स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)
Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan
धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञान के आधार पर चल सकें! भारत में कृषि व उद्योग या ऐसे अन्य क्षेत्रों में 80
प्रतिशत उत्पादन तो आज भी परम्परागत भारतीय प्रतिभा के लोग ही करते हैं।
आवश्यक साधन व स्वतंत्रता रहेगी तो यह प्रतिभा फूले-फलेगी; परिष्कृत होगी
और इसके परिष्कृत होने पर यह भी सम्भव हो पायेगा कि पश्चिम के ज्ञान और
भारतीय बृहत् समाज के ज्ञान में कुछ संवाद और लेन-देन कायम हो सके।
बृहत् समाज के पास आवश्यक साधन व स्वतंत्रता आ जाये, पर्याप्त खुली जगह
(स्पेस) मिल जाये, तो वह आत्माभिव्यक्ति करने लगेगा। उसकी आत्माभिव्यक्तियां
ही समाज को स्वस्थ, सबल और समृद्ध बनाएंगी।
अभी के आधुनिकृत समूहों ने तो समस्त राजनैतिक सत्ता और बल का
प्रयोग इन आत्माभिव्यक्तियों को बाधित करने के लिए ही किया है। परिणाम
यह है कि भारत दो भागों में बंटा है, पर यह बंटवारा हमें सामाजिक विनाश की
ओर ही ले जाता है। एक भाग है उन आधे प्रतिशत लोगों का जो अपने सहायक
तथा सेवक वर्ग के सहारे, जो कि लगभग 15-20 प्रतिशत बैठता है, भारत के
तंत्र और साधन क्षेत्रों को नियंत्रित करते हैं। दूसरा भाग उन 80-85 प्रतिशत
लोगों का है, जो अपने अति सीमित साधनों और अवशिष्ट बल से ही जी रहे हैं।
यह सही है कि पश्चिम को इसका अभ्यास रहा है कि 90 क्या, 99
प्रतिशत तक की आबादी को एक प्रतिशत प्रभुवर्ग दासत्व में बांधकर रखे और
उन्हें मशीन जैसा मानकर काम ले। समय-समय पर पश्चिम के औजार इत्यादि
बदलते रहे हैं, लेकिन रिश्ता स्वामी और दास का ही बना रहा है। हमारे यहां तो
यह संस्कार ही नहीं रहा; इसलिए यहां के लोग जो स्वाधीनता-संग्राम के
कारण, उसके संस्कारों के प्रभाव से, सम्पन्न वर्ग के प्रति अब तक आत्मीयता
और सहनशीलता रखे हुए थे, वे अधिक समय इसे रख और सह नहीं सकेंगे।
अतः मनमाने टकराव तथा हिंसा का रास्ता खुला छोड़े रखने से अच्छा है कि
दोनों का स्पष्ट न्यायसंगत विभाजन हो जाए। पश्चिमीकृत लोग अपने पश्चिमी
किस्म के ढांचों के साथ महानगरों, आदि में रहें; परन्तु उनके साधन-स्रोत जरूर
घटाने होंगे; अभी की तरह 85-90 प्रतिशत साधनों का उपयोग केवल उन्हें ही
तो नहीं करने दिया जा सकता। लेकिन उन्हें न्यायपूर्ण साधन-स्रोतों के आधार
पर अपना जीवन चलाने की पूरी स्वतंत्रता रहे। दूसरी ओर, 80-85 प्रतिशत
लोगों को अपने साधन-स्रोतों का स्वविवेक से आत्माभिव्यक्ति के लिए प्रयोग
करने दिया जाए। उनसे गलतियां भी होंगी; पर गलतियां आधुनिक वर्ग से भी तो
कम नहीं हुई हैं।
इस तरह के न्यायसंगत बंटवारे में यह आवश्यक है कि इन लगभग
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48-50 वर्षों में हमने सरकारी और स्वैच्छिक स्तर पर जो नयी योजनाएं बनाई
हैं, संयंत्र, बांध, बिजली के प्रतिष्ठान, मकानों और वास्तुकला, आदि की विधियां
अपनाई हैं, उनकी पूरी तरह से समीक्षा हो। भारत की कृषि-व्यवस्था,
भवन-निर्माण, वन व्यवस्था, पशुपालन-व्यवस्था, वस्त्र-निर्माण व्यवस्था,
भवन-निर्माण एवं प्रबन्ध जैसे कार्य तो वृहत् समाज की ही जिम्मेदारी रहे।
उनकी शिक्षा भी उनके ही अधीन चलनी चाहिए; आधुनिकतावादियों की शिक्षा
का उन पर नियंत्रण तथा बोझ न रहे।
जितना वृहत् समाज के लोगों को बाहर का या आधुनिकीकृत वर्ग का
लेना तथा आत्मसात् करना होगा, वे कर लेंगे। आत्माभिव्यक्ति के स्वतंत्र अवसर
मिलें, तो वे आवश्यकतानुसार वाह्य ज्ञान को आत्मसात् भी करते रहेंगे। अपनी
सभ्यता, संस्कृति, विद्या-केन्द्रों का नवनिर्माण वे अपने विवेक से कर लेंगे।
आपस में स्वतंत्र तथा सम्मानजनक संवाद तथा सम्प्रेषण रहेगा ही। लेकिन
वृहत् समाज को हीन मानकर, उनका उद्धार और कल्याण करने की युक्तियां
देते हुए, राष्ट्रीय साधनों-स्रोतों पर नियंत्रण रखना हो तो हमें छोड़ना ही होगा।
ऐसे न्यायपूर्ण विभाजन, संयोजन और समन्वय द्वारा राष्ट्र में 20-30 वर्षों के
लिये दोनों हिस्सों का शक्ति पूर्ण सह अस्तित्व रह सकना संभव है, ऐसे सहअस्तित्व
की अवधि में, हमें कुछ अधिक साहस और शक्ति मिली तो हम मिलकर आगे का
भी सोच सकेंगे और ऐसे रास्ते व व्यवस्थायें बना सकेंगे जिनके द्वारा हमारा यह
टूटा-बिखरा समाज फिर से एक होकर आगे बढ़ सकेगा।
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