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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

जेलसे निवेदन
बतलाऊं ? जिस आन्तरिक आत्मोत्सर्गका आदर्श लेकर
मैं कर्म भूमिमें अवतीर्ण हुआ था, निर्वासनकी पारसमणि
मुझे प्रतिदिन उसके लिये योग्यतर बना रही है। जो चिरं-
तन सत्य बंगालकी भागीरथी और बंगालके शस्यश्यामल
क्षेत्रोंमें मूर्त हुआ है, बंगालके जिस धर्मको बंकिमसे
लेकर देशबन्धुतकने साधना द्वारा उपलब्ध किया था,
तथा जिसका साहित्य द्वारा प्रकटीकरण किया था,
बंगालका जो भुवनमोहन रूप कितने शिल्पियों, कला-
कारों, कवियों और साहित्यिकोंकी तूलिका और लेखनी
का विषय है, आज उसका आभास पाकर मैं कृतकृत्य हूं।
देशकी इसी अनुभूतिके पुण्य प्रतापसे जेल-जीवनके ये
दो वर्ष सार्थक हुए हैं। मैं समझ सका हूं कि माकेलिये
इस प्रकार दुख, कष्टका वरण करना कितने गौरव और
सौभाग्यकी बात है।
इस प्रकारके आवेदनमें अपना परिचय देनेकी विधि
बहुत दिनसे चली आ रही है किन्तु मेरे पास ऐसा कुछ
नहीं है जिसका परिचय देकर मैं आपकी सहायता पाने-
का दावा कर सकूं। पांच वर्ष पहले जब उत्ताल महो-
दधिकी तरंगोंकी तरह भारतके प्राण भारतमाताके चरणों
मे उत्सर्ग होनेके लिये उतावले हो रहे थे, उस समय विश्व-
विद्यालयसे निकलकर मैं कर्मक्षेत्रमें आया था।
१३१

तरुणके स्वप्न

अपने जीवनको पूर्ण रूपसे विकसित कर माताके
चरणोंमें अंजलि चढ़ा दूंगा और इसी आन्तरिक उत्सर्ग
द्वारा जीवनकी पूर्णता प्राप्त करूंगा, इसी आदर्शसे मैं
अनुप्राणित हुआ था। समाज सेवा और राजनीतिका
काम मैंने सामयिक रूपसे ग्रहण नहीं किया था। इसी-
लिये पराधीन देशके जीवनमें जो विपत और परीक्षा, दुःख
और वेदना अवश्यम्भावी है; उसके लिये शरीर और
मनसे प्रस्तुत होनेकेलिये हमेशा चेष्टा करता था। इस को-
शिशमें मैं सफल हुआ या नहीं, अथवा किस हदतक सफल
हुआ उसका विचार मेरे देशवासी करेंगे। मेरे इस क्षुद्र
किन्तु घटनापूर्ण जीवनके ऊपरसे जो जो तूफान गुजरे हैं,
उन्हीं विघ्न और विपत्तियों द्वारा मैंने अपने आपको सम-
झने और पहचाननेकी चेष्टा की है। यौवनके प्रभातमें मैंने
जिस कंटकमय पथका अवलम्बन किया, निश्चय ही उसी
पथपर अन्ततक चल सकूंगा, अज्ञात भविष्यको सामने
रखकर जिस व्रतको मैने ग्रहण किया था, उसका उद्यापन
किये बिना विरत नहीं होऊँगा। अपने प्राणों और ज्ञान-
को निचोड़कर मैंने यही सत्य प्राप्त किया है कि पराधीन
जातिका सब कुछ, शिक्षा-दीक्षा, कर्म, सब व्यर्थ है, यदि
वह स्वाधीनता प्राप्तिमे सहायक और उसके अनुकूल नहीं
१३२

जेलसे निवेदन
होता। इसीलिये आज मेरे हृदयके अन्तरतम प्रदेशसे निक-
लकर यह वाणी हमेशा मेरे कानोंमें प्रतिध्वनित होती
रहती है, “स्वाधीनता हीनताय के बांचिते चाय रे, के
बांचिते चाय।” मैं हाथ जोड़कर आपसे यह प्रार्थना
करता हूं, आप लोग मुझे आशीर्वाद दें कि स्वराज्य
लाभकी पुण्य प्रचेष्टा ही मेरा जप, तप, स्वाध्याय, साधन
और मुक्तिका सोपान हो तथा जीवनके अन्तिम क्षणतक
मैं भारतीय मुक्ति संग्राममें लगा रहूं।
आत्मोत्सर्गके पवित्र और मूर्तिमान विग्रह प्रातः
स्मरणीय देशबन्धुके चरणोंमें मैंने देश सेवाकी दीक्षा, शिक्षा
ली है। उनके रहते हुए, सब विपत्तियोंको तुच्छ मानकर,
उनकी पताका लेकर चलता रहा हूं। उनकेन रहनेपर उनके
लोकोत्तर चरित्रसे शिक्षा लेकर उसे हृदयमें धारण कर
तथा उनके महिमामय जीवनके आदर्शको सामने रखकर
एकनिष्ट भावसे जीवन पथपर अग्रसर होऊंंगा, यहो
संकल्प मनमें कर रखा है। सर्व मंगलमय भगवान मेरी
रक्षा करें।
इस समय जो निर्वाचन समस्या है, उसका हल आपके
ही ऊपर है। क्योंकि इस निर्वाचन संग्राममें एक प्रवासी
राजवन्दी पहाड़, नदी, समुद्र पार रहकर, इतनी दूरसे
१३३

तरुणके स्वप्न
क्या कर सकता है ? देशका अकिंचन सेवक होनेपर भी
आपकेलिये तो मैं बिलकुल अपरिचित नहीं हूं। सबके
साथ प्रत्यक्ष परिचय न होनेपर भी क्या आपके ऊपर मेरा
कोई दावा नहीं है ? मैं प्रार्थना करता हूं, मेरी जयका
अर्थ है, राष्ट्रीय महासभाकी जय, जनमतकी जय, आप-
की जय है। इस व्ययसाध्य निर्वाचन संग्राममें आप ही
मेरी आशा, भरोसा, सहारा सब कुछ हैं। आपकी सेवा
कर कृतार्थ बनूं यही मेरी आकांक्षा है। मुझे विश्वास है
कि आप मुझे सेवाका सुयोग और अधिकार देकर धन्य
करेंगे और मैं क्या कहूं ? आप ही देशके मूर्तस्वरूप हैं।
वतनसे दूर, समुद्र पार निर्वासित बन्दीका श्रद्धापूर्वक
अभिवादन स्वीकार कीजिये। इति
१३४

देशबन्धु
( श्री शरच्चन्द्र चट्टोपाध्यायको लिखा गया पत्र )
मान्डला जेल
१२-८-२५
श्रद्धास्पदेषु ।
मासिक वसुमतीमें आप द्वारा लिखित "स्मृति कथा"
तीन बार पढ़ी, बहुत अच्छी लगी । मनुष्य चरित्र देख-
नेकी अन्तर्दृष्टि आपको प्राप्त है, देशबन्धुके साथ घनि-
ष्ट सम्पर्क और आत्मीयता होनेके कारण छोटी छोटी
घटनाओंकी जानकारीमेंसे उनका विश्लेषण कर रस और
१३५

तरुणके स्वप्न
सत्यका आविष्कार करनेकी क्षमता आपमें ही है। साध-
रण उपकरणके द्वारा भी आप इतनी सुन्दर चीज लिख
सके हैं !
जो उनके अन्तरङ्ग थे, उनके हृदयमें एक गोपन कथा
रह गयी। उन गोपन कथाओंमें कुछका उल्लेखकर
आपने सिर्फ सत्यकी ही प्रतिष्ठा नहीं की है, बल्कि आपने
हमारे मनका भार भी हलका कर दिया। सचमुच, “परा-
धीन देशकेलिये सबसे बड़ा अभिशाप यही है कि विदे-
शियोंकी अपेक्षा अपने देशवासियोंके साथ ही अधिक
लड़ाई करनी पड़ती है।” इस उक्तिमें जो निष्ठुर सत्य
है, उसे राष्ट्र सेवियोंने अच्छी तरह अनुभव किया है
और अब भी कर रहे हैं।
आपके लेखमें मुझे यह बात सबसे अच्छी लगी कि
“अत्यन्त प्रिय, बिलकुल अपने आत्मीयकेलिये हृदयमें
जैसी आग लग जाती है, यह वैसी ही आग है। आज
हम लोग जो उनके आस पास थे, उनकी ऐसी हालत
ही रही है कि हमारे पास अपना मार्मिक दुख प्रकट करने
लायक भाषा भी नहीं है और दूसरेके सामने यह दुखड़ा
रोना अच्छा भी नहीं लगता”। सचमुच हृदयकी गूढ़ बात
क्या दूसरेसे आसानीसे कही जा सकती है? हां, वे
१३६

उपहास करें तो उसे सहा जा सकता है। किन्तु यदि
वे दुखका मर्म न समझें तो कितना भीषण कष्ट होता है,
तब मनमें यही होता है, “अरसिकेषु रस निवेदनम् शिर-
सि मा लिख।” हमारे हृदयकी बात अन्तरंग मित्रके सिवां
कौन समझ सकता है ?
आपने और एक बात लिखी है, जो मुझे बहुत अच्छी
लगी कि “हम देशबन्धुका काम करते थे।” मैं ऐसे आद-
मियोंकों जानता हूं जो देशबन्धुके मतमें विश्वास नहीं
करते थे किन्तु उनके हृदयमें जो मोहिनी शक्ति थी, उससे
मोहित होकर उनकेलिये काम किये बिना नहीं रहते थे।
और वे भी मतामतसे रहित होकर सबको प्रेम करते थे। वे
कभी-भी समाजके वर्तमान विधि निषेध या परिपाटीसे
मनुष्यके चरित्रको नहीं देखते थे। मनुष्यकी अच्छाई, बुराई
जानकर भी उसे प्यार करना चाहिये, यह उनका विश्वा-
स था।
अनेक सोचते होंगे कि हम लोग अन्धेकी तरह
उनका अनुसरण करते थे, किन्तु उनके प्रधान शिष्योंके
साथ उनका सबसे अधिक झगड़ा होता था। अपने सम्ब-
न्धमें मैं कह सकता हूं, असंख्य विषयोंमें मेरा उनके साथ
झगड़ा हुआ है। किन्तु मैं जानता था कि चाहे जितना

१३७

तरुणकें स्वप्न
〰〰〰〰〰〰〰〰
झगड़ू, मेरी भक्ति और निष्ठा अटूट रहेगी। तथा उनके
प्रेमसे मैं कभो वंचित न हो सकूंगा। वे विश्वास करते
थे कि चाहे जैसा तूफान क्यों न आये वे मुझे चरणोंके
पास ही पायगें। मा (वासन्तीदेवी) हमारे सब तरहके
झगड़े निपटातीं। किन्तु हाय ! मचलने, बिगड़ने, रूठनेका
आधार भी चला गया। आपने एक स्थानपर लिखा है,
“आदमी नहीं, संगी साथी नहीं, धन नहीं, हाथमें एक
अखबार भी नहीं, जो अत्यन्त छोटे हैं, वे भी बिना
गाली गलौजके बात नहीं करते। देशबन्धुकी यह क्या
हालत हैं?” ओह ! उस दिनका-चित्र अभी भी मेरे स्मृति
पटपर उसी तरह अंकित है। हम लोग गया कांग्रेसके
बाद जब कलकत्ता लौटे, उस समय झूठी और अर्द्ध-सत्य
बातोंसे बंगालके समाचार पत्र रंगे हुए थे। यहां तक
कि अखबारवाले हमारा वक्तव्य भी छापना नहीं चाहते थे
उस समय धनकी आवश्यकता थी और उसका ठिकाना
नहीं था, जिस मकानमें भीड़के मारे जगह नहीं रहती थी,
उसी मकानमें शत्रु या मित्र कोई आकर झांकतातक नहीं
था। सिर्फ हम लोग कुछ आदमी बैठकर, आपसमें बात
चीत करते। फिर जब 'उसी मकानका पूर्ण गौरव
फिर आया तब बात ही और थी? बाहरके आदमियोंने
१३८

देशबन्धु
और पद प्रार्थियोंने आकर जब सभा स्थलपर अधिकार
जमा लिया, उस समय हमें, बोलनेका अवसर भी नहीं
मिला। कितने परिश्रमसे, हड्डी तोड़ परिश्रमकर भण्डारमें
धन संचय किया, फिर किस तरह अपना अखबार निकला,
किस तरह जनमतको अपने अनुकूल बनाया, यह बाहरके
आदमियोंको नहीं मालूम। शायद कभी मालूम भी न
होगा। किन्तु इस यज्ञके जो होता, ऋत्विक्, प्रधान पुरो
हित थे वे पूर्णाहूतिके पहलेही कहां, चले गये ? भीतरकी
आग और बाहरकी आग, इन दोनों ज्वालाओंको उनका
पार्थिव शरीर सह न सका।
अनेक सोचते हैं उनके जीवनका उद्देश्य था, स्वदेश
सेवाकेलिये मा के चरणोंमें जीवन उत्सर्ग करना। किन्तु मैं
जानता हूं उनका उद्देश्य इससे भी महान् था। और वे
इसमें बहुत कुछ सफल भी हुए थे। १९२१ की धर
पकड़में उन्होंने निश्चय किया था कि एक एक करके
अपने परिवारके प्रत्येक व्यक्तिको जेल भेज देंगे, फिर
खुद भी चले जायेंगे। अपने लड़केको जेल भेजे बिना वे
दूसरेके लड़केको जेल नहीं भेज सकते थे। हम जानते
थे वे शीघ्रही गिरफ्तार कर लिये जायगें। उनकी गिर-
फतारीके पहले उनके पुत्रके जेल जानेकी कोई आवश्यकता
१३६

तरुणके स्वप्न

नहीं, तथा एक मर्दके रहते हुए हम किसी महिलाको नहीं
जाने देंगे, यह हमारा कहना था । इस पर काफी देर तक
बहस हुई, किन्तु किसी तरहका निश्चय न हो सका, हम
लोग किसी भी तरह उनकी बात माननेको तैयार नहीं
थे। अन्तमें उन्होंने कहा, “यह मेरी आज्ञा है, पालन
करना होगा।” अपना प्रतिवाद प्रकटकर हमने आज्ञा
शिरोधार्य की।
उनकी बड़ी लड़की विवाहिता थी, उसके ऊपर
उनका कोई जोर या अधिकार नहीं था, उसे वे जेल नहीं
भेज सके। दूसरी कन्या वाग्दत्ता थी, उसे जेल भेजा जाय
या नहीं, इसपर बहस छिड़ी, वे उसे भी भेजना चाहते थे,
कन्या भी जेल जानेकेलिये अत्यन्त उत्सुक थी किन्तु
बाकी सब उसके जेल भेज जानेके विरुद्ध थे, क्योंकि एक
तो उसका शरीर ठीक नहीं था, दूसरे उसका विवाह भी
शीघ्र ही होने वाला था। आखिर उन्हें यह बात
माननी ही पड़ी। बाकी सबका जेल जाना तय ही
था।
बाहरकी घटना तो सब जानते हैं; किन्तु इस घटना-
के मूलमें दुनियाकी नजरोंसे पीछे जो भाव, जो आदर्श,
जो प्रेरणा निहित है, उसका पता किसको है?
१४०

देशबन्धु
मेरा विश्वास है कि महापुरुषोंका महत्व बड़ी बड़ी
घटनाओंकी बनिस्वत छोटी-छोटी घटनाओंसे विशेष
प्रकट होता है। आषाढ़ और श्रावणकी वसुमतिमें मैंने देश-
बन्धुके सहकर्मियोंके लेख ध्यानसे पढ़े। अनेक लेख चालू-
शब्द तथा पुनरुक्तिसे परिपूर्ण हैं, सिर्फ आपने ही छोटी-
छोटी घटनाओंका विश्लेषण कर देशबन्धुका चरित्र
अंकित करनेकी चेष्टा की है। इसीलिये आपका लेख
पढ़कर कितना सुखी हुआ, कह नहीं सकता। देशबन्धु-
के शिष्य और सहकर्मियोंसे इससे अधिककी आशा
करता था किन्तु अच्छा होता यदि वे कुछ न लिखते।
बीच बीचमें विना यह सोचे नहीं रह सकता कि देशबन्धु-
की अकाल मृत्युकेलिये उनके देशवासी और सहकर्मी
भी जिम्मेदार हैं। यदि वे उनके बोझको कुछ हलका
कर देते तो उन्हें इतना अधिक परिश्रम करके आयु क्षीण
न करना पड़ता। किन्तु हमारा ऐसा अभ्यास हो गया
है कि एक बार जिसको नेता मान लेते हैं, उसके ऊपर
इतना भार लाद देते हैं, उनसे इतनी अधिक आशा
करते हैं कि किसी भी आदमीकेलिये उतना भार वहन
करना और आशापूर्ण करना संभव नहीं होता। राज-
नीति सम्बन्धी सब तरहका दायित्व नेतापर लादकर
हम निश्चिन्त होकर बैठना चाहते हैं।
१४१

तरुणके स्वप्न
जाने दीजिये, क्या कहते कहते, क्या कहने लगा।
मेरी, मेरीही क्यों, यहां जितने हैं सबकी इच्छा है कि आप
“स्मृति कथा” की तरह देशबन्धुके सम्बन्धमें और भी
कुछ लिखिये। आपका भण्डार इतना जल्द रिक्त नहीं
होगा, इसलिये लिखनेका उपादान नहीं मिलेगा, ऐसी
आशंका नहीं है। आप यदि लिखेंगे तो बर्मामें बैठे हुए
कई बंगाली राजबन्दी उसे साग्रह पढ़ेंगे।
संभवतः मैं अधिक समय तक यहां नहीं रहूंगा किन्तु
अब छूटनेकी विशेष इच्छा नहीं है। बाहर होते ही श्म-
शानकी-सी शून्यता मुझे घेर लेगी, इसकी, कल्पना करते
ही हृदय संकुचित हो जाता है। यहांपर सुख, दुख, स्मृति,
स्वप्नमें किसी तरह दिन कट रहे हैं। जेलमें बन्द रहकर
जो ज्वाला अनुभव कर रहा हूं उस ज्वालामें कुछ भी
सुख नहीं है, यह नही कह सकता। जिसको चाहता हूं,
उसको हृदयसे चाहनेके कारण ही मैं आज उस ज्वालाके
भीतर भी शांति पा रहा हूं। जेलकी दीवारसे टकराकर
क्षतविक्षत हृदयको भी जो शान्ति मिल जाती है,
उसे छोड़कर बाहरकी हताशा, शून्यता और दायित्व
लेनेकेलिये मानो मन तैयार नहीं होता।
यहां आये बिना मानो मैं समझ नहीं पाता कि
१४२

देशबन्धु
बंगालको कितना चाहता हूं, शायद रवि बाबूने जेलमें
कल्पना कर लिखा था कि,–
सोनार बांग्ला आमि तोमाय भालो बासि
चिर दिन तोमार आकाश तोमार बातास
आमार प्राणे बाजाय बांशी।"
जब क्षणभरकेलिये भी बंगालका विचित्र रूप मानस
चक्षुओंके सामने आ जाता है, तब मनमे होता है, अनु-
भूतिके लिये, इतना कष्ट सहकर माण्डला आना सार्थक
हुआ। पहले कौन जानता था बंगालकी मिट्टी, बंगालका
आकाश, बंगालकी वायु अपने भीतर इतना माधुर्य भरे
हुए है।
क्यों यह पत्र लिख डाला मालूम नहीं। आपको पत्र
लिखूंगा यह बात पहले कभी सोची भी नहीं थी। पर
आपका लेख पढ़कर जो बाते मनमें आयीं उन्हें लिख
डाला। और जब लिख डाला है, तब भेज देना ही ठीक
है। हम सबका प्रणाम ग्रहण करें। इच्छा हो पत्रका उत्तर
दीजियेगा। किन्तु उत्तर पानेकेलिये जोर देनेका अधिकारी
नहीं हूं, शायद उत्तर दें, इसी आशासे ठिकाना दे रहा हूं।
C/o D. I. G. I. B. C. I. D.
13. Elysium Row, Calcutta.
१४३

तरुणके स्वप्न
[ देशबन्धुके जीवन चरित्र लेखक श्री हेमेन्द्रनाथदास-
गुप्तको लिखा हुआ पत्र । ]
मान्डला जेल
२०-१-२६
सर्वसाधारणके पढ़ने लायक देशबन्धु चितरंजनदासके
सम्बन्धमें कुछ लिखनेका साहस अभी भी मेरे अन्दर नहीं
है । कभी होगा या नहीं, मालूम नहीं। व्यक्तिगत रूपसे
मेरे साथ उनका सम्बन्ध इतना घनिष्ट था कि अन्तरंगके
सिवा उनके सम्बन्धमें और किसीसे कुछ कहनेकी इच्छा
नहीं होती । वे इतने बड़े थे और मैं इतना क्षुद्र हूं कि
मुझे भय होता है कि उनकी प्रतिभा कितनी सर्वतोमुखी,
हृदय कितना उदार, चरित्र कितना महान था, उसे आज
भी हृदयंगम नहीं कर सका हूं। ऐसी हालतमें क्षुत्र हृदय,
क्षीण विचार शक्ति और दीन भाषाकी सहायतासे उन
प्रातःस्मरणीयके सम्बन्धमें कुछ लिखना धृष्टता होगी।
तब भी इच्छा और सामग्री न रहने पर भी मित्रके अनु-
रोधसे अनेक काम करने पड़ते हैं। इसीलिये प्रिय मित्र
हेमेन्द्रनाथके अनुरोधसे यह प्रयास कर रहा हूं। देशबन्धु-
के सम्बन्धमें मैं प्रत्यक्ष रूपसे जितना जानता हूं और
१४४

देशबन्धु
गम्भीर विवेचनके बाद उनके जीवन और कर्ममय जीवन-
का गूढ़ अर्थ जहांतक समझ सका हूं, वह लिखने पर
एक पुस्तक तैयार हो जायगी। इतनी बातें लिखनेकी
शक्ति और मनकी अनुकूल अवस्था इस समय नहीं है।
इसलिये मित्रके अनुरोधकी रक्षाकेलिये मैं कुछ बातें ही
लिखूंगा।
देशबन्धुके वैचित्र्यपूर्ण जीवनकी सब बातोंसे मैं परि-
चित नहीं हूं। जीवन चरित्रमें जो बातें अबतक छपी हैं,
वे भी सम्भवतः मुझे मालूम नहीं। मैं सिर्फ तीन वर्षतक
उनके पास था। इस समयमें भी कोशिश करनेपर बहुत
कुछ सीख सकता था किन्तु आंखें रहते हुए क्या हम
उनका मूल्य समझते हैं ? खासकर देशबन्धुके सम्बन्धमें
मेरी धारणा थी कि वे और भी कुछ साल रहेंगे और
अपने व्रतका उद्यापन न होने तक कर्मभूमिसे अवसर
ग्रहण न करेंगे। मुझे जहांतक ख्याल है उन्होंने बहुत बार
कहा था कि उनके भाग्यमें दो सालतक समुद्र पार जेलमें
रहना लिखा है। जेलके बाद वे फिर ससम्मान लौटेंगे,
अधिकारियोंके साथ समझौता होगा और वे राजसम्मान
पायेंगे, इसके बाद उनकी मृत्यु होगी। उस समय मैंने
कहा था कि आपके साथ समुद्र पार चलनेकेलिये मैं भी
१० १४५

तैयार हूं। यहां आनेपर बराबर मेरे मनमें शंका होती
कि कहीं उनकी बात ठीक न निकले, वे भी कहीं यहां न
भेज दिये जायं ? किन्तु हाय इससे भी बढ़कर भयंकर
वज्रपात हुआ। हा ! भारतका भाग्य !
देशबन्धुके साथ मेरी आखिरी मुलाकात अलीपुर
जेलमें हुई थी। आरोग्य लाभ और विश्रामकेलिये वे
शिमला गये थे, मेरी गिरफ्तारीकी बात सुनकर वे फौरन
शिमलासे कलकत्ते आये थे, मुझे देखनेकेलिये वे अलीपुर
मे दो बार आये थे, बहरमपुरको बदली होनेके पहले उनसे
अन्तिम साक्षात् हुआ था। आवश्यक बाते होनेपर मैंने
उनकी चरणधूलि लेकर कहा, शायद आपके साथ बहुत
दिनोंतक मुलाकात न हो। उन्होंने अपने स्वाभाविक
उत्साह और प्रफुल्लताके साथ कहा, “नहीं ! मैं तुम्हें शीघ्र
ही छुड़वा लूंगा।” हाय ! किसे मालूम था कि अब इस
जीवनमें उनके दर्शन नहीं होंगे। उस मुलाकातका प्रत्येक
दृश्य, प्रत्येक बात, चित्रकी तरह मेरे मानस पटलपर
अंकित है, आशा है जीवन भर अंकित रहेगी। उनकी वह
शेष स्मृति ही मेरे जीवनका सम्बल है।
जनतापर देशबन्धुके अद्भुत प्रभावका क्या कारण है ?
बहुतोंने इस प्रश्नका उत्तर देनेका प्रयत्न किया है। मैं

देशबन्धु
अनुचरकी हैसियतसे उसके कारणका निर्देश करना
चाहता हूं। मैंने देखा कि वे मनुष्यके गुण दोषोंकी तरफ
दृष्टि न देकर उसे प्यार कर सकते थे। वे हृदयके सहज
भावसे ही मनुष्य मात्रको स्नेह करते थे, उनका यह
स्वाभाविक स्नेह किसी व्यक्तिके गुणावगुणकी अपेक्षा
नहीं करता था। जिनको हम घृणासे दूर कर देते हैं,
उन्हें वे हृदयसे लगा सकते थे। न जाने कितने तरहके
आदमी उनके पास आते थे और न जाने किन किन क्षेत्रों-
में उनका अपार प्रभाव था। उन्होंने चारों तरफसे जन-
समाजको आकर्षित किया था और उनका पक्ष समर्थन
कर उन्हें विजयी बनाया था। जो उनके अगाध पाण्डित्य-
के सामने नतमस्तक नहीं होते थे, असाधारण वाग्मितासे
वशीभूत नहीं होते थे, अद्भुत भाग्यसे चकित न होते थे,
वे भी उनके महान् हृदय द्वारा आकृष्ट होते थे। तथा
उनके जो साथी थे, वे मानों उनके परिवारके ही आदमी
थे। वे उनके उपकार और मङ्गलकेलिये सब कुछ करते
थे। जीवन दिये बिना जीवन नहीं मिल सकता यह बिल-
कुल सत्य है। उनके सहकर्मी उनके इशारेपर क्या नहीं
कर सकते थे। किसी भी तरहका त्याग, कष्ट, परिश्रम
उन्हें विचलित न कर पाता। उनके इशारेपर सहकर्मी
१४७

तरुणके स्वप्न

सर्वस्व बलिदान करनेकेलिये तैयार रहते थे । देशबन्धु
जानते थे कि अहिंसा संग्राममें अनेक ऐसे अनुचर हैं
जिनका हर अवस्थामें विश्वास किया जा सकता है। मैं
गर्वके साथ कहता हूं कि अन्तिम समय तक उनके अनु-
यायियोंने उनके कहनेके अनुसार हर तरहकी विपत्तियां
और कष्ट सहर्ष सहे ।
दुःखका विषय है कि देशबन्धुके सुसंयत, कर्तव्य-
परायण निर्भीक अनुचरोंको देखकर अनेक तथाकथित
नेता इर्ष्या करते, शायद वे मन ही मन ऐसे सहकर्मी पाने-
केलिये लालायित होते । किन्तु ऐसे कर्मियोंका मूल्य
चुकानेकेलिये वे प्रस्तुत नहीं थे, कमसे कम मेरा तो
यही विचार है । सहकर्मी या अनुचरसे हार्दिक स्नेह
किये बिना बदलेमें उसका हृदय नहीं पाया जा सकता ।
अन्य लोगोंकी तरह उनके अन्दर अपने और पराये-
का भेदभाव नहीं था । उनका मकान सबके लिये खुला
था, यहां तक कि उनके शयन कक्षमें कोई भी जा सकता
था। वे अपने अनुचर वृन्दको प्रेम ही नहीं करते थे बल्कि
उनकेलिये लांछना सहनेकेलिये भी तैयार थे। एक दिन
उनके किसी कुटुम्बीने एक सहकर्मीके किसी कार्यकी
निन्दा कर कहा कि “I hate him” उन्होंने अत्यन्त व्य-
१४८

देशबन्धु
थित होकर कहा कि यही तो मुश्किल है कि मैं घृणा
नहीं कर सकता। यही नहीं बल्कि वे बाहरके आदमियों-
से अपने आदमियोंके लिये झगड़ा भी किया करते थे। मैंने
कई बार देखा है कि वे अपने साथियोंका जोरदार सम-
र्थन करते थे और उनकी निन्दाका जोरदार प्रतिवाद
करते थे।
जो भीतरी बात नहीं जानते वे देशबन्धुकी संगठन-
शक्ति देखकर विमोहित थे, मोहित होनेकी बात भी है।
देशबन्धुने जो कुछ कर दिखाया वह भारतकी राजनीति-
में अभूतपूर्व है। मैं निःसंकोच कह सकता हूं कि उन्होंने
पर्वतके समान दृढ़ संगठन किया था, उसके मूलमें अनु-
चर और नायकके प्राणोंका संयोग था। इसके सिवा
दोष गुणकी तरफ ध्यान न देकर मनुष्यमात्रको स्नेह
करनेके भाव और असाधारण बुद्धिकौशल द्वारा वे
भिन्न-भिन्न रुचि और भिन्न-भिन्न पथके लोगोंको एक
साथ चला सकते थे। जो उनके दलमें नहीं थे या उनके
मतका समर्थन नहीं करते थे, वे भी गुपचुप उनकी सहा-
यता करते थे।
अनेक तथाकथित नेताओंने कहा है कि देशबन्धुके
अनुचर और सहकर्मी दासत्वपरायण थे। देशबन्धुके
१४६

तरुणके स्वप्न
मंत्रणागृहमें जो उपस्थित थे, वे इस बातका समर्थन नहीं
करेंगे। आलोचना और परामर्शके समय जो निर्भीक
और स्पष्टवादी थे उनको मैं दासत्वपरायण कैसे कह
सकता हूं? यहां तक कि आलोचनाके समय नायक
और अनुचर वर्गमें तुमुल विवाद छिड़ जाता, किन्तु वे
कभी भी इस तरहके विवादसे मनमें भी नाराज नहीं
होते। अनेक तो यही कहते हैं कि जो ज्यादा तर्कवितर्क
करते, वे उन्हींकी बाते' ज्यादा सुनते। यह बात सच है
कि मतभेद होनेपर भी उनके अनुयायी उच्छृङ्खल या
असंयत नहीं होते। अथवा नेतापर नाराज हो उसकी
निन्दा कर विपक्षमें नहीं मिल जाते। देशबन्धुके संघका
प्रधान नियम था संयम और शृंखला। आपसमें मतभेद
होनेपर भी बहुमत द्वारा जो निर्णय हो जाता उसे ही
सब मानते। संघके नियमोंको मानकर चलनेकी शिक्षा
इस भारतमें नवीन नहीं है। २५ सौ वर्ष पहले भगवान
बुद्धने भी भारतको यही शिक्षा दी थी। आजतक पृथ्वी-
भरमे सब जगह बौद्ध प्रार्थनाके समय कहते हैं—
बुद्धं शरणम् गच्छामि
धर्मं शरणम् गच्छामि
संघं शरणम् गच्छामि
१५०