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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

भारतीय अनुभवों की नींव पर खड़ा किया गया है, न राष्ट्रीय चरित्र के अनुकूल
और न ही भारतीय जन की प्राथमिकताओं का विचार कर।
इस प्रकार "भारत के विकास के परिप्रेक्ष्य" को लेकर उठी किसी भी
बहस के सामने यह एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है। यह नहीं कि पिछले तीस साल से
ज्यादा समय से जारी नियोजित विकास ने भारतीय राष्ट्र की शक्ति में कोई
वृद्धि नहीं की है, उसे कुछ अधिक आत्मविश्वासयुक्त नहीं बनाया है अथवा
विविध क्षेत्रों में व्यवसायदक्ष लोगों तथा विशेषज्ञों को बड़ी संख्या नहीं पैदा
किया है। ऐसा तो हुआ है। साथ ही, औद्योगिक उत्पादन और कृषि दोनों में
गुणात्मक वृद्धि भी हुई है। किंतु साथ ही इस प्रक्रिया ने व्यापक पैमाने पर
जंगलों का विनाश, भूमि क्षय तथा बाढ़ और सूखे की लगातार वृद्धि भी की है।
इसी प्रक्रिया में पर्यावरण अधिकाधिक विषाक्त होता जा रहा है। अधिक सुरुचिपूर्ण
और अधिक व्यवस्थित जीवन का सृजन करने के स्थान पर इस प्रक्रिया ने
वस्तुतः साधारण जीवन को अधिक अस्थिर, अधिक असुरक्षित और निश्चय ही
ज्यादा बदसूरत बना डाला है। यह कहना शायद गलत न होगा कि हमारे
कस्बों, शहरों और महानगरों में भी कुछ सौ वर्ग मीलों में फैले केंद्रीय क्षेत्रों और
[L16

यहाँ दोनों पृष्ठों का लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

रही समझी जाती है। इसका परिणाम यद्यपि बिल्कुल निराशाजनक नहीं रहा
है, तथापि ऐसा भी नहीं है कि हम दावा कर सकें कि हम एक पश्चिम जैसा
समाज बनाने जा रहे हैं। यह तो हो सकता है कि लगभग पाँच-पचास लाख
भारतीय घरों में आज टेलीविजन सेट हों, रेफ्रीजरेटर हो, गैस या बिजली के
चूल्हे हों, शायद दस लाख कारें हों तथा ऐसा ही कुछ और हो, लेकिन इन्हीं
(सत्तावर्गीय) स्रोतों के अनुसार भारतीय जनता का आधा हिस्सा 'गरीबी रेखा'
के नीचे रहता है और 'गरीबी रेखा' से ऊपर वाले लोगों का अधिकांश हिस्सा
घंटों तक परिवहन, दूध, चीनी, मिट्टी के तेल, खाद्य पदार्थ आदि के लिए लाईन
लगाने में खर्च करने को विवश है।
इन गतिविधियों के पिछले तीस वर्षों की प्रशंसा में अधिक से अधिक
कुछ कहा जा सकता है, तो यही कि इस दौरान भारत को वे चलाये रखे रही हैं।
यह संभव है कि भाग्यवश हम इसी रास्ते पर चलते हुए कुछ समय तक और
जिंदा रह लें।
(3)
लेकिन जिस रास्ते पर हम चलते रहे हैं, उसी पर चलते रहकर शायद
भारत एक राजनैतिक इकाई बना भी रहे, तो भी भारत के जनसाधारण की
यानि कुल आबादी के लगभग 95 प्रतिशत की, बुनियादी जरूरतों तक की पूर्ति
की संभावना इस रास्ते में अत्यंत अल्प है। इससे भी बुरी बात यह है कि इस
मार्ग के अवलंबन से भारतीय जन बहुत अधिक पराश्रित हो गये हैं। यहाँ तक कि
आज का किसान भी नई संकर खेती और उसकी जरूरतों के संदर्भ में कम
सृजनात्मक और नवाचार में कम समर्थ हो गया है। उसकी स्वयं की सृजनात्मकता
तथा नवाचार की मेधा आज उससे भी अधिक अवरुद्ध कर दी गयी है, और
बौनी बना दी गयी है, जितनी और जैसी कि ब्रिटिश राज्य के आरंभ में की गई
थी। यदि भारत को एक सभ्य समाज के रूप में बचे रहना है तो उसे वर्तमान
प्रक्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न आज की इस किंकर्तव्य-विमूढ़ता की दिशा में से
कोई और रास्ता निकालना होगा। एक ओर जनसंख्या के बहुत बड़े हिस्से के
कल्याण की तो बात ही क्या, उसे भोजन, वस्त्र और निवास तक दे पाने में
केंद्रीयकरण अक्षम हो चुका है और दूसरी ओर समस्त साधन स्रोतों तथा
संगठनात्मक ढाँचों पर एकाधिकार और विनियोजन के कारण यह केन्द्रीयकरण
जनगण द्वारा स्वप्रबंध के रास्ते में रूकावट बना खड़ा है। 19 वीं शताब्दी में तथा
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20 वीं शताब्दी के आरंभ में भी यानि उस संपूर्ण अवधि में भी जब भारतीय
किसान की अपने खेतों में निवेश की क्षमता निम्नतम बिंदु तक पहुँचा दी जा
चुकी थी, और उसके कृषि औजार तथा माल-मवेशी बड़ी मात्रा में बरबाद कर
दुर्दशाग्रस्त बनाये जा चुके थे, किसान ने देश को पर्याप्त अनाज देकर जीवित
रखा, यह तथ्य उसकी सामर्थ्य और प्रतिभा का पर्याप्त दृष्टांत है। यही बात
भारतीय शिल्पियों, कारीगरों के बारे में भी सच है।
भारतीय जनगण अपेक्षाकृत सौम्य प्रकृति का है। और कई पीढ़ियों
तक उन्हें दबाकर रखा गया, उनकी खिल्ली उड़ाई गई, उन्हें पीसा जाता रहा
तथा उनकी सार्वजनिक क्रियाशीलता प्रतिबंधित रही। फलतः 19 वीं और
प्रारंभिक 20 वीं शताब्दी के प्रारंभ में भारतीय जन अपनी निजी सीमा में ही
सिमट गये थे। इसका यह मतलब नहीं कि वे अन्याय और अनुचित्त का बुरा
नहीं मान रहे थे। जैसा कि मार्च 1944 में किसी ने गांधीजी से कहा था, भारतीय
दृश्य पर उनके उदय से पूर्व तक फिरोज शाह मेहता जैसे लोग भी अंग्रेजों से
बोलते वक्त दब्बू और विनीत होते थे। गांधीजी ने स्वीकार किया कि 1915 तक
ऐसी स्थिति थी, पर साथ ही यह भी कहा कि "मैंने जो कहना शुरू किया, वह
वही था, जो लोग दिलों में महसूस करते थे, पर अपनी बात खुद कहने में समर्थ
नहीं थे" इस प्रकार 1916 के बाद से, अगले 30 बरसों तक वे जनता के प्रवक्ता
थे। वे भारतीय जनता की प्रशंसा करते और आवश्यकतानुसार झिड़कते भी।
पर दुर्भाग्यवश उनके उत्तराधिकारियों ने, विशेषकर जो स्वाधीन भारत के प्रबंध-
क बने, उन्होंने ब्रिटिश राज्य के समय का व्यवहार का ढांचा अपना लिया।
(उन्होंने ऐसा क्यों किया, यह मनोविश्लेषकों पर छोड़ देना ही बेहतर होगा। या
शायद यह कारण रहा हो कि ब्रिटिश शिक्षा और ट्रेनिंग की उन पर उससे अधि-
क गहरी छाप थी, जितनी गांधीजी के साथ बिताये गये उनके समय की छाप
उन पर थी)। वे पश्चिम से अभिभूत थे, फिर यह सोवियत संघ हो या अमरीका
अथवा यूरोपीय औद्योगिक क्रांति का प्रारंभ हो, इस संदर्भ में इन सबका एक ही
अर्थ है। इस कारण उन्हें भारत की हर वस्तु अदिमकालीन अतः अपरिष्कृत,
संकीर्ण, अंधविश्वास-युक्त इत्यादि प्रतीत होती थी। उनकी दृष्टि से जिसे वे
भारत का अभिमान या प्रगति समझते थे; उसकी राह में भारत के लोग वस्तुतः
एक व्यवधान थे, राह के रोड़े थे और इसलिए ये भारतीय जन निर्णय और कर्म
के क्षेत्र से (सिवाय लकड़ियां चीरने, पानी खींचने और कभी-कभी इस-उस
की साजसज्जा के काम से) जितना ही दूर रहें, उतना ही उनके सपनों के भारत
के लिए बेहतर है। यह संभव है कि यह दृष्टिकोण सार्वजनिक तौर पर खुलकर
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अधिक व्यक्त न किया गया हो, पर दृष्टि यही थी। इस दृष्टि वालों में से किसी
को कभी यह याद नहीं आया कि ये वे ही भारतीय जन हैं, जिन्होंने निम्नतम
संभव पूँजी-निवेश, उपकरणों और उस पशुसम्पदा के जरिए भी भारत की रक्षा
की थी तथा पालन किया था जो उन्हीं की तरह अस्थिपंजर मात्र बना डाली
गयी थी। उनकी प्रशंसा करने और उनकी स्वीकृति प्राप्त करने के स्थान पर
उन्हें वस्तुतः यह बताया गया कि वे निकम्मे हैं। सर्वसामान्य भारतीय जन को
इस तरह रद्द कर देने और बहिष्कृत कर देने के बाद यह आश्चर्य की बात नहीं
कि इस भारतीय कुलीन वर्ग के लिये शासन प्रबन्ध और विकास की समस्याएं
इतनी बड़ी बोझ बन गयीं।
समुद्रीय वृत्त सम्बन्धी अवधारणा के लिये 28 जुलाई 1946 का हरिजन
दृष्टव्य है। इसमें "स्वराज" शीर्षक से अपने लेख में गांधी जी ने स्वराज लोकतंत्र
की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा था- "वह एक सामुद्रिक वृत्त होगा, जिसका
केन्द्र होगा व्यक्ति जो गांव के लिए उत्सर्ग को सदा तत्पर रहेगा, गांव
ग्राम-समुदाय के लिए उत्सर्ग हेतु तत्पर रहेगा, यही क्रम चलता रहेगा और
सम्पूर्ण समाज का ऐसे व्यक्तियों से बना एक अखंड जीवन होगा, जो अपने
मन्तव्य से कभी भी आक्रामक न होंगे, सदा विनययुक्त होंगे तथा उस सामुद्रिक
वृत्त की महत्ता के भागीदार होंगे, जिसकी कि वे अभिन्न इकाइयां हैं।" आगे
उन्होंने लिखा- "असंख्य गांवों (और स्वाभाविक ही कस्बों तथा शहरों) से युक्त
इस संरचना में निरन्तर फैलने वाले किन्तु कभी भी प्रभुत्व न दिखाने वाले वृत्त
होंगे। सबसे बाहर वाले वृत्त (यानी राज्य) द्वारा अपने समस्त भीतरी वृत्तों को
सुदृढ़ रखने के लिए तथा उनसे शक्ति पाने के लिये ही शक्ति-संचय किया
जायेगा, न कि उन्हें दबाने-कुचलने के लिये।"
शासन सम्बन्धी इन सुझावों की पर्याप्तता पर बहस संभव है। किन्तु
भारत की तथा साथ ही पश्चिम की सभ्यता का उनका विश्लेषण तथा अपने
स्वदेशी जनगण की तथा उनके द्वारा पोषित-समाहत नैतिक विचारों की गांधी
की समझ अतुलनीय रही है और वह आज भी उतनी ही प्रामाणिक है, जितनी
60-70 वर्ष पहले थी। (सभ्यता सम्बन्धी उनका यह विश्लेषण सर्वप्रथम 1909
में "हिन्द स्वराज" में सामने आया। यह प्रश्नोत्तर शैली में है और उसमें गांधी जी
ने उस समाज और राज्य के स्वरूप पर प्रकाश डाला है, जैसा वे स्वाधीन भारत
में देखना चाहते थे।) जिन लोगों को दरिद्र बनने को विवश किया गया है, जो
व्यापक वंचना के शिकार बनाये गये हैं और जिनका आत्मगौरव छीना गया है,
उन्हीं करोड़ों लोगों की सृजनात्मक एवं प्रवर्तनकारी मेधा को मुक्त तथा जागृत
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करके ही विकास की समस्या को हल करना संभव है। क्योंकि अंततः विकास
का मूल अभिप्राय है "भीतर के विकास" तथा "आत्मअभिव्यक्ति, आत्मविस्तार
अणु से महत् की ओर बढ़ना"। अतः विकास की परिभाषा में ही यह निहित है
कि वह तभी प्रारम्भ होगा जब भारतीय जनगण स्वयं अपना विकास करने में
सक्षम होते हैं अर्थात जब व्यक्ति-रूप में तथा समूह के अंग के रूप में वे खिलना,
प्रस्फुटित होना शुरू करते हैं।
आजादी के बाद से जो दृष्टिकोण, जो कार्यविधि तथा जो
उपकरण-व्यवस्था भारतीय मामलों में गतिशील रही है, वह अब और ज्यादा
समय तक अपेक्षित कार्य नहीं कर सकती यानी संतोषप्रद रूप में गरीबी कम
करने का तथा सर्वसामान्य भारतीय जन में आत्मगौरव तथा पहल की प्रवृत्ति
पुनःप्रतिष्ठित करने का काम नहीं कर सकती, यह कहने का अभिप्राय इन
दृष्टिकोणादिक की भर्त्सना करना नहीं है। 1947 के बाद की स्थितियों में,
विशेषकर 1945 से आगे भारत जिस दिशा में बढ़ा यहां के कुलीनवर्ग खासकर,
प्रशासन वर्ग और अर्थशास्त्री समूह ने अपनी दक्षता भर कार्य किया! इस
क्रियाशीलता से हिन्दुस्तान से अभाव, दरिद्रता और पराश्रय के समुद्र के बीचों
बीच पश्चिमोपन और अति समृद्धि के कुछ सौ नखलिस्तान तथा परकीय अन्तः
क्षेत्र विकसित हो गये हैं तथा समस्त नैतिक आचरण और मानदण्ड क्षत-विक्षत
हो चुके हैं। इन सबका दायित्व उन्हीं पर डालने की जरूरत नहीं है। किन्तु
भारत के स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए यह स्वीकार करना होगा कि ये नजरिये
वगैरह अब प्रासंगिक नहीं हैं और वे वस्तुतः भारतीय समाज के ताने-बाने को ही
नष्ट-भ्रष्ट करने वाले हैं। ऐसी परिस्थितियों में, भारतीय राजनैतिक व्यवस्था
को तथा जीवन के हर क्षेत्र में सक्रिय विचारशील भारतीयों को उन भागों तथा
साधनों को खोजना होगा, जिनमें राष्ट्र की एकता सुरक्षित रहने के साथ-साथ
देशजन को स्वतन्त्रता, अवसर और आनुपातिक राष्ट्रीय साधन-स्रोत उपलब्ध
हो सकें, जिसमें विविध स्तरों पर लोग जीवन की अधिक आवश्यक और बुनियादी
समस्याओं पर विचार करना तथा उनका समाधान करना प्रारम्भ कर सकें।
अब हमारे पास भारतीय मामलों के प्रबन्ध का पैंतीस वर्षों (अब 50
वर्षों) का अनुभव है, और साथ ही अंतरराष्ट्रीय जगत का अधिक यथार्थपरक
परिचय है और शायद, औद्योगिक क्रान्ति की उपलब्धियों की चकाचौंध से भी
हम कुछ मुक्त हुए हैं, यह तथ्य अवश्य नये मार्गों तथा साधनों के सृजन को अधि
क व्यावहारिक बना देता है। जहाँ यह सच है कि एक ओर हमारी समस्याएं
पैंतीस साल पहले की तुलना में अधिक जटिल हुई हैं और उनका दबाव बढ़ा है,
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तृतीय खण्ड: ग्राम-स्वराज्य, स्थानीय उत्पादन एवं स्वावलम्बी भारत

दूसरी ओर पहले से बड़ी संख्या में हमारे युवकजन अब और अधिक बौद्धिक
तथा व्यावसायिक दक्षता से युक्त हैं तथा शायद उनमें संकल्प निर्णय और
मौलिकता भी है, जिससे वे वांछित परिवर्तन और रद्दोबदल करने में समर्थ हो
सकते हैं। यह ध्यान में रखते हुए कि यदि हम चाह भी लें तो भी हम विश्व के
दबावों से सहसा अलग-थलग पड़कर नहीं रह सकते, यह हो सकता है कि
कुछ समय तक हमें दो भिन्न-भिन्न रास्तों पर सक्रिय रहना पड़े। एक मार्ग है
बाहरी दबावों और रिश्तों से व्यवहार का और दूसरा हमारे नैतिक और सामाजिक
मूल्यों के अनुकूल है। इस प्रकार हम दैनंदिन जीवन में सहभागिता और
सृजनात्मकता का प्रवर्त्तन कर सकते हैं तथा एक या दो दशकों में अपने समाज
को पूर्ण स्वस्थ बना सकते हैं।
किन्तु ऐसे समझौते और तालमेल वाले मार्ग को अपनाने पर भी
पाँच-सितारा संस्कृति के परित्याग की आवश्यकता तो पड़ेगी ही तथा कम से
कम कुछ दशकों के लिए हम सभी को अधिकांश मामलों में ग्रामीण झोपड़ी के
जीवन जैसा जीवन अपनाना होगा। यह तो सभी जानते हैं कि अन्य समाजों में
भी ऐसे ही प्रयास हुए हैं और उन्हें उल्लेखनीय सफलता मिली है।
यह संभव है कि आगामी दशकों में भारत स्वयं किसी तरह की
आधुनिकता को तथा उपयुक्त विज्ञान और प्रौद्योगिकी को चुने। भारतीय
योजना-निर्माताओं तथा उनके स्वामियों और प्रेरकों की बहुत गंभीर गलती यह
रही है कि उन्होंने देवताओं की तरह व्यवहार करने का प्रयास किया (या
आधुनिक बिम्ब-विधान से बात करें तो कहना होगा कि उन्होंने उस महान श्वेत
मनुष्य की तरह व्यवहार करने की कोशिश की, जो संसार के जंगली लोगों के
लिए दिव्य उपहारों का बोझ लेकर आया बताया जाता है।) उन्होंने उस जनता
के लिये जिसे उसने अपना श्रद्धालु भक्त समझ लिया था, योजना और विकास
का वरदान लेकर आने वाले जैसा व्यवहार किया। पर क्योंकि न तो वह भूरा
साहब था, न तो देवता, अतः अचरज नहीं कि स्थितियां इस तरह की हो गयीं।
शायद यह समय है जबकि हम वैज्ञानिक दृष्टि के साथ ही सामान्य बुद्धि का
प्रयोग करें और आज की कठोर वास्तविकता से एक-एक कदम आगे बढ़ें।
जैसा कि गांधी जी करते थे, तथा हर बार यह भली भाँति देख लें कि जो कदम
हम उठा रहे हैं वह ठोस आधार पर टिका है तथा हमारे उद्देश्य की दिशा में और
उसका पोषक है। एक बार हमारा समाज क्रियाशील हो उठे, अर्थात जब उसके
उत्पादन मात्र उसके भौतिक निवेश का परिणाम न हो अपितु अधिक सृजनशीलता
तथा प्रवीणता का फल हो, तब फिर अमूर्त मुद्दों पर बहस के लिए पर्याप्त समय
बना रहेगा।
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भारतीय समाज बनाम पश्चिमी
समाज व्यवस्था - 1
हमारे देश में या तीसरी दुनिया के दूसरे देशों में परिवार, शिक्षा और
समाज की जो अवधारणाएं आज प्रचलित हैं उनकी नींव ग्रेट ब्रिटेन या अमेरिका
में 19 वीं सदी के दौरान पड़ी थी। उन दिनों वहां जो सिद्धांत बनाए जा रहे थे
और जो विचार शक्ल ले रहे थे उन्हीं से इनका अर्थ निश्चित हुआ था। पुराने
यूनानी दिनों से लगा कर 19 वीं शताब्दी के मध्य तक यूरोप में परिवार और
शिक्षा का संबंध राजनैतिक सत्ता या संपत्ति हासिल करने से जुड़ा रहा है।
यूरोप में संपत्ति और राजनैतिक शक्ति बहुत थोड़े से लोगों में ही सीमित रही है।
इन थोड़े से लोगों ने ही अपने व्यक्तिगत जीवन में या उन्होंने जो साहित्य लिखा
उसमें परिवार या शिक्षा से होने वाले लाभ के बारे में सोचा-समझा है।
पिछले दो हजार साल में परिवार का स्वरूप, उसका ढांचा और उसका
अर्थ बदलता रहा है। यही बात शिक्षा के बारे में भी कही जा सकती है। प्लेटो या
अरस्तू ने यूरोपीय ढांचे में परिवार की जो अवधारणा की थी वह सामंती, अभिजात,
व्यापारिक या मध्यकालीन पश्चिमी यूरोप के साहूकार परिवारों से बहुत ज्यादा
मिलती-जुलती नहीं दिखाई देती। इसी तरह प्लेटो की अकादमी 19 वीं शताब्दी
के आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से बिल्कुल अलग दिखाई दे सकती है। लेकिन
पुराने स्पार्टा में, जहां नब्बे प्रतिशत आबादी दास या अजनबी लोगों की थी और
जिन्हें कोई नागरिक अधिकार हासिल नहीं थे या 19 वीं शताब्दी के ब्रिटेन में,
जहां सिर्फ एक प्रतिशत लोग जेंटलमैन समझे जाते थे, परिस्थितियां बहुत
अलग नहीं थीं। परिवार या शिक्षा की सारी समझ 18 वीं शताब्दी के आरंभ से
शुरू हुए यूरोपीय पुनर्जागरण काल तक इन्हीं थोड़े से ताकतवर लोगों के
दृष्टिकोण पर आधारित थी।
अठारहवीं शताब्दी के पुनर्जागरण के दौरान जो बहसें चलीं और उनमें
से जो सिद्धांत निकले उन्होंने इस संभावना की तरफ इशारा करना शुरू किया
कि परिवार और शिक्षा रूपी इन दोनों विशेषाधिकार को पश्चिमी यूरोप के सभी
या अधिकांश लोगों तक फैलाया जा सकता है। क्रांति के डर ने उन्हें ईसाई व
दूसरी नैतिक मान्यताओं को आम लोगों तक फैलाने के लिए प्रेरित किया। इसी
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भय से उन्हें परिवार की अवधारणा को आम लोगों में फैलाने की जरूरत महसूस
हुई ताकि वैधानिक रूप से स्थापित हुई सत्ता की अधीनता मानने की आदत
लोगों में डाली जा सके। इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए ही उनमें शिक्षा के
प्रसार की बात सोची गई थी। और उनमें नई तर्कवादी मान्यताओं का प्रसार
किया गया था। पुनर्जागरण काल के तर्कवाद ने इस धारणा को भी पैदा किया
कि अगर उचित संस्थाएं खड़ी कर दी जाएं और उचित माहौल बना दिए जाए
तो सभी लोग संपत्तिवान और ताकतवर हो सकते हैं। इस तरह की मान्यताएं
बनाने के लिए नई अवधारणाओं और नए मिथकों की जरूरत थी। इसी से
परिवार और शिक्षा की मौजूदा अवधारणाओं को जन्म मिला।
यूरोप में एक और ताकतवर विचार प्रचलित था। यह विचार है भौतिक
जीवन में व्यक्ति को स्वतंत्र मानना। इस विचार का यूरोप की केन्द्रीय नियंत्रण
की प्रवृत्ति से गहरा संबंध रहा है। व्यक्ति की स्वतंत्रता के विचार के आधार पर
यूरोप में कुछ लोगों को बिना किसी बंधन और मर्यादा की अड़चन महसूस किए
सत्ता और संपत्ति पर केंद्रीय नियंत्रण संभव बनाने में काफी आसानी हुई।
दूसरी तरफ लोगों को समुदायों की जैविक इकाइयों से तोड़ कर अकेला कर
दिया गया। 19 वीं शताब्दी तक भौतिक जीवन में स्वतंत्रता का उपभोग मुट्ठी
भर लोगों तक ही सीमित था। फिर भी जो लोग बहुत दुस्साहसी, उद्यमी या
हताश होते थे, ऐसे लोगों की संख्या चाहे कितनी ही मामूली क्यों न निकले पर
बहुसंख्यक आबादी के ऐसे लोग भी अपने देश के भीतर या दूरदराज इलाकों में
राजनैतिक सत्ता या संपत्ति हासिल करने में सफल हो जाते थे। ऐसे लोगों के
किस्से आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के दौर की शुरुआत से पहले भी मिल
जाएंगे। उन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता का फायदा उठाने का मौका मिल जाता था।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी का दौर शुरू होने के बाद ऐसे लोगों की संख्या में
हजारों गुना वृद्धि हो गई होगी।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उपभोग का दायरा बढ़ जाने के कारण और
विज्ञान व प्रौद्योगिकी की विशाल उपलब्धियों के कारण 19 वीं शताब्दी में जो
आदर्शवादी ढांचे बनाए गए थे उनसे भी मुक्ति पाने में मदद मिली है। इसका
सबसे ज्यादा असर परिवार पर पड़ा है। इन परिवारों का कोई व्यापक या
गहरा कुलीय आधार तो था नहीं। न ही उन पर देसी समाज के रीति-रिवाजों
का कोई बंधन था। उनका आधार तो संपत्ति और सत्ता ही रहा था। इसलिए
परिवार की आदर्शीकृत अवधारणा तो टूटनी ही थी। लेकिन यूरोप या अमेरिकी
परिवार में जो वास्तविक परिवर्तन हुआ है वह ऐतिहासिक रूप से उतना
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चौंकाने वाला नहीं है जितना आज हमें बताया जाता है। आज के पश्चिम में
परिवार कुछ-कुछ सराय जैसा दिखाई देता है जिसमें रहने वाले लोगों में
कुलीय भावना जैसी कोई चीज नहीं होती। इन परिवारों में आमतौर पर संपत्ति
जैसा कुछ नहीं दिखाई देता। मगर पहले भी हालात कोई इससे बहुत अलग
नहीं रहे। यह बात विशेष कर उन लोगों को समझनी चाहिए जो पश्चिमी समाज
को अपने लिए प्रकाश पुंज जैसा समझते हैं कि वहां खासतौर पर ब्रिटेन और
अमेरिका में बहुत कमजोर पारिवारिक व्यवस्था रही है।
दास प्रथा, सामंतवाद या सर्वहारा जैसी परिस्थितियों के कारण पश्चिमी
समाज में पारिवारिक संबंधों के पनप सकने लायक माहौल ही नहीं रहा। आज
हम यूरोप में जिस परिवार के टूटने की इतनी बात करते हैं वह केवल परिवार
की एक 19 वीं सदी वाली आदर्शीकृत अवधारणा का टूटना ही है। यही वजह है
कि इस टूट की या तो पश्चिमी समाज के वे मध्य स्तरीय लोग ज्यादा बात करते
हैं जिन्हें अपनी शिक्षा-दीक्षा के दौरान परिवार की यह आदर्शीकृत अवधारणा
घुटाई गई थी या फिर हमारे जैसे लोग उसकी ज्यादा बात करते हैं जो इस तरह
की रूमानी अवधारणाओं को पाले हुए हैं। पश्चिम का सामान्य व्यक्ति जिसे
अपने यहां की परिस्थितियों का सहज ज्ञान है परिवार के टूटने की ऐसी बात
करके चिंतित नहीं होता।
पश्चिमी यूरोप या अमेरिका में सत्ता और संपत्ति के केंद्रीकरण व
व्यक्तिगत स्वतंत्रता संबंधी विचारों ने इस बात की तो कोई गुंजाइश ही नहीं
छोड़ी थी कि वहां समाज जैसी कोई चीज उभर सके। यूरोप के स्लाव इलाकों
में समुदाय बनाने की तरफ प्रवृत्ति जरूर दिखाई देती है जैसा कि रूसी मीर से
दिखता है। हो सकता है कि कुछ जर्मन इलाकों में भी ऐसी ही प्रवृत्ति रही हो
जैसी कि जर्मन मार्क से लगता है। इसके अलावा सत्ता और संपत्ति के केंद्रीकरण
व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विचार के बावजूद पश्चिमी यूरोप में समाज की मान्यता
पूरी तरह नहीं मर पाई। समय-समय पर विभिन्न समुदाय बनते रहे। लेकिन वे
ज्यादातर असहमत लोगों द्वारा बनाए गए। उन लोगों द्वारा जो उस समय के
धार्मिक या वैचारिक आग्रहों के खिलाफ खड़े हुए थे। यह समुदाय एक केंद्रीकृत
और व्यक्तिवादी ढांचे में दुर्लभ सामाजिक इकाइयों की तरह थे।
भारत और एशिया व अफ्रीका के बहुत से इलाकों में, यहां तक कि
यूरोपीय लोगों का नियंत्रण होने से पहले तक, अमेरिका में भी समाज की
अवधारणा गहरे स्तर पर रही है। इसलिए यहां व्यक्ति की स्वतंत्रता को एक
दूसरी दृष्टि से देखा गया। परिवार और शिक्षा के स्वरूप और उनकी संस्थाओं
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के अर्थ और ढांचे के बारे में भी यहां के लोगों ने भिन्न तरीके से सोचा।
काफी पुराने समय से भारत के लोग अपने आपको गांव, कस्बे या
तीर्थों को केंद्र बना कर अथवा जाति या उद्योग-धंधों को केंद्र बना कर संगठित
करते रहे हैं। लेकिन इनमें से कोई भी संगठन दूसरे से अलग-थलग नहीं होता
था। उदाहरण के लिए हर व्यक्ति स्थानीय इकाई का भी सदस्य होता था,
जाति का भी और शिल्प या उद्योग-व्यापार संबंधी श्रेणी का भी। इसी तरह
स्थानीय इकाइयां, जातियां और विभिन्न शिल्पों की श्रेणियां भी अपनी तरह की
दूसरी इकाइयों से या दूसरी तरह के संगठनों से जुड़ी होती थीं। कोई आदमी
किसी एक जाति का सदस्य है तो इसका यह मतलब नहीं है कि वह दूसरे
उद्देश्यों से बने संगठनों में अपनी इच्छा से भाग लेने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं।
उदाहरण के लिए वह किसी भी विद्या परंपरा, कला परंपरा, धार्मिक संप्रदाय
या शिल्प से जुड़ने के लिए स्वतंत्र था। दुनिया के दूसरे देशों की तरह इन
संस्थाओं से और वर्गों से उसके संबंध अस्थायी ही थे जबकि अपनी जाति या
अपने देश से वह कहीं गहरा और स्थायी संबंध महसूस करता है।
भारत के बारे में महत्वपूर्ण बात यह है कि एक सभ्यता के नाते तो वह
बहुत पुराने जमाने से ही इकाई माना जाता रहा है लेकिन उसकी बुनियादी
राजनैतिक इकाइयां तो किसी छोटे इलाके में ही सीमित होती थीं। भारत के
इतिहास में ये राजनैतिक इकाइयां सैकड़ों में नहीं तो दर्जनों में तो रही ही हैं।
यहां चक्रवर्ती राजा की अवधारणा भी रही है। राम, अशोक या चंद्रगुप्त
विक्रमादित्य को चक्रवर्ती सम्राट माना जाता रहा है। इसी तरह चोल या विजय
नगर के राजा, यहां तक कि अकबर चक्रवर्ती राजा होने का सपना संजोते रहे।
लेकिन चक्रवर्ती राजा तो एक पद या जिसे दूसरे राजा श्रेष्ठता के कारण
सम्मान देते थे। उसी तरह जिस तरह कि किसी संन्यासी, ऋषि, किसी महान
कवि या विद्वान को श्रेष्ठ समझ कर उसे सम्मान दिया जाता है।
चक्रवर्ती सम्राटों में अनेक गुण होते होंगे या अनेक तरह की प्रतिभाएं
होती होंगी। लेकिन उनका भारत पर प्रशासन नहीं चलता था और न ही उन्हें
देश के सभी हिस्सों का राजस्व हासिल होता था। उन्हें पूरे देश की सेना के
सर्वोच्च अधिपति जैसा भी कुछ नहीं माना जाता था। यह सब काम और
अधिकार तो उन लोगों के पास थे जो बुनियादी राजनैतिक इकाइयों में शासन
करते थे। इन बुनियादी राजनैतिक इकाइयों में हजारों स्थानीय इकाइयां या
नाडू और खाप जैसी बड़े क्षेत्र में फैली हुई इकाइयां शामिल थीं। जिस तरह के
संबंध चक्रवर्ती राजाओं और स्थानीय राजाओं के बीच थे उसी तरह के संबंध
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इन राजाओं और स्थानीय इकाइयों के बीच रहे होंगे। इस तरह संप्रभुता तो
दरअसल स्थानीय इकाई में ही होती थी। उससे ऊपर की राजनैतिक इकाइयों
के पास तो केवल वही अधिकार और कर्तव्य तथा साधन होते थे जिन्हें उनको
सुपुर्द किया गया हो। ये अधिकार और कर्तव्य या राजस्व संबंधी साधन कुछ
इलाकों में काफी मात्रा में उन्हें सुपुर्द किए गए हो सकते हैं। लेकिन ऐसे मामलों
में भी उनकी शक्ति मुख्यतः प्रशासनिक ही थी।
इन राजाओं को अपने आप में कानून नहीं माना जाता था। शासन के
विधि-नियमों की व्याख्या तो धर्म द्वारा स्थानीय रीति-रिवाजों द्वारा पहले से
ही हुई रहती थी। इस व्याख्या को समय-समय पर जातियों या औद्योगिक
श्रेणियों द्वारा सामूहिक विचार-विमर्श के जरिए बदला या सुधारा जाता रहता
था। सभ्यता के नीति-निर्देशक तत्वों के बारे में बड़े ऋषियों या विद्वानों द्वारा
नई-नई व्याख्याएं की जाती रहती थीं। इस सारी व्यवस्था में बहुत सी कमजोरियां
रही होंगी। उसके कुछ पहलू बराबरी की मनवीय भावना भी कभी-कभी लांघते
नजर आ सकते हैं। यह व्याख्या व्यक्तिगत या जातीय महत्वाकांक्षाओं से भी
प्रभावित होती रही होगी। ये सब कमजोरियां हमारे यहां भी उसी तरह आती
रही होंगी जिस तरह दूसरे सभी राजनैतिक और सामाजिक संगठनों में पाई
जाती हैं। इन सब कमजोरियों के बावजूद जिस तरीके से भारत के लोग अपने
आपको संगठित करते रहे वह हमारे लिए महत्व रखता है। इसके आधार पर
हम अपने बारे में सही समझ बना सकते हैं। हमारे यहां आज भी नए-नए
समुदाय उसी पुराने तरीके पर बनते रहते हैं और अपने दायरे में वे काफी
स्वायत्तता हासिल कर लेते हैं।
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भारतीय समाज बनाम पश्चिमी
समाज व्यवस्था - 2
इस तरह हमारे यहां परिवार एक व्यापक और अंतर्गठित समाज का
अंग रहा है। वह अनिवार्य रूप से कुटुंब, गोत्र, जाति और देश से जुड़ रहा है।
इसलिए यह पति-पत्नी और बच्चों की छोटी इकाई में कभी सीमित नहीं रहा।
परिवार के दैनिक काम जैसे निवास, भोजन बनाना, साफ-सफाई आदि इस
बुनियादी इकाई में सीमित रह सकते हैं। लेकिन संबंधों के मामले में पति-पत्नी
या बच्चे, सभी अनेक स्तरों पर जुड़े होते हैं। हमारे यहां विवाह को शायद ही
कभी व्यक्तिगत घटना माना जाता हो, वह तो एक सामाजिक घटना है। विवाह
के सूत्र में बंधने वाले युवक या युवती के बीच में चाहे जितना गहरा आकर्षण
रहा हो; उनका विवाह तो उनकी जाति और गोत्र या कुटुंबों के बीच हुआ रिश्ता
ही माना जाता था, और स्थानीय समाज के लिए वह एक महत्वपूर्ण घटना होती
थी। इन सामाजिक संबंधों के कारण कभी-कभी विवाह के इच्छुक युवक और
युवतियों की स्वतंत्रता में जरूर बाधा पड़ती होगी लेकिन मुसीबत में या जरूरत
पड़ने पर यह कौटुंबिक और सामाजिक रिश्ते ही जीवन की अनेक समस्याओं
को आसान कर देते होंगे।
इन सामाजिक संबंधों और विवाह संबंधों के कारण शिक्षा या दूसरे
सभी सामाजिक कार्य समाज की जरूरतों और समुदायों के अपने काम-धंधे
की जरूरतों से निर्धारित होते रहे हैं। यही वजह है कि अधिकांश लोगों की
शिक्षा ऐसी संस्थाओं में होती थी जिन्हें हम आज पड़ोस के स्कूल जैसी कोई
संज्ञा दे सकते हैं। शिक्षा के बारे में दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि वह विभिन्न
शिल्पों के विशेषज्ञ माने गए लोगों द्वारा दी जाती थी। ये लोग छात्र के माता-पिता
भी हो सकते थे। शास्त्रीय या अधिक विशेषता वाली शिक्षा तो विद्यालयों और
विद्यापीठों में ही दी जाती थी और वे आज के स्कूलों और कॉलेजों या उच्च
शिक्षा संस्थानों जैसे ही थे।
हमारे भारतीय समाज में जीवन की दिशा तय करने के बारे में,
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बारे में और सामाजिक सुरक्षा के बारे में क्या स्थिति थी
और प्राचीन यूरोप या आज के यूरोप के स्त्री-पुरुषों और बच्चों को जो कुछ
और जितना कुछ हासिल हो रहा है, इन दोनों की तुलनात्मक स्थिति को तो
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गहरे विश्लेषण और बहस से ही समझा जा सकता है। इस विश्लेषण और बहस
के जो भी नतीजे निकले लेकिन हमें अपने भविष्य के बारे में फैसले लेने से पहले
यह गारंटी जरूर कर लेनी चाहिए कि दोनों सभ्यताओं की बुनियादी
अवधारणाओं के बारे में कोई घालमेल और गलतफहमी न रहे। हर सभ्यता को
अपने विचारों का ढांचा समझ लेना चाहिए और उसके हिसाब से दुनिया को
देखते और समझते हुए अपने भविष्य की तस्वीर बनानी चाहिए।
हमारे यहां आज पुराने ढांचे और तौर-तरीकों के अवशेष तो दिखाई
दे सकते हैं लेकिन वह तेजस्विता नहीं जो 1950 के आसपास भी दिखाई देती
है। करीब दो सौ साल पहले अंग्रेजी शासन के शुरू होने के साथ-साथ हमारे
समाज और हमारी राज्य व्यवस्था में एक गहरी दरार पड़ गई थी। उससे भी
पहले उत्तर और पश्चिम भारत के मुस्लिम शासित इलाके में भी राज्य और
समाज में खाई देखी जा सकती है। मुस्लिम शासकों का शासन करने का ढंग
और मुहावरा भी भारतेत्तर विचारों में ढला था। राज्य और समाज के इस
अलगाव ने मुस्लिम शासन के दौरान दोनों को ही एक दूसरे के बारे में शंका ग्रस्त
रखा और उससे दोनों ही कमजोर हुए होंगे। इस जड़ता और कमजोरी के
कारण ही बाद में यूरोपीय लोग हमें जीत सके और पराधीन बना सके।
अंग्रेजों के जमाने में राज्य और समाज की खाई के और खतरनाक
परिणाम निकले। उसने भारतीय समाज को सब तरह से बाँट और तोड़ दिया।
समाज की बुनियादी इकाइयां जीवन-मरण के संघर्ष में पड़ गई, और अपने
भीतर सिकुड़ती चली गयीं। इसने भारत को कायरता, गरीबी और अराजकता
में पहुंचा दिया। दूसरी तरफ राज्यतंत्र निरंकुश होता चला गया। उसमें कर्तव्य
की सारी भावना नष्ट हो गई और आशंकाओं से इतना भर गया कि लोगों में होने
वाली जरा-सी फुसफुसाहट उसे अपने लिये बड़ी चुनौती नजर आने लगी और
वह उसमें अपने अस्तित्व के लिये ही संकट देखने लगा।
राज्य के बड़ी नाजुक स्थिति में होने की यह भावना अंग्रेजों के समूचे
शासन काल में बनी रही। खास तौर पर 1820 में, 1857-58 में और 1893 के
गौहत्या विरोधी व्यापक आंदोलन के दौरान तो अवश्य ही। तथा 1930-31 के
नमक सत्याग्रह के दौरान वह काफी गहरी दिखाई देती है। उस समय तो इस
भावना का थोड़ा बहुत होना समझ में आ भी सकता है। मगर यह भावना तो
अंग्रेजों के जाने के बाद भी हमारे राज्यतंत्र में बनी हुई है। इससे अनुमान
लगाया जा सकता है कि हमारे राजनैतिक ढांचे में कहीं कोई भारी गड़बड़ी है।
इस गड़बड़ी की जड़ें तो दरअसल और भी ज्यादा गहरी हैं। [94/२]
69

पहले आजादी हासिल करने के लिये या जैसा कि अंग्रेजों ने कहा है सत्ता के
हस्तांतरण के लिये जिस तरह की बातचीत चली और जिस तरह के समझौते
किये गये, उनका बाद में जो कुछ परिणाम हमारे सामने आ रहा है उस पर
काफी असर पड़ा है। इन समझौतों का मुख्य उद्देश्य उन लोगों के पक्ष में इतिहास
का चक्र मोड़ना था जो पश्चिमी विचारों के ढांचे में ढल चुके थे, और उन लोगों
को किनारे करना था जो देसी तौर तरीकों की वकालत करते रहते थे। पश्चिमी
विचारों में ढले हुए आधुनिकतावादी और अपने समाज से कटे हुए लोग कोई
रातों रात नहीं पैदा हो गये थे। वे लोग कोई एक शताब्दी में फले फूले हैं।
विशेषकर 1829 में जब ब्रिटिश गर्वनर जनरल बेंटिक ने यह लिखा था कि -
पुराने जमाने में जो साधन गरीबों और ब्राह्मणों को बांटने में खर्च किये जाते थे
उन्हें अब यूरोपीय लोगों के स्वागत और मनोरंजन पर खर्च किया जाता है।
बेंटिक इस समाचार से संतुष्ट हुआ था कि निरर्थक कामों में खर्च किया जाने
वाला पैसा बहुत बड़ी हद तक घटा दिया गया है।
1946 से 1949 के बीच स्वतंत्र भारत का संविधान जिस तरह तैयार
किया जा रहा था उससे भी इन परिस्थितियों को समझा जा सकता है। स्वतंत्र
भारत के जन प्रतिनिधि इस संविधान पर विचार करने के लिये संविधान सभा के
रूप में बैठे जरूर पर करीब-करीब हर मामले में उन्हें अंगूठा लगाने की ही
भूमिका निभानी पड़ी। इस संविधान को बनाने के लिये विशेषज्ञों की कई समितियां
बनाई गयी थीं। मगर उनके अधिकांश सदस्य दूसरे कामों में व्यस्त थे। इसलिये
हमारे संविधान का प्रारूप भारत पर शासन करने के लिये खड़े किये गये अंग्रेजी
ढांचे के आधार पर ही बनाया गया था। उसमें जहाँ-तहाँ यूरोप के देशों या
अमेरिका के संविधान की कुछ विशेषताओं को यहाँ-वहाँ चिपका दिया गया।
संविधान सभा में संविधान के प्रारूप के अनेक पहलुओं पर काफी गरमागरम
बहस हुई। लेकिन उसके बुनियादी ढांचे में कोई खास परिवर्तन नहीं किया जा
सका। इसके लिये तर्क यह दिया गया की कोई बड़े परिवर्तन किये गये तो
संविधान निश्चित कर दी गयी तारीख तक तैयार नहीं हो पायेगा और लटक
जायेगा। संविधान का यह प्रारूप दो लोगों ने --- कानून मंत्री और संवैधानिक
सलाहकार ने तैयार किया था।
पहले से तय की गयी निश्चित तारीख तक संविधान बना देने की
मजबूरी की बात संवैधानिक सलाहकार ने संविधान सभा के अध्यक्ष के सामने
तब रखी जब इस बात को लेकर गरमा-गरम बहस छिड़ी हुई थी कि हमारे नये
राजनैतिक ढांचे की बुनियादी इकाई क्या होनी चाहिए। वे स्थानीय इकाइयां
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जो पुराने जमाने से हमारे राजनैतिक ढांचे की बुनियाद बनी हैं या कि बालिग
व्यक्ति जैसा कि पश्चिमी दुनिया में होता है। इस मुद्दे पर पूरी तरह विचार नहीं
होने दिया गया। संविधान बनाने की तारीख को कुछ इस तरह पवित्र मानकर
यह बहस रोक दी गई जैसे कि कोई शुभ मुहूर्त टल जाने वाला हो। संविधान के
प्रारूप में नयी बातें जोड़ी जरूर गयीं लेकिन उनसे संविधान का परिमाण ही
बढ़ा होगा और उस संविधान को तकनीकी दृष्टि से चुस्त दुरूस्त बनाया गया
होगा। लेकिन जहां तक भारतीय पद्धतियों के अनुरूप ढालने की बात है कुछ
नहीं किया गया। भारतीय जरूरतों के लिहाज से यह संविधान बिल्कुल ही
बेमेल है और अनजाने ही उसने हमारे राजनैतिक ढांचे को अंग्रेजी शासन वाले
जमाने से भी ज्यादा जड़ बना दिया है।
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पृष्ठ 72

भारत का पुनर्निर्माण
कुछ वर्ष पहले हमारे देश में स्वतंत्रता की पचासवीं वर्षगाँठ का उत्सव
धूमधाम से मनाया गया। उत्सव के शुरू में चार-पाँच दिन तो भारत की लोकसभा
व राज्य सभा में इस स्वतंत्रता की परिभाषा और आधारों को लेकर काफी कुछ
कहा गया। देश के अपने आदर्शों मर्यादाओं, विज्ञान और तकनीक पर चर्चा
रही। वर्ष के अंत में देश की अपनी कला से संबंधित उत्सव हुए, और इनमें न
केवल भारत के कोने-कोने के गान, नृत्य, कथायें सामने आईं अपितु निकटवर्ती
बौद्ध देशों के विद्वानों और कलाकारों ने भी भाग लिया। काशी में रामायण और
मध्यप्रदेश में आल्हा-ऊदल प्रमुख रहे और कुछ ही दिन पहले केरल में एक वर्ष
का भगवद्गीता का अभियान भी आरंभ हुआ।
इस तरह का उत्सव मनाना तो ठीक है। लेकिन इस पचास बरस की
स्वतंत्रता के बाद अधिकांश लोगों को, शायद जो भारत का तंत्र चलाने में लगे हैं
उनको भी, लगा – कि इस पचास वर्ष की उपलब्धियाँ नये भारत को खड़ा करने
में उसका आधार बनाने में काफी नहीं हैं। 1942 में, जब कि भारत में जोरों से
कहा जा रहा था 'अंग्रेजों वापिस जाओ,' उस समय अंग्रेजी और अमरीकी
सरकार के बीच भारत का क्या किया जाए इस विषय में कुछ बातचीत चलती
थी। उस समय अगस्त 1942 में अमरीका के राष्ट्रपति रुजवेल्ट का अंग्रेजों को
यह सुझाव था कि वे चाहे जो भी कदम भारत के बारे में उठाएँ लेकिन उन्हें यह
ध्यान रहे कि (अन्त में पश्चिमी दृष्टि यह है कि) भविष्य का भारतवर्ष पश्चिम की
'ऑरबिट' में, छत्रछाया में जीए। रुजवेल्ट ने तो यहाँ तक कहा कि भारतवर्ष के
लोग एशियाटिक (एशिया के) नहीं कहे जा सकते, वे तो इंडो-यूरोपियन हैं,
और इसलिए यूरोप और अमरीका के करीब हैं, और संबंधी जैसे हैं।
1947 में हम जाने-अनजाने, रुजवेल्ट की इस सोच पर चलने लगे
और जैसा पश्चिम चाहता था उसकी ऑरबिट में, छत्रछाया में रहने लगे। इससे
हम देश के और स्वतंत्रता के ध्येय से तो हटे ही, अंग्रेजों द्वारा स्थापित किए गए
शासन व तंत्र से (जिसमें शिक्षा, सफाई, स्वास्थ्य, बैंक, स्टॉक मार्केट और अंत में
कृषि व पशुपालन भी बँध गया।) घनिष्ठता से बंध जाने के कारण देश के
90-95 फीसदी लोगों से भी अलग हो गए। परिणाम हुआ कि अब हमारे यहाँ
शासन व तंत्र से जुड़े लोग ही (जिन्हें शासन पालता-पोसता है) पहले दर्जे के
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पृष्ठ 73

नागरिक रह गये। बाकी सब तो देश में रहते हुए भी, दूसरे दर्जे के बन गए। जो
साहस, आत्मविश्वास, देश को बनाने का उत्साह, सन् 1947 से पहले आया था,
उस पर पिछले पचास बरस ने बहुत हद तक पानी फेर दिया। जब 1942 में
रुजवेल्ट ने यह सुझाव दिया कि भारतवर्ष पश्चिमी, 'ऑरबिट' में (छत्रछाया में)
रहे, तो उनका व अंग्रेजों का शायद यह तात्पर्य नहीं रहा होगा कि हम उनकी
तरह शक्तिशाली, संपन्न व आधुनिक बन जाएँ। लेकिन जब हमने अपने से
1945-47 में उनका रास्ता पकड़ा तब अगर हमारे में, यूरोप कैसे बना, इसकी
समझ व शक्ति होती तो हो सकता है हम इन पचास बरसों में यूरोप व अमरीका
जैसे बन जाते, जैसे कि जापान 1885 से 1930 के दौरान बन ही गया। लेकिन
हमारे में ऐसी शक्ति व समझ न तब थी, न अब दिखती है।
आज देश में जो हो रहा है वह तो एक बहुत निचले स्तर का यूरोप व
अमरीका का अनुकरण हो रहा है। यूरोप का वैचारिक प्रभाव तो हमारे यहाँ
1820 से शुरू हो गया था; यह क्रमशः बढ़ता गया और शायद 1900 तक देश के
राजनैतिक, शैक्षणिक व व्यापारिक नेतृत्व इससे प्रभावित लोगों के हाथों में चला
गया। शायद 25-30 बरस (1915-1945 तक) यह प्रभाव कुछ घटा और दब-सा
भी गया। लेकिन 1945 के बाद तो पश्चिमी प्रभाव में आए लोग फिर से आगे
आए और 1947 में उन्होंने ही देश को चलाने की बागडोर संभाली। वृहत समाज
और उसका नेतृत्व व संचालन करने वाले पीछे खदेड़ दिए गए। अगर उनमें से
कुछ राजनीति में रह भी गए तो उनका काम केवल हाथ उठाने का रह गया है।
पिछले 50 बरस में यूरोपीय वैचारिक प्रभाव में पढ़े लोगों की संख्या व नेतृत्व
बढ़ा ही है। केवल उनमें यूरोपीय शक्ति व समझ अनेक कारणों से कुंठित रह
गई है।
आज हम अपने वृहत समाज व जन को भी पश्चिमी विचार की, विज्ञान
की, तकनीकी की, व्यवस्थाओं की जंजीरों से बाँधकर पूरे दासत्व की ओर ले
जा रहे हैं। यूरोप और अमरीका की तो प्लेटो और अरस्तू के समय से ही
मान्यता है कि दासत्व ही साधारण मानव-समाजों के लिए उचित व्यवस्था है।
यूनानी और ईसाइयत के विचार से भी समग्र प्रकृति, उसके पर्वत, नदियाँ, झरने,
समुद्र, वृक्ष, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, इत्यादि मनुष्य के उपयोग के लिए ही बने
हैं। मनुष्य उन्हें जैसे चाहे रखे। यूनानियों और यहूदियों के 'ओल्ड टेस्टामेंट' के
हिसाब से (जिसे ईसाई व इस्लाम दोनों मानते हैं) मनुष्य-मनुष्य में भी फर्क है।
कुछ थोड़े ही मनुष्य-मनुष्य माने जा सकते हैं, बाकी तो पशु व शेष प्रकृति के
समान हैं। आवश्यकता होने पर राजपुरुष उन्हें बगैर किसी कानूनी व्यवस्था में
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पड़े मार सकते हैं, जैसे कि किसी पागल कुत्ते को। पिछले 100-200 वर्ष की
यूरोप व अमरीका की समृद्धि व बदलाव के होते हुए भी मूलतः यूरोप और
अमरीका के लोग आज भी दासत्व के स्तर पर ही हैं। अगर ऐसी मूल स्थिति
उनकी है तो बाकी संसार के मनुष्य और दूसरे प्राणियों को तो कभी भी समाप्त
किया जा सकता है।
ऐसी स्थिति में से हम निकलना चाहते हों तो हमें अपने देश की परंपराओं,
मान्यताओं, विद्याओं और भारतीय स्वभाव के आधार पर नया भारत बनाना
शुरू करना चाहिए। अंग्रेजों से मिले तंत्र व व्यवस्था को पूरी तरह छोड़ने का हमें
शीघ्र ही निश्चय कर लेना चाहिए, और ऐसी योजना बनानी चाहिए कि अधिक
से अधिक 20-25 बरस में हम अपने पाँवों पर खड़े हो जाएँ, हमारी अपनी
व्यवस्थाएँ पूरी तरह स्थापित हो जाए और अंग्रेजों के दिए तंत्र व्यवस्था को हम
ताक पर रखें, पुराने लेखागारों में कभी अध्ययन के लिए रख दें।
हमें सभी बातें कुछ नए सिरे से करनी होंगी। हमें ऐसा मान लेना
चाहिए कि पिछले 200-250 बरस हमारे लिए विपत्ति के ही रहे हैं और उनमें
जो कुछ हुआ उससे भारत वर्ष में रहने वालों का विनाश ही हुआ। लेकिन
इसका यह मतलब नहीं कि हमारी शुरुआत 1700 या 1750 में जो था उसी से
होगी। पिछले दो-ढाई सौ बरस में हमारे यहाँ जो बदला है, उसमें से शायद
कुछ हम अपने काम में ले पाएँ। आगे भी, बाकी पृथ्वी पर पिछले पचास बरसों
में जो बदलाव आए होंगे उनमें से भी कुछ हमारे काम के हो सकते हैं। लेकिन
बाहर का जो भी हम अपनाएंगे वह हमारे अपने विचारों, आधारों और स्वभाव के
अनुकूल होगा तभी वह हमारे काम का होगा।
आज सबसे पहले तो हमें अपनी कृषि, वन-व्यवस्था व पशुपालन पर
ध्यान देना होगा। ये ही हमारे समाज के मुख्य भौतिक आधार हैं। पश्चिम से
आए हुए तरीकों को छोड़कर, हमें अपने तरीकों, बीजों, फसलों,
सिंचाई-व्यवस्थाओं पर आना होगा और जो आवश्यक बदलाव उनमें करने हों
वे भी करने होंगे। हमें अपनी उपज भी बढ़ानी होगी, जैसे कि वह 1800 से पहले
होती थी और यह भी देखना होगा कि देश में कोई भी (मनुष्य, पशु या अन्य
जीव-जंतु) भूखा नहीं रहे। पशुओं और मनुष्यों का भूखे रहना हमारे लिए सबसे
बड़ा अभिशाप है।
यह भी अत्यन्त आवश्यक है कि भारतवर्ष जल्दी से जल्दी विदेशों से
अनाज, तेल और खाने-पीने के दूसरे सामान लेना बंद कर दे। हमारे महाद्वीप
जैसे देश में सभी कुछ पैदा किया जा सकता है। किसी पदार्थ की कमी होगी तो
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हमें उतनी कमी से सहन करना चाहिए। विदेशों को हमारी कुछ पैदावार की
विशेष आवश्यकता रहे तो हमें उन्हें कुछ एक फीसदी के करीब तक देना उचित
ही है।
भारत केवल कृषि-प्रधान देश नहीं था। पिछले 10-12 बरसों के
अध्ययन ने यह बतलाया है कि 1750 के करीब भारतवर्ष और चीन के क्षेत्र में
कुल विश्व का 73 प्रतिशत औद्योगिक उत्पादन होता था। 1820 में भी यह
उत्पादन 60 प्रतिशत तक रहा। सैकड़ों वस्तुएँ तब बनती होंगी। यह सब हमें
दोबारा आज की आवश्यकता के अनुसार स्थापित करना पड़ेगा।
हमारे बच्चों का पालन और शिक्षा पिछले 150-200 वर्षों में बुरी तरह
से बिगड़ी है। इसे फिर से ढंग से व्यवस्थित करना होगा। गाँवों, कस्बों व शहरों
के मुहल्लों में नई शुरुआत तो अभी से हो सकती है। इसमें आवश्यकता है कि
स्थानीय युवा वर्ग का इस काम में सहयोग मिले। शिक्षा का रूप क्या होगा इस
पर सोचना और उसको कार्यान्वित करना हमारी दूसरी प्राथमिकताएँ हैं। 6 से
12-13 बरस तक की शिक्षा का ध्येय तो यह होगा कि इन बरसों में हमारे बच्चे
सृष्टि, प्रकृति और उसमें रहने वाले सब जीवों से परिचित हो जाएँ, उनका
जीवन और स्वभाव समझें, उनसे मित्रता बनाएँ और 12-13 बरस की उम्र में
अपने को अपने देश और गाँव, नगर इत्यादि का नागरिक मानने लगें और
समाज की वार्ता में बराबर का भाग लेने लगें। जो भी जीवन को चलाने का काम
उन्हें करना होगा वह मुख्यतः तो इसके बाद दो-तीन बरस में सीखा जा सकता
है। अगले एक बरस में अगर देश की भिन्न-भिन्न भाषाओं में 8-10 पुस्तकें
इतिहास, भूगोल, स्थानीय प्रकृति और दूसरे जीव इत्यादि पर लिखी जा सकें
तो इस शिक्षा की रूपरेखा बनाने में बहुत सहायक होंगी।
अपने पड़ोसियों को भी, जिनके साथ हमारा हजारों वर्षों का घनिष्ठ
संबंध रहा है, फिर से समझना जरूरी है, क्योंकि आज हम यूरोप व अमरीका से
चालित दुनिया में रहते हैं इसलिए इनको भी और इनकी मान्यताओं, स्वभाव
इत्यादि को भी, समझना हमारे लिए आवश्यक है। वैसे यूरोप और अमरीका से
हम मित्रता रखते हुए भी, उनसे आवश्यक दूरी रख सके तो वह हमारे लिए ही
नहीं सभी के लिए शुभ रहेगा।
यह आवश्यक है कि हम अपने करीब के देशों से - विशेषतः चीन,
कोरिया, जापान, थाईलैण्ड, कंबोडिया, इंडोनेशिया, वियतमान, श्रीलंका, नेपाल,
म्यांमार (बर्मा), बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान से करीबी संबंध
दोबारा कायम करें। पिछले 500 बरसों में हमारे ये संबंध टूटे और शिथिल हुए
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हैं। लेकिन इन देशों की सोच व स्वभाव हमारे देश की सोच व स्वभाव से बहुत
मिलता-जुलता है। यहाँ तक कि इन सब देशों में गौतम बुद्ध का प्रभाव भारत से
गया। उसी समय या उससे भी पहले से इनमें से अधिक देशों में रामायण व
महाभारत का प्रसार भी रहा, और इन सब में भी अयोध्या नाम के नगर तो मिलते
ही हैं, मथुरा के नाम के भी। अयोध्या व मथुरा के नाम के नगर तो तकरीबन
1500 तक इन देशों की राजधानियाँ हुआ करती थीं।
अपने को समझने और पहचानने के लिए अपने पुराने समाज और
जीवन के भौतिक तथ्य जानना भी आवश्यक है। यह काम शीघ्र ही विद्या-केंद्रों
के द्वारा पी.एच.डी., व इसी तरह के अध्ययन-कार्यक्रम में होने चाहिए। अगले
6-7 महीने देश के 10-20 क्षेत्रों, जिलों, इत्यादि में ऐसी खोज शुरू की जा सके
तो 5-7 बरस के अंदर हमें अपने पुराने समाज की व्यवस्था, उसका जीवन,
विद्या, हुनर इत्यादि के बारे में काफी जानकारी मिल जाएगी।
नए भारत की रचना तभी ठीक तरह से संभव होगी जब हम अपनी
परंपराओं, मान्यताओं, धारणाओं और स्वभाव को समझ पाएंगे। कहा जाता है
कि महाभारत के युद्ध के बाद, उसमें जो हुआ और उससे जो परिणाम निकला,
उन्हें समझने के लिए हमारे ऋषि व दूसरे विद्वान बरसों तक नैमिषारण्य में बैठे
और आने वाले समय को केन्द्र में रखकर बीते उक्त काल खंड को समझने में
लगे रहे। आज का समय भी महाभारत के उक्त काम से कुछ मिलता-जुलता
ही है। हमारी परंपराओं, दर्शन और गए समय पर आज ध्यान रखते हुए विचार
आवश्यक है। इसके लिए 3-4 नए विद्या केंद्र स्थापित हों तो हम भविष्य में कैसे
क्या करना है, यह निश्चित कर सकेंगे।
अगर सब देशों के दार्शनिक, समाजशास्त्री, मनुष्य की आज की स्थिति
को और पिछले 500 वर्षों में जो स्थिति बनी है, कैसे मनुष्य (पुरुष और स्त्री दोनों)
का आत्मसम्मान घटा है, अकेलापन बढ़ा है और कैसे दोनों एक दूसरे के लिए
केवल क्षणिक भोग की वस्तु रह गए हैं, को समझने का प्रयास करते तो हो
सकता है पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों का आत्मसम्मान कुछ लौटता और उनके
छोटे-छोटे प्राकृतिक समूहों में परस्परता फिर से पनपने लगती और व्यक्तियों
का आलस्य व उदासीनता कम होती। लेकिन ऐसा तो अधिकतर संसार में अभी
होता दिखता नहीं है। फिर भी यह संभव है कि जिन क्षेत्रों में बौद्ध मत का प्रभाव
रहा है और जहाँ भारतीय व चीनी (इसमें जापान, कोरिया, कंब्रोज, इंडोनेशिया
सभी आ जाते हैं) मान्यताओं व परंपराओं का असर रहा है, वहाँ सब जीवों का
आत्मसम्मान, उनकी अपने समूहों में पारस्परिकता व स्वतंत्रता काफी हद तक
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शीघ्र ही वापस लाई जा सकती है। आर्थिक समृद्धि अपने में जरूरी है, विशेषतः
ऐसे क्षेत्रों में जो पिछले 200-300 बरसों में छिन्न-भिन्न हो गए हैं और जहाँ
अधिक लोगों में पिछले 150-200 बरस से कंगाली का बोलबाला है। लेकिन
आत्मसम्मान, परस्परता और सामूहिक स्वतंत्रता आएगी तो आर्थिक समृद्धि भी
क्रमशः आ ही जाएगी और समृद्धि की परिभाषा भी नए रूप लेने लगेगी।
जहाँ तक भारतवर्ष की बात है उसका पहला काम तो आज
आत्मसम्मान, साहस, परस्परता और सामूहिक स्वतंत्रता को देश में शीघ्रातिशीघ्र
स्थापित करना है। यह हो जाएगा तो अन्य जटिल प्रश्न भी हल होने लगेंगे।
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हमारे सपनों का भारत ?
हमारे सपने 1947 के दिनों में व 1942 के करीब क्या थे, यह सोचना
आज शायद आसान है। उन दिनों तो एक तीव्र भावना थी, अच्छे-अच्छे ख्याल
थे कि स्वाधीन होना है, और स्वाधीन होंगे तो सबको सम्मान से भोजन, कपड़ा,
मकान मिलेगा, सामुदायिक जीवन होगा, शांति से रहेंगे और विश्व में भी शांति
का ही सन्देश देंगे इत्यादि।
लेकिन किसी भी स्वप्न या लक्ष्य का स्वरूप, आत्मबोध तथा आत्मचित्र
के आधार पर ही निर्धारित होता है। उस दृष्टि से देखें तो लगता है कि हमारा
आत्मचित्र तो बहुत समय से हमारा अपना नहीं है। उन दिनों भी यही स्थिति
थी। हमें अंग्रेजों ने और अंग्रेजी शिक्षा ने जो-जो सिखा दिया था, उसे ही हम
अपना वास्तविक स्वरूप मानने लगे थे। जैसे, अंग्रेजों या उनकी शिक्षा का
कहना था या उनकी शिक्षा थी कि 'भारत के ऊपर तो सदैव दूसरों ने ही राज
किया है, भारत कभी स्वाधीन रहा नहीं।'' वे यह भी कहते थे कि – उन्होंने हमें
बचा रखा है, नहीं तो इस्लाम व पश्चिम के इस्लामी देश भारत को खा जायेंगे।
हमारे इतिहास तथा शास्त्रों के बारे में भी वे जो कहते थे, उसे ही हम पढ़े-लिखे
लोगों ने सत्य मान लिया था। बहुत से सुधार-आन्दोलन भी उसी मान्यता में से
उपजे थे। अपने इतिहास के प्रति ग्लानि तथा हीनता का भाव शिक्षित भारतीयों
में गहराई तक घर कर गया था। यह अवश्य है कि हम में से जो स्वाधीनता की
तीव्र भावना से भरे थे, वे भारतीय अतीत को इस तरह से हीन दिखाने के प्रयासों
को अस्वीकार करते थे।
यह भी था कि गांधी जी ने "हिन्द स्वराज" में पूर्व और पश्चिम की दो
भिन्न-भिन्न सभ्यताओं की बात उठाई और यहां के जनमानस में पहले से ही बैठी
अपनी सभ्यता की विशेषताएं दिखाई। उसका भी कुछ प्रभाव हमारे ऊपर था;
लेकिन आधुनिक शिक्षित वर्ग में ज्यादातर तो हवा एक ही थी कि पश्चिम बहुत
आगे बढ़ गया है, हमें भी उसी रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ना है। ज्ञान और प्रेरणा,
दोनों के लिए हम पश्चिम की ओर ही देखते थे। अपने वृहत् समाज के लोगों की
उन्नति करनी है, कल्याण करना है, विकास करना है, यह भाव तो था; पर अपने
समाज से कुछ सीखना भी है, वह स्वयं भी रास्ते की रुकावटें हट जाने पर कुछ
कर सकता है, यह भाव बहुत कम था।
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विश्व के बारे में हमारी जो धारणा थी, उसमें पश्चिम की शक्ति और
सफलताएं ही प्रमुख थीं, उसकी विकृतियां, ऐतिहासिक क्रूरताएं, बर्बरताएं हमारे
ध्यान में नहीं थीं। वे संसार के बारे में क्या विचार और धारणाएं रखते हैं, यह
हमारी जानकारी में नहीं था। इस प्रकार न तो हमें स्वतंत्र आत्मबोध था, न ही
सही विश्व-बोध। अपने बारे में भी हमारा आत्मचित्र उनके द्वारा गढ़ा हुआ था
और उनके बारे में भी हमारी मान्यताएं किसी अध्ययन या स्वयं की सोच-समझ
पर आधारित नहीं थी।
इसका कोई मामूली असर नहीं हुआ। अधिकांश सुधार-आंदोलन
भारतीय इतिहास के प्रति ग्लानि का भाव जगाने वाले बन गए। और तो और,
"स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है" का उद्घोष करने वाले लोकमान्य
बाल गंगाधर तिलक ने भी 'ओरायन' में "आर्कटिक होम इन द वेदाज" में इतिहास
की पश्चिम वालों की ही दृष्टि अपनाई।
ऐसा नहीं है कि स्वतंत्र विवेक में यह कमी ब्रिटिश-काल में ही आई।
वस्तुतः समाज पर पड़ने वाले दबावों का प्रभाव साहित्य आदि में भी होता है।
इसलिए हमारे जो महान ग्रन्थ हैं, महाकाव्य हैं, उनको भी उनकी रचना के समय
और परिवेश के सन्दर्भ में ही देखना चाहिए। यह नहीं मानना चाहिए कि सभी
कुछ प्राचीन काल से एक-सा ही है। वाल्मीकि रामायण और तुलसी की रामायण
(रामचरित मानस) में जो अंतर है, वह अधिकांश समय के भेद से ही है। भिन्न-भिन्न
स्मृतियों में भी अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं, इसका कारण भी यही समय का
अंतर है। अगर हम विवेक-बुद्धि से उन सबको नहीं देखेंगे तो भ्रांतियां स्वाभाविक
हैं।
संसार के बारे में हमें आज अधिक जानकारी प्राप्त है। उसके प्रकाश
में हमें संसार को और स्वयं को समझना चाहिए। लेकिन अभी तो दिखता यह है
कि हमारा जो सबल वर्ग है, वह अपने समाज से बौद्धिक और भावनात्मक स्तर
पर बहुत समय से दूर होता चला गया है। ब्रिटिश काल में इसने अंग्रेजों के
आचार-व्यवहार और बोली तथा अभिव्यक्ति की विधियों को अंगीकार कर
लिया। इससे ऐसी दृष्टि बनी कि हमारे एक अभिजन राजनेता ने 1945 में गांधी
जी से कहा कि कोई यह कैसे कबूल कर सकता है कि गांव के लोगों में भी कोई
सद्गुण और सामर्थ्य है, वे तो पूर्णतया मूर्ख ही हैं।
फलतः समाज के विकास के लिए हमने वे ही तरीके अपनाने शुरू
किए जो पश्चिम के थे। 1938 ई. में श्री सुभाषचन्द्र बोस ने एक राष्ट्रीय योजना
समिति बनाई थी, जिसके संयोजक वे स्वयं थे और अध्यक्ष थे श्री जवाहरलाल
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नेहरू। उस समिति ने भी योजना का जो रूप सोचा, वह पश्चिमी ढंग का ही
था।
इस तरह स्वतंत्र भारत में हम जिस रास्ते पर चले, उसकी नींव तो
बहुत पहले पड़ गई थी। अब हमें यह समझना होगा कि हर सभ्यता और
संस्कृति की अपनी-अपनी परम्पराएं होती हैं, उसके अनुसार ही वे सभ्यताएं
विकास किया करती हैं। जैसे 1850 के यूरोप में जो विज्ञान व तकनीकी विकसित
थी वह चीन में 2000 वर्ष पूर्व ही विकसित हो चुकी थी। लेकिन चीन ने बारूद
बनाने की विधियों से उत्सवों आदि में काम आने वाली आतिशबाजियां व पटाखे
बनाए, जबकि यूरोप ने अब से पांच-छः सौ वर्ष पहले वही विधि जानकर युद्ध
और हिंसा के लिए हथियार बनाये। यह सभ्यताओं की दिशा की भिन्नता के
कारण ही हुआ। ऐसा नहीं है कि दक्षिणी या पूर्वी एशिया के लोग विज्ञान और
तकनीकी में उन्नत नहीं थे; लेकिन उनकी सभ्यता उन्हें मर्यादा सिखाती थी और
हिंसक दिशाओं में बढ़ने से रोकती थी। यह उनकी अक्षमता नहीं, उनका विवेक
था। भारत में भी इस्पात तथा लोहे के निर्माण की अपनी विकसित विधि थी।
सन के पौधे के उपयोग से कागज बनाने तथा इसी तरह अलग-अलग
वनस्पतियों, आदि से रंगाई के विविध रसायन बनाने की प्रौद्योगिकी भी विकसित
थी। हर्षवर्धन के समय में और 18 वीं सदी में भी, उत्तर प्रदेश, बिहार इत्यादि में
पानी से बर्फ बनायी जाती रही है। खेती और सिंचाई तथा जल-प्रबंध की
अत्यंत विकसित प्रौद्योगिकी तो थी ही। लेकिन हमने उसमें से कोई विशालकाय
और थोड़े से लोगों के पूर्ण नियंत्रण में चलने वाले ठाट नहीं खड़े किए।
यूरोप का स्वभाव प्राचीन काल से ही हिंसक रहा लगता है। विशेषकर
इंग्लैंड और अमेरिका तो पिछले पांच सौ बरसों से पूरी तरह हिंसक स्वभाव के
रहे हैं; वे दूसरों के अस्तित्व का आगे बढ़ना सह नहीं पाते, सबको अपने अधीन
ही रखना चाहते हैं। पिछले सप्ताह यहीं दिल्ली में अमरीकी विद्वान चोम्स्की ने
तो कहा ही है; पर यह केवल उनकी बात नहीं है, बल्कि यह सर्वमान्य ही है कि
यूरोप और अमेरिका स्वभाव से ही हिंसक हैं। और देशों में भी समय-समय पर
हिंसा तो रही ही है, लेकिन वे अधिकांशतः हिंसा को मर्यादित करते रहे हैं।
दक्षिण व पूर्वी एशिया के लोग स्वभाव से मुख्यतः अहिंसक ही रहे हैं, ऐसा कहा
जा सकता है। फिर भी, हमने तो यूरोप की ही शिक्षा-दीक्षा, विकास-दृष्टि तथा
जीवन-दृष्टि अपना ली।
स्वतंत्रता मिली, हमें लगा कि चमत्कार हो गया। पर आगे क्या करना
है, इसका कोई स्पष्ट चित्र नहीं था। 18 वीं शताब्दी के इस यूरोपीय विचार से
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ही हम भी भरे हुए थे कि यदि अवसर उचित रहे तो हम लोग भी उनके रास्ते पर
चलते हुए उनके बीसवीं सदी के स्तर पर पहुंच जाएंगे। हमने मान लिया था कि
पश्चिमी चिंतन ही सारे संसार को जीत लेगा, इसलिए जल्दी-जल्दी उसी राह
पर हम बढ़ चले। लेकिन एकदम से पराई राह पर, अनचीन्ही, अपरिचित राह
पर चलना सबको तो नहीं आता। जिन्हें आता था, वे आगे बढ़ गए; पश्चिमीकृत
हो गए; बाकी यों ही पड़े रहे। इस तरह समाज के शक्तिशाली व सम्पन्न लोगों
की साधारण समाज से, वृहत् समाज से, दूरी बढ़ी, विलगाव बढ़ा, आत्मीयता
घटी।
फलतः समाज में कई स्तरों पर विभेद उभरे। पहले पुरुषों को अधिक
आधुनिक शिक्षा दी गई, तो वे कुछ पश्चिमी उपकरणों, वस्तुओं, साहित्य, मनोरंजन,
आदि का उपयोग करने और आनन्द लेने में समर्थ बने। पर भारतीय स्त्रियां ऐसी
शिक्षा में नहीं पड़ीं, उनकी भारतीय मानसिकता और सोच टिकी रही। इसलिए
घर के भीतर ही विखंडन हो गया; बाहर के कार्यक्षेत्र की बात घर पर कर
सकना सम्भव नहीं रहा और स्त्रियों और पुरुषों के संसार अलग-अलग होते
चले गये। मेरी मां पूछती - बेटा, क्या पढ़ रहा है, तो मैं उन्हें बता नहीं पाता;
कहता - तुम समझोगी नहीं। पहले जो लोग रामायण, भागवत्, रघुवंश, गीता,
महाभारत, पुराण, गणित-ज्योतिष, पंचतंत्र, हितोपदेश, व्याकरण आदि पढ़ते
थे, तो सरलता से मां को व परिवार की दूसरी स्त्रियों, बहनों व बेटियों को उनके
विषय में बता सकते थे, क्योंकि वे भी उन्हें समझ सकती थीं। पर अब यह
सम्भव नहीं रहा। खेती या पुराने हुनर, शिल्प, कला-कौशल, उद्योग आदि के
बारे में तो घर की स्त्रियां भी उतना ही जानती थीं, जितना पुरुष; बल्कि प्रायः
स्त्रियां कुछ अधिक ही जानती थीं। तो, पहले ऐसा विखंडन नहीं था, कार्यक्षेत्र के
बारे में घर पर बात की जा सकती थी; अब वह नहीं रहा।
इसी प्रकार, सम्पन्न लोगों और वृहत् समाज के बीच संवाद घटता
गया। मेटकाफ (अंग्रेज अधिकारी) ने जब 1930 के करीब कलकत्ते में कहा कि
इन भारतीयों का कुछ ठिकाना नहीं है, ये तो हवा के साथ चलते हैं, जाने कब
हमारे विरुद्ध हो जाएं, तो ब्रिटिश गवर्नर जनरल विलियम बेण्टिक ने कहा कि -
नहीं, कलकत्ते के समाज के बड़े लोग तो बदल रहे हैं, हमारे अनुकूल हो रहे हैं,
अब वे गौपालन, गोसेवा, ब्राह्मण-भोजन, भिक्षा, आदि में खर्च करना बंद कर
रहे हैं, हमारे मनोरंजन में, हमारे सेवा-सत्कार में ज्यादा से ज्यादा खर्च कर रहे
हैं; इसलिए हमारे अनुकूल वर्ग बढ़ रहा है।
यह विभेद, यह विलगाव तो शायद 1830 के करीब से बढ़ता ही गया।
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अभी कुछ वर्ष पहले मैं हरिद्वार गया था तो वहां हमारे पांडे की बही में हमारे ही
कस्बे के एक व्यक्ति की लिखत थी- 1885 की; जो अंग्रेजी में थी। जब इतने वर्ष
पहले उत्तर प्रदेश के एक कस्बे में एक व्यक्ति अंग्रेजी को प्रभुत्व की, प्रतिष्ठा की
भाषा मान रहा था, तो स्पष्ट है कि भेद तो बढ़ रहा था। वह बाद में गहरा ही
होता चला गया।
इस तरह अंग्रेजों की योजना ही सफल हुई। जो उन्होंने चाहा था,
अधिकांशतः वही हुआ। वे हमारी अपनी विद्या-बुद्धि तो नष्ट करना ही चाहते
थे। मैकाले के सामने कुछ अंग्रेज अफसरों ने यह तर्क रखा था कि यहां बंगाल
में तो एक लाख देशी स्कूल पहले से हैं, उन्हें हम दस-दस रुपया भी प्रति वर्ष दें
तो उनका काम चलता रहेगा। उसी में से अपने काम के लोग भी निकल आएंगे
या हम उनमें से छांट लेंगे। उस पर मैकाले ने कहा कि नहीं, उन्हें कुछ भी देने
का कोई औचित्य नहीं है, वह तो व्यर्थ होगा। पहले हम अपने प्रशिक्षकों को
प्रशिक्षित करें, फिर वे शिक्षण-संस्थाओं को बनायें और उनके माध्यम से काम
करें; तभी हमारी विश्व-दृष्टि का ज्ञान इन भारतीयों को होगा। तो इस तरह
हिन्दुस्तान को उन्होंने कोरी स्लेट मान लिया था और हमारे भी कुछ लोग तभी
से यही मान बैठे थे। उनकी विश्व-दृष्टि, शिक्षण-संस्थाओं वगैरह के द्वारा हम
तक पहुंची और हमने उसे ही अपना लिया, बिना मनन किए। पिछले 40-50
वर्षों में तो यह विचार मानस पर छा ही गया। जो लोग 1950 के करीब से ग्राम
पुनर्रचना, सामुदायिक विकास (कम्यूनिटी डिवेलपमेंट) इत्यादि चला रहे थे,
उन पर तो और भी अधिक।
अभी कुछ दिन पहले प्रख्यात दार्शनिक विद्वान दयाकृष्ण यहां दिल्ली
में बतला रहे थे कि 1850 के करीब से, जब अंग्रेजों ने भारत में विश्वविद्यालय
स्थापित करने शुरू किये, हमारा आत्मचित्र और आत्मस्मृति बिगड़नी शुरू हुई।
हम तबसे स्वयं को और अपने समाज व इतिहास को अंग्रेजों की दृष्टि से देखने
लगे। यह कुछ दुर्भाग्य ही है कि हमें यह समझ इतनी देर से आयी। मेरे विद्वान
मित्र श्री रामेश्वर मिश्र 'पंकज' का तो यह भी मानना है कि यह समझ भी हमारे
काम की तभी होगी जब हम अब तक की नासमझी और गलतियों व मूर्खताओं
के लिए प्रायश्चित्त कर लेंगे। गलती के लिए प्रायश्चित्त करना ही धर्म है, यह तो
हमारी पुरानी मान्यता है। रूस के प्रसिद्ध लेखक एलेक्जैंडर सोल्झेनित्सिन भी,
अपनी सभ्यताओं की मान्यताओं के आधार पर, प्रायश्चित को इसी तरह प्रतिष्ठा
देते हैं।
यह तो हमने सोचा ही नहीं कि यह हमारी अपनी विचार-परम्परा में
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से आने वाला अथवा उससे पुष्ट होने वाला विचार नहीं है, बल्कि यह तो पश्चिम
का ही विचार है। शायद प्लेटो का भी यही विचार रहा हो, पूंजीवाद और
मार्क्सवाद का तो है ही कि - लोग कुछ नहीं हैं, वे तो हमारे द्वारा सुधारे जाएंगे,
पीटे-डाले जाएंगे, फिर जिधर हम चाहेंगे, उधर वे चलते चले जाएंगे, हम बढ़ते
चले जाएंगे। जब, यह उनका विचार है तो उनमें इतनी शक्ति भी होती है कि
एक समय तक वे पूरे समाज को एक दिशा-विशेष में हांककर ले जाते हैं। जैसे,
सोवियत संघ ही था; मारपीट, वगैरह जो भी की, पर सत्तर साल तक मार्क्सवाद
वहां चला, शायद कुछ बनाया भी, हो सकता है रूस के लोगों को शक्ति भी
मिली हो, और उनका सामाजिक आत्मविश्वास तो बढ़ा ही है।
लेकिन वैसी कठोरता हमारे वश की नहीं। और अपनी शक्ति के उदात्त
रूपों की, परम्पराओं की हमारी स्मृति जैसे-जैसे धुंधली होती गई, वैसे-वैसे
कोई काम हम शक्तिवान लोगों की तरह कर पाने में असमर्थ होते गये। भारत में,
जहां लोगों को भोजन उपलब्ध कराने का लक्ष्य पूर्ण होना तो कुछ कठिन नहीं
था; हमसे वह भी नहीं हो पा रहा है। न ही हम सोच पाए कि यह हमसे हो
सकता है। हमारे मन में तो केवल सबको काम देने की बात थी वह भी ऐसे नए
काम, जो हम चाहते थे कि वे सीखें; उनका अपना हुनर, अपनी बुद्धि, अपनी
विद्या, अपनी सृजनशीलता भी सम्माननीय है, यह तो कभी हमें लगा नहीं। न ही
उनकी श्रेष्ठ परम्पराओं को प्रोत्साहन देकर और आत्माभिव्यक्ति के अवसर
देकर, हमने उन्हें कोई श्रेयष्कर काम करने दिए।
नतीजा यह हुआ कि हमने कुछ उत्पादन, वगैरह तो बढ़ाया, पर वह
सब निष्प्राण सा रहा। उसमें समाज का मन, बुद्धि, पुरुषार्थ, प्राणशक्ति खिलकर
नहीं लगी। नई चीजों की समझ भी पूरी तरह नहीं बनी और सम्बन्ध भी विकसित
नहीं हुए। इससे जो कुछ काम हुआ भी, उससे कबाड़ ही बढ़ा। 50 वर्षों में हमने
बहुत नया कबाड़ इकट्ठा कर लिया। पुराना कबाड़ भी बहुत सारा था ही।
छांटने का विवेक खोकर, हम बस संग्रह करते गये। अलग-अलग चीजें कबाड़
जैसी पड़ी रहीं; उनका आपस में कोई रचनात्मक सम्बन्ध बनाना तो हमने सीखा
नहीं। विचार के क्षेत्र में, मान्यताओं के क्षेत्र में, रुचियों के क्षेत्र में, भाषा, वेश-भूषा,
भवन और भोजन के क्षेत्र में, जो भी नवनिर्माण इधर हमने किया, वह तो कबाड़
जैसा ही है; उससे कोई राष्ट्रीय उत्कर्ष तो सम्भव नहीं है। इस कबाड़ को तो
हटाना ही होगा; नया ही सृजन करना होगा। क्या करना है, यह मुख्यतः अपने
ही लोगों से सीखना होगा, उनसे जिनमें अपनी शक्ति के उदात्त रूपों की और
परंपराओं की स्मृति अभी बची है।
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अपनी संस्थाओं, मान्यताओं को बिना किसी कुंठा के समझना होगा।
अपनी 'पालिटी' को, अपने राजनीति-तंत्र को, सही-सही समझना होगा। हमारे
बारे में जो-जो सिखाया-पढ़ाया गया है, उसके बारे में सन्देह करना भी सीखें,
सबको निर्दोष मानकर स्वीकार न करते चलें, यह बहुत जरूरी है।
यूरोप ने हमें जिस तरह से देखना सिखाया, उसे पुष्ट करने वाले तंत्र
भी उन्होंने रचे; उनका यह स्वभाव ही है। संयुक्त राज्य अमेरिका में रेडइंडियनों
(वहाँ के मूल निवासियों) की गणना पुरानी जनगणनाओं में कभी की ही नहीं
जाती थी, क्योंकि यूरोप से आए लोग रेडइंडियनों को मनुष्य नहीं मानते थे।
इसी दृष्टि के फलस्वरूप करोड़ों की संख्या वाले रेडइंडियनों का वंशनाश ही
कर डाला। अफ्रीका से लाये गये 'ब्लैक्स' को भी वे पूर्ण मानव नहीं मानते थे।
1850 के करीब शायद 5 'ब्लैक्स' को मिलाकर एक मनुष्य मानते रहे। मनुष्य
पूरी तरह तो वे केवल खुद को मानते हैं, बाकी उनके लिए आदिम, पिछड़े, बर्बर,
अविकसित मनुष्य, कमतर मनुष्य हैं।
भारत में भी ब्रिटिश जनगणना उनकी ही दृष्टि के हिसाब से की जाती
रही। हमारे यहां जाति तो कभी समाज की उस रूप में इकाई रही नहीं; 'जात'
शब्द का प्रयोग कुल-विशेष में जन्मे व्यक्तियों के अर्थ में ही किया जाता रहा है।
जाति व वर्ण कोई सामाजिक वर्ग कभी नहीं रहा। पर अंग्रेजों ने उसे इसी तरह
से दिखाया। 1881 व 1891 की जनगणना में अनेक जातियों में कई-कई हजार
उपजातियां दिखाई गई; यह तब के 'कुल' रहे होंगे, ऐसा लगता है। पंजाब में
1881 में जाटों में 10 हजार के करीब उपजातियां दिखाई गई थीं। वे सम्भवतः
आज कही जाने वाली खाप थीं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में 1881 की जनगणना
में अनेक जातियों में दो-दो चार-चार हजार उपजातियां दिखाई गई। ऐसा ही
तमिलनाडु में रहा। स्पष्ट है कि यह 'कुल-समूह' ही थे, जिन्हें उपजाति कहा
जा रहा था। बाद में कई उपजातियों को एकजुट करके दर्ज किया जाने लगा।
फिर जाति ही मूल इकाई बताई जाने लगी। फलतः हमारा शिक्षित वर्ग भी उसे
ही प्राचीन और स्वाभाविक मौलिक इकाई मानने लगा।
इस तरह हर क्षेत्र में हमने समाज की अपनी स्वाभाविक
आत्माभिव्यक्ति को अवरुद्ध किया, बाधित किया। दूसरी ओर, बाहर से भी जो
लिया, उसे ठीक से आत्मसात् नहीं कर पाये, अपना नहीं बना पाये। संसार में
सभी समाज और सभ्यताएं एक दूसरे से सीखते रहते हैं, पर वे सीखी हुई विद्या,
जानकारी और हुनर को अपना बना लेते हैं। आत्मसात् करने का यह काम भी
हम नहीं कर पाए। इससे केवल कबाड़ और बोझ बढ़ता रहा।
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1940 में महात्मा गांधी, राष्ट्रीय योजना समिति (नेशनल प्लानिंग
कमेटी) की ग्रामोद्योग उप-समिति (विलेज इंडस्ट्रीज सब-कमिटी) की वर्धा की
बैठक में मौजूद थे। निर्मल कुमार बोस के अनुसार उस समय गांधी जी की
सलाह थी कि परंपरागत (ट्रेडिशनल) और आधुनिक (मार्डेन), दोनों आस्थाओं व
विचारों के लोग अपनी-अपनी समयबद्ध विस्तृत योजना बना लें, और बतलायें
कि उनमें से क्या निकलेगा और काम शुरू करें। इस सुझाव में गांधी जी की शर्त
थी कि यह दोनों योजनाएं विदेशों से किसी तरह से धन व साधन नहीं लेंगी और
जो भी धन व साधन जरूरी होंगे, वे भारत के अन्दर से ही लिए जाएंगे। मुझे
लगता है कि गांधी जी के इस सुझाव पर, आज फिर विचार और खुली चर्चा
होनी आवश्यक है।
पिछले 150-200 वर्षों में यूरोप की सभ्यता ने भीमकाय और चमकीले
ढांचे तो अवश्य बनाये। उन्हें अधिक उत्पादक भी माना जाता है और कहा जाता
है कि वे मनुष्य की मेहनत को हल्का और आसान करते हैं। यूरोप का स्वचालन
(आटोमेशन) का विचार तो 2300 वर्ष पहले अरस्तू ने भी उठाया था। परन्तु, यह
यूरोप के बनाये तंत्र व ढांचे कुल मिलाकर विश्व को व मनुष्य समाजों को
कितना अधिक देते हैं, इस पर विचार करना आवश्यक है। 40-50 वर्ष पहले
हमारे मित्र रामस्वरूप ने अपनी पुस्तक 'कम्युनिज्म एंड द पीजैण्ट्री' में आधुनिक
उत्पादन (मॉडर्न प्रोडक्शन) के विषय में कुछ प्रश्न उठाये थे। उनका कहना था
कि इसका भीमकाय रूप, तेज रफ्तार और चमक्रीलापन एक भ्रम पैदा करता है
और इसकी जड़ें इसी भ्रम पर टिकी हैं! उनका मानना था कि कुल मिलाकर
मॉडर्निज्म से अधिक उत्पादन नहीं होता, उसका भ्रम ही रहता है। रामस्वरूप ने
इसको 'साइक्लिक प्रोडक्शन' का नाम दिया था। हमें इस तरह के मूलभूत
प्रश्नों पर भी सोचना शुरू करना चाहिये।
प्रश्न उठता है कि आगे क्या करें? आज के संसार से हमारे पश्चिमीकृत
वर्ग ने जो ज्यादा ही सम्बन्ध बना लिया है, वह अभी टूटता दिखता नहीं। अतः
कुछ समय तक तो पश्चिमीकृत समुदाय या वर्ग भी रहेगा और वृहत् समाज भी
रहेगा। भारतीय मान्यताओं में तो संसार ने सभी तरह के जीवों को, लोगों को
और समाजों को रहना ही है। हिंसकों के लिए भी यहां जगह है; हिंसा पूरी तरह
समाप्त हो, यह सम्भव नहीं है; लेकिन हिंसा मर्यादित रहे, यह आवश्यक है।
आज की स्थिति में यह विचारणीय एवं आवश्यक लगता है कि भारत
में वृहत् समाज को समुचित साधन व स्वतंत्रता मिले, जिससे वृहत् समाज की
इकाइयां अपनी मान्यताओं, व्यवस्था की अपनी प्रणालियों और अपने तकनीकी
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ज्ञान के आधार पर चल सकें! भारत में कृषि व उद्योग या ऐसे अन्य क्षेत्रों में 80
प्रतिशत उत्पादन तो आज भी परम्परागत भारतीय प्रतिभा के लोग ही करते हैं।
आवश्यक साधन व स्वतंत्रता रहेगी तो यह प्रतिभा फूले-फलेगी; परिष्कृत होगी
और इसके परिष्कृत होने पर यह भी सम्भव हो पायेगा कि पश्चिम के ज्ञान और
भारतीय बृहत् समाज के ज्ञान में कुछ संवाद और लेन-देन कायम हो सके।
बृहत् समाज के पास आवश्यक साधन व स्वतंत्रता आ जाये, पर्याप्त खुली जगह
(स्पेस) मिल जाये, तो वह आत्माभिव्यक्ति करने लगेगा। उसकी आत्माभिव्यक्तियां
ही समाज को स्वस्थ, सबल और समृद्ध बनाएंगी।
अभी के आधुनिकृत समूहों ने तो समस्त राजनैतिक सत्ता और बल का
प्रयोग इन आत्माभिव्यक्तियों को बाधित करने के लिए ही किया है। परिणाम
यह है कि भारत दो भागों में बंटा है, पर यह बंटवारा हमें सामाजिक विनाश की
ओर ही ले जाता है। एक भाग है उन आधे प्रतिशत लोगों का जो अपने सहायक
तथा सेवक वर्ग के सहारे, जो कि लगभग 15-20 प्रतिशत बैठता है, भारत के
तंत्र और साधन क्षेत्रों को नियंत्रित करते हैं। दूसरा भाग उन 80-85 प्रतिशत
लोगों का है, जो अपने अति सीमित साधनों और अवशिष्ट बल से ही जी रहे हैं।
यह सही है कि पश्चिम को इसका अभ्यास रहा है कि 90 क्या, 99
प्रतिशत तक की आबादी को एक प्रतिशत प्रभुवर्ग दासत्व में बांधकर रखे और
उन्हें मशीन जैसा मानकर काम ले। समय-समय पर पश्चिम के औजार इत्यादि
बदलते रहे हैं, लेकिन रिश्ता स्वामी और दास का ही बना रहा है। हमारे यहां तो
यह संस्कार ही नहीं रहा; इसलिए यहां के लोग जो स्वाधीनता-संग्राम के
कारण, उसके संस्कारों के प्रभाव से, सम्पन्न वर्ग के प्रति अब तक आत्मीयता
और सहनशीलता रखे हुए थे, वे अधिक समय इसे रख और सह नहीं सकेंगे।
अतः मनमाने टकराव तथा हिंसा का रास्ता खुला छोड़े रखने से अच्छा है कि
दोनों का स्पष्ट न्यायसंगत विभाजन हो जाए। पश्चिमीकृत लोग अपने पश्चिमी
किस्म के ढांचों के साथ महानगरों, आदि में रहें; परन्तु उनके साधन-स्रोत जरूर
घटाने होंगे; अभी की तरह 85-90 प्रतिशत साधनों का उपयोग केवल उन्हें ही
तो नहीं करने दिया जा सकता। लेकिन उन्हें न्यायपूर्ण साधन-स्रोतों के आधार
पर अपना जीवन चलाने की पूरी स्वतंत्रता रहे। दूसरी ओर, 80-85 प्रतिशत
लोगों को अपने साधन-स्रोतों का स्वविवेक से आत्माभिव्यक्ति के लिए प्रयोग
करने दिया जाए। उनसे गलतियां भी होंगी; पर गलतियां आधुनिक वर्ग से भी तो
कम नहीं हुई हैं।
इस तरह के न्यायसंगत बंटवारे में यह आवश्यक है कि इन लगभग
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48-50 वर्षों में हमने सरकारी और स्वैच्छिक स्तर पर जो नयी योजनाएं बनाई
हैं, संयंत्र, बांध, बिजली के प्रतिष्ठान, मकानों और वास्तुकला, आदि की विधियां
अपनाई हैं, उनकी पूरी तरह से समीक्षा हो। भारत की कृषि-व्यवस्था,
भवन-निर्माण, वन व्यवस्था, पशुपालन-व्यवस्था, वस्त्र-निर्माण व्यवस्था,
भवन-निर्माण एवं प्रबन्ध जैसे कार्य तो वृहत् समाज की ही जिम्मेदारी रहे।
उनकी शिक्षा भी उनके ही अधीन चलनी चाहिए; आधुनिकतावादियों की शिक्षा
का उन पर नियंत्रण तथा बोझ न रहे।
जितना वृहत् समाज के लोगों को बाहर का या आधुनिकीकृत वर्ग का
लेना तथा आत्मसात् करना होगा, वे कर लेंगे। आत्माभिव्यक्ति के स्वतंत्र अवसर
मिलें, तो वे आवश्यकतानुसार वाह्य ज्ञान को आत्मसात् भी करते रहेंगे। अपनी
सभ्यता, संस्कृति, विद्या-केन्द्रों का नवनिर्माण वे अपने विवेक से कर लेंगे।
आपस में स्वतंत्र तथा सम्मानजनक संवाद तथा सम्प्रेषण रहेगा ही। लेकिन
वृहत् समाज को हीन मानकर, उनका उद्धार और कल्याण करने की युक्तियां
देते हुए, राष्ट्रीय साधनों-स्रोतों पर नियंत्रण रखना हो तो हमें छोड़ना ही होगा।
ऐसे न्यायपूर्ण विभाजन, संयोजन और समन्वय द्वारा राष्ट्र में 20-30 वर्षों के
लिये दोनों हिस्सों का शक्ति पूर्ण सह अस्तित्व रह सकना संभव है, ऐसे सहअस्तित्व
की अवधि में, हमें कुछ अधिक साहस और शक्ति मिली तो हम मिलकर आगे का
भी सोच सकेंगे और ऐसे रास्ते व व्यवस्थायें बना सकेंगे जिनके द्वारा हमारा यह
टूटा-बिखरा समाज फिर से एक होकर आगे बढ़ सकेगा।
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अंग्रेजी शासन और तंत्र व्यवस्था
सन् 1750 से भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित करते ही, अंग्रेजों ने
यहां अपनी जरूरत के मुताबिक व्यवस्था को बदलना शुरू कर दिया था। उसमें
सबसे पहला काम तो अंग्रेज अफसरों व सैनिकों के मातहत बढ़ती हुई अंग्रेजी
सेना में भारतीयों को भर्ती करना था। दूसरा, और इससे भी अधिक महत्व का
काम था भारत के खुशहाल खेतिहरों व कारीगरों को अलग-अलग तरीकों से
अपने अधीन करना और यहां की खेती की उपज के आधे से अधिक भाग कर
(टैक्स) के रूप में बन्दूक व तलवार के जोर पर वसूल करना। इसी तरह से
कारीगरों से जबरदस्ती काम करवाना और उनके उद्योगों से बनी वस्तुओं की
कम से कम कीमत देना। आरम्भ में तो ऐसी कार्यवाही मद्रास व बंगाल के क्षेत्र
में ही रही, लेकिन सन् 1800 के बाद अंग्रेजों ने धीरे-धीरे सारे भारत में ऐसा
करना शुरू कर दिया। इसी प्रकार के बदलाव अंग्रेजों के मातहत आये हुए
भारतीय क्षेत्रों में भी होने लगे – वहां भी नये तंत्र स्थापित होने लगे।
भारतीय व्यवस्थाओं के अनुसार हर क्षेत्र की अपनी स्थानीय सैनिक
व्यवस्थाएं थीं और हर ग्राम व नगर में अपनी स्थानीय पुलिस व्यवस्था भी थी।
सेना और पुलिस स्थानीय व्यवस्थाओं के अधीन होती थी। इसी तरह से, जमीन
का हिसाब-किताब, उसकी रजिस्ट्री या उनमें आवश्यक तब्दीली करने वाले
लोग भी स्थानीय व्यवस्थाओं के मातहत रहते थे। जमीन के हिसाब-किताब से
संबंधित लोगों को दक्षिण भारत में कनकपिल्ले और उत्तर में लेखपाल, पटवारी
इत्यादि कहा जाता था। इसी तरह से गांव के स्तर पर बढ़ई, लोहार, धोबी,
कुम्हार, सिंचाई के साधनों की मरम्मत व व्यवस्था करने वाले, पंचांग और तिथि,
शुभ दिन इत्यादि बताने वाले, मंदिरों के पुजारी, देवदासी, गायक और दूसरे
कर्मचारी गांव और नगर के मोहल्लों से संबंधित होते थे। गांव में इन सब का
कृषि की उपज में हिस्सा होता था। अंग्रेजी शासन ने आते ही सेना, पुलिस,
कनकपिल्ले, सिंचाई के साधनों की मरम्मत व काम करने वालों इत्यादि को इस
व्यवस्था से पूरी तरह से अलग कर दिया। पुरानी व्यवस्था में इन लोगों को जो
मिलता था वह अब मिलना बन्द हो गया क्योंकि ब्रिटिश सरकार अब उसे कर
के रूप में लेने लगी। इनमें से कुछ लोगों को तो ब्रिटिश सरकार ने अपना नौकर
बना दिया परन्तु बाकी बेकार हो गये। अंग्रेजों से पहले भारत में, दक्षिण और
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उत्तर दोनों में, यह प्रथा थी कि किसी का अगर कुछ खो जाता था और पुलिस
अगर खोई हुई चीज को तलाश करने में सफल नहीं होती थी, तो पुलिस को
जिस व्यक्ति का सामान खोया होता था उसे हर्जाना देना पड़ता था। अंग्रेजी
व्यवस्था ने भारतीय पुलिस व्यवस्था को खत्म कर दिया और उसकी जगह नई
केन्द्रीकृत व्यवस्था लागू की। ऐसा करते ही हर्जाने की बात तो पूरी तरह से
समाप्त ही हो गयी। उल्टे कुछ दिनों के बाद ऐसा होने लगा कि अंग्रेजी पुलिस,
जिनका कुछ खो जाता था और जो शिकायत दर्ज करवाते थे, उन्हीं के साथ
मारपीट करने लगती थी। इसके साथ-साथ ही जमीन का लगान अंग्रेजी
व्यवस्था ने तिगुना-चौगुना बढ़ा दिया और सन् 1790 के आसपास जमीन की
मिल्कियत कुछ थोड़े से लोगों को दे दी, जिन्हें जमींदार कहा गया। वैसे इंग्लैंड
में 700 वर्षों से जमींदार होते रहे थे, लेकिन ये जमींदार किसान से कुल फसल
का 50-80 प्रतिशत तक लगान के रूप में ले लेते थे, सरकार को कुल फसल का
लगभग 10 प्रतिशत देते थे। शेष अपने पास रखते थे। लेकिन बंगाल इत्यादि में
जो जमींदार अंग्रेजों ने बनाये वे किसानों से उनकी उपज का करीब 50 प्रतिशत
वसूल करते थे और उसमें से 90 प्रतिशत ब्रिटिश सरकार को कर के रूप में देते
थे। उनके अपने पास किसान से वसूल किये गए लगान का 10 प्रतिशत ही
बचता था।
किसान से लगान वसूली की दर में तिगुनी-चौगुनी वृद्धि अंग्रेजों के
जमाने में हुई। इसलिए इतना ऊँचा कर वसूल करना असंभव सा हो गया।
इसका एक और कारण भी था। भारतीय व्यवस्था में लगान, जिसकी दर वैसे
भी काफी कम थी, अनाज के रूप में ही लिया जाता था। परन्तु अंग्रेजों ने बढ़ते
हुए लगान को, अनाज के बजाय पैसे में लेना शुरू किया। पिछले 10 वर्षों की
फसल का दाम इत्यादि निकाल कर भूमिकर पैसे के रूप में निर्धारित किया
गया। अंग्रेजी व्यवस्था के आने से गरीबी में जो भारी बढ़ोत्तरी हुई और उसकी
फसल के दाम गिर गये। इसका असर भी किसान पर दोतरफा हुआ क्योंकि
उसे लगान अब फसल के बजाय पैसे में देना होता था। मन्दी के कारण फसल
की कीमत कम होने की वजह से वास्तविक लगान की दर 80 से 90 प्रतिशत
तक होने लगी, यानी किसान के पास सिर्फ 10 से 20 प्रतिशत ही बचता था।
इस वजह से लगान वसूली में मुश्किलें आने लगीं। इसलिए अंग्रेजी तंत्र ने सन्
1792 में फैसला किया और जमींदार को यह हक दिया कि वह जब चाहे
खेतिहर को जमीन से बेदखल कर सकता है। इससे पहले भारत में कभी भी
खेतिहर को इस तरह से उनकी जमीन से बेदखल करने का रिवाज नहीं था।
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यहाँ दोनों पृष्ठों का पंक्ति-दर-पंक्ति अनुलेखन प्रस्तुत है:

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लेकिन अंग्रेजी अधिकारियों का तर्क था कि अगर इंग्लैंड में खेतिहर को वहां
का जमींदार निकाल सकता है तो भारत में ऐसा अधिकार और भी जरूरी है,
क्योंकि यहां लगान की दर इंग्लैंड से कई गुना ज्यादा है।
क्योंकि इतना बड़ा लगान वसूल करना आसान नहीं रहा होगा इसलिए
सेना की टुकड़ियों को, जिन्हें रेवेन्यू बटालियन कहा गया, उन्हें कर वसूल करने
के काम में लगाया गया। इसका परिणाम यह भी हुआ कि सन् 1805-1806
तक बंगाल-बिहार के अधिकांश जमींदार दिवालिया हो गये। इसके बाद इन
जमींदारियों की नीलामियाँ शुरू हुईं और साहूकार, फौजी ठेकेदार, राजा इत्यादि
नये जमींदार बने। यह सिलसिला अगले 40-50 वर्ष तक चलता रहा और इस
दौरान भारत की जनता की एक बड़ी संख्या भुखमरी, अकाल इत्यादि से सन्
1900 और उसके बाद तक मरती रही। कविवर श्री मैथिलीशरण गुप्त के अनुसार,
"कुल दुनिया की लड़ाइयों में सौ वर्ष के अन्दर (सन् 1793 से सन् 1900
तक) सिर्फ पचास लाख आदमी मारे गये थे पर हमारे हिन्दुस्तान के केवल
दस वर्ष में (सन् 1891 से सन् 1901 तक), भूख, अकाल के मारे एक
करोड़ नब्बे लाख मनुष्यों ने प्राण त्याग दिये"- (हिन्दी ग्रन्थमाला, मई सन्
1908 पृष्ठ 9 और 'भारत भारती', संवत् 1969, पृष्ठ 87)। तब मैथिलीशरण जी
26 वर्ष के थे। वे शायद राजेन्द्र प्रसाद व जवाहरलाल नेहरू की उम्र के तब रहे
होंगे, हो सकता है कि एक-दो वर्ष बड़े भी हों। इससे पहले, सन् 1870 के
आसपास भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कहा था कि अंग्रेजों ने भारतवासियों से सब
कुछ ले लिया, लेकिन उन्हें भीख मांगना अवश्य सिखा दिया है। महात्मा गांधी
जनवरी सन् 1915 में भारत लौटे थे। ऐसा लगता है कि मैथिलीशरण जी की
तरह बहुत से भारतीय गांधीजी के आने की तीव्र प्रतीक्षा कर रहे थे। जब
महात्मा गांधी 9 जनवरी, 1915 को जहाज से बम्बई पहुंचे तब उनका बहुत भव्य
स्वागत हुआ। लेकिन ऐसा स्वागत गांधीजी को कुछ अच्छा नहीं लगा। उनके
आने के तीन-चार दिनों के अन्दर भारत के कई प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों में
गांधीजी के आने को लेकर लम्बे-लम्बे संपादकीय लिखे गये - मद्रास के
'हिन्दू' में, और इलाहाबाद के 'लीडर' में भी। उन्हें पढ़ने से ऐसा लगता है जैसे
कि किसी अवतार की प्रतीक्षा हो रही थी। यह वर्णन कुछ उसी तरह का है जैसा
कि गौतम बुद्ध के जन्म का वर्णन अश्वघोष के 'बुद्ध चरित' में किया गया है, कुछ
ललित विस्तार से।
अगर यह सही है कि सन् 1891 से सन् 1901 तक भारत में भुखमरी
के कारण एक करोड़ नब्बे लाख लोग मर गये तो, अंग्रेजी शासन के शुरू से
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उसके अंत तक भारत में 20-25 करोड़ जन भुखमरी से मरे होंगे, ऐसा माना जा
सकता है। इसी तरह करोड़ों की संख्या में गाय, बैल, भैंस, बकरी, भेड़ और
दूसरे जीव-जन्तु भी मरे होंगे। वन और पेड़-पौधे तो बहुत बड़ी तादाद में नष्ट
हुए ही।
इस तरह के शोषण और अत्याचार के कारण भारतीयों में अंग्रेजों से
लड़ने की शक्ति नहीं रह गयी। वैसे तो भारत के लोग कभी भी खूँखार व लड़ाकू
नहीं रहे, न ही उन्हें न्यायालयों में जाने का चाव ही था। अंग्रेजी राज्य ने उनके
खेतों को छीन कर, उद्योगों व घरों को उजाड़ कर, उन्हें न्यायालयों की शरण
लेने के लिए एक तरह से बाध्य किया। इन न्यायालयों में असत्य का सहारा
लेना आवश्यक-सा हो गया। अंग्रेजों ने जो न्यायालय स्थापित किये उनमें अब
तक भी यह बात ज्यादा चलती रही कि भारतीय असत्य ही बोलते हैं। उन्हें
असत्य बोलना उनके वकीलों और कर्मचारियों एवं न्यायालयों ने ही सिखाया।
जैसे-जैसे न्यायालय स्थापित हुए वैसे-वैसे ही अंग्रेजी राज्य में जिलों
को चलाने के लिए दूसरे तंत्र भी स्थापित हुए। ताल्लुकों को चलाने के लिए तंत्र
बने। प्रदेशों को चलाने के लिए तंत्र बने। भारत को चलाने के लए तंत्र बने।
जितना अंग्रेजों से हो सका उतना उन्होंने भारत को कस कर रख दिया। लोगों
को हिलने-डुलने, सांस लेने तक का मौका नहीं रहा। भय और उसके साथ-साथ
गरीबी और मुफलिसी का राज्य छा गया।
फिर भी अंग्रेज कुछ भयभीत ही रहे, विशेषकर भारतीय सैनिकों से।
साधारणतः तो अंग्रेज यही मानते थे कि भारतीय सैनिक, जिनकी संख्या सन्
1820-30 में दो-तीन लाख रही होगी, उनके प्रति वफादार हैं। लेकिन उन्हें यह
भी लगता था कि कहीं अगर हवा का बहाव बदल गया और भारतीय सैनिकों
को यह लगने लगा कि अंग्रेजों का राज्य उखड़ने वाला है, तो फिर वे अंग्रेजों के
खिलाफ हो जायेंगे। इसी बीच में सन् 1829-30 के वर्षों में यह भी तय किया
गया कि अंग्रेजों और दूसरे यूरोपीय लोगों को भारत में जहाँ-तहाँ, विशेषतः
पर्वतों पर, ठंडी जगहों पर बसाया जाये। धीरे-धीरे ऐसी बसावट शुरू भी हुई।
इससे पहले भी भारत में सैकड़ों जगह अंग्रेजी सेना की छावनियां बनी थीं। सेना
के साथ, सेना की सेवा के लिए, उनकी तुलना में पांच-दस गुना ज्यादा लोग,
सेना की सवारी और सामान ढोने के लिए एकत्रित किये जाते रहे। इनमें से,
आधे से अधिक को, उस समय की अंग्रेजों द्वारा घटाई गयी मजदूरी भी नहीं दी
जाती थी और कुछ लोगों को तो एकदम 'बेगार' में ही रखा जाता था। अफसरों
व सैनिकों के लिए वेश्यालय भी तभी बने और जैसे-जैसे छावनियों की संख्या
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बढ़ने लगी वैसे-वैसे यह सब ठिकाने भी बढ़ने लगे। सन् 1857-58 की अंग्रेजों और भारतीयों के बीच की बड़ी लड़ाई के बाद, जिसमें अन्ततः भारतीय हार ही गये, उनके सैकड़ों शहर लूटे गये और उनके पचासों लाख लोगों को वृक्षों पर लटका कर, अलग-अलग तरीकों से, मार दिया गया। इसके बाद अंग्रेजों को यह आवश्यक लगा कि भारत में बड़े पैमाने पर अंग्रेजों और यूरोपियों को बसाने का काम तेजी से आरम्भ किया जाना चाहिये। आज जो यह पहाड़ी शहर देशभर में हैं और काफी चाय व काफी के बगीचे या दूसरे बड़े व्यापारिक खेती के मैदान असम, बिहार और दक्षिण भारत इत्यादि में बने हैं, ये अधिकांशतः सन् 1860 के इसी अंग्रेजी फैसले के बाद स्थापित हुए।

इसी तरह सैनिकों की छावनियाँ भी और बढ़ाई गयी होंगी। आज शायद यह मानना पड़ेगा कि अंग्रेजों ने भारत में जो यह विस्तृत तंत्र खड़ा किया है वह सारे देश से जल्दी जाने वाला नहीं है। यह तंत्र कैसे यहाँ से उखड़े, इसके लिए तो हमें काफी सोचना होगा। ऐसे रास्ते निकालने होंगे जिससे हम अपना तंत्र खड़ा कर सकें, जिससे कि भारत की राज्य व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, कृषि, वन, जल के साधन, बड़े और छोटे उद्योग और भारतीयों का सार्वजनिक जीवन, देश के लोगों के मन के अनुसार चल सके। इस तरह के सवाल स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में और पिछले 53 वर्षों में निश्चय ही हमारे विचारकों व राजनैतिकों के मन में उठे होंगे। सन् 1946 से सन् 1949 तक जो संवैधानिक सभा हमारे यहां बैठी, और जिसमें संविधान के बारे में काफी सोच-विचार और बातचीत हुई, उसमें भी इस तरह के प्रश्न उठे होंगे। उसके बाद भी देश की स्थिति को सामने रखकर ऐसे प्रश्न उठते ही दिखते हैं। ऐसा कहा जाता है कि अखिल भारतीय कांग्रेस में भी इस तरह के प्रश्न जब तब, गांधीजी के बाद भी, उठते रहे। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने स्वयं शायद कहा था कि उनके पिता जवाहर लाल नेहरू ने बड़ी गलती की कि अंग्रेजों के बनाये तंत्र को जैसा का तैसा रहने दिया। साधारण लोग और काफी सारे समाजवादी नेता और भारतीय जनता दल के कुछ नेता भी ऐसा कहते रहे हैं। कुछ दिनों पूर्व श्री नरसिंह राव ने, जो पांच वर्ष तक भारत के प्रधानमंत्री रहे, इस तरह के प्रश्नों को फिर से उठाया है, वह भी लंदन में। हम लोग इस पर सोचेंगे और बराबर आग्रह रखेंगे तो, दस-बीस वर्ष में भारत में, अंग्रेजों के बनाये तंत्र को पूर्ण रूप से बदलने का काम तो कर ही सकते हैं। जब ऐसा होगा तभी भारतीय शिक्षा, कृषि-उद्योग, पुलिस, सेवा आदि क्षेत्रों के स्वरूप को भी आज के समय के अनुरूप और प्राणवान भारतीय रूप में बनाना सम्भव होगा।

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कहाँ हैं पश्चिमीकरण की जड़ें ?

वैसे तो भारत पिछले 20-30 वर्षों से विश्वशक्तियों के बढ़ते दबाव में है। भारत के गांव के प्राथमिक स्कूल भी उनके आदेश व सहायता से चलने लगे हैं। बसों का किराया बढ़े यह भी उनके आदेश से होने लगा है। सड़कें कैसी हों, कितनी चौड़ी हों इसके आदेश भी बाहर से आने लगे हैं। यहाँ तक कि सेवाग्राम आश्रम जैसे स्थान भी चौड़ी-चौड़ी सड़कों से घिरने लगे हैं। जबकि ऐसे स्थानों और स्थलों की शांति व पवित्रता के लिये यह आवश्यक था कि उनके आसपास अधिक मोटर गाड़ियां व दूसरे वाहन न चलें। विदेशों में हमारा सामान ज्यादा से ज्यादा जाये इसमें फँस कर पिछले पचास बरसों में हम अपनी हस्तकला उद्योग का विनाश ही कर चुके हैं। और कुछ महीनों से खादी ग्रामोद्योग आयोग इसमें लगा है कि हम खादी से अमरीकी जीन्स कपड़ा डैनिम और उससे जीन्स बनवायें और उन्हें विदेशों में भेजें।

हमारी खेती में तो बड़े पैमाने पर बगैर सोचे समझे विदेशीकरण हो चुका है। हमारे गांवों के कृषि व ग्रामोद्योग के उजड़ने का एक बड़ा कारण यह हमारी बेसमझी की नकल है। ये ही बेसमझी हमें आधुनिकता को समझने से भी दूर रखती है --- चाहे वो तकनीकी के प्रश्न हों, व्यवस्था के या हमारी अपनी दिशा के। भारत की मानसिकता, उसकी प्राथमिकतायें, उसकी प्राकृतिक उपलब्धियां हमारे आज के देश चलाने वाले लोग समझ नहीं सके हैं। जैसे दो हजार बरस से यूरोप, व उसके बाद अरब लोग मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय व्यापार व लूटमार पर जीवन चलाते थे। उसे ही हमने बेसमझी में मान लिया है कि बाकी विश्व का भी वही तरीका है। लेकिन हमारे यहाँ तो हमारी आवश्यकताओं की सभी वस्तुएं साधारणतः प्रचुर मात्रा में पैदा होती थी, बनती थी, हमें उनका व्यवस्थित उपयोग आता था, उनमें से मुख्य खाना, कपड़ा, रहने की जगह, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति जीवन हमारे यहाँ के सब लोगों को उपलब्ध रहा है, यह हम भूल गये दिखते हैं। इस तरह की भूलें तो हमारे यहाँ पिछले पचास बरस से शुरू हुई, और अब तो हम सब पढ़े लिखे, अच्छे खाते पीते, किसी भी दल व सम्प्रदाय व वाद के हों, इन भूलों को सत्य वाक्य जैसे मानने लगे हैं। हममें वैसे पराये के लिये कोई प्रेम व निष्ठा नहीं पैदा हुई लेकिन यह जरूर हो गया है कि हमें अपने और पराये (व्यक्ति, व्यवस्था, तकनीक, विज्ञान) में जो भेद होते हैं वह

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समझ में नहीं आते। स्वदेशी के प्रचार में जो लोग आज लगे हैं उनमें से अधिकांश
को भी नहीं।
यह ऊपर जो कहा गया है वह अधिकांशतः तो हमारे 200-250 बरस
की दासता का परिणाम है, और पिछले 50 बरस में हमारे ऊपर जो बाहर का
बढ़ता दबाव है उससे इसका भारतव्यापी विस्तार हुआ है। हम समझ कर और
लगकर प्रयत्न करते तो उसमें से निकल आते। लेकिन इन 30-40-50 बरसों
की हमारी सोच और कार्य हमारे पर और एक नई विपत्ति ले आये हैं। देखने में
जो विपत्ति आई है वह वैसे तो 12-14 बरस पुरानी ही है लेकिन उसका आरंभ
व जड़ें तो यह जो हमारा संविधान है जिसको हमने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से
सीखा और उधार लिया, उसमें है।
अंग्रेजों ने 300-400 बरस पहले क्रोमवेल के मध्य सत्रहवीं शती के
समय से अपने यहां दो दलों को लेकर राज्यव्यवस्था बनानी शुरू की। वह
कमोबेश अभी भी अंग्रेजों के यहाँ चलती है। समय चलते चलते कोई और नया
दल बनता है – जैसे कि 18 वीं सदी के अन्त में ब्रिटिश लेबर पार्टी बनी, तो
पुरानों में से एक दल क्षीण पड़ जाता है जैसे कि विग व लिबरल क्षीण हुए।
लेकिन ब्रिटेन एक छोटा देश है, उत्तर प्रदेश से भी क्षेत्रफल में छोटा और आबादी
में तो आधा ही। दूसरे, राजनैतिक दल ही ब्रिटेन के लोगों के मुख्य संरक्षक व
सहारा नहीं हैं। ब्रिटेन में पचासों ईसाई सम्प्रदाय हैं जिनसे अलग अलग लोग,
पूरे मुहल्ले व गाँव भी सम्बंधित हैं। फिर वहाँ के पुराने धनवान और शक्तिशाली
लोगों की क्लबें हैं, जहाँ देश की स्थिति पर विचार होता रहता है और अक्सर
बड़े-बड़े फैसले भी ऐसे स्थानों पर होते हैं। यह जरूर है कि यह दो व तीन
राजनैतिक दलों का बारी बारी से सरकार चलाने का तरीका ब्रिटेन से अमरीका,
यूरोप व जापान तक गया है। लेकिन अमरीका इत्यादि में इस तरीके को अपनी
तरह से समझा गया है, खपाया गया है, और जहाँ वह नहीं खप पाया जैसे
दक्षिण अमरीका व अफ्रीका के देशों में, वहाँ जब तब डिक्टेटरशिप चलती ही है।
पिछले पचास बरस में हमारी राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक स्थिति
दक्षिण अमरीका व अफ्रीका के देशों जैसी होने लगी है। भारत की लोक सभा व
राज्यसभा, और प्रदेशों की विधानसभायें भी कंकाल जैसे होती जा रही हैं।
हमारा 'स्टील फ्रेम' कहा जाने वाला अंग्रेजों का दिया तंत्र व ढांचा भी अब
शक्तिहीन ही है, उसके बस का अब लोगों को बराबर भयभीत कर लेना नहीं है
जो कि ब्रिटिश समय में उसका मुख्य काम था, लेकिन लोगों के रास्ते में बाधायें
कायम करना तो अभी तक जारी है ही। इस राजनीतिक व्यवस्था और शासन
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तंत्र की एक बड़ी देन है कि उसने देश के लोगों को बांट दिया है, परिवार-परिवार
में व्यक्तियों को बांट दिया है, मोहल्लों-मोहल्लों में, गांव-गांव में। जिससे
भारत के 10 से 15 प्रतिशत लोग तो सरकारी व्यवस्था के खंबे बन गये हैं, और
बाकी 85 से 90 प्रतिशत निरूत्साहित, कंगाल और साधनहीन। देश का
मुहल्ला-मुहल्ला, गाँव-गाँव, नगर-नगर बंट चुका दिखता है। बंटना तो अंग्रेजों
के समय में ही आरंभ हो गया था, लेकिन हम उसे अब पूरा करने में लगे दिखते
हैं।
इस तरह के टूटने की एक भयंकर शुरूआत दिल्ली के सांसदों और
विधान सभा के सदस्यों को लेकर ही शुरू हुई। बहाना रहा कि दो, चार, छः
सदस्य जिन्हें आयाराम-गयाराम नाम दिया गया, एक राजनैतिक दल छोड़कर
दूसरे दल में जाते रहते हैं, और दलबदल होता रहता है, और इसमें धन व पद
का लालच भी काम करता है। यह दलबदल कोई नई बात नहीं है। हजारों वर्षों
से यह जहाँ तहाँ होता ही रहता है। इसके अलग-अलग इलाज भी होंगे। ब्रिटेन
में तो जो पार्लियामेंट के सदस्य अपने दल के साथ मत नहीं देते, उन्हें दल से
नहीं निकाला जाता, लेकिन उनका सामाजिक बहिष्कार जैसा होता है, लेकिन
हमारे विद्वान राजनितिकों व उनके सलाहकारों ने तय किया कि जो सदस्य हर
तरह से साथ नहीं देता, उसको न केवल दल से ही निकाल दिया जाये बल्कि
उसका फौरन ही राजनीतिक प्रतिनिधित्व भी समाप्त कर दिया जाये। वैसे जो
सदस्य सांसद या विधायक बनता है वह अपने क्षेत्र का प्रतिनिधि होता है, न कि
किसी दल का भृत्य। उसको डांट – फटकार व हुक्म देने का अगर किसी को
अधिकार है तो उसके क्षेत्र को न कि किसी राजनीतिक दल को। दल में वो
स्वायत्त ही आया है, और दल ठीक-ठाक चलता है, न्याय करता है तो वो
साधारणतः उसमें रहेगा ही। उसका किसी कारणवश विचार या ध्येय बदलता
है तो वो तो उसका क्षेत्र ही संभाल सकता है।
लेकिन हमने तो ब्रिटिश राज्य के शुरू से ही यहां के समाज और लोगों
के रास्ते में रुकावटें डालना ही सीखा है, या कानूनों के छिद्र बंद करना।
रुकावटें डालने या छिद्र बंद करने का परिणाम यह हुआ कि यह देश फिर से
क्रमशः आलस्य से भर गया और यहाँ की परस्परिकता ओझल – सी हो गयी।
वैसे तो आज का सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक ढांचा
इन 200–150 वर्षों में, या और पहले से ही, जर्जर होता गया है, लेकिन पिछले
8–10 बरसों से भारत का जो बेहाल हुआ है उसका मुख्य कारण सांसदों को
दल का भृत्य व कैदी जैसा बना देना है। वैसे भारत का संविधान और उसकी
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