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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 50 में से

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पृष्ठ 41

हमारे सपनों का भारत ?
हमारे सपने 1947 के दिनों में व 1942 के करीब क्या थे, यह सोचना
आज शायद आसान है। उन दिनों तो एक तीव्र भावना थी, अच्छे-अच्छे ख्याल
थे कि स्वाधीन होना है, और स्वाधीन होंगे तो सबको सम्मान से भोजन, कपड़ा,
मकान मिलेगा, सामुदायिक जीवन होगा, शांति से रहेंगे और विश्व में भी शांति
का ही सन्देश देंगे इत्यादि।
लेकिन किसी भी स्वप्न या लक्ष्य का स्वरूप, आत्मबोध तथा आत्मचित्र
के आधार पर ही निर्धारित होता है। उस दृष्टि से देखें तो लगता है कि हमारा
आत्मचित्र तो बहुत समय से हमारा अपना नहीं है। उन दिनों भी यही स्थिति
थी। हमें अंग्रेजों ने और अंग्रेजी शिक्षा ने जो-जो सिखा दिया था, उसे ही हम
अपना वास्तविक स्वरूप मानने लगे थे। जैसे, अंग्रेजों या उनकी शिक्षा का
कहना था या उनकी शिक्षा थी कि 'भारत के ऊपर तो सदैव दूसरों ने ही राज
किया है, भारत कभी स्वाधीन रहा नहीं।'' वे यह भी कहते थे कि – उन्होंने हमें
बचा रखा है, नहीं तो इस्लाम व पश्चिम के इस्लामी देश भारत को खा जायेंगे।
हमारे इतिहास तथा शास्त्रों के बारे में भी वे जो कहते थे, उसे ही हम पढ़े-लिखे
लोगों ने सत्य मान लिया था। बहुत से सुधार-आन्दोलन भी उसी मान्यता में से
उपजे थे। अपने इतिहास के प्रति ग्लानि तथा हीनता का भाव शिक्षित भारतीयों
में गहराई तक घर कर गया था। यह अवश्य है कि हम में से जो स्वाधीनता की
तीव्र भावना से भरे थे, वे भारतीय अतीत को इस तरह से हीन दिखाने के प्रयासों
को अस्वीकार करते थे।
यह भी था कि गांधी जी ने "हिन्द स्वराज" में पूर्व और पश्चिम की दो
भिन्न-भिन्न सभ्यताओं की बात उठाई और यहां के जनमानस में पहले से ही बैठी
अपनी सभ्यता की विशेषताएं दिखाई। उसका भी कुछ प्रभाव हमारे ऊपर था;
लेकिन आधुनिक शिक्षित वर्ग में ज्यादातर तो हवा एक ही थी कि पश्चिम बहुत
आगे बढ़ गया है, हमें भी उसी रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ना है। ज्ञान और प्रेरणा,
दोनों के लिए हम पश्चिम की ओर ही देखते थे। अपने वृहत् समाज के लोगों की
उन्नति करनी है, कल्याण करना है, विकास करना है, यह भाव तो था; पर अपने
समाज से कुछ सीखना भी है, वह स्वयं भी रास्ते की रुकावटें हट जाने पर कुछ
कर सकता है, यह भाव बहुत कम था।
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विश्व के बारे में हमारी जो धारणा थी, उसमें पश्चिम की शक्ति और
सफलताएं ही प्रमुख थीं, उसकी विकृतियां, ऐतिहासिक क्रूरताएं, बर्बरताएं हमारे
ध्यान में नहीं थीं। वे संसार के बारे में क्या विचार और धारणाएं रखते हैं, यह
हमारी जानकारी में नहीं था। इस प्रकार न तो हमें स्वतंत्र आत्मबोध था, न ही
सही विश्व-बोध। अपने बारे में भी हमारा आत्मचित्र उनके द्वारा गढ़ा हुआ था
और उनके बारे में भी हमारी मान्यताएं किसी अध्ययन या स्वयं की सोच-समझ
पर आधारित नहीं थी।
इसका कोई मामूली असर नहीं हुआ। अधिकांश सुधार-आंदोलन
भारतीय इतिहास के प्रति ग्लानि का भाव जगाने वाले बन गए। और तो और,
"स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है" का उद्घोष करने वाले लोकमान्य
बाल गंगाधर तिलक ने भी 'ओरायन' में "आर्कटिक होम इन द वेदाज" में इतिहास
की पश्चिम वालों की ही दृष्टि अपनाई।
ऐसा नहीं है कि स्वतंत्र विवेक में यह कमी ब्रिटिश-काल में ही आई।
वस्तुतः समाज पर पड़ने वाले दबावों का प्रभाव साहित्य आदि में भी होता है।
इसलिए हमारे जो महान ग्रन्थ हैं, महाकाव्य हैं, उनको भी उनकी रचना के समय
और परिवेश के सन्दर्भ में ही देखना चाहिए। यह नहीं मानना चाहिए कि सभी
कुछ प्राचीन काल से एक-सा ही है। वाल्मीकि रामायण और तुलसी की रामायण
(रामचरित मानस) में जो अंतर है, वह अधिकांश समय के भेद से ही है। भिन्न-भिन्न
स्मृतियों में भी अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं, इसका कारण भी यही समय का
अंतर है। अगर हम विवेक-बुद्धि से उन सबको नहीं देखेंगे तो भ्रांतियां स्वाभाविक
हैं।
संसार के बारे में हमें आज अधिक जानकारी प्राप्त है। उसके प्रकाश
में हमें संसार को और स्वयं को समझना चाहिए। लेकिन अभी तो दिखता यह है
कि हमारा जो सबल वर्ग है, वह अपने समाज से बौद्धिक और भावनात्मक स्तर
पर बहुत समय से दूर होता चला गया है। ब्रिटिश काल में इसने अंग्रेजों के
आचार-व्यवहार और बोली तथा अभिव्यक्ति की विधियों को अंगीकार कर
लिया। इससे ऐसी दृष्टि बनी कि हमारे एक अभिजन राजनेता ने 1945 में गांधी
जी से कहा कि कोई यह कैसे कबूल कर सकता है कि गांव के लोगों में भी कोई
सद्गुण और सामर्थ्य है, वे तो पूर्णतया मूर्ख ही हैं।
फलतः समाज के विकास के लिए हमने वे ही तरीके अपनाने शुरू
किए जो पश्चिम के थे। 1938 ई. में श्री सुभाषचन्द्र बोस ने एक राष्ट्रीय योजना
समिति बनाई थी, जिसके संयोजक वे स्वयं थे और अध्यक्ष थे श्री जवाहरलाल
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