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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 50 में से

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पृष्ठ 39

पड़े मार सकते हैं, जैसे कि किसी पागल कुत्ते को। पिछले 100-200 वर्ष की
यूरोप व अमरीका की समृद्धि व बदलाव के होते हुए भी मूलतः यूरोप और
अमरीका के लोग आज भी दासत्व के स्तर पर ही हैं। अगर ऐसी मूल स्थिति
उनकी है तो बाकी संसार के मनुष्य और दूसरे प्राणियों को तो कभी भी समाप्त
किया जा सकता है।
ऐसी स्थिति में से हम निकलना चाहते हों तो हमें अपने देश की परंपराओं,
मान्यताओं, विद्याओं और भारतीय स्वभाव के आधार पर नया भारत बनाना
शुरू करना चाहिए। अंग्रेजों से मिले तंत्र व व्यवस्था को पूरी तरह छोड़ने का हमें
शीघ्र ही निश्चय कर लेना चाहिए, और ऐसी योजना बनानी चाहिए कि अधिक
से अधिक 20-25 बरस में हम अपने पाँवों पर खड़े हो जाएँ, हमारी अपनी
व्यवस्थाएँ पूरी तरह स्थापित हो जाए और अंग्रेजों के दिए तंत्र व्यवस्था को हम
ताक पर रखें, पुराने लेखागारों में कभी अध्ययन के लिए रख दें।
हमें सभी बातें कुछ नए सिरे से करनी होंगी। हमें ऐसा मान लेना
चाहिए कि पिछले 200-250 बरस हमारे लिए विपत्ति के ही रहे हैं और उनमें
जो कुछ हुआ उससे भारत वर्ष में रहने वालों का विनाश ही हुआ। लेकिन
इसका यह मतलब नहीं कि हमारी शुरुआत 1700 या 1750 में जो था उसी से
होगी। पिछले दो-ढाई सौ बरस में हमारे यहाँ जो बदला है, उसमें से शायद
कुछ हम अपने काम में ले पाएँ। आगे भी, बाकी पृथ्वी पर पिछले पचास बरसों
में जो बदलाव आए होंगे उनमें से भी कुछ हमारे काम के हो सकते हैं। लेकिन
बाहर का जो भी हम अपनाएंगे वह हमारे अपने विचारों, आधारों और स्वभाव के
अनुकूल होगा तभी वह हमारे काम का होगा।
आज सबसे पहले तो हमें अपनी कृषि, वन-व्यवस्था व पशुपालन पर
ध्यान देना होगा। ये ही हमारे समाज के मुख्य भौतिक आधार हैं। पश्चिम से
आए हुए तरीकों को छोड़कर, हमें अपने तरीकों, बीजों, फसलों,
सिंचाई-व्यवस्थाओं पर आना होगा और जो आवश्यक बदलाव उनमें करने हों
वे भी करने होंगे। हमें अपनी उपज भी बढ़ानी होगी, जैसे कि वह 1800 से पहले
होती थी और यह भी देखना होगा कि देश में कोई भी (मनुष्य, पशु या अन्य
जीव-जंतु) भूखा नहीं रहे। पशुओं और मनुष्यों का भूखे रहना हमारे लिए सबसे
बड़ा अभिशाप है।
यह भी अत्यन्त आवश्यक है कि भारतवर्ष जल्दी से जल्दी विदेशों से
अनाज, तेल और खाने-पीने के दूसरे सामान लेना बंद कर दे। हमारे महाद्वीप
जैसे देश में सभी कुछ पैदा किया जा सकता है। किसी पदार्थ की कमी होगी तो
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हमें उतनी कमी से सहन करना चाहिए। विदेशों को हमारी कुछ पैदावार की
विशेष आवश्यकता रहे तो हमें उन्हें कुछ एक फीसदी के करीब तक देना उचित
ही है।
भारत केवल कृषि-प्रधान देश नहीं था। पिछले 10-12 बरसों के
अध्ययन ने यह बतलाया है कि 1750 के करीब भारतवर्ष और चीन के क्षेत्र में
कुल विश्व का 73 प्रतिशत औद्योगिक उत्पादन होता था। 1820 में भी यह
उत्पादन 60 प्रतिशत तक रहा। सैकड़ों वस्तुएँ तब बनती होंगी। यह सब हमें
दोबारा आज की आवश्यकता के अनुसार स्थापित करना पड़ेगा।
हमारे बच्चों का पालन और शिक्षा पिछले 150-200 वर्षों में बुरी तरह
से बिगड़ी है। इसे फिर से ढंग से व्यवस्थित करना होगा। गाँवों, कस्बों व शहरों
के मुहल्लों में नई शुरुआत तो अभी से हो सकती है। इसमें आवश्यकता है कि
स्थानीय युवा वर्ग का इस काम में सहयोग मिले। शिक्षा का रूप क्या होगा इस
पर सोचना और उसको कार्यान्वित करना हमारी दूसरी प्राथमिकताएँ हैं। 6 से
12-13 बरस तक की शिक्षा का ध्येय तो यह होगा कि इन बरसों में हमारे बच्चे
सृष्टि, प्रकृति और उसमें रहने वाले सब जीवों से परिचित हो जाएँ, उनका
जीवन और स्वभाव समझें, उनसे मित्रता बनाएँ और 12-13 बरस की उम्र में
अपने को अपने देश और गाँव, नगर इत्यादि का नागरिक मानने लगें और
समाज की वार्ता में बराबर का भाग लेने लगें। जो भी जीवन को चलाने का काम
उन्हें करना होगा वह मुख्यतः तो इसके बाद दो-तीन बरस में सीखा जा सकता
है। अगले एक बरस में अगर देश की भिन्न-भिन्न भाषाओं में 8-10 पुस्तकें
इतिहास, भूगोल, स्थानीय प्रकृति और दूसरे जीव इत्यादि पर लिखी जा सकें
तो इस शिक्षा की रूपरेखा बनाने में बहुत सहायक होंगी।
अपने पड़ोसियों को भी, जिनके साथ हमारा हजारों वर्षों का घनिष्ठ
संबंध रहा है, फिर से समझना जरूरी है, क्योंकि आज हम यूरोप व अमरीका से
चालित दुनिया में रहते हैं इसलिए इनको भी और इनकी मान्यताओं, स्वभाव
इत्यादि को भी, समझना हमारे लिए आवश्यक है। वैसे यूरोप और अमरीका से
हम मित्रता रखते हुए भी, उनसे आवश्यक दूरी रख सके तो वह हमारे लिए ही
नहीं सभी के लिए शुभ रहेगा।
यह आवश्यक है कि हम अपने करीब के देशों से - विशेषतः चीन,
कोरिया, जापान, थाईलैण्ड, कंबोडिया, इंडोनेशिया, वियतमान, श्रीलंका, नेपाल,
म्यांमार (बर्मा), बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान से करीबी संबंध
दोबारा कायम करें। पिछले 500 बरसों में हमारे ये संबंध टूटे और शिथिल हुए
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