स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)
Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan
धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा
पृष्ठ 35, कुल 50 में से
संदर्भ में पढ़ेंके अर्थ और ढांचे के बारे में भी यहां के लोगों ने भिन्न तरीके से सोचा।
काफी पुराने समय से भारत के लोग अपने आपको गांव, कस्बे या
तीर्थों को केंद्र बना कर अथवा जाति या उद्योग-धंधों को केंद्र बना कर संगठित
करते रहे हैं। लेकिन इनमें से कोई भी संगठन दूसरे से अलग-थलग नहीं होता
था। उदाहरण के लिए हर व्यक्ति स्थानीय इकाई का भी सदस्य होता था,
जाति का भी और शिल्प या उद्योग-व्यापार संबंधी श्रेणी का भी। इसी तरह
स्थानीय इकाइयां, जातियां और विभिन्न शिल्पों की श्रेणियां भी अपनी तरह की
दूसरी इकाइयों से या दूसरी तरह के संगठनों से जुड़ी होती थीं। कोई आदमी
किसी एक जाति का सदस्य है तो इसका यह मतलब नहीं है कि वह दूसरे
उद्देश्यों से बने संगठनों में अपनी इच्छा से भाग लेने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं।
उदाहरण के लिए वह किसी भी विद्या परंपरा, कला परंपरा, धार्मिक संप्रदाय
या शिल्प से जुड़ने के लिए स्वतंत्र था। दुनिया के दूसरे देशों की तरह इन
संस्थाओं से और वर्गों से उसके संबंध अस्थायी ही थे जबकि अपनी जाति या
अपने देश से वह कहीं गहरा और स्थायी संबंध महसूस करता है।
भारत के बारे में महत्वपूर्ण बात यह है कि एक सभ्यता के नाते तो वह
बहुत पुराने जमाने से ही इकाई माना जाता रहा है लेकिन उसकी बुनियादी
राजनैतिक इकाइयां तो किसी छोटे इलाके में ही सीमित होती थीं। भारत के
इतिहास में ये राजनैतिक इकाइयां सैकड़ों में नहीं तो दर्जनों में तो रही ही हैं।
यहां चक्रवर्ती राजा की अवधारणा भी रही है। राम, अशोक या चंद्रगुप्त
विक्रमादित्य को चक्रवर्ती सम्राट माना जाता रहा है। इसी तरह चोल या विजय
नगर के राजा, यहां तक कि अकबर चक्रवर्ती राजा होने का सपना संजोते रहे।
लेकिन चक्रवर्ती राजा तो एक पद या जिसे दूसरे राजा श्रेष्ठता के कारण
सम्मान देते थे। उसी तरह जिस तरह कि किसी संन्यासी, ऋषि, किसी महान
कवि या विद्वान को श्रेष्ठ समझ कर उसे सम्मान दिया जाता है।
चक्रवर्ती सम्राटों में अनेक गुण होते होंगे या अनेक तरह की प्रतिभाएं
होती होंगी। लेकिन उनका भारत पर प्रशासन नहीं चलता था और न ही उन्हें
देश के सभी हिस्सों का राजस्व हासिल होता था। उन्हें पूरे देश की सेना के
सर्वोच्च अधिपति जैसा भी कुछ नहीं माना जाता था। यह सब काम और
अधिकार तो उन लोगों के पास थे जो बुनियादी राजनैतिक इकाइयों में शासन
करते थे। इन बुनियादी राजनैतिक इकाइयों में हजारों स्थानीय इकाइयां या
नाडू और खाप जैसी बड़े क्षेत्र में फैली हुई इकाइयां शामिल थीं। जिस तरह के
संबंध चक्रवर्ती राजाओं और स्थानीय राजाओं के बीच थे उसी तरह के संबंध
66
इन राजाओं और स्थानीय इकाइयों के बीच रहे होंगे। इस तरह संप्रभुता तो
दरअसल स्थानीय इकाई में ही होती थी। उससे ऊपर की राजनैतिक इकाइयों
के पास तो केवल वही अधिकार और कर्तव्य तथा साधन होते थे जिन्हें उनको
सुपुर्द किया गया हो। ये अधिकार और कर्तव्य या राजस्व संबंधी साधन कुछ
इलाकों में काफी मात्रा में उन्हें सुपुर्द किए गए हो सकते हैं। लेकिन ऐसे मामलों
में भी उनकी शक्ति मुख्यतः प्रशासनिक ही थी।
इन राजाओं को अपने आप में कानून नहीं माना जाता था। शासन के
विधि-नियमों की व्याख्या तो धर्म द्वारा स्थानीय रीति-रिवाजों द्वारा पहले से
ही हुई रहती थी। इस व्याख्या को समय-समय पर जातियों या औद्योगिक
श्रेणियों द्वारा सामूहिक विचार-विमर्श के जरिए बदला या सुधारा जाता रहता
था। सभ्यता के नीति-निर्देशक तत्वों के बारे में बड़े ऋषियों या विद्वानों द्वारा
नई-नई व्याख्याएं की जाती रहती थीं। इस सारी व्यवस्था में बहुत सी कमजोरियां
रही होंगी। उसके कुछ पहलू बराबरी की मनवीय भावना भी कभी-कभी लांघते
नजर आ सकते हैं। यह व्याख्या व्यक्तिगत या जातीय महत्वाकांक्षाओं से भी
प्रभावित होती रही होगी। ये सब कमजोरियां हमारे यहां भी उसी तरह आती
रही होंगी जिस तरह दूसरे सभी राजनैतिक और सामाजिक संगठनों में पाई
जाती हैं। इन सब कमजोरियों के बावजूद जिस तरीके से भारत के लोग अपने
आपको संगठित करते रहे वह हमारे लिए महत्व रखता है। इसके आधार पर
हम अपने बारे में सही समझ बना सकते हैं। हमारे यहां आज भी नए-नए
समुदाय उसी पुराने तरीके पर बनते रहते हैं और अपने दायरे में वे काफी
स्वायत्तता हासिल कर लेते हैं।
67