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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

तरुणके स्वप्न
आपलोगोंको पहचाननेमें कष्ट या असुविधा नहीं
है, आशा है आप सब सकुशल होंगे। मेरा प्रीतिसंभाषण
और आलिंगन ग्रहण करें। इति
३८

समाज-सेवा और गृह-शिल्प
[ श्री० अनिल बन्धुको लिखे गये पत्रका अंश ]
माण्डला जेल ।
सविनय निवेदन,
आपका पत्र पाकर और सब समाचार जानकर आन-
न्दित हुआ। कार्यसमितिके अधिकांश सदस्य सेवाश्रमके
कामोंमें दिलचस्पी नहीं लेते इससे आप निराश या चिंतित
न हों। अधिकांश कार्यकारिणी समितियोंकी यही
हालत है। अपनी सेवा और लगनसे ही दूसरोंमें सेवा
और लगनकी भावना जगाना होगा। गांवमें दूसरेके
दुःखके प्रति संवेदना और आग्रहका भाव जाग्रत हुए
२६

प्रथम खण्ड: जीवन-लक्ष्य, आत्म-विकास एवं साधना-पथ

तरुणके स्वप्न

बिना सेवाकार्य संभव नहीं होता। इसके बिना यदि
सम्भव भी हो तो सार्थक नहीं होता। आपकी आन्तरिक
सेवा और लोकप्रियताके कारण दूसरोंके हृदयोंमें भी
वैसे ही भाव जागरित होंगे, यही मेरा विश्वास और
आकांक्षा है।
सेवाश्रम-भवनके साथ फुलवारी लगाने लायक जमीन
है क्या ? महीनेमें १४० तकका चन्दा आ जाता है सुन-
कर सुखी हुआ। मकानका किराया क्या है ? मकान
कितने तल्लोंका है तथा कुल कितने कमरे हैं? कारपो-
रेशन प्राइमरी स्कूलमें कितने छात्र हैं और किस जातिके
छात्र पढ़ने आते हैं। सेवाश्रमके छात्रोंको किस तरहकी
शिक्षा दी जाती है, इसका विवरण भेजियेगा। सेवाश्रम-
में नौकर हैं क्या ? यदि हैं तो कितने हैं ? भोजन कौन
बनाता है ? बालकोंमें कितने तांत और Sewing machine
का काम सीखते हैं। बुननेका काम और सीनेका (साधा-
रण कोट, कुर्ता आदि ) कितने दिनमें सिखलाया जा
सकता है।
बालकोंका average intelligence कैसा है?
सेवाश्रमके सम्बन्धमें यथासंभव विस्तृत विवरण भेजि-
येगा। उसे पढ़कर कुछ परामर्श देनेकी चेष्टा करूंगा।
४०

समाज-सेवा और गृह-शिल्प
बालकोंके भोजनकी क्या व्यवस्था है ? बीमारीमें चिकि-
त्साका क्या इन्तजाम है ? चिकित्सा और दवाके लिये
दाम देने पड़ते हैं कि नहीं ? इति—
२
मान्डला जेल
✽ ✽ ✽ ✽
सम्भव है आपने अबतक सुन लिया होगा कि हमारा
अनशन व्रत बिलकुल निरर्थक या निष्फल नहीं हुआ ।
सरकार हमारे धार्मिक अधिकार माननेको बाध्य हुई ।
अबसे बंगालके बन्दी पूजा ( दुर्गापूजा ) के खर्चके लिये
३०) रुपये एलाउन्स allowance पायेंगे, तीस रुपये बहुत
कम हैं और इससे हमारा खर्चा पूरा न होगा, किन्तु जिस
principle को सरकार अब तक मानना नहीं चाहती
थी, उसे अब स्वीकार कर लिया है, यही हमारे लिये
सबसे बड़ा लाभ है । रुपयेकी बात तो सब जगह, सब
समय, बिलकुल मामूली बात है ? पूजा करने देनेकी मांग-
के सिवा सरकारने हमारी अन्य मांग स्वीकृत की है ।
वैष्णव भाषामें कहने जानेपर इसे इस तरह कहना होगा
कि “एहि बाह्य” । यानी अनसनव्रतका सबसे बड़ा
४१

तरुणके स्वप्न

लाभ अन्तरका विकाश और आनन्दलाभ है, मांग स्वी-
कार करा लेनेकी बात तो बाहिरी लौकिक बात है।
Suffering के सिवा मनुष्य कभी भी अपने आन्तरिक
आदर्शके साथ अभिन्नता महसूस नहीं कर सकता और
कसौटीपर चढ़े बिना मनुष्य कभी स्थिर निश्चित भावसे
नहीं कह सकता कि उसके भीतर कितनी अपार शक्ति
है। इसी अभिज्ञताके आधारपर मैं अब अपनेको और भी
अच्छी तरह पहचान सका हूं तथा अपने पर मेरा विश्वास
सौ गुना बढ़ गया है।
❉ ❉ ❉ ❉
Social Service के द्वारा हमें गृहशिल्प-प्रतिष्ठा-
की चेष्टा करना होगा। Commercial Museum,
Bengal Home Industries Association आदि
प्रतिष्ठान या दूकान देखनेसे हमारे मनमें नवीन
भाव आ सकते हैं। बंगाल गवर्नमेंट द्वारा प्रकाशित
शिल्प-विभागकी वात्सरिक रिपोर्ट (Administration
Report of the Department of Home Industries)
देखनेसे भी हमारा लाभ हो सकता है। सबसे आवश्यक
बात यह है कि जहां गृहशिल्प हों वहां जाकर अपनी
आंखोंसे देखने और जाननेसे ही लाभ हो सकता है।
४२

समाज-सेवा और गृह-शिल्प
कुटीर-शिल्पके लिये बहुत बड़ी रकम चाहिये, ऐसा मेरा
विश्वास नहीं है। सबसे पहले जरूरी यह है कि सभाका
एक सदस्य ऐसा होना चाहिये जो सिर्फ इसी विषयमें
दिलचस्पी रखे, इस विषयकी सब बातें जाने और पुस्त-
कादि पढ़े तथा जहां कुटीर-शिल्प चलनेकी जरा भी
सम्भावना हो वहां जाकर अपनी आंखोंसे सब कुछ
देखे सुने। जब काम चलानेका निश्चय हो जाय तब
जिसके जिम्मे काम चलानेका भार हो उसे पहलेसे उस
कामकी शिक्षाके लिये उपयुक्त स्थानपर भेजकर शिक्षा
दिलवाना चाहिये। पहलेसे ही Polytechnic Institute
में भेजनेका प्रयोजन नहीं है। Electroplating का काम
सिखानेकी जरूरत नहीं है। क्योंकि सिलाईका काम अपने
यहां सिखाया ही जाता है और Electroplating सिखाने
से कोई फायदा नहीं होगा। मुझे जहांतक याद है, मैं एक
बार वहां गया हूं। Polytechnic के सब कामोंमें वेतका
सामान बनाने और मिट्टीके खिलौने आदि बनानेका काम
गृह-शिल्पके ढङ्गपर चलाया जा सकता है। इसमें भी वेतके
कामके बारेमें मुझे सन्देह है कि स्त्रियोंसे यह काम कर-
वाया जा सकेगा या नहीं ? अब यदि मिट्टीके खिलौने आ-
दिका काम चलानेका विचार हो तो कोई भी एक आदमी
४३

तरुणके स्वप्न
वहां जाकर कुछ ही दिनोंमें सीखकर आ सकता है।
इसमें खर्च भी कुछ न बढ़ेगा और जब यह काम शुरू
किया जायगा, तब सिर्फ रंगोंमें कुछ खर्च करना पड़ेगा,
इसके सिवा और खर्च बहुत कम होगा। सौ बातकी
एक बात यह है कि एक आदमीको इसीके पीछे हाथ
धोकर पड़ जाना होगा, He must become mad
over it.
और एक बात बार बार मेरे मनमें आती है, सम्भव
है पहले भी इस विषयमें लिख चुका हूं, बटन तैयार करने
के सम्बन्धमें। ढाका जिलेमें अनेक गांवोंमें यह काम
होता है। गरीब गृहस्थ अपने फुरसतके समय यही काम
करते रहते हैं। एक आदमीको बहुत शीघ्र ही यह काम
सिखाया जा सकता है। अथवा एक ऐसे आदमीको
नियुक्त किया जा सकता है जो यह काम जानता हो और
सिखा सकता हो।
अखबारमें विज्ञापन देनेसे ऐसा आदमी मिल सकता
है। मेरा ख्याल है कि पत्थरपर घिसकर बटन तैयार किये
जा सकते हैं। छेद करने और गोल काटनेके लिये यंत्रकी
जरूरत पड़ेगी। कुछ यंत्र और एक बोरा सीप और घोंघा
से ही काम शुरू किया जा सकता है। जिनको सहायता-
४४

समाज-सेवा और गृह-शिल्प
की जरूरत है उन्हीसे यह काम शुरू करवाना चाहिये,
किन्तु काम चल निकलनेपर गरीब गृहस्थ अपनी आय
बढ़ानेके लिये यह काम खुद ही करने लगेंगे। समिति
सस्ते भावमे raw materials दे और तैयार माल बेचने-
का प्रबन्ध करे। यह काम शुरू करनेपर पहले इसमें काफी
समय लगाना होगा। इति—
३
माण्डला जेल
आपने पहले जो कागजात भेजे थे, वे सब मिल गये
थे। कल पुस्तकालयका सूचीपत्र आदि मिला। समिति-
का कार्य दिनों दिन बढ़ रहा है, उससे मैं कितना आन-
न्दित हूं, यह लिख नही सकता।
* * *
आप लोगोंने खर्चा बाद देकर इतने रुपये जमा कर
लिये यह जानकर सुखी हुआ। चरखा, सूता आदिके
विषयमे आपने जो कुछ लिखा है, उससे मैं सहमत हूं।
तब भी अभीसे कोशिश बन्द नही करना चाहिये। आपने
पहले एक पत्रमें लिखा था कि रूईकी खेतीकेलिये एक
महाशय अस्सी बीघा जमीन देनेको तैयार हैं, वे महाशय
४५

तरुणके स्वप्न
अभी भी तैयार हों तो रूईकी खेतीमें पहले पहले अधिक
खर्च नहीं पड़ेगा। दो एक मालियोंके वेतन और बीजोंके
दाम लायक रुपयोंका प्रबन्ध करनेसे साल भरमें ही हमें
उसका फल मिल जायगा। कृषि विभाग ( Agricul
tural Department ) से यह जान लेना होगा कि किस
जातिकी रूईके बीज बोने चाहिये। जिन गृहशिल्पोंका
श्रीगणेश कर चुके हैं,उनमें यदि नुकसान न हो,थोड़ा लाभ
भी हो तो चलाते रहियेगा। फिर अधिक लाभका काम
चल जानेपर यह काम बन्द किया जायगा। इस समय
जो शरणागत हैं उनसे कुछ न कुछ काम अवश्य कराना
चाहिये। भीख मांगना छोड़कर जब वे काम करने लगेंगे
तब उन्हें लाभ जनक व्यवसायमें लगा देनेसे बहुत उत्तम
फल मिलेगा। फिलहाल 'गृहशिल्पमें आर्थिक लाभ न भी
हो तो काम करनेकी तरफ रुचि और dignity of la-
bour की भावना जगाने और बढ़ानेसे समाजका बड़ा
लाभ होगा। कुटीर शिल्पके सम्बन्धमें यदि आप श्री
मदनमोहन बर्मनसे मिलें तो बड़ा अच्छा हो।
बड़ी, आचार, चटनी आदि तैयार हों तो ये चीजें
भी चल सकती हैं। स्त्रियां, विशेषकर विधवाएं यह काम
आसानीसे कर सकती हैं। किन्तु ये काम सिखानेवाला
४६

आदमी मिल सकेगा क्या ? बाजारमें बेचनेकेलिये इन
चीजोंका बहुत उत्तम होना जरूरी है । यदि अच्छी चीज
तैयार होनेकी संभावना हो तो इसका experiment
किया जा सकता है । Raw materials देकर आप
तैयारी माल ले सकते हैं, बिक्रीकी जिम्मेदारी आपकी
रहेगी । या वे खुद ही raw materials संग्रह कर माल
तैयार कर आपके पास आकर बेच जा सकती हैं। काम
शुरू करनेसे पहले दूकानदारसे बातचीत करना जरूरी है
कि वे हमारा माल लेंगे या नहीं। Raw materials अच्छा
होनेसे माल अच्छा बनेगा,पर इसमें चोरीकी भी सम्भावना
है। जो ये काम करेंगी वे गरीब होंगी,फिर वे आम, नींबू,
तेल, मिर्च आदि पानेपर उन्हें अपने उपयोगमें लानेके
लिये नहीं ललचायंगी, यह कौन कह सकता है ? फिर
यदि वे खुद raw materials लेंगी तो तेल वगैरह सस्ता
ले सकती हैं और फलस्वरूप चीज बढ़िया तैयार न
होगी। इस सम्बन्धमें आप दोनों तरफकी बातें सोच
समझ कर ही कुछ निर्णय करें। इसके सिवा यह जानना
भी जरूरी है कि बाजारमें इन सब चीजोंके खरीद्दार
कैसे हैं? मेरा ख्याल है कि conscientious recipients
नहीं मिलनेपर इस काममें सफलता नहीं मिल सकती ।

४७

तरुणके स्वप्न
गरीब भले गृहस्थों द्वारा यह काम चल सकता है। माल
तैयार होकर आते ही उसका दाम या मजदूरी चुका देना
पड़ेगा और मालको न बिकनेतक भण्डारमें रखना होगा।
समितिको एक और काममें हाथ लगाना चाहिये।
कलकत्ते में प्रेसीडेन्सी और अलीपुर दो जेल हैं। जेलके
अस्पतालमें यदि कोई हिन्दू मर जाय और उसके सम्बन्धी
कलकत्तेमे न हों तो उसकी दाह क्रिया उचित रूपसे नहीं
होती,—डोम या मेहतरको पैसे देकर यह काम कराया
जाता है। इस कामकेलिये मुसलमानोंका Burial
Association है, जो मुसलमान कैदीके मरनेकी खबर पाते
ही उचित व्यवस्था करता है। मृत हिन्दू कैदियोंकेलिये
एक ऐसा organization चाहिये। सेवक समिति क्या
इस कार्यका भार ले सकती है ? यदि आपकी राय हो तो
बसन्त बाबूकी मार्फत जेल सुपरिण्टेण्डेण्टको पत्र लिखा
जा सकता है कि सेवक समिति इस कार्यका भार लेनेके
लिये तैयार है। आप यदि इस सम्बन्धमे कोई व्यवस्था न
कर सके तो मैं जेलसे आनेपर इस सम्बन्धमें विशेष
प्रयत्न करूंगा। आदमी न होनेपर मैंने खुद कई बार यह
काम किया है। ऐसे काममें स्वयंसेवक बननेकेलिये मैं
हमेशा तैयार हूं।
४८

समाज-सेवा और गृह-शिल्प

गृह-शिल्प चलाना चाहते हों तो एक काम आवश्यक
है। किसी युवकको कासिमबाजार polytechnic या
इसी तरहकी दूसरी संस्थामे काम सीखनेकेलिये भेजना
होगा। कासिमबाजार स्कूलमें मिट्टीके खिलौने और देव-
देवियोंकी मूर्तियां बहुत अच्छी तैयार होती हैं। सहायता
चाहनेवालोंको ऐसे काममें लगाया जा सके तो उनके
द्वारा तैयार माल बङ्गाल भरमें बिक सकता है। यहांपर
एक शिल्प और भी प्रचलित है, रङ्गीन कागजोंसे फूल,
पेड़, पत्तियां, गुलदस्ते, चीनी लालटेन आदि बनाना। ये
चीजें इतनी सुन्दर होती हैं कि देखनेपर एकाएक मनमें
यह बात नहीं उठती कि ये चीजें असली नहीं, बल्कि
कागजकी हैं। भले घरोंके छोटे बच्चे यह काम कर सकते
हैं, यह बिलकुल आसान है।
ढाका जिलेमे कुटीर शिल्पके ढङ्गपर बटन तैयार होते
हैं, वहां घर घरमें यह काम होता है, किसी आदमीको
वहां यह सब देखनेकेलिये भेजा जा सकता है।
स्वास्थ्य विषयक व्याख्यान और मेजिक लालटेनके
प्रदर्शनकी व्यवस्था भवानीपुरकी तरफ करना अच्छा
होगा। जहां गरीब रहते है वहां व्याख्यानकी सख्त जरू-
रत है, यदि सम्भव हो तो मेजिक लालटेन आदि खरीदने
४ ४६

तरुणके स्वप्न
की व्यवस्था कीजिये। प्रदर्शनके लिये तस्वीरें किसीसे
बनवा लेना शायद अच्छा होगा। इति—
४
(दक्षिण कलकत्ता सेवक समितिके अन्यतम कर्मी
श्रीमान् हरिचरण बागचीको लिखे हुए पत्रका अंश)
माण्डला जेल
३-७-२५
तुम्हारे तीन पत्र यथासमय मिले। उत्तर देनेका अव-
सर नहीं मिला, इसके सिवा शरीर भी ठीक नहीं है।
किसी तरहके काममें (लिखने पढ़नेमें भी) मन नहीं
लगता। पहले हफ्तेमें दो पत्र लिख पाता था, अब सिर्फ
एक लिख पाता हूं। फलस्वरूप, उत्तर देनेका अवसर न
मिलनेके कारण दो तीन महिनेकी चिट्ठियां जमा हो
जाती हैं।
Social Service विभागका प्रधान उद्देश्य होना
चाहिये,—गरीबकी सहायता कर उसके द्वारा काम
कराना। सिर्फ दान करना Organised Charity का
उद्देश्य नहीं हो सकता। प्रतिदान न देकर दान ग्रहण
करना आत्म सम्मानकेलिये हानिकर है, यही भाव गरीब
सहायता चाहनेवालोंके मनमें जगाना चाहिये। तब भी
५०

समाज-सेवा और गृह-शिल्प
यदि कोई सहायता लेकर भी बदलेमें काम करना न चाहे,
तो उसकी सहायता बन्द कर देना अच्छा है। पर इसके
पहले दो एक बातोंपर विचार करना जरूरी है।
( १ ) जो सहायता लेता है उसे काम करनेकी फुर्सत
होना चाहिये। यानी यदि कोई विधवा सहायता लेती
हो और उसे गृहस्थीके कामोंसे अवकाश न मिलता हो तो
उससे काम करनेकी जिद्द करना बेकार है। हमे देखना
चाहिये कि सहायता पाकर कोई आलस्यमें समय तो
नहीं बिता रहा है। इसलिये जांच पड़ताल करना आव-
श्यक है। समय और शक्ति रहनेपर भी जो काम नहीं
करते उनकी सहायता बन्द कर देना चाहिये।
( २ ) जिनमें शारीरिक बल नहीं है तथा जिनके यहां
कोई काम करनेवाला आदमी न हो, उनसे काम करानेके
लिये जिद न करना चाहिये।
( ३ ) काम करानेमें vartiey of choice होना
चाहिये, क्योंकि सबसे सब काम नहीं हो सकते। पहले
सहज काम करवाना चाहिये, फिर जरा मुश्किल काम
सिखाना चाहिये ।
( ४ ) जिनसे काम लेना हो उन्हें काम भी सिखाना
चाहिये। अनेक काम ऐसे हैं जिन्हें आदमी जबतक
५१

तरुणके स्वप्न
सीख नहीं लेता, करनेमें सकुचाता है। ऐसे काम आदमी
अपने मनसे करनेके लिये तैयार नहीं होता, किन्तु काम
सीख लेनेपर करने लगता है।
हम भिक्षुक जातिमें परिणत हो गये हैं, इसीलिये
भिक्षुककी मनोवृत्ति एक दिनमें नहीं बदल जायगी। तुम
यदि आशा करोगे कि यह मनोवृत्ति एक दिनमें बदल
जायगी तो निराश होना पड़ेगा। Social service में
असीम धैर्यकी जरूरत है।
तुम्हारा काम होना चाहिये, raw materials, जैसे
रद्दी कागज, घोंघा सीप आदिका प्रबन्ध कर देना। जो
सहायता ग्रहण करते हैं वे raw materials से माल तैयार
कर देंगे। तैयार माल बेचनेकी जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर
है, उसके लिये तुमलोगोंको भिन्न भिन्न दूकानदारोंके
साथ ऐसा प्रबन्ध करना चाहिये कि वे चीजोंको बेच दें।
इन सब चीजोंकी बिक्रीसे जो आय होगी, उसमें खर्चा
बाद देकर जो रकम बच रहेगी उससे आंशिक रूपसे
सहायता दानका काम चल जायेगा। Public Charity
पर हमेशा निर्भर न रहकर स्थायी आयकी व्यवस्था
करना होगा। हां, यह सब काम समय सापेक्ष और
व्ययसाध्य है। पुस्तकालयके लिये किताब न खरीदकर
५२

समाज-सेवा और गृह-शिल्प
लेखकों और भले आदमियोंसे किताबें संग्रह करनेका
प्रयत्न करो।
अनिलबाबूसे कहना,कि पुस्तकालयके लिये hap-haz
ardly पुस्तकें एकत्र न कर,एक method से संग्रह करें।
हां, बिना दाम जो किताबें मिलें, वे रखी जा सकती हैं।
तब भी एक प्रणाली होना चाहिये। पहले बंगला, अंग्रेजी
और यूरोपीय साहित्यके प्रसिद्ध लेखकोंकी किताबें
संग्रह करना चाहिये। इसके बाद भारतका इतिहास तथा
पृथ्वीके सब देशों'का इतिहास संग्रह करो। इसके बाद
विज्ञान सम्बन्धी पुस्तक और महापुरुषोंकी जीवनी संग्रह
करो। साथ ही साथ कृषि, राजनीति, वाणिज्य संबंधी
पुस्तकें भी संग्रह करना चाहिये। एक साथ सब तरह-
की पुस्तकें संग्रह की जा सकें तो बहुत अच्छा है। लगभग
सभी विषयों'की पुस्तकें रखना चाहिये ताकि चाहे जिस
तरहकी रुचिका आदमी हो, मांगनेपर किताब पा सके
रद्दी उपन्यास रखनेकी जरूरत नहीं है, मगर अच्छे उप-
न्यास अवश्य रखने वाहिये। यानी कम खर्चमें एक आदर्श
पुस्तकालय होना चाहिये।
❊ ❊ ❊ ❊
दूर देशसे सूत खरीदकर बहुत समयतक weaving
५३

तरुणके स्वप्न
depot नहीं चलाया जा सकता। जिनकी सहायता करते
हों उनके घरमें तथा समितिके सदस्योंके घरमें सूत
उत्पादनकी चेष्टा करना चाहिये। भवानीपुर या उसके
आसपाससे थोड़ा सूत भी न मिल सका तो तुम्हारा
परिश्रम व्यर्थ है। और भी एक बात जान लेना चाहिये
कि यदि स्थानीय लोग संस्थाकेलिये सूत तैयार करने
लगें तो समझना चाहिये कि संस्थाके प्रति उनकी वास्त-
विक सहानुभूति है। स्थानीय सहानुभूतिके अभावमें
कोई भी प्रतिष्ठान अधिक दिनतक नहीं चल सकता।
ऐसे आदमी भी मिल सकते हैं जो सूत कातेंगे पर
बेचेंगे नहीं, किन्तु उनके काते हुए सूतसे धोती साड़ी
बनाकर दे सको तो वे सूत कातकर देते रहेंगे। पहले
अनेक सूत देकर धोती या साड़ी बनवाते थे। आजकल
की हालत मैं नहीं जानता। तब भी मैं समझता हूं सूत
लेकर धोती साड़ी तैयार करवाकर देनेकी व्यवस्था होना
चाहिये। प्रत्येक सदस्यके घरमे सूत काता जाय इसका
ध्यान रखना चाहिये। इति—
५४

चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
(दक्षिण कलकत्ता सेवक समितिके श्री हरिचरण
बागचीको लिखे गये पत्रका अंश)
माण्डला जेल
तुमने जो लिखा ठीक है, वास्तविक कार्यकर्त्ताका
बड़ा अभाव है। तब भी जैसा उपादान मिलता है उसे
लेकर ही काम चलाना पड़ता है। जीवन न देनेसे जैसे
जीवन नहीं पाया जाता, प्रेम किये बिना प्रतिदानमें जैसे
प्रेम नहीं मिलता, वैसे ही स्वयं आदमी बने बिना आदमी-
को “आदमी” नहीं बनाया जा सकता।
५५

तरुणके स्वप्न
राजनीति का स्रोत क्रमशः जिस प्रकार पंकिल होता
जा रहा है उससे मनमें यही होता है कि कुछ समय तक
राजनीतिसे देशका विशेष उपकार नहीं हो सकता।
सत्य और त्याग—ये दो आदर्श राजनीतिसे जितने ही दूर
होते जाते हैं राजनीतिकी कार्यकारिताका उतना ही ह्रास
होता जाता है। राजनैतिक आन्दोलन नदीके स्रोतकी तरह
कभी स्वच्छ, कभी पंकिल, सभी देशोंमें हो जाता है।
बङ्गालमें राजनीतिकी अवस्था जैसी भी हो, तुम उस तरफ
ध्यान न देकर सेवा कार्यमें अग्रसर होते जाओ।
✱ ✱ ✱
तुम्हारे मनकी वर्तमान असन्तोष पूर्ण अवस्थाका
कारण क्या है, यह तुम समझ सके हो या नहीं, मालूम
नहीं, पर मैं समझ सका हूं। सिर्फ कामसे मनुष्यका
आत्म-विकास सम्भव नहीं हो सकता। बाहरी कामके
साथ लिखने-पढ़ने और ध्यान धारणाकी भी जरूरत है।
कामसे जैसे बाहरकी उच्छृंखलता नष्ट हो जाती है और
मनुष्य संयत हो जाता है, उसी प्रकार लिखने-पढ़ने और
ध्यान-धारणासे internal discipline, यानी आन्तरिक
संयम प्रतिष्ठित होता है।
५६

चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
भीतरके संयमके बिना बाहरका संयम स्थायी नहीं
होता। और एक बात है, व्यायामसे जैसे शरीरकी
उन्नति होती है, उसी प्रकार साधनासे सद्वृत्तियां जाग-
रित होती हैं और भीतरी शत्रुओंका नाश होता है।
साधनाके उद्देश्य दो हैं—भीतरी शत्रु-भय, काम, स्वार्थ-
परतापर विजय पाना (२) प्रेम, शक्ति, बुद्धि, त्याग
आदि गुणोंका विकाश होना।
काम जयका प्रधान उपाय है स्त्री मात्रमें मातृरूपका
दर्शन करना और स्त्री मूर्त्ति (दुर्गा, काली आदि) में
भगवानका चिन्तन करना। स्त्रीमूर्त्तिमें गुरु या गोविन्द-
का ध्यान करनेसे मनुष्य स्त्री मात्रमें भगवान देखनेका
अभ्यस्त हो जाता है। इसीलिये महाशक्तिको मूर्त्त करते
समय हमारे पूर्व पुरुषोंने स्त्री मूर्त्तिकी कल्पना की थी।
व्यावहारिक जीवनमें स्त्री मात्रको मा के भावसे देखते
रहनेसे मन क्रमशः पवित्र और शुद्ध हो जाता है।
भक्ति और प्रेमसे मनुष्य निस्वार्थ हो जाता है। मनु-
ष्यके हृदयमें जब किसी आदर्शके प्रति प्रेम और भक्ति
बढ़ती है, तब उसी अनुपातमें स्वार्थपरता कम हो जाती
है। प्रेम करते करते भक्त क्रमशः सम्पूर्ण संकीर्णता
छोड़कर विश्वमें लीन हो जाता है। मनुष्य जिस विषय
५७