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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 50 में से

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भारतीय समाज बनाम पश्चिमी
समाज व्यवस्था - 2
इस तरह हमारे यहां परिवार एक व्यापक और अंतर्गठित समाज का
अंग रहा है। वह अनिवार्य रूप से कुटुंब, गोत्र, जाति और देश से जुड़ रहा है।
इसलिए यह पति-पत्नी और बच्चों की छोटी इकाई में कभी सीमित नहीं रहा।
परिवार के दैनिक काम जैसे निवास, भोजन बनाना, साफ-सफाई आदि इस
बुनियादी इकाई में सीमित रह सकते हैं। लेकिन संबंधों के मामले में पति-पत्नी
या बच्चे, सभी अनेक स्तरों पर जुड़े होते हैं। हमारे यहां विवाह को शायद ही
कभी व्यक्तिगत घटना माना जाता हो, वह तो एक सामाजिक घटना है। विवाह
के सूत्र में बंधने वाले युवक या युवती के बीच में चाहे जितना गहरा आकर्षण
रहा हो; उनका विवाह तो उनकी जाति और गोत्र या कुटुंबों के बीच हुआ रिश्ता
ही माना जाता था, और स्थानीय समाज के लिए वह एक महत्वपूर्ण घटना होती
थी। इन सामाजिक संबंधों के कारण कभी-कभी विवाह के इच्छुक युवक और
युवतियों की स्वतंत्रता में जरूर बाधा पड़ती होगी लेकिन मुसीबत में या जरूरत
पड़ने पर यह कौटुंबिक और सामाजिक रिश्ते ही जीवन की अनेक समस्याओं
को आसान कर देते होंगे।
इन सामाजिक संबंधों और विवाह संबंधों के कारण शिक्षा या दूसरे
सभी सामाजिक कार्य समाज की जरूरतों और समुदायों के अपने काम-धंधे
की जरूरतों से निर्धारित होते रहे हैं। यही वजह है कि अधिकांश लोगों की
शिक्षा ऐसी संस्थाओं में होती थी जिन्हें हम आज पड़ोस के स्कूल जैसी कोई
संज्ञा दे सकते हैं। शिक्षा के बारे में दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि वह विभिन्न
शिल्पों के विशेषज्ञ माने गए लोगों द्वारा दी जाती थी। ये लोग छात्र के माता-पिता
भी हो सकते थे। शास्त्रीय या अधिक विशेषता वाली शिक्षा तो विद्यालयों और
विद्यापीठों में ही दी जाती थी और वे आज के स्कूलों और कॉलेजों या उच्च
शिक्षा संस्थानों जैसे ही थे।
हमारे भारतीय समाज में जीवन की दिशा तय करने के बारे में,
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बारे में और सामाजिक सुरक्षा के बारे में क्या स्थिति थी
और प्राचीन यूरोप या आज के यूरोप के स्त्री-पुरुषों और बच्चों को जो कुछ
और जितना कुछ हासिल हो रहा है, इन दोनों की तुलनात्मक स्थिति को तो
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गहरे विश्लेषण और बहस से ही समझा जा सकता है। इस विश्लेषण और बहस
के जो भी नतीजे निकले लेकिन हमें अपने भविष्य के बारे में फैसले लेने से पहले
यह गारंटी जरूर कर लेनी चाहिए कि दोनों सभ्यताओं की बुनियादी
अवधारणाओं के बारे में कोई घालमेल और गलतफहमी न रहे। हर सभ्यता को
अपने विचारों का ढांचा समझ लेना चाहिए और उसके हिसाब से दुनिया को
देखते और समझते हुए अपने भविष्य की तस्वीर बनानी चाहिए।
हमारे यहां आज पुराने ढांचे और तौर-तरीकों के अवशेष तो दिखाई
दे सकते हैं लेकिन वह तेजस्विता नहीं जो 1950 के आसपास भी दिखाई देती
है। करीब दो सौ साल पहले अंग्रेजी शासन के शुरू होने के साथ-साथ हमारे
समाज और हमारी राज्य व्यवस्था में एक गहरी दरार पड़ गई थी। उससे भी
पहले उत्तर और पश्चिम भारत के मुस्लिम शासित इलाके में भी राज्य और
समाज में खाई देखी जा सकती है। मुस्लिम शासकों का शासन करने का ढंग
और मुहावरा भी भारतेत्तर विचारों में ढला था। राज्य और समाज के इस
अलगाव ने मुस्लिम शासन के दौरान दोनों को ही एक दूसरे के बारे में शंका ग्रस्त
रखा और उससे दोनों ही कमजोर हुए होंगे। इस जड़ता और कमजोरी के
कारण ही बाद में यूरोपीय लोग हमें जीत सके और पराधीन बना सके।
अंग्रेजों के जमाने में राज्य और समाज की खाई के और खतरनाक
परिणाम निकले। उसने भारतीय समाज को सब तरह से बाँट और तोड़ दिया।
समाज की बुनियादी इकाइयां जीवन-मरण के संघर्ष में पड़ गई, और अपने
भीतर सिकुड़ती चली गयीं। इसने भारत को कायरता, गरीबी और अराजकता
में पहुंचा दिया। दूसरी तरफ राज्यतंत्र निरंकुश होता चला गया। उसमें कर्तव्य
की सारी भावना नष्ट हो गई और आशंकाओं से इतना भर गया कि लोगों में होने
वाली जरा-सी फुसफुसाहट उसे अपने लिये बड़ी चुनौती नजर आने लगी और
वह उसमें अपने अस्तित्व के लिये ही संकट देखने लगा।
राज्य के बड़ी नाजुक स्थिति में होने की यह भावना अंग्रेजों के समूचे
शासन काल में बनी रही। खास तौर पर 1820 में, 1857-58 में और 1893 के
गौहत्या विरोधी व्यापक आंदोलन के दौरान तो अवश्य ही। तथा 1930-31 के
नमक सत्याग्रह के दौरान वह काफी गहरी दिखाई देती है। उस समय तो इस
भावना का थोड़ा बहुत होना समझ में आ भी सकता है। मगर यह भावना तो
अंग्रेजों के जाने के बाद भी हमारे राज्यतंत्र में बनी हुई है। इससे अनुमान
लगाया जा सकता है कि हमारे राजनैतिक ढांचे में कहीं कोई भारी गड़बड़ी है।
इस गड़बड़ी की जड़ें तो दरअसल और भी ज्यादा गहरी हैं। [94/२]
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