तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)
Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा
तरुणके स्वप्न
जिसका अपने राष्ट्रमें विश्वास नहीं है, अपनी आत्मा
में विश्वास नहीं है, वह किस वस्तुकी सृष्टि कर सकता
है ? भारतीयमें अनेक दोष हैं, किन्तु एक गुण है जिससे
उसके सब दोष दब जाते हैं, जिसके कारण वह दुनियामें
आदमी गिना जाता है। उसमें आत्म विश्वास है, भाव
प्रवणता है, कल्पनाशक्ति है, इसीलिये वह वर्तमान जीवनकी
सभी वास्तविक त्रुटियों, अक्षमताओं, असफलताओंको अग्राह्य
कर महान् आदर्शकी कल्पना कर सकता है। उसी आदर्श
के ध्यानमे मगन हो सकता है, जो असाध्य है उसके
'साधनकी चेष्टा कर सकता है। इसी कल्पना शक्ति और
आत्मविश्वासके कारण भारतने कितनेही साधकोंको जन्म
दिया है और देगा। इसी कारण दुख, कष्ट और
अत्याचारसे उसका मेरुदण्ड कभी नहीं टूटेगा। जो
जाति आदर्शवादी है वह अपने आदर्शके लिये यंत्रणा और
क्लेशको सानन्द सह सकती है।
बहुतसे समझते हैं suffering में सिर्फ कष्ट ही है,
पर यह सच नहीं है। Suffering मे जिस प्रकार कष्ट है
उसी प्रकार अपार आनन्द भी है। किन्तु जो इस आनन्द-
को महसूस नहीं कर सकता, उसके लिये कष्ट ही कष्ट
है। वह दुःख और कष्टसे अभिभूत हो जाता है। किन्तु
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सौ बातकी एक बात
जिसने दुःख और कष्टमें भो एक अनिर्वचनीय आनन्दका
आस्वाद पाया है, उसके लिये suffering गौरवकी चीज
है। वह कष्ट और यातनासे मुमूर्षु न होकर और भी
शक्तिमान् और महान हो उठता है। अब सवाल होता है,
'यह आनन्दका स्रोत कहां है ?' मैं समझतो हूं इस आनन्द
की उत्पत्ति आदर्शके प्रति अनुरागसे होती है। जो व्यक्ति
किसी महान् आदर्शको निस्वार्थ भावसे चाहनेके कारण
दुःख और यन्त्रणा पाता है, उसके लिये वह दुःख और
यन्त्रणा अर्थहीन—बेमतलब नही होती। उसके लिये तो
दुःख आनन्दके रूपमें रूपान्तरित होता है। वही आनन्द
अमृतकी तरह उसकी रग रगमें शक्तिका संचार करता
है। वही जीवनका वास्तविक अर्थ समझ सकता है,
आदर्शके चरणोंमें सर्वस्व समर्पण कर सकता है, वही
जीवन-रसका आस्वाद पा सकता है।
पिछले अप्रैलमें इनसिन जेलमें एक रसियन उपन्यास
पढ़ते पढ़ते ठीक इसी भावकी उपलब्धि हुई। उपन्यास
लेखकने रसियन जातिको लक्षकर अपने नायक द्वारा
कहा है;—There is still much suffering in store
for the people, much of their blood will yet
flow, squeezed out by the hands of greed
(
तरुणके स्वप्न
but for all that,all my suffering, all my blood
is a small price for that which is already sti-
rring in my breast, in my mind, in the marrow
of my bones ! I am already rich as a star is
rich in golden rays. And I well bear all, will
suffer all because there is within me a joy
which no one, which nothing can ever stifle !
In this joy there is a world of strength ! (यानी;
भाग्यमें अभी भी अनेक कष्ट हैं, लोभी और अत्याचा-
रियोंके निष्पेषणसे अभी हमारा रक्त और भी बहेगा।
तब भी जो सत्य मेरे चित्तमें, हृदयमें, अस्थि-मज्जामे स्प-
न्दित है, उसे पानेके लिये यदि मुझे दुःख कष्ट भोगना
पड़े, मुझे अपना रक्त देना पड़े तो मैं समझूँगा कि बहुत कम
दाममें महान् सम्पदा मिल गयी। सुनहरी किरणोंसे
मण्डित तारेके समान अलभ्य सम्पदा मुझे मिली। इसी-
लिये मैं सम्पूर्ण कष्ट यन्त्रणा सहन करूंगा, सम्पूर्ण दुःख
कष्टको अपने हृदयमें खींच लूंगा, क्योंकि मैंने अपने
भीतर जो आनन्द पाया है उसे कोई भी पार्थिव पदार्थ
दबाकर नहीं रख सकता, यही आनन्द अनन्त शक्तिका
समुद्र है।)
२०
„सौ बातकी एक बात
नीलकण्ठ शिवको आदर्श मान जो व्यक्ति कह सकता
है कि मेरे हृदयमें आनन्दका झरना खुला है, इसीलिये मैं
संसारके सब दुःख कष्टोंको अपने हृदयमें खींचकर रख
सकता हूं, जो व्यक्ति कह सकता है कि मैं सम्पूर्ण यात-
नाओंको भोगनेको तैयार हूं क्योंकि इनसे मुझे सत्यका
आभास होता है, वही व्यक्ति साधनामें सिद्ध हुआ है।
हमें इसी साधनामें सिद्ध होना होगा। जो नवीन
भारतकी सृष्टि करना चाहते हैं, उन्हें सिर्फ देते रहना
पड़ेगा—जीवन भर देते रहना पड़ेगा, अपना सर्वस्व
लुटाकर कंगाल हो जाना होगा, बिना किसी प्रतिदानकी
इच्छा किये। अन्तमें जीवनदान देकर जीवनकी प्रतिष्ठा
करना होगा। जो ऐसे साधक होंगे उनकी सम्पदा होगी
उनका अपना आत्मविश्वास, आदर्शानुराग और आनन्द
बोध।
कुछ दिन हुए छात्र-जीवनके एक बन्धुसे मुलाकात
हुई, उसने मुझसे अनेक निराशा व्यंजक और अविश्वास-
पूर्ण प्रश्न किये। उसके प्रश्नका मर्म यही था कि हमारे
देशका कुछ न होगा। कई प्रश्नका उत्तर पाकर फिर
उसने पूछा, कौंसिलोंमें जाकर, सरकारी कार्यमें अड़ंगा
लगाकर, मंत्रियोंको भगाकर क्या होगा ? मैंने उत्तर
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तरुणके स्वप्न
दिया, यह सब न किया जाय तो क्या होगा ? फिर उसके
अविश्वास और अश्रद्धाके भावको लक्ष कर मैंने कहा,
“देखो ! तुम्हारी उम्र मुझसे कम है, आदर्शकी प्रेरणासे
तुमलोग असहयोग आन्दोलनमें आये हो । मेरा आदर्श-
वाद बड़ोंके साथ बढ़ता चला जा रहा है पर तुम्हारा
आदर्श दिन दिन क्षीण हो रहा है।” तब उसने स्वीकार
किया कि पिछले वर्षों'से नाना प्रकारके आघातोंके कारण
उसमे यह भावान्तर हुआ है।
यह अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि पिछले
दो वर्षों'से अविश्वास और अश्रद्धाका भाव फैला हुआ
है। इस कारण हमारी कार्यकारी शक्ति लंगड़ी हो गयी
है, किन्तु अब इस जंजालसे अलग होनेका समय आगया
है। अपने भीतरके शत्रुसे बड़ा और शत्रु कौन होगा ?
इसलिये सबसे पहले इस गृहशत्रुको ही भगाना होगा।
तभी हम बाहरके शत्रुपर विजय प्राप्त कर सकेंगे। हमे
दुर्जय आत्मविश्वास प्राप्त करना होगा। हमे आदर्शमे
विश्वास, अपनी शक्तिमे विश्वास, भारतके गौरवमय
भविष्यमें विश्वास करना होगा। इसी विश्वासकी
प्रेरणासे उद्बुद्ध होकर हमें विश्वविजयी बनना होगा।
बंगालकी वर्तमान अवस्था देखनेसे दो बाते आशा-
२२
सौ बातकी एक बात
प्रद मालूम होती हैं। (१) व्यायाम चर्चा और भूपर्यटन-
की स्पृहा (२) युवकोंकी जागृति। एक समय बंगाली-
कापुरुष समझा जाता था, वह अपवाद अब नहीं रहा।
जो बंगालीके परम शत्रु हैं वे भी अब उसे बदनाम नहीं
कर सकते। यह बदनामी किसने की थी और कैसे
मिटी यह सब जानते हैं। किन्तु शारीरिक दुर्बलता अभी
भी हैं। इस कमीको दूर करना होगा। हर्ष है कि बंगाली
इस कमीको दूर करनेके लिये बद्धपरिकर हुए हैं और
प्रान्तभरमें समितियां खुल रही हैं। कमजोरीका यह
लांछन यदि हमेशाके लिये मिटाना है तो बंगालीको
राष्ट्रीय दृष्टिसे सबल और वीर्यवान् होना होगा। कुछ
विश्वविजयी पहलवान पैदा करनेसे ही कुछ न होगा।
क्योकि इस तरहके पहलवानोंकी शक्ति और शौर्यसे
राष्ट्रीय गौरवकी वृद्धि होनेपर भी साधारण बंगालीकी
शक्ति नहीं बढ़ेगी। जाति बलवान है या नहीं यह देखने-
के समय उसके दो चार पहलवानोको देखनेसे काम नहीं
चलता, यह भो देखना होता है कि सर्वसाधारणका क्या
हाल है।
बंगालीमे आजकल भ्रमणका शौक बढ़ रहा है यह
सबसे अधिक आनन्दकी बात है। बंगाली तैराकीमे,
२३
तरुणके स्वप्न
साइकिलपर विश्वभ्रमण करनेमें उत्साह दिखलाने लगा
है। अपरिचित देश देखने, अपरिचितोंसे मिलनेकी जो
व्याकुलता है इसीसे जातिगठन और साम्राज्य सृष्टि
होती है। जो जाति अपनी परिमित सीमाके बाहर नहीं
जाना चाहती उसका पतन अवश्यम्भावी है। दूसरी तरफ
जो जाति बाधा विघ्न पारकर, प्राणोंकी माया त्यागकर,
देश विदेशोंका भ्रमण करती है उसकी दिन दिन शारी-
रिक, मानसिक उन्नति तो होती ही है साथ ही साथ
उसका साम्राज्य भी बढ़ता जाता है। कवि डी० एल०
रायने जिस समय गाया था—"आमार एई देशेते जोन्म,
जेन एई देशेते मोरि", उस समय उन्होंने हमारे सामने
भ्रान्त आदर्श उपस्थित किया था। अब यह कहनेका
समय आया है कि;—
“आमि जाबोना जाबोना, जाबोना घोरे
बाहिर कोरेछे पागल मोरे।”
घरका कोना छोड़कर अब हमें विश्वमें विचरण
करना होगा। अपने देशको भी प्रत्यक्ष रूपसे अच्छी तरह
देखना होगा फिर देशकी सीमा छोड़कर विदेशोंमें भ्रमण
करना होगा तथा अपरिचित देशका आविष्कार करना
होगा। जो जाति इस प्रकारके कार्य कर सकती है उस-
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सौ बातकी एक बात
का शारीरिक बल, साहस, चरित्र बल, ज्ञान और अभि-
ज्ञता बढ़ती है साथ ही साथ व्यवसाय तथा साम्राज्य
बढ़ता है। ब्रिटिश जाति जो इतनी उन्नत है और इतना
बड़ा विशाल साम्राज्य गठित कर सकी है, भ्रमणेच्छा
उसका एक प्रधान कारण है। साम्राज्य प्रतिष्ठाकी
इच्छा न रखते हुए भी विदेश भ्रमणसे हमारा हृदय
विशाल होगा, आत्म विश्वास बढ़ेगा, बुद्धिका विकाश
होगा इसमे किसे सन्देह है ? भू पर्यटनका यदि पूरा
फायदा उठाना हो तो अमेरिकन धनियोंकी तरह विश्व
भ्रमण न कर कुछ कष्ट सहकर पैदल, घोड़े या साइकिल-
पर विश्व भ्रमण करना चाहिये ।
एक अन्य आशाप्रद लक्षण यह है कि सब जिलोंके
युवकोमें चांचल्य पाया जाता है। यह चांचल्य ही जीवन
शक्तिका परिचायक है। तरुणोंमें जीवन आ गया है, वे
अब अपना कर्तव्य समझने लगे हैं, इसी कारण असंख्य
स्थानोंपर युवक समितियोंके अधिवेशन होते दिखलाई
पड़ते हैं। बीच-बीचमें सुना जाता है कि वे काम करनेके
लिये तैयार हैं किन्तु अभी उन्हें ठीक रास्तेका पता
नहीं चलता। नेता न पाने पर और पथ न पहचानने
पर भी युवक जाग पड़े हैं, अपना कर्तव्य और
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तरुणके स्वप्न
दायित्व समझनेकी चेष्टा कर रहे हैं, यह मामूली
बात नहीं है। मेरा यही कहना है कि यदि तलाश
करनेपर भी नेता न मिलेगा तो क्या तुम चुप बैठे
रह सकोगे ? तुम लोग ही नेता बनाकर काममे लग
जाओ। नेता आकाशसे नहीं गिरता, काम करते करते
ही नेता हो उठता है। अब “कःपंथा” कहकर बैठे रहनेसे
काम नहीं चलेगा। अपनी विवेक-बुद्धिके प्रकाशमें तुम
अपना रास्ता खुद ही खोज लो। तुम समस्याको जितना
जटिल समझते हो उतनी नहीं है। हम लोगोंका आदर्श
यही है कि हम एक सर्वाङ्ग सुन्दर जाति बनाना चाहते हैं
जो जाति ज्ञान और कर्ममें, शिक्षा और धर्ममें संसारकी
सर्वश्रेष्ठ स्वाधीन जातिके बराबर खड़ी हो सके। इसी-
लिये राष्ट्रीय जीवनके प्रत्येक क्षेत्रमें जागरण लाना
होगा। किसी भी तरफसे लापरवाही नहीं दिखलाई जा
सकती। जिसकी जैसी शक्ति हो, जिसकी जिस तरफ
अभिरुचि हो उसे अपने लिये वैसा ही कार्य-क्षेत्र चुन
लेना चाहिये। जिसकी जैसी जन्म-जात या भगवत् दत्त
क्षमता है, उसे उसीको विकसित करना चाहिये और
उसे ही देश माताके चरणोंपर अर्पण करना चाहिये।
पिछले बीस वर्षोंमें बंगालमें अनेक साधक, कवि,
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सौ बातकी एक बात
साहित्यिक, वैज्ञानिक नेता हुए। उनमें अनेक अपना
कर्तव्य पूरा कर देशवासियोंको रुला स्वर्ग सिधार गये।
उनके रिक्त स्थान अभीतक खाली पड़े हैं, यह कुछ कम
लज्जाकी बात नहीं है। बंगालीको यदि बचे रहना है तो
उसे ऐसे मनुष्योंका सर्जन करना होगा जो इन रिक्त
स्थानोंका अधिकांश पूरा कर सकें। जो जाति वस्तुतः
जीवित है, उस जातिमे ऐसे महत्वपूर्ण स्थान इस प्रकार
शून्य नहीं पड़े रहते। महापुरुषोंके स्वर्गवासके बाद अन्य
मनीषि उन स्थानोंको भर देते हैं। जो जाति एकमन होकर
जीवनके विभिन्न क्षेत्रोकी साधनामे लगी रहती है उस
जातिमें किसी भी तरफ उपयुक्त मनुष्यका अभाव नहीं
होता। बंगालकी साधना अभी पूर्ण और सर्वांग सुन्दर
नहीं हुई, इसीलिये किसी महापुरुषके जानेके बाद उनके
रिक्त स्थानकी पूर्ति नहीं होती। सर्वांग सम्पन्न जातिका
आदर्श सामने रखकर जातीय साधनामें प्रवृत्त न होनेसे
वह साधना कभी भी विजय युक्त और साफल्य मण्डित
नहीं होती। राष्ट्रीय जीवनके अनेक क्षेत्र हैं, सभी क्षेत्रोंमें
जातिको पूर्ण करना होगा। जब जाग्रतिकी बाढ़ आयगी,
तब वह जीवनके सभी क्षेत्रोंपर अधिकार कर लेगी।
तरुण बङ्गालको स्वावलम्बी होना होगा, बाहिरी शक्ति-
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तरुणके स्वप्न
पर निर्भर न होकर अपना भरोसा करना होगा। नवीन
जातिकी सृष्टिका उत्तरदायित्व आज युवकोंपर है।
इतना बड़ा दायित्वपूर्ण कार्य सफल बनानेके लिये प्राणों-
की बाजी लगाकर साधनामें प्रवृत्त होना होगा। बड़ी
प्रसन्नताकी बात है कि चारों तरफ इस साधनाका विपुल
आयोजन चल रहा है। इस विराट् यज्ञमें हमी निश्चेष्ट
रहेगे, यह हो ही नहीं सकता। इसीलिये कहता हूं, हे
तरुण दल ! आओ, हम भी यह वाणी उच्चरित करें।
“मंत्रम् वा साधयेयम् शरीरम् वा पातयेयम् ।”
आश्विन १३३१ ( वंगला )
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पत्रावली
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मेरा देश
—**—
(माण्डलेकी जेलसे दक्षिण कलकत्ता सेवक समितिके
सहकारी सम्पादक श्री० अनाथ बंधु दत्तको लिखा हुआ
पत्र )
माण्डला जेल
दिसम्बर १६२६
सविनय निवेदन,
आपका ६ नवम्बरका पत्र यथा समय मिला । उत्तर
देनेमें बिलम्ब हुआ, कुछ खयाल न कीजियेगा । अपनी
इच्छाके अनुसार ही चलता तो पत्र नहीं लिखता, क्योंकि
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तरुणके स्वप्न
राजबन्दीके साथ सम्बन्ध रखना वांछनीय नहीं समझा
जाता। किन्तु आप पत्रोत्तरकी प्रतीक्षा करते होंगे और
उत्तर पाकर सन्तुष्ट होंगे, यही समझ कर उत्तर देने
बैठा हूं।
आपने सामूहिक रूपसे मुझे याद किया, मेरे स्वास्थ्य-
के लिये शुभ कामना की, मेरी रिहाईकी कामनाकी तथा
मेरे प्रति अपने हृदयका प्रेम प्रदर्शित किया, इसके लिये
मेरी आन्तरिक कृतज्ञता स्वीकार कीजिये। स्वदेश सेवक
इससे बढ़कर और क्या पारितोषिक चाह सकता है?
आपका पत्र पाकर और अखबारमें आपकी सभाका
विवरण पढ़कर मैं आनन्दित हुआ, यह कहना न होगा।
तब भी मैं समझता हूं इस तरहका आनन्द उपभोग करना,
मनकी सर्वोच्चता प्रकट नहीं करता। क्या करूं? स्वदेश
सेवी होनेकी स्पर्द्धा रखनेपर भी मैं मनुष्य हूं। अपनत्व
और ममताका निदर्शन पाकर कौन सुखी नहीं होता ?
प्रेम और ममता पानेकी आकांक्षा पर विजय पा लेना या
उससे आगे बढ़ जाना बहुत अच्छा है, तथा उच्च स्वदेश
सेवीके लिये हर तरहके प्रतिफलकी आकांक्षा पर विजय
प्राप्त कर लेना उचित है किन्तु यह अवस्था अभीतक मेरे
लिये आदर्शही है। हृदयपर हाथ रखकर बोलते समय मुझे
३२
मेरा देश
भी Alexander Selkirk की भाषामें कहना होगा, बीच
बीचमें मेरे भी मनमें होता है;—
“My friends do they now and then
Send a wish or a thought after me.”
आज पूरे चौदह महीने मुझे जेलमें हुए। इनमें ग्यारह
महिने बर्मामें काटे। समय समयपर मनमें होता है लम्बे
चौदह महिने देखते-देखते चले गये, किन्तु कभी मनमें
आता है कि न जाने कितने युगसे यहां हूं। जेल ही मानो
घर द्वार है, यहांसे बाहरकी बात मानो स्वप्नकी बात है,
मानो यहांका एकमात्र सत्य—वास्तविकता, लोहेकी
गारद और प्रस्तर प्राचीर है। सचमुच यह एक विचित्र
दुनिया है। रह रहकर मनमें सोचता हूं, जिसने जेलखाना
नहीं देखा उसने दुनियाका कुछ भी नहीं देखा। उसके
सामने दुनियाकी बहुत-सी सचाई नहीं आयी।
मैं अपने मनका विश्लेषण कर समझ पाता हूं कि ऐसे
विचार ईर्ष्याके कारण नहीं उठते। वस्तुतः जेलमें आकर
बहुत कुछ सीखा हू। बहुत कुछ सत्य जो एक समय छाया
के समान था, यहां वहो स्पष्ट हो गया है। तथा अनेक
नवीन गम्भीर अनुभूतियोंने मेरे जीवनको सबल और
गम्भीर बनाया है। यदि भगवान किसी दिन सुयोग और
३ ३३
तरुणके स्वप्न
वाणी देंगे तो वे सब बातें देशवासियोंको सुनाऊंगा।
जेलमें हूं, इससे दुखी नहीं हूं। देशमाताके लिये कष्ट
सहना गौरवकी बात है। Suffering में आनन्द है
इसे विश्वास करिये। अगर ऐसा न होता तो आदमी
पागल हो जाता, ऐसा न होता तो यातनाओंके बीचमें
मनुष्यका हृदय आनन्दसे भरकर हंसता कैसे ? जो
वस्तु बाहरसे suffering मालूम पड़ती है, भीतरसे देख-
नेसे वही आनन्दमय मालूम होती है। निश्चय ही वर्षके
३६५ दिन और दिनके २४ घण्टोंमें हमेशा ही यह भाव मेरे
हृदयमें नहीं रहता, क्योंकि अभी भी हाथोंपर बेड़ियोंके
दाग हैं। किन्तु यह सच है कि उपरोक्त अनुभूति कम या
ज्यादा जिसके हृदयमें नहीं है, वह suffering से जीवन-
को बल-युक्त नहीं कर सकता और suffering के बीचमें
प्रकृतिस्थ नहीं रह सकता।
मुझे दुख इस बातका है कि इन चौदह महीनोंका
बहुत-सा समय योंही बिता दिया। अगर बङ्गालकी जेल-
में होता तो साधनाके पथमें बहुत कुछ आगे बढ़ पाता।
किन्तु यह तो होनेको न था। अब इस समय मेरी प्रार्थना
यही है कि जिसके हाथमें पताका दो उसके हाथमें उसे
धारण करनेकी शक्ति दो। जिस समय यहांसे छुटकारेकी
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कल्पना करता हूं उस समय जितना आनन्द होता है उस-
से ज्यादा भय होता है कि तैयारी पूरी होते न होते कर्तव्य-
का आह्वान न आ जाय। तब यही चाहता हूं कि जब तक
तैयार न हो जाऊं तबतक छुटकारेकी बात नहीं उठे।
आज मैं बाहर भीतरसे तैयार नहीं हूं इसलिये कर्तव्यका
आह्वान भी नहीं आया। जिस दिन तैयार हो जाऊंगा,
उस दिन एक मुहूर्तके लिये भी यह मुझे अटकाकर न रख
सकेगा।
यही भावोंका सिलसिला है, इसमें Objective
truth है यो नहीं, नहीं जानता। जेलमे रहते रहते sub-
jective truth और objective truth एक हो गया हैं।
भाव और स्मृतिके सहारे रहते रहते, भाव और स्मृति
ही वास्तविकमें परिणत हो जाती हैं। मेरी अवस्था
बहुत कुछ ऐसी ही हो गयी है। भाव ही मेरे लिये
वास्तव सत्य है, क्योंकि एकत्व बोधमें ही शान्ति है।
आपने लिखा है, “देश और कालके व्यवधानने बंगालके
लिये आपको और भी अधिक प्रिय कर दिया हैं।” और
देश कालके व्यवधानने बंगालको मेरे सामने कितना
सुन्दर, कितना वास्तविक बना दिया है, यह मैं कह नहीं
सकता। देशबन्धुने कहा है, “बंगालके जल और मिट्टीमें
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तरुणके स्वप्न
एक चिरंतन सत्य है” इस उक्तिकी सत्यता यदि यहां एक
साल नहीं रहता तो इस प्रकार थोड़े ही समझ पाता ।
बङ्गालके शस्य श्यामल मनोहर क्षेत्र, मधुगन्ध-वह मुक-
लित आम्र कानन, आरति धूप धूमाच्छादित मन्दिर,
फलकवत् गाम्य कुटीर, मेरी आँखोंके सामने नाचता
रहता है। ओह ! ये सब दृश्य कल्पनामें भी कितने
सुन्दर हैं।
सवेरे या दोपहरको जब मेघोंके टुकड़े, आंखोंके
सामने आ आ कर चले जाते हैं, तब मनमें होता है कि
विरहीयक्षकी तरह मैं भी अपने अन्तरतम प्रदेशका सन्देश
वंग माताओंके चरणोंमें निवेदन करूं,-भेज दूं । आखिर
वैष्णवोंकी भाषामें लिख भेजता हूं।
“तोमारेई लागिया कोलंकेर बोझा,
बोहिते आमार सुख।”
सायंकालके बढ़ते हुए अन्धकारके आक्रमणसे जब
मार्त्तण्ड माण्डलेके दुर्गकी प्राचीरोंके पीछे छिप जाता है,
अस्तोन्मुख सूर्यकी सुनहली किरणोंसे जब पश्चिम
प्रदेश रञ्जित हो जाता है और उसी समय जब असंख्य
रिक्तमेघ सूर्यकी लाल किरणोंसे रूप बदलकर लाल-लाल
दखलायी पड़ते हैं,उस समय बङ्गालके सुहावने सूर्यास्तकी
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मेरा देश
याद आती है। इस काल्पनिक दृश्यमें भी इतना
सौन्दर्य यह पहले नहीं जानता था।
प्रातःकालकी विचित्र वर्णच्छटा जब पूर्वाकाशको रंजित
करती है, तब निद्रालस नयनोंकी पलकोंपर आघात करके
कोई कहता है, "अन्धे जागो।" उस समय और भी एक
सूर्योदयका स्मरण होता है, जिस सूर्योदयमें कवि और
साधकोंने मांका दर्शन पाया है।
जाने दो—शायद मैं pedantic हुआ जा रहा हूं।
किन्तु यह pedantry नहीं, वाचालता है। भावोंका
आदानप्रदान बन्द होनेपर, फिर एकाएक सुयोग मिलने-
पर जो होता है,उसीका एक दृष्टान्त है। Engine समय-
समयपर जैसे अपनी स्टीम बाहर छोड़कर आत्मरक्षा
करता है, बस, ऐसी ही मेरी अवस्था है।
सेवक समितिका काम सुचारु रूपसे चल रहा है,
सुनकर सुखी हुआ। Lansdowne ब्रांचके साथ किसी
तरहका मनोमालिन्य न होना चाहिये। आशा है, वे लोग
कामकाज ठीक चला रहे होंगे। दक्षिण कलकत्ता सेवाश्रम
के Orphanage के लिये कुछ करें तो बड़ा अच्छा होगा।
इसकी विशेष उन्नति नहीं हो रही है, किन्तु यह काम
बहुत जरूरी है।
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