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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 50 में से

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दूसरी ओर पहले से बड़ी संख्या में हमारे युवकजन अब और अधिक बौद्धिक
तथा व्यावसायिक दक्षता से युक्त हैं तथा शायद उनमें संकल्प निर्णय और
मौलिकता भी है, जिससे वे वांछित परिवर्तन और रद्दोबदल करने में समर्थ हो
सकते हैं। यह ध्यान में रखते हुए कि यदि हम चाह भी लें तो भी हम विश्व के
दबावों से सहसा अलग-थलग पड़कर नहीं रह सकते, यह हो सकता है कि
कुछ समय तक हमें दो भिन्न-भिन्न रास्तों पर सक्रिय रहना पड़े। एक मार्ग है
बाहरी दबावों और रिश्तों से व्यवहार का और दूसरा हमारे नैतिक और सामाजिक
मूल्यों के अनुकूल है। इस प्रकार हम दैनंदिन जीवन में सहभागिता और
सृजनात्मकता का प्रवर्त्तन कर सकते हैं तथा एक या दो दशकों में अपने समाज
को पूर्ण स्वस्थ बना सकते हैं।
किन्तु ऐसे समझौते और तालमेल वाले मार्ग को अपनाने पर भी
पाँच-सितारा संस्कृति के परित्याग की आवश्यकता तो पड़ेगी ही तथा कम से
कम कुछ दशकों के लिए हम सभी को अधिकांश मामलों में ग्रामीण झोपड़ी के
जीवन जैसा जीवन अपनाना होगा। यह तो सभी जानते हैं कि अन्य समाजों में
भी ऐसे ही प्रयास हुए हैं और उन्हें उल्लेखनीय सफलता मिली है।
यह संभव है कि आगामी दशकों में भारत स्वयं किसी तरह की
आधुनिकता को तथा उपयुक्त विज्ञान और प्रौद्योगिकी को चुने। भारतीय
योजना-निर्माताओं तथा उनके स्वामियों और प्रेरकों की बहुत गंभीर गलती यह
रही है कि उन्होंने देवताओं की तरह व्यवहार करने का प्रयास किया (या
आधुनिक बिम्ब-विधान से बात करें तो कहना होगा कि उन्होंने उस महान श्वेत
मनुष्य की तरह व्यवहार करने की कोशिश की, जो संसार के जंगली लोगों के
लिए दिव्य उपहारों का बोझ लेकर आया बताया जाता है।) उन्होंने उस जनता
के लिये जिसे उसने अपना श्रद्धालु भक्त समझ लिया था, योजना और विकास
का वरदान लेकर आने वाले जैसा व्यवहार किया। पर क्योंकि न तो वह भूरा
साहब था, न तो देवता, अतः अचरज नहीं कि स्थितियां इस तरह की हो गयीं।
शायद यह समय है जबकि हम वैज्ञानिक दृष्टि के साथ ही सामान्य बुद्धि का
प्रयोग करें और आज की कठोर वास्तविकता से एक-एक कदम आगे बढ़ें।
जैसा कि गांधी जी करते थे, तथा हर बार यह भली भाँति देख लें कि जो कदम
हम उठा रहे हैं वह ठोस आधार पर टिका है तथा हमारे उद्देश्य की दिशा में और
उसका पोषक है। एक बार हमारा समाज क्रियाशील हो उठे, अर्थात जब उसके
उत्पादन मात्र उसके भौतिक निवेश का परिणाम न हो अपितु अधिक सृजनशीलता
तथा प्रवीणता का फल हो, तब फिर अमूर्त मुद्दों पर बहस के लिए पर्याप्त समय
बना रहेगा।
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भारतीय समाज बनाम पश्चिमी
समाज व्यवस्था - 1
हमारे देश में या तीसरी दुनिया के दूसरे देशों में परिवार, शिक्षा और
समाज की जो अवधारणाएं आज प्रचलित हैं उनकी नींव ग्रेट ब्रिटेन या अमेरिका
में 19 वीं सदी के दौरान पड़ी थी। उन दिनों वहां जो सिद्धांत बनाए जा रहे थे
और जो विचार शक्ल ले रहे थे उन्हीं से इनका अर्थ निश्चित हुआ था। पुराने
यूनानी दिनों से लगा कर 19 वीं शताब्दी के मध्य तक यूरोप में परिवार और
शिक्षा का संबंध राजनैतिक सत्ता या संपत्ति हासिल करने से जुड़ा रहा है।
यूरोप में संपत्ति और राजनैतिक शक्ति बहुत थोड़े से लोगों में ही सीमित रही है।
इन थोड़े से लोगों ने ही अपने व्यक्तिगत जीवन में या उन्होंने जो साहित्य लिखा
उसमें परिवार या शिक्षा से होने वाले लाभ के बारे में सोचा-समझा है।
पिछले दो हजार साल में परिवार का स्वरूप, उसका ढांचा और उसका
अर्थ बदलता रहा है। यही बात शिक्षा के बारे में भी कही जा सकती है। प्लेटो या
अरस्तू ने यूरोपीय ढांचे में परिवार की जो अवधारणा की थी वह सामंती, अभिजात,
व्यापारिक या मध्यकालीन पश्चिमी यूरोप के साहूकार परिवारों से बहुत ज्यादा
मिलती-जुलती नहीं दिखाई देती। इसी तरह प्लेटो की अकादमी 19 वीं शताब्दी
के आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से बिल्कुल अलग दिखाई दे सकती है। लेकिन
पुराने स्पार्टा में, जहां नब्बे प्रतिशत आबादी दास या अजनबी लोगों की थी और
जिन्हें कोई नागरिक अधिकार हासिल नहीं थे या 19 वीं शताब्दी के ब्रिटेन में,
जहां सिर्फ एक प्रतिशत लोग जेंटलमैन समझे जाते थे, परिस्थितियां बहुत
अलग नहीं थीं। परिवार या शिक्षा की सारी समझ 18 वीं शताब्दी के आरंभ से
शुरू हुए यूरोपीय पुनर्जागरण काल तक इन्हीं थोड़े से ताकतवर लोगों के
दृष्टिकोण पर आधारित थी।
अठारहवीं शताब्दी के पुनर्जागरण के दौरान जो बहसें चलीं और उनमें
से जो सिद्धांत निकले उन्होंने इस संभावना की तरफ इशारा करना शुरू किया
कि परिवार और शिक्षा रूपी इन दोनों विशेषाधिकार को पश्चिमी यूरोप के सभी
या अधिकांश लोगों तक फैलाया जा सकता है। क्रांति के डर ने उन्हें ईसाई व
दूसरी नैतिक मान्यताओं को आम लोगों तक फैलाने के लिए प्रेरित किया। इसी
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