स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)
Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan
धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभय से उन्हें परिवार की अवधारणा को आम लोगों में फैलाने की जरूरत महसूस
हुई ताकि वैधानिक रूप से स्थापित हुई सत्ता की अधीनता मानने की आदत
लोगों में डाली जा सके। इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए ही उनमें शिक्षा के
प्रसार की बात सोची गई थी। और उनमें नई तर्कवादी मान्यताओं का प्रसार
किया गया था। पुनर्जागरण काल के तर्कवाद ने इस धारणा को भी पैदा किया
कि अगर उचित संस्थाएं खड़ी कर दी जाएं और उचित माहौल बना दिए जाए
तो सभी लोग संपत्तिवान और ताकतवर हो सकते हैं। इस तरह की मान्यताएं
बनाने के लिए नई अवधारणाओं और नए मिथकों की जरूरत थी। इसी से
परिवार और शिक्षा की मौजूदा अवधारणाओं को जन्म मिला।
यूरोप में एक और ताकतवर विचार प्रचलित था। यह विचार है भौतिक
जीवन में व्यक्ति को स्वतंत्र मानना। इस विचार का यूरोप की केन्द्रीय नियंत्रण
की प्रवृत्ति से गहरा संबंध रहा है। व्यक्ति की स्वतंत्रता के विचार के आधार पर
यूरोप में कुछ लोगों को बिना किसी बंधन और मर्यादा की अड़चन महसूस किए
सत्ता और संपत्ति पर केंद्रीय नियंत्रण संभव बनाने में काफी आसानी हुई।
दूसरी तरफ लोगों को समुदायों की जैविक इकाइयों से तोड़ कर अकेला कर
दिया गया। 19 वीं शताब्दी तक भौतिक जीवन में स्वतंत्रता का उपभोग मुट्ठी
भर लोगों तक ही सीमित था। फिर भी जो लोग बहुत दुस्साहसी, उद्यमी या
हताश होते थे, ऐसे लोगों की संख्या चाहे कितनी ही मामूली क्यों न निकले पर
बहुसंख्यक आबादी के ऐसे लोग भी अपने देश के भीतर या दूरदराज इलाकों में
राजनैतिक सत्ता या संपत्ति हासिल करने में सफल हो जाते थे। ऐसे लोगों के
किस्से आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के दौर की शुरुआत से पहले भी मिल
जाएंगे। उन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता का फायदा उठाने का मौका मिल जाता था।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी का दौर शुरू होने के बाद ऐसे लोगों की संख्या में
हजारों गुना वृद्धि हो गई होगी।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उपभोग का दायरा बढ़ जाने के कारण और
विज्ञान व प्रौद्योगिकी की विशाल उपलब्धियों के कारण 19 वीं शताब्दी में जो
आदर्शवादी ढांचे बनाए गए थे उनसे भी मुक्ति पाने में मदद मिली है। इसका
सबसे ज्यादा असर परिवार पर पड़ा है। इन परिवारों का कोई व्यापक या
गहरा कुलीय आधार तो था नहीं। न ही उन पर देसी समाज के रीति-रिवाजों
का कोई बंधन था। उनका आधार तो संपत्ति और सत्ता ही रहा था। इसलिए
परिवार की आदर्शीकृत अवधारणा तो टूटनी ही थी। लेकिन यूरोप या अमेरिकी
परिवार में जो वास्तविक परिवर्तन हुआ है वह ऐतिहासिक रूप से उतना
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चौंकाने वाला नहीं है जितना आज हमें बताया जाता है। आज के पश्चिम में
परिवार कुछ-कुछ सराय जैसा दिखाई देता है जिसमें रहने वाले लोगों में
कुलीय भावना जैसी कोई चीज नहीं होती। इन परिवारों में आमतौर पर संपत्ति
जैसा कुछ नहीं दिखाई देता। मगर पहले भी हालात कोई इससे बहुत अलग
नहीं रहे। यह बात विशेष कर उन लोगों को समझनी चाहिए जो पश्चिमी समाज
को अपने लिए प्रकाश पुंज जैसा समझते हैं कि वहां खासतौर पर ब्रिटेन और
अमेरिका में बहुत कमजोर पारिवारिक व्यवस्था रही है।
दास प्रथा, सामंतवाद या सर्वहारा जैसी परिस्थितियों के कारण पश्चिमी
समाज में पारिवारिक संबंधों के पनप सकने लायक माहौल ही नहीं रहा। आज
हम यूरोप में जिस परिवार के टूटने की इतनी बात करते हैं वह केवल परिवार
की एक 19 वीं सदी वाली आदर्शीकृत अवधारणा का टूटना ही है। यही वजह है
कि इस टूट की या तो पश्चिमी समाज के वे मध्य स्तरीय लोग ज्यादा बात करते
हैं जिन्हें अपनी शिक्षा-दीक्षा के दौरान परिवार की यह आदर्शीकृत अवधारणा
घुटाई गई थी या फिर हमारे जैसे लोग उसकी ज्यादा बात करते हैं जो इस तरह
की रूमानी अवधारणाओं को पाले हुए हैं। पश्चिम का सामान्य व्यक्ति जिसे
अपने यहां की परिस्थितियों का सहज ज्ञान है परिवार के टूटने की ऐसी बात
करके चिंतित नहीं होता।
पश्चिमी यूरोप या अमेरिका में सत्ता और संपत्ति के केंद्रीकरण व
व्यक्तिगत स्वतंत्रता संबंधी विचारों ने इस बात की तो कोई गुंजाइश ही नहीं
छोड़ी थी कि वहां समाज जैसी कोई चीज उभर सके। यूरोप के स्लाव इलाकों
में समुदाय बनाने की तरफ प्रवृत्ति जरूर दिखाई देती है जैसा कि रूसी मीर से
दिखता है। हो सकता है कि कुछ जर्मन इलाकों में भी ऐसी ही प्रवृत्ति रही हो
जैसी कि जर्मन मार्क से लगता है। इसके अलावा सत्ता और संपत्ति के केंद्रीकरण
व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विचार के बावजूद पश्चिमी यूरोप में समाज की मान्यता
पूरी तरह नहीं मर पाई। समय-समय पर विभिन्न समुदाय बनते रहे। लेकिन वे
ज्यादातर असहमत लोगों द्वारा बनाए गए। उन लोगों द्वारा जो उस समय के
धार्मिक या वैचारिक आग्रहों के खिलाफ खड़े हुए थे। यह समुदाय एक केंद्रीकृत
और व्यक्तिवादी ढांचे में दुर्लभ सामाजिक इकाइयों की तरह थे।
भारत और एशिया व अफ्रीका के बहुत से इलाकों में, यहां तक कि
यूरोपीय लोगों का नियंत्रण होने से पहले तक, अमेरिका में भी समाज की
अवधारणा गहरे स्तर पर रही है। इसलिए यहां व्यक्ति की स्वतंत्रता को एक
दूसरी दृष्टि से देखा गया। परिवार और शिक्षा के स्वरूप और उनकी संस्थाओं
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