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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 50 में से

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यहाँ दोनों पृष्ठों का पंक्ति-दर-पंक्ति अनुलेखन प्रस्तुत है:

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लेकिन अंग्रेजी अधिकारियों का तर्क था कि अगर इंग्लैंड में खेतिहर को वहां
का जमींदार निकाल सकता है तो भारत में ऐसा अधिकार और भी जरूरी है,
क्योंकि यहां लगान की दर इंग्लैंड से कई गुना ज्यादा है।
क्योंकि इतना बड़ा लगान वसूल करना आसान नहीं रहा होगा इसलिए
सेना की टुकड़ियों को, जिन्हें रेवेन्यू बटालियन कहा गया, उन्हें कर वसूल करने
के काम में लगाया गया। इसका परिणाम यह भी हुआ कि सन् 1805-1806
तक बंगाल-बिहार के अधिकांश जमींदार दिवालिया हो गये। इसके बाद इन
जमींदारियों की नीलामियाँ शुरू हुईं और साहूकार, फौजी ठेकेदार, राजा इत्यादि
नये जमींदार बने। यह सिलसिला अगले 40-50 वर्ष तक चलता रहा और इस
दौरान भारत की जनता की एक बड़ी संख्या भुखमरी, अकाल इत्यादि से सन्
1900 और उसके बाद तक मरती रही। कविवर श्री मैथिलीशरण गुप्त के अनुसार,
"कुल दुनिया की लड़ाइयों में सौ वर्ष के अन्दर (सन् 1793 से सन् 1900
तक) सिर्फ पचास लाख आदमी मारे गये थे पर हमारे हिन्दुस्तान के केवल
दस वर्ष में (सन् 1891 से सन् 1901 तक), भूख, अकाल के मारे एक
करोड़ नब्बे लाख मनुष्यों ने प्राण त्याग दिये"- (हिन्दी ग्रन्थमाला, मई सन्
1908 पृष्ठ 9 और 'भारत भारती', संवत् 1969, पृष्ठ 87)। तब मैथिलीशरण जी
26 वर्ष के थे। वे शायद राजेन्द्र प्रसाद व जवाहरलाल नेहरू की उम्र के तब रहे
होंगे, हो सकता है कि एक-दो वर्ष बड़े भी हों। इससे पहले, सन् 1870 के
आसपास भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कहा था कि अंग्रेजों ने भारतवासियों से सब
कुछ ले लिया, लेकिन उन्हें भीख मांगना अवश्य सिखा दिया है। महात्मा गांधी
जनवरी सन् 1915 में भारत लौटे थे। ऐसा लगता है कि मैथिलीशरण जी की
तरह बहुत से भारतीय गांधीजी के आने की तीव्र प्रतीक्षा कर रहे थे। जब
महात्मा गांधी 9 जनवरी, 1915 को जहाज से बम्बई पहुंचे तब उनका बहुत भव्य
स्वागत हुआ। लेकिन ऐसा स्वागत गांधीजी को कुछ अच्छा नहीं लगा। उनके
आने के तीन-चार दिनों के अन्दर भारत के कई प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों में
गांधीजी के आने को लेकर लम्बे-लम्बे संपादकीय लिखे गये - मद्रास के
'हिन्दू' में, और इलाहाबाद के 'लीडर' में भी। उन्हें पढ़ने से ऐसा लगता है जैसे
कि किसी अवतार की प्रतीक्षा हो रही थी। यह वर्णन कुछ उसी तरह का है जैसा
कि गौतम बुद्ध के जन्म का वर्णन अश्वघोष के 'बुद्ध चरित' में किया गया है, कुछ
ललित विस्तार से।
अगर यह सही है कि सन् 1891 से सन् 1901 तक भारत में भुखमरी
के कारण एक करोड़ नब्बे लाख लोग मर गये तो, अंग्रेजी शासन के शुरू से
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उसके अंत तक भारत में 20-25 करोड़ जन भुखमरी से मरे होंगे, ऐसा माना जा
सकता है। इसी तरह करोड़ों की संख्या में गाय, बैल, भैंस, बकरी, भेड़ और
दूसरे जीव-जन्तु भी मरे होंगे। वन और पेड़-पौधे तो बहुत बड़ी तादाद में नष्ट
हुए ही।
इस तरह के शोषण और अत्याचार के कारण भारतीयों में अंग्रेजों से
लड़ने की शक्ति नहीं रह गयी। वैसे तो भारत के लोग कभी भी खूँखार व लड़ाकू
नहीं रहे, न ही उन्हें न्यायालयों में जाने का चाव ही था। अंग्रेजी राज्य ने उनके
खेतों को छीन कर, उद्योगों व घरों को उजाड़ कर, उन्हें न्यायालयों की शरण
लेने के लिए एक तरह से बाध्य किया। इन न्यायालयों में असत्य का सहारा
लेना आवश्यक-सा हो गया। अंग्रेजों ने जो न्यायालय स्थापित किये उनमें अब
तक भी यह बात ज्यादा चलती रही कि भारतीय असत्य ही बोलते हैं। उन्हें
असत्य बोलना उनके वकीलों और कर्मचारियों एवं न्यायालयों ने ही सिखाया।
जैसे-जैसे न्यायालय स्थापित हुए वैसे-वैसे ही अंग्रेजी राज्य में जिलों
को चलाने के लिए दूसरे तंत्र भी स्थापित हुए। ताल्लुकों को चलाने के लिए तंत्र
बने। प्रदेशों को चलाने के लिए तंत्र बने। भारत को चलाने के लए तंत्र बने।
जितना अंग्रेजों से हो सका उतना उन्होंने भारत को कस कर रख दिया। लोगों
को हिलने-डुलने, सांस लेने तक का मौका नहीं रहा। भय और उसके साथ-साथ
गरीबी और मुफलिसी का राज्य छा गया।
फिर भी अंग्रेज कुछ भयभीत ही रहे, विशेषकर भारतीय सैनिकों से।
साधारणतः तो अंग्रेज यही मानते थे कि भारतीय सैनिक, जिनकी संख्या सन्
1820-30 में दो-तीन लाख रही होगी, उनके प्रति वफादार हैं। लेकिन उन्हें यह
भी लगता था कि कहीं अगर हवा का बहाव बदल गया और भारतीय सैनिकों
को यह लगने लगा कि अंग्रेजों का राज्य उखड़ने वाला है, तो फिर वे अंग्रेजों के
खिलाफ हो जायेंगे। इसी बीच में सन् 1829-30 के वर्षों में यह भी तय किया
गया कि अंग्रेजों और दूसरे यूरोपीय लोगों को भारत में जहाँ-तहाँ, विशेषतः
पर्वतों पर, ठंडी जगहों पर बसाया जाये। धीरे-धीरे ऐसी बसावट शुरू भी हुई।
इससे पहले भी भारत में सैकड़ों जगह अंग्रेजी सेना की छावनियां बनी थीं। सेना
के साथ, सेना की सेवा के लिए, उनकी तुलना में पांच-दस गुना ज्यादा लोग,
सेना की सवारी और सामान ढोने के लिए एकत्रित किये जाते रहे। इनमें से,
आधे से अधिक को, उस समय की अंग्रेजों द्वारा घटाई गयी मजदूरी भी नहीं दी
जाती थी और कुछ लोगों को तो एकदम 'बेगार' में ही रखा जाता था। अफसरों
व सैनिकों के लिए वेश्यालय भी तभी बने और जैसे-जैसे छावनियों की संख्या
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