स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)
Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan
धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा
पृष्ठ 43, कुल 50 में से
संदर्भ में पढ़ेंअभी कुछ वर्ष पहले मैं हरिद्वार गया था तो वहां हमारे पांडे की बही में हमारे ही
कस्बे के एक व्यक्ति की लिखत थी- 1885 की; जो अंग्रेजी में थी। जब इतने वर्ष
पहले उत्तर प्रदेश के एक कस्बे में एक व्यक्ति अंग्रेजी को प्रभुत्व की, प्रतिष्ठा की
भाषा मान रहा था, तो स्पष्ट है कि भेद तो बढ़ रहा था। वह बाद में गहरा ही
होता चला गया।
इस तरह अंग्रेजों की योजना ही सफल हुई। जो उन्होंने चाहा था,
अधिकांशतः वही हुआ। वे हमारी अपनी विद्या-बुद्धि तो नष्ट करना ही चाहते
थे। मैकाले के सामने कुछ अंग्रेज अफसरों ने यह तर्क रखा था कि यहां बंगाल
में तो एक लाख देशी स्कूल पहले से हैं, उन्हें हम दस-दस रुपया भी प्रति वर्ष दें
तो उनका काम चलता रहेगा। उसी में से अपने काम के लोग भी निकल आएंगे
या हम उनमें से छांट लेंगे। उस पर मैकाले ने कहा कि नहीं, उन्हें कुछ भी देने
का कोई औचित्य नहीं है, वह तो व्यर्थ होगा। पहले हम अपने प्रशिक्षकों को
प्रशिक्षित करें, फिर वे शिक्षण-संस्थाओं को बनायें और उनके माध्यम से काम
करें; तभी हमारी विश्व-दृष्टि का ज्ञान इन भारतीयों को होगा। तो इस तरह
हिन्दुस्तान को उन्होंने कोरी स्लेट मान लिया था और हमारे भी कुछ लोग तभी
से यही मान बैठे थे। उनकी विश्व-दृष्टि, शिक्षण-संस्थाओं वगैरह के द्वारा हम
तक पहुंची और हमने उसे ही अपना लिया, बिना मनन किए। पिछले 40-50
वर्षों में तो यह विचार मानस पर छा ही गया। जो लोग 1950 के करीब से ग्राम
पुनर्रचना, सामुदायिक विकास (कम्यूनिटी डिवेलपमेंट) इत्यादि चला रहे थे,
उन पर तो और भी अधिक।
अभी कुछ दिन पहले प्रख्यात दार्शनिक विद्वान दयाकृष्ण यहां दिल्ली
में बतला रहे थे कि 1850 के करीब से, जब अंग्रेजों ने भारत में विश्वविद्यालय
स्थापित करने शुरू किये, हमारा आत्मचित्र और आत्मस्मृति बिगड़नी शुरू हुई।
हम तबसे स्वयं को और अपने समाज व इतिहास को अंग्रेजों की दृष्टि से देखने
लगे। यह कुछ दुर्भाग्य ही है कि हमें यह समझ इतनी देर से आयी। मेरे विद्वान
मित्र श्री रामेश्वर मिश्र 'पंकज' का तो यह भी मानना है कि यह समझ भी हमारे
काम की तभी होगी जब हम अब तक की नासमझी और गलतियों व मूर्खताओं
के लिए प्रायश्चित्त कर लेंगे। गलती के लिए प्रायश्चित्त करना ही धर्म है, यह तो
हमारी पुरानी मान्यता है। रूस के प्रसिद्ध लेखक एलेक्जैंडर सोल्झेनित्सिन भी,
अपनी सभ्यताओं की मान्यताओं के आधार पर, प्रायश्चित को इसी तरह प्रतिष्ठा
देते हैं।
यह तो हमने सोचा ही नहीं कि यह हमारी अपनी विचार-परम्परा में
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से आने वाला अथवा उससे पुष्ट होने वाला विचार नहीं है, बल्कि यह तो पश्चिम
का ही विचार है। शायद प्लेटो का भी यही विचार रहा हो, पूंजीवाद और
मार्क्सवाद का तो है ही कि - लोग कुछ नहीं हैं, वे तो हमारे द्वारा सुधारे जाएंगे,
पीटे-डाले जाएंगे, फिर जिधर हम चाहेंगे, उधर वे चलते चले जाएंगे, हम बढ़ते
चले जाएंगे। जब, यह उनका विचार है तो उनमें इतनी शक्ति भी होती है कि
एक समय तक वे पूरे समाज को एक दिशा-विशेष में हांककर ले जाते हैं। जैसे,
सोवियत संघ ही था; मारपीट, वगैरह जो भी की, पर सत्तर साल तक मार्क्सवाद
वहां चला, शायद कुछ बनाया भी, हो सकता है रूस के लोगों को शक्ति भी
मिली हो, और उनका सामाजिक आत्मविश्वास तो बढ़ा ही है।
लेकिन वैसी कठोरता हमारे वश की नहीं। और अपनी शक्ति के उदात्त
रूपों की, परम्पराओं की हमारी स्मृति जैसे-जैसे धुंधली होती गई, वैसे-वैसे
कोई काम हम शक्तिवान लोगों की तरह कर पाने में असमर्थ होते गये। भारत में,
जहां लोगों को भोजन उपलब्ध कराने का लक्ष्य पूर्ण होना तो कुछ कठिन नहीं
था; हमसे वह भी नहीं हो पा रहा है। न ही हम सोच पाए कि यह हमसे हो
सकता है। हमारे मन में तो केवल सबको काम देने की बात थी वह भी ऐसे नए
काम, जो हम चाहते थे कि वे सीखें; उनका अपना हुनर, अपनी बुद्धि, अपनी
विद्या, अपनी सृजनशीलता भी सम्माननीय है, यह तो कभी हमें लगा नहीं। न ही
उनकी श्रेष्ठ परम्पराओं को प्रोत्साहन देकर और आत्माभिव्यक्ति के अवसर
देकर, हमने उन्हें कोई श्रेयष्कर काम करने दिए।
नतीजा यह हुआ कि हमने कुछ उत्पादन, वगैरह तो बढ़ाया, पर वह
सब निष्प्राण सा रहा। उसमें समाज का मन, बुद्धि, पुरुषार्थ, प्राणशक्ति खिलकर
नहीं लगी। नई चीजों की समझ भी पूरी तरह नहीं बनी और सम्बन्ध भी विकसित
नहीं हुए। इससे जो कुछ काम हुआ भी, उससे कबाड़ ही बढ़ा। 50 वर्षों में हमने
बहुत नया कबाड़ इकट्ठा कर लिया। पुराना कबाड़ भी बहुत सारा था ही।
छांटने का विवेक खोकर, हम बस संग्रह करते गये। अलग-अलग चीजें कबाड़
जैसी पड़ी रहीं; उनका आपस में कोई रचनात्मक सम्बन्ध बनाना तो हमने सीखा
नहीं। विचार के क्षेत्र में, मान्यताओं के क्षेत्र में, रुचियों के क्षेत्र में, भाषा, वेश-भूषा,
भवन और भोजन के क्षेत्र में, जो भी नवनिर्माण इधर हमने किया, वह तो कबाड़
जैसा ही है; उससे कोई राष्ट्रीय उत्कर्ष तो सम्भव नहीं है। इस कबाड़ को तो
हटाना ही होगा; नया ही सृजन करना होगा। क्या करना है, यह मुख्यतः अपने
ही लोगों से सीखना होगा, उनसे जिनमें अपनी शक्ति के उदात्त रूपों की और
परंपराओं की स्मृति अभी बची है।
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