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सर्वकोश
स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 50 में से

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नेहरू। उस समिति ने भी योजना का जो रूप सोचा, वह पश्चिमी ढंग का ही
था।
इस तरह स्वतंत्र भारत में हम जिस रास्ते पर चले, उसकी नींव तो
बहुत पहले पड़ गई थी। अब हमें यह समझना होगा कि हर सभ्यता और
संस्कृति की अपनी-अपनी परम्पराएं होती हैं, उसके अनुसार ही वे सभ्यताएं
विकास किया करती हैं। जैसे 1850 के यूरोप में जो विज्ञान व तकनीकी विकसित
थी वह चीन में 2000 वर्ष पूर्व ही विकसित हो चुकी थी। लेकिन चीन ने बारूद
बनाने की विधियों से उत्सवों आदि में काम आने वाली आतिशबाजियां व पटाखे
बनाए, जबकि यूरोप ने अब से पांच-छः सौ वर्ष पहले वही विधि जानकर युद्ध
और हिंसा के लिए हथियार बनाये। यह सभ्यताओं की दिशा की भिन्नता के
कारण ही हुआ। ऐसा नहीं है कि दक्षिणी या पूर्वी एशिया के लोग विज्ञान और
तकनीकी में उन्नत नहीं थे; लेकिन उनकी सभ्यता उन्हें मर्यादा सिखाती थी और
हिंसक दिशाओं में बढ़ने से रोकती थी। यह उनकी अक्षमता नहीं, उनका विवेक
था। भारत में भी इस्पात तथा लोहे के निर्माण की अपनी विकसित विधि थी।
सन के पौधे के उपयोग से कागज बनाने तथा इसी तरह अलग-अलग
वनस्पतियों, आदि से रंगाई के विविध रसायन बनाने की प्रौद्योगिकी भी विकसित
थी। हर्षवर्धन के समय में और 18 वीं सदी में भी, उत्तर प्रदेश, बिहार इत्यादि में
पानी से बर्फ बनायी जाती रही है। खेती और सिंचाई तथा जल-प्रबंध की
अत्यंत विकसित प्रौद्योगिकी तो थी ही। लेकिन हमने उसमें से कोई विशालकाय
और थोड़े से लोगों के पूर्ण नियंत्रण में चलने वाले ठाट नहीं खड़े किए।
यूरोप का स्वभाव प्राचीन काल से ही हिंसक रहा लगता है। विशेषकर
इंग्लैंड और अमेरिका तो पिछले पांच सौ बरसों से पूरी तरह हिंसक स्वभाव के
रहे हैं; वे दूसरों के अस्तित्व का आगे बढ़ना सह नहीं पाते, सबको अपने अधीन
ही रखना चाहते हैं। पिछले सप्ताह यहीं दिल्ली में अमरीकी विद्वान चोम्स्की ने
तो कहा ही है; पर यह केवल उनकी बात नहीं है, बल्कि यह सर्वमान्य ही है कि
यूरोप और अमेरिका स्वभाव से ही हिंसक हैं। और देशों में भी समय-समय पर
हिंसा तो रही ही है, लेकिन वे अधिकांशतः हिंसा को मर्यादित करते रहे हैं।
दक्षिण व पूर्वी एशिया के लोग स्वभाव से मुख्यतः अहिंसक ही रहे हैं, ऐसा कहा
जा सकता है। फिर भी, हमने तो यूरोप की ही शिक्षा-दीक्षा, विकास-दृष्टि तथा
जीवन-दृष्टि अपना ली।
स्वतंत्रता मिली, हमें लगा कि चमत्कार हो गया। पर आगे क्या करना
है, इसका कोई स्पष्ट चित्र नहीं था। 18 वीं शताब्दी के इस यूरोपीय विचार से
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ही हम भी भरे हुए थे कि यदि अवसर उचित रहे तो हम लोग भी उनके रास्ते पर
चलते हुए उनके बीसवीं सदी के स्तर पर पहुंच जाएंगे। हमने मान लिया था कि
पश्चिमी चिंतन ही सारे संसार को जीत लेगा, इसलिए जल्दी-जल्दी उसी राह
पर हम बढ़ चले। लेकिन एकदम से पराई राह पर, अनचीन्ही, अपरिचित राह
पर चलना सबको तो नहीं आता। जिन्हें आता था, वे आगे बढ़ गए; पश्चिमीकृत
हो गए; बाकी यों ही पड़े रहे। इस तरह समाज के शक्तिशाली व सम्पन्न लोगों
की साधारण समाज से, वृहत् समाज से, दूरी बढ़ी, विलगाव बढ़ा, आत्मीयता
घटी।
फलतः समाज में कई स्तरों पर विभेद उभरे। पहले पुरुषों को अधिक
आधुनिक शिक्षा दी गई, तो वे कुछ पश्चिमी उपकरणों, वस्तुओं, साहित्य, मनोरंजन,
आदि का उपयोग करने और आनन्द लेने में समर्थ बने। पर भारतीय स्त्रियां ऐसी
शिक्षा में नहीं पड़ीं, उनकी भारतीय मानसिकता और सोच टिकी रही। इसलिए
घर के भीतर ही विखंडन हो गया; बाहर के कार्यक्षेत्र की बात घर पर कर
सकना सम्भव नहीं रहा और स्त्रियों और पुरुषों के संसार अलग-अलग होते
चले गये। मेरी मां पूछती - बेटा, क्या पढ़ रहा है, तो मैं उन्हें बता नहीं पाता;
कहता - तुम समझोगी नहीं। पहले जो लोग रामायण, भागवत्, रघुवंश, गीता,
महाभारत, पुराण, गणित-ज्योतिष, पंचतंत्र, हितोपदेश, व्याकरण आदि पढ़ते
थे, तो सरलता से मां को व परिवार की दूसरी स्त्रियों, बहनों व बेटियों को उनके
विषय में बता सकते थे, क्योंकि वे भी उन्हें समझ सकती थीं। पर अब यह
सम्भव नहीं रहा। खेती या पुराने हुनर, शिल्प, कला-कौशल, उद्योग आदि के
बारे में तो घर की स्त्रियां भी उतना ही जानती थीं, जितना पुरुष; बल्कि प्रायः
स्त्रियां कुछ अधिक ही जानती थीं। तो, पहले ऐसा विखंडन नहीं था, कार्यक्षेत्र के
बारे में घर पर बात की जा सकती थी; अब वह नहीं रहा।
इसी प्रकार, सम्पन्न लोगों और वृहत् समाज के बीच संवाद घटता
गया। मेटकाफ (अंग्रेज अधिकारी) ने जब 1930 के करीब कलकत्ते में कहा कि
इन भारतीयों का कुछ ठिकाना नहीं है, ये तो हवा के साथ चलते हैं, जाने कब
हमारे विरुद्ध हो जाएं, तो ब्रिटिश गवर्नर जनरल विलियम बेण्टिक ने कहा कि -
नहीं, कलकत्ते के समाज के बड़े लोग तो बदल रहे हैं, हमारे अनुकूल हो रहे हैं,
अब वे गौपालन, गोसेवा, ब्राह्मण-भोजन, भिक्षा, आदि में खर्च करना बंद कर
रहे हैं, हमारे मनोरंजन में, हमारे सेवा-सत्कार में ज्यादा से ज्यादा खर्च कर रहे
हैं; इसलिए हमारे अनुकूल वर्ग बढ़ रहा है।
यह विभेद, यह विलगाव तो शायद 1830 के करीब से बढ़ता ही गया।
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