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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 174 में से

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पृष्ठ 139

तरुणकें स्वप्न
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झगड़ू, मेरी भक्ति और निष्ठा अटूट रहेगी। तथा उनके
प्रेमसे मैं कभो वंचित न हो सकूंगा। वे विश्वास करते
थे कि चाहे जैसा तूफान क्यों न आये वे मुझे चरणोंके
पास ही पायगें। मा (वासन्तीदेवी) हमारे सब तरहके
झगड़े निपटातीं। किन्तु हाय ! मचलने, बिगड़ने, रूठनेका
आधार भी चला गया। आपने एक स्थानपर लिखा है,
“आदमी नहीं, संगी साथी नहीं, धन नहीं, हाथमें एक
अखबार भी नहीं, जो अत्यन्त छोटे हैं, वे भी बिना
गाली गलौजके बात नहीं करते। देशबन्धुकी यह क्या
हालत हैं?” ओह ! उस दिनका-चित्र अभी भी मेरे स्मृति
पटपर उसी तरह अंकित है। हम लोग गया कांग्रेसके
बाद जब कलकत्ता लौटे, उस समय झूठी और अर्द्ध-सत्य
बातोंसे बंगालके समाचार पत्र रंगे हुए थे। यहां तक
कि अखबारवाले हमारा वक्तव्य भी छापना नहीं चाहते थे
उस समय धनकी आवश्यकता थी और उसका ठिकाना
नहीं था, जिस मकानमें भीड़के मारे जगह नहीं रहती थी,
उसी मकानमें शत्रु या मित्र कोई आकर झांकतातक नहीं
था। सिर्फ हम लोग कुछ आदमी बैठकर, आपसमें बात
चीत करते। फिर जब 'उसी मकानका पूर्ण गौरव
फिर आया तब बात ही और थी? बाहरके आदमियोंने
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