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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 174 में से

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पृष्ठ 138

उपहास करें तो उसे सहा जा सकता है। किन्तु यदि
वे दुखका मर्म न समझें तो कितना भीषण कष्ट होता है,
तब मनमें यही होता है, “अरसिकेषु रस निवेदनम् शिर-
सि मा लिख।” हमारे हृदयकी बात अन्तरंग मित्रके सिवां
कौन समझ सकता है ?
आपने और एक बात लिखी है, जो मुझे बहुत अच्छी
लगी कि “हम देशबन्धुका काम करते थे।” मैं ऐसे आद-
मियोंकों जानता हूं जो देशबन्धुके मतमें विश्वास नहीं
करते थे किन्तु उनके हृदयमें जो मोहिनी शक्ति थी, उससे
मोहित होकर उनकेलिये काम किये बिना नहीं रहते थे।
और वे भी मतामतसे रहित होकर सबको प्रेम करते थे। वे
कभी-भी समाजके वर्तमान विधि निषेध या परिपाटीसे
मनुष्यके चरित्रको नहीं देखते थे। मनुष्यकी अच्छाई, बुराई
जानकर भी उसे प्यार करना चाहिये, यह उनका विश्वा-
स था।
अनेक सोचते होंगे कि हम लोग अन्धेकी तरह
उनका अनुसरण करते थे, किन्तु उनके प्रधान शिष्योंके
साथ उनका सबसे अधिक झगड़ा होता था। अपने सम्ब-
न्धमें मैं कह सकता हूं, असंख्य विषयोंमें मेरा उनके साथ
झगड़ा हुआ है। किन्तु मैं जानता था कि चाहे जितना

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