रवृत्ति और व्यक्तित्व-
के अनुसार व्यक्तिको एक तरफ विशेषत्व प्राप्त करना
होगा, किन्तु इस विशेषत्वके मूलमे सर्वाङ्गीण विकास
चाहिये । जिस व्यक्तिकी सर्वाङ्गीण उन्नति नहीं होती
उसके मनको शांति प्राप्त नहीं होती, वह भीतरसे सुखी
नहीं होता, उसके मनमे एक शून्यता, एक अभाव आखिर-
तक रह जाता है । इस सर्वाङ्गीण विकासकेलिये आव-
श्यक है; (१) व्यायाम चर्चा (२) नियमित अध्ययन (३)
दैनिक ध्यान और चिन्तन । कार्यकी अधिकतासे बीच-
बीचमे इनकी तरफसे नजर फिर जाती है या ध्यान रहने-
पर भी समय नहीं रहता, किन्तु कार्यभार कम होते ही
इनकी तरफ ध्यान देना चाहिये । दैनिक काम करके
ही निश्चिन्त हो जानेसे नहीं चलेगा, उसीमें से व्यायाम,
पठनपाठन और ध्यान चिन्तनकेलिये भी समय निका-
लना होगा । इन तीनों अत्यावश्यक कामोंकेलिये यदि
आदमी प्रति दिन डेढ़ दो घण्टे भी निकाल सके तो बड़ा
लाभ हो । मूलरका कहना है कि रोज उसके कहनेके
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