तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)
Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा
तरुणके स्वप्न
पढ़ना, अच्छी सीख मिलेगी। जल्दीमें अभी अधिक
किताबोंकी तालिका नहीं दे सका। समय मिलनेपर
सोचकर एक तालिका भेजूंगा। इति—
२
मान्डला जेल
स्वास्थ्योन्नतिकेलिये रोज व्यायाम करो तो बड़ा
उपकार होगा। Mullar की ‘My System’ नामक
किताब कहींसे लेकर उसके अनुसार व्यायाम करना
अच्छा होगा। मैं मूलरके बताये व्यायाम अक्सर किया
करता हूं, उनसे लाभ पाता हूं। मूलरके बताये व्यायाम-
की विशेषताएँ हैं कि (१) कुछ खर्च नहीं होता और
थोड़ी ही जगहमें व्यायाम हो जाता है (२) व्यायाममें
अतिरिक्त परिश्रम नहीं होता इसलिये अधिक परिश्रमसे
होनेवाली क्षति नहीं होती (२) सिर्फ अंगविशेषकी चालना
नहीं होती बल्कि सभी मांसपेशियोंकी कसरत होती है।
(४) परिपाक शक्ति बढ़ती है।
मेरा ख्याल है, हमारे देशमें, विशेषकर छात्रोंमें मूलर-
के व्यायामका विशेष प्रचार हो तो बहुत उपकार हो।
रोजमर्राका काम करके ही सन्तोष कर लेनेसे कुछ
नहीं होगा। इन सब कामोंका जो उद्देश्य या आदर्श है,
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चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
यानी आत्म-विकास-साधन, उसे नहीं भूलना चाहिये ।
काम करते रहना ही जीवनका मूल उद्देश्य नहीं है, बल्कि
कामके बीचमेंसे चरित्रका विकास और चरित्रका सर्वा-
ङ्गीण विकास आवश्यक है । यद्यपि प्रवृत्ति और व्यक्तित्व-
के अनुसार व्यक्तिको एक तरफ विशेषत्व प्राप्त करना
होगा, किन्तु इस विशेषत्वके मूलमे सर्वाङ्गीण विकास
चाहिये । जिस व्यक्तिकी सर्वाङ्गीण उन्नति नहीं होती
उसके मनको शांति प्राप्त नहीं होती, वह भीतरसे सुखी
नहीं होता, उसके मनमे एक शून्यता, एक अभाव आखिर-
तक रह जाता है । इस सर्वाङ्गीण विकासकेलिये आव-
श्यक है; (१) व्यायाम चर्चा (२) नियमित अध्ययन (३)
दैनिक ध्यान और चिन्तन । कार्यकी अधिकतासे बीच-
बीचमे इनकी तरफसे नजर फिर जाती है या ध्यान रहने-
पर भी समय नहीं रहता, किन्तु कार्यभार कम होते ही
इनकी तरफ ध्यान देना चाहिये । दैनिक काम करके
ही निश्चिन्त हो जानेसे नहीं चलेगा, उसीमें से व्यायाम,
पठनपाठन और ध्यान चिन्तनकेलिये भी समय निका-
लना होगा । इन तीनों अत्यावश्यक कामोंकेलिये यदि
आदमी प्रति दिन डेढ़ दो घण्टे भी निकाल सके तो बड़ा
लाभ हो । मूलरका कहना है कि रोज उसके कहनेके
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तरुणके स्वप्न
अनुसार पन्द्रह मिनट भी व्यायाममें खर्च करे तो यथेष्ट
हैं और पन्द्रह मिनट ध्यान चिन्तामें लगावे तो कुल आधा
घण्टा हुआ। एक घण्टा पढ़नेके लिये रखा जाय तो कुल
डेढ़ घण्टा हुआ, इसमें रोजाना अखबार पढ़ना शामिल
नहीं है। फिर जितना ज्यादा समय दे सको, उतना ही
लाभ होगा। हर एकको अपनी सुविधाके अनुसार डेढ़
घण्टा निकाल लेना होगा। ध्यान धारणाके सम्बन्धमें
पिछले पत्रमें कुछ लिखा है, इसीलिये इस पत्रमें नहीं
लिख रहा हूं। मैं पुस्तकोंकी तालिका दे रहा हूं। ये
किताबें सालभर पढ़नेके लिये काफी हैं।*
प्राथमिक शिक्षा और उच्च शिक्षाका एक बड़ा फर्क
यही है कि प्राथमिक शिक्षामें facts का परिचय रहता
है और उच्च शिक्षामें उसके साथ विश्लेषण और व्याख्या
जुड़ जाती है। प्राथमिक शिक्षामें ऐन्द्रिक शक्तिपर
विशेष निर्भर रहना पड़ता है। उच्च शिक्षामें ऐसी बातें
सिखलायी जाती हैं जिसे छात्र देख नहीं पर समझ सकता
है। और एक बात है सिखानेके समय इन्द्रियकी सहा-
यता जितनी अधिक ली जायगी, सीखनेवालेको सीखने-
में उतनी ही आसानी होगी। जैसे-बांसुरी या इसी
- मूल पुस्तकमें कुछ बंगला पुस्तकोंका उल्लेख है।
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तरहका बाजा सिखाना हो तो, छात्र यदि बांसुरीको
देखे, छुए, बजाकर उसकी आवाज कानसे सुने तो
बांसुरी बजाना बहुत शीघ्र जान जायगा। क्योंकि दृष्टि-
शक्ति, श्रवण शक्ति, स्पर्श शक्तिको उसने एक साथ
काममें लगाया। गोदका बच्चा कोई चीज देखते ही उसे छूना
चाहता है, खाना चाहता है, उसका कारण यही है कि
बालक सब इन्द्रियोंसे बाहरका ज्ञान प्राप्त करना चाहता
है। इसलिये प्रकृतिके नियमके अनुसार यदि सब इन्द्रियों-
से ज्ञान प्राप्त करनेका प्रयत्न किया जाय तो बहुत ही
शीघ्र फल मिलेगा। गणित मुखस्थ न कराकर यदि हम
छात्रको ईंट पत्थर या काठके टुकड़ोंसे उसे इस विषय-
की शिक्षा दें तो वह आसानीसे समझ सकता है।
और एक बात है, मानसिक शिक्षाके साथ ही साथ
शिल्प शिक्षाकी व्यवस्था भी होना चाहिये। खिलौने
बनाना, मिट्टीसे मानचित्र बनाना, तसवीर बनाना, रंगों-
का व्यवहार करना, गाना सिखाना आदिकी व्यवस्था
भी होना चाहिये। इससे शिक्षा सर्वांग पूर्ण होगी
यह नहीं बल्कि लिखने पढ़नेमे भी विशेष उन्नति होगी।
पांच तरहकी चीजें सिखानेसे बालकोंकी बुद्धि बढ़ती है,
लिखने पढ़नेमें मन लगता है और वे पढ़नेका नाम सुनते
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तरुणके स्वप्न
ही भगाते नहीं हैं। पांच तरहकी चीज न सीखकर यदि
“रट्टू” पढ़ाई ही पढ़ाई जाय तो बालक लिखने पढ़नेसे
दूर भगाता है और उसकी बुद्धि विकसित नहीं होती।
बालककी आंखें, नाक, कान, हाथ यदि उपयोग और
जाननेकी चीज पायेंगे तो ये सब इन्द्रियां सजग हो
जायंगी, जिसके फलस्वरूप उसकी बुद्धि और मन जाग-
रित होगा और सब तरहका ज्ञान पानेके कारण लिखने
पढ़नेमें उसका मन लगेगा। Manual traning के बिना
शिक्षाकी जड़में मट्ठा पड़ जाता है। अपने हाथसे कोई
चीज बनानेमें जो आनन्द मिलता है वैसा आनन्द पृथ्वी-
पर कम ही है। सर्जन करनेमें गम्भीर आनन्द निहित है।
इसी joy of creation का, बच्चे अपने हाथसे जब
कोई चीज तैयार करते हैं, तब अनुभव करते हैं। चाहे बगीचेमें
पेड़ पौधे लगाकर या मिट्टीके खिलौने बनाकर यानी
किसी भी नयी चीजको बनाकर बच्चे परम प्रसन्न होते
हैं। बच्चे छोटी उम्रमें ही इस तरहका आनन्द प्राप्त कर
सकें ऐसी व्यवस्था होना चाहिये। इसी प्रकार उनकी
Originality या व्यक्तित्वका विकास होगा। वे लिखने
पढ़नेसे न डरकर उसका आनन्द उठाना सीखेंगे। विला-
यतके अधिकांश स्कूलोंमें बच्चे बागवानी, व्यायाम, ड्रिल
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चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
खेल, गाना बजाना सीखते हैं, Route march करते हैं,
जत्थे बनाकर सड़कोंपर घूमते हैं, कथाच्छलसे नाना
देशोंके हाल जानते हैं। बच्चे ये न समझे कि वे लिखना
पढ़ना सीख रहे हैं, बल्कि यह समझें कि वे कहानी सुन
रहे हैं या खेल करते हैं। प्रथमावस्थामें Text Book की
बिलकुल जरूरत नही है। पेड़, पत्ते, फूलोंके बारेमें जो
कुछ बतलाया जाय वह पेड़, पौधे, फूल आदि सामने रख
कर। आकाश, तारे आदिके बारेमें जब शिक्षा दी जाय
तब मुक्त आकाशके नीचे ले जाकर। जिस चीजकी शिक्षा
दो वह सब इन्द्रियोंके सामने उपस्थित हो। भूगोल
सिखानेके समय ग्लोब, मानचित्र आदि रहना चाहिये।
इतिहास सिखलानेके समय सुविधा अनुसार म्युजियम
आदिमें ले जाना चाहिये। मामूली ढङ्गपर भी विद्यालय
हो तो गानेकी शिक्षा, Painting, drawing, garden-
ing आदि की शिक्षा देना चाहिये। असल बात यह है
कि पाठ्य वस्तुका वास्तविक ज्ञान होना चाहिये, पाठ
रट लेना उतना प्रयोजनीय नहीं है।
मैंने प्राथमिक शिक्षाके Principles या नीतिके स-
म्बन्धमें कुछ कहा। Text Book की बात ऐसे ही नहीं
कह दी। Text Book का प्रयोजन कम है ही, जो पाठ्य
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तरुणके स्वप्न
पुस्तकें रखना होगा, उनका Importance खूब कम है,
अच्छे अध्यापकके बिना प्राथमिक शिक्षा सफल नहीं हो
सकती। शिक्षाको सर्वप्रथम शिक्षाका Fundamental
principles समझना होगा। उसके बाद नवीन शिक्षा
प्रणाली चलायी जा सकती। उसे अपने प्रेम और सहा-
नूभूतिसे विद्यार्थियोंकी पूरी देख भाल करना होगा।
यदि शिक्षक छात्रकी अवस्थामें अपने आपको नहीं रखेगा
तो वह किस तरह छात्रोंकी Difficulty और भूल भ्रांति
समझ सकेगा। और Personality of teacher सबसे
मुख्य बात है। शिक्षाके तीन प्रधान उपादान हैं। (१)
शिक्षकका व्यक्तित्व (२) शिक्षाकी प्रणाली (३) शिक्षा-
का विषय और पाठ्य पुस्तक। शिक्षकमें व्यक्तित्व न हो
तो किसी तरहकी शिक्षा संभव नहीं हो सकती। चरित्र-
वान व्यक्तित्व सम्पन्न शिक्षक मिलनेपर हमें शिक्षाप्रणाली
निर्धारित करना होगा। योग्य शिक्षक मिले और शिक्षा
प्रणाली निर्धारित हो जाय तो किसी भी विषयकी
पुस्तक पढ़ायी जा सकती है।
आशा है तुम प्रसन्न होगे। इति
३
तुम्हारा पत्र यथा समय मिला, उत्तर देनेमें बिलम्ब
हुआ, कुछ खयाल न करना। आशा करता हूं तुम मान-
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चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
सिक अशांति दूरकर प्रसन्नचित हो सब काम करते
रहोगे। Milton ने कहा है। "The mind is its own
place and can make a hell of heaven and a
heaven of hell." निश्चय ही इस उक्तिको व्यवहारमें
लाना हर समय संभव नहीं होता। किन्तु आदर्शको
सामने रखे बिना जीवनमे आगे बढ़ना असम्भव है।
वस्तुतः जीवनकी कोई भी अवस्था अशांतिहीन नहीं है,
यह बात भूलनेसे काम नहीं चलेगा।
अपने छुटकारेकी बात अब मैं नही सोचता, तुम लोग
भी मत सोचना भगवानकी कृपासे यहां मुझे मानसिक
शांति मिली है, जरूरत होनेपर यहां सारा जीवन व्यतीत
कर सकता हूं, ऐसी ताकत पा गया हूं, यही विश्वास
होता है। मेरी शुभेच्छाका कोई प्रभाव नहीं है, किन्तु
विश्वजननीका शुभाशीर्वाद चर्मकी तरह सर्वदा तुम्हारी
रक्षा करें। और मैं क्या लिखूं ? विश्वजननीमें विश्वास
और भरोसा रखना। तुम उसकी कृपासे सम्पूर्ण विपत्ति
और मोहसे उत्तीर्ण हो जाओगे। मनमें सुख शांति न
रहने पर, बाहरका अभाव दूर होनेपर भी मनुष्य सुखी
नहीं हो सकता। इसलिये संसारके सब काम करते रहने-
पर भी विश्वजननीके प्रति हृदयको अर्पण करना चाहिये।
इति।
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तरुणके स्वप्न
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("आत्म शक्ति" सम्पादक श्रीगोपाल लालको लिखे
हुए पत्रका अंश)
इनसिन जेल
५ अप्रैल, १६२७
परम प्रीति भाजनेषु,
आपका ५ वीं चैत्रका पत्र पाकर आनन्दित हुआ,
आपने अनेक प्रश्न किये हैं क्या उत्तर दूं, मालूम नहीं।
बहुत बातें लिखनेकी इच्छा होती है, पर लिखी जा सकती
है क्या ?
शरीरके सम्बन्धमें कोई नयी बात नहीं कहना है,
"यथा पूर्वम् तथा परम्" परिणाम क्या होगा मालूम नहीं;
अब शरीरकी चिन्ता नहीं करता। पिछले महिनोंमें मेरे
मनकी गति कुछ भिन्न धाराओंकी तरफ द्रुत वेगसे गयी
है। मेरी यह धारणाबद्ध मूल होती जा रही है कि जीवन-
को सोलहों आना देनेके लिये तैयार न होने पर मेरुदण्ड-
को सीधा रखना मुश्किल है। जीवन प्रभातमें यही
प्रार्थना हृदयमें रखकर अवतीर्ण हुआ था,—"तोमार
पोताका जारे दाओ तारे बोहिबार दाओ शक्ति।" भविष्य-
की बात तो नहीं कह सकता पर अभीतक वह शक्ति भग-
बान देते आ रहे हैं। इसीलिये मैं बहुत सुखी हूं, बीच-
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चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
बीचमें मनमें सवाल होता है, मेरे समान सुखी दुनियांमें
कितने हैं ? इस समय वक्ताकार उन्नत प्राचीरसे निकलने-
की आशा जितनी दूर जा रही है, उसी अनुपातसे मेरा
चित्त शान्त और उद्व ग शून्य हो रहा है । आत्मस्थ होना
और अपने आत्म-विकासके श्रोतमें जीवन नौका
वहा देनेमें परम शान्ति है और अधिक समयतक बन्द
रहनेमें भीतरी शान्ति ही एकमात्र सहारा है। अधिक
कालतक कारावासमें रहनेकी सम्भावनामें मैंने अपूर्व
शान्ति पायी है Emerson ने कहा है, We must live
wholly from within इसका अक्षर अक्षर सत्य है और
इस सत्यके प्रति मेरा विश्वास दिन-दिन दृढ़ होता जा
रहा है ।
मेरे समान जिनका जीवन है वे यदि बाहरकी घटना-
से जीवनकी सफलता और विफलता निद्धारित करें तो;
‘मृत्युरेव न संशयः’ जिस कांटेसे हमारी ( बन्दियोंकी )
हालत वजन की जाती है, वह कांटा बाहरका नहीं भीतर-
का होना चाहिये । क्योकि बाहरी हिसाबसे तो हमारा
जीवन शून्य है। यहीं यदि यवनिका पात हो तो संसार-
पर तो हमारे जीवनकी स्थायी छाप नहीं भी रह सकती
है । किन्तु जीवनमें यदि और काम न भी कर सकू ं तो,
६६
तरुणके स्वप्न
आदर्शको वास्तव द्वारों प्रस्फुटित न कर सकूँ तो भी
जीवन व्यर्थ न होगा। महान आदर्शको यदि प्राणोंमें रखे
रहूँ, आदर्शके साथ अपना जीवन मिला दूँ तो मैं सन्तुष्ट
हूँ। मेरा जीवन दुनियाकी नजरोंमें व्यर्थ होनेपर भी, मेरी
नजरोंमें (मालूम होता है भगवानकी दृष्टिमें भी) व्यर्थ
न होगा। दुनियामें सभी चीज क्षणभंगुर हैं, सिर्फ एक
चीज अविनाशी है, नष्ट नहीं होती, वह है भाव या
आवेग। हमारा आदर्श, हमारी आशा, आकांक्षा, चिन्ता-
धारा अविनाशवर है। आपको क्या दिवालोंसे घेरकर
कोई रख सकता है ?
पूर्ण रूपसे उत्सर्ग करनेके लिये दूसरी तरफ आदर्श-
को पूर्ण रूपसे ग्रहण करना होगा। यानी आदर्शकी पूर्ण
प्राप्तिके लिये अपना पूर्णोत्सर्ग चाहिये। त्याग और उप-
लब्धि,—renunciation and realisation एक ही
चीजके दो पहलू हैं। इस समय आदर्शको सम्पूर्णतः
उत्सर्ग करनेके लिये मेरे प्राण व्याकुल हो उठे हैं।
जिन्होंने इतनी दुर्बलताके बीचमे मुझे शक्तिके उच्च
चरित्र गठन और मानसिक उन्नति
बहुत दिन हुए systemetic study छोड़नेके लिये
बाध्य हुआ हूं, राष्ट्रीयताकी भित्ति स्वरूप जो कुछ मूल
समस्याएं हैं उनके समाधानके लिये लिखना-पढ़ना और
गवेषणा शुरू की थी। आजकल वह काम बन्द है। फिर
कब शुरू कर सकूं'गा मालूम नहीं। बाहर निकळनेपर यह
काम न कर सकूं'गा इसलिये यहीं काम खत्म कर लेना
चाहता हूं। मेरे कारावासका काम शायद अभीतक समाप्त
नही हुआ इसलिये जानेमे विलम्ब हो रहा है।
भगवान आप सबको प्रसन्न रखें तथा उनका
आशीर्वाद हमेशा आपको प्राप्त हो यही मेरी प्रार्थना है,
इति—
७१
जेल और कैदी
[ श्री दिलीपकुमार रायको लिखे गये दो पत्र ]
माण्डला जेल
२—५—२५
प्रिय दिलीप,
तुम्हारी २४-३-२५ की चिट्ठी पाकर आनन्दित हुआ।
तुमने शंका की थी कि बीच-बीचमें जैसा होता रहता है,
चिट्ठियोंको भी "double distiletion" के बीचमेंसे आना
होगा किन्तु इस बार ऐसा नहीं हुआ इसलिये बहुत
प्रसन्न हूं।
तुम्हारी चिट्ठी हृत्तन्त्रीका इस प्रकार कोमल भावसे
७२
जेल और कैदी
स्पर्श करती है, चिन्ता और अनुभूतिको अनुप्राणित करती
है कि मेरे लिये उसका उत्तर देना सुकठिन है। इस चिट्ठी-
को “censor” हाथोंसे गुजर कर जाना होगा यह भी
एक असुविधा है। क्योंकि यह कोई नहीं चाहता कि
उसके हृदयके गम्भीर भाव दिनके प्रकाशमें नग्न पड़े रहे।
इसीलिये पत्थरकी दीवाल और लोहेके फाटकमें बन्द
इस समय जो कुछ सोचता हूं, अनुभव करता हूं उसका
अनेकांश उपयुक्त समय न आनेतक अकथित ही रखना
पड़ेगा।
हममेंसे अनेक बिना कारण और अज्ञात कारण
जेलोंमे बन्द है, यह भावना तुम्हारी मार्जित रुचिको
आघात करती है यह सम्पूर्ण स्वाभाविक है। किन्तु जब
सब घटनाएं मनमें ही, भीतर ही भीतर हो रही हैं, तब
इसे अध्यात्मिक दृष्टिसे भी देखा जा सकता है। मैं यह
बात नहीं कह सकता कि जेलमे रहना ही मैं पसन्द
करता हूं, क्योंकि यह कहना बिलकुल ढोंग होगा। बल्कि
मैं यह तब कह सकता हूं कि कोई भी सभ्य शिक्षित
आदमी जेलोंमें रहना पसन्द नहीं कर सकता। जेलकी
आवहवा मनुष्यको विकृत और अमानुष करनेके लिये हैं,
और मेरा विश्वास है यह बात हर एक जेलके लिये कही
जा सकती है।
७३
तरुणके स्वप्न
मेरा विचार है कि जेलमें रहनेवाले अधिकांश अप-
राधियोंकी जेलमें नैतिक उन्नति नहीं होती बल्कि वे
और भी हीन हो जाते हैं। यह मुझे मानना होगा कि
इतने दिन तक जेलमें रहनेके कारण जेलोंमें आमूल सुधार
होना चाहिये,यह मैं अनुभव करने लगा हूं और भविष्यमें
जेलोंका सुधार भी मेरे कार्यक्रमका एक अंग होगा।
भारतीय जेल-शासन-प्रणाली एक खराब प्रणाली (यानी
ब्रिटिश प्रणाली) का अनुकरण मात्र है। जिस प्रकार
कलकत्ता विश्वविद्यालय एक खराब यानी लण्डन विश्व-
विद्यालयका अनुकरण है। जेल संस्कारकेलिये हमें
अमेरिकाके जेल खानोंकी व्यवस्थाका अनुसरण करना
चाहिये।
इस परिवर्तनमें सबसे आवश्यक है एक नवीन मनो
भाव, कैदियोंके प्रति सहानुभूतिका भाव होना, अपरा-
धियोंकी अपराध प्रवृत्तिको मानसिक व्याधि ही मानना
होगा। और इसके दूर होनेका उपाय हो ऐसी व्यवस्था ही
करना होगा। प्रतिषोध मूलक दण्ड विधिको संस्कार-
मूलक दण्ड विधिकेलिये रास्ता छोड़ देना होगा।
मैं नहीं समझता कि यदि मैं स्वयं कैदी न होता
तो एक कैदीको सहानुभूतिकी नज़रसे देख सकता और
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जेल और कैदी
इस विषयमें मुझे कुछ भी सन्देहं नहीं है कि यदि हमारे
आर्टिस्टों और साहित्यिकोंमे जेल जीवन सम्बन्धी कुछ
अभिज्ञता होती तो शिल्प और साहित्य कई अंशोंमें समृद्ध
हो जाता। काजी नजरूल इस्लामकी कविता उनके जेल
जीवनकी अभिज्ञताकी कितनी ऋणी है, शायद यह किसीने
सोचा भी नहीं।
मैं जब स्थिर भावसे सोचता हूं तो मेरे मनमे यह
धारणा स्पष्ट हो जाती है कि हमारी भावना और कष्टों-
के भीतर एक महान् उद्देश्य आपना काम कर रहा है।
और यदि यही धारणा हर घड़ी हमारे जीवनमे अपना
प्रभाव रखती तो हमारा दुख, कष्ट सब कुछ तिरोहित
हो जाता। हां ! इसी लिये तो आत्मा और शरीरमें निर-
न्तर द्वन्द चला करता है।
कैदीकी अवस्थामें रहते हुए बन्दीके हृदयमे साधारण
तया एक दार्शनिक भाव उठता है जो उसे बल प्रदान
करता है, मैंने भी वहींपर अपने खड़े होनेके लिये स्थान
बना लिया है, तथा दर्शनके विषयमें जो कुछ जाना सुना है
वह और जीवन सम्बन्धी जो मेरी धारणा है वह भी इस
समय मेरे काम आ रही है। मनुष्य यदि अपने भीतर
खोजे तो सोचने लायक बहुत-सी बातें पा सकता है,
७५
तरुणके स्वप्न
बन्दी होनेपर भी उसे कष्ट नहीं है यदि उसका स्वास्थ्य
अक्षुण्ण हैं। किन्तु हमारा कष्ट तो आध्यात्मिक नहीं
है, वह शारीरिक है, आत्माके तैयार होनेपर भी शरीर
कभी-कभी दुर्बल हो जाता है।
लोकमान्य तिलकने जेलमें गीताकी समालोचना
लिखी थी और मैं निसन्देह कह सकता हूं कि जेलमें वे
भीतरसे सुखी रहे होंगे, किन्तु इसमें भी मुझे सन्देह
नहीं है कि मान्डला जेलमें छ साल तक रहनाही उनकी
अकाल मृत्युका कारण हुआ। यह मुझे मानना होगा
कि जिस निर्जनतामें मनुष्यको जेल जीवन बिताना पड़ता
है वही निर्जनता मनुष्यको बाहिरी वातावरणसे दूर कर
जीवनकी गहनतम समस्याओंपर विचार करनेका सुयोग
देती है। अपने सम्बन्धमें भी मैं कह सकता हूं कि
साल भर यहां रहनेके कारण व्यक्तिगत और समष्टिगत
अनेक समस्याओंका बहुत कुछ समाधान कर सका हूं।
जो मतामत एक समय नितान्त साधारण तौरसे प्रकट
किये जाते या सोचे जाते, आज वे स्पष्ट और अपने
पूर्ण रूपसे मेरे सामने आ गये। और किसी तरफसे
नहीं, जब तक जेलकी मीयाद खत्म नहीं होती न सही मैं
आध्यात्मिकी दृष्टिसे बहुत कुछ लाभवान हो सकूंगा।
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जेल और कैदी
तुमने मेरे कारावास ग्रहणको एक प्रकारका Martyr-
dom कहा है। बेशक, यह कहना तुम्हारी गम्भीर अनुभूति
और प्राणोंके महत्वका परिचायक है। किन्तु humour
और proportion का मुझे थोड़ा बहुत ज्ञान है, इसलिये
अपनेको Martyr अनुभव करनेकी स्पर्धा नहीं करता ।
स्पर्धा या आत्मदर्पसे दूर ही रहना चाहता हूं। हां, इसमें
कितना सफल हुआ है, यह तुम्हारे जैसे मित्र ही कह
सकते हैं। Martyrdom तो मेरे लिये एक आदर्श हो
सकता है।
मेरा विश्वास है कि अधिक समय तक जेलमें रहने
केलिये सबसे बड़ी मुसीबत यही है कि उसके अन-
जानमें ही बुढ़ौती उसे आ घेरती है। इसलिये इस ओर
उसे विशेष ध्यान रखना चाहिये। तुम सोच भी नहीं
सकते कि अधिक समय तक जेलमें रहनेके कारण आदमी
कैसे शरीर और मनसे बुड्ढा हो जाता है। इसके अनेक
कारण हैं, खराब खाना व्यायाम या स्फुर्तिका अभाव,
समाजसे अलग रहना, अधीनताकी शृङ्खलाका भार, मित्रोंका
अभाव और संगीतका अभाव, संगीतका अभाव सबसे
अन्तमे उलिखित है किन्तु यह बहुत बड़ा अभाव है। अनेक
अभावोंकी पूर्ति तो मनुष्य अपने अन्तरसे कर सकता है
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तरुणके स्वप्न
किन्तु कुछकी पूर्ति बाहरसेही हो सकती है। इन सब
बाहिरी चीजोंसे वंचित रहना अकाल वार्द्धक्यका मामूली
कारण नहीं है। अलीपुर जेलमें युरोपियन कैदियोंके
लिये सप्ताहमें एक दिन संगीतका प्रबन्ध है, पर हमारे
लिये नहीं। पिकनिक, संगीत चर्चा, साधारण वक्तृता
और खुली जगहमें घूमना तथा काव्य साहित्यकी चर्चा
करना हमारे जीवनको कितना सरस और मधुर बना
देता है यह हम साधारण जीवनमें अनुभव नहीं कर सकते
परन्तु जब हमें जबरन बन्दी बनाकर रखा जाता है,
तब समझमें आता है। जबतक जेलमें स्वास्थ्यकर और
सामाजिक विधि व्यवस्थाका प्रबन्ध न होगा, उस समय
तक कैदियोंके सुधारकी बात असंभव है। और तबतक
जेल नैतिक उन्नतिका साधन न होकर वर्तमान अवनत
अवस्थामें ही पड़ी रहेगी।
यह लिखना शायद उचित नहीं है कि अपने आदमियों,
मित्रों प्रिय जनों और सर्वसाधारणकी सहानुभूतिसे मनु-
ष्यको जेलमें भी अत्यन्त सुख होता है। यह भाव कैदीके
मनमें सूक्ष्म रूपसे काम करता है, तब भी मैं अपने मनका
विश्लेषण करके समझ पाता हूं कि यह भाव कुछ कम
वास्तविक नहीं है। यह सहानुभूति प्राप्त करनेका भाव
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जेल और कैदी
साधारण और कैदियों राजनैतिक कैदियोंके भाग्यके फर्कको
साफ कर देता है। जो राजनैतिक कैदी है, वह जानता है
कि छुटकारा पानेपर समाज उसका सहर्ष स्वागत करेगा,
किन्तु साधारणतः अपराधी इस तरहकी संभावना नहीं
देखता। संभव है वह अपने घरके सिवा और कही भी सहा-
नुभूतिकी आशा नहीं कर सकता, इसी लिये सर्वसाधारण
को मुंह दिखानेमे उसे शर्म मालूम होती है। मेरे Yard
मे जो कैदी काम करते है उनमे कुछ कैदी कहते है कि उनके
घरवालोको मालूम ही नही कि जेलमें है। वे शर्मके मारे
घरपर किसी तरहका संवाद नही भेजते। यह परिस्थिति
बड़ी असन्तोषजनक मालूम होती है। सभ्य समाज
अपराधियोंके प्रति अधिक सहानुभूतिशील क्यों न
बने ?
जेल जीवनकी अभिज्ञता और उससे उठनेवाले विचा-
रोंसे पन्नेपर पन्ने लिख सकता हूं। पर एक चिट्ठीका
भी तो कहीं अन्त होना चाहिये। विशेष शक्ति और
उद्यम होता तो इस विषयपर एक पुस्तक लिखनेकी चेष्टा
करता किन्तु ऐसी सामर्थ्य नही है।
मैं जेलके कष्टको शारीरिक न मानकर मानसिक
माननेका पक्षपाती हूं। जहां अत्याचार और अपमानका
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