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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 50 में से

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पृष्ठ 46

अंग्रेजी शासन और तंत्र व्यवस्था
सन् 1750 से भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित करते ही, अंग्रेजों ने
यहां अपनी जरूरत के मुताबिक व्यवस्था को बदलना शुरू कर दिया था। उसमें
सबसे पहला काम तो अंग्रेज अफसरों व सैनिकों के मातहत बढ़ती हुई अंग्रेजी
सेना में भारतीयों को भर्ती करना था। दूसरा, और इससे भी अधिक महत्व का
काम था भारत के खुशहाल खेतिहरों व कारीगरों को अलग-अलग तरीकों से
अपने अधीन करना और यहां की खेती की उपज के आधे से अधिक भाग कर
(टैक्स) के रूप में बन्दूक व तलवार के जोर पर वसूल करना। इसी तरह से
कारीगरों से जबरदस्ती काम करवाना और उनके उद्योगों से बनी वस्तुओं की
कम से कम कीमत देना। आरम्भ में तो ऐसी कार्यवाही मद्रास व बंगाल के क्षेत्र
में ही रही, लेकिन सन् 1800 के बाद अंग्रेजों ने धीरे-धीरे सारे भारत में ऐसा
करना शुरू कर दिया। इसी प्रकार के बदलाव अंग्रेजों के मातहत आये हुए
भारतीय क्षेत्रों में भी होने लगे – वहां भी नये तंत्र स्थापित होने लगे।
भारतीय व्यवस्थाओं के अनुसार हर क्षेत्र की अपनी स्थानीय सैनिक
व्यवस्थाएं थीं और हर ग्राम व नगर में अपनी स्थानीय पुलिस व्यवस्था भी थी।
सेना और पुलिस स्थानीय व्यवस्थाओं के अधीन होती थी। इसी तरह से, जमीन
का हिसाब-किताब, उसकी रजिस्ट्री या उनमें आवश्यक तब्दीली करने वाले
लोग भी स्थानीय व्यवस्थाओं के मातहत रहते थे। जमीन के हिसाब-किताब से
संबंधित लोगों को दक्षिण भारत में कनकपिल्ले और उत्तर में लेखपाल, पटवारी
इत्यादि कहा जाता था। इसी तरह से गांव के स्तर पर बढ़ई, लोहार, धोबी,
कुम्हार, सिंचाई के साधनों की मरम्मत व व्यवस्था करने वाले, पंचांग और तिथि,
शुभ दिन इत्यादि बताने वाले, मंदिरों के पुजारी, देवदासी, गायक और दूसरे
कर्मचारी गांव और नगर के मोहल्लों से संबंधित होते थे। गांव में इन सब का
कृषि की उपज में हिस्सा होता था। अंग्रेजी शासन ने आते ही सेना, पुलिस,
कनकपिल्ले, सिंचाई के साधनों की मरम्मत व काम करने वालों इत्यादि को इस
व्यवस्था से पूरी तरह से अलग कर दिया। पुरानी व्यवस्था में इन लोगों को जो
मिलता था वह अब मिलना बन्द हो गया क्योंकि ब्रिटिश सरकार अब उसे कर
के रूप में लेने लगी। इनमें से कुछ लोगों को तो ब्रिटिश सरकार ने अपना नौकर
बना दिया परन्तु बाकी बेकार हो गये। अंग्रेजों से पहले भारत में, दक्षिण और
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उत्तर दोनों में, यह प्रथा थी कि किसी का अगर कुछ खो जाता था और पुलिस
अगर खोई हुई चीज को तलाश करने में सफल नहीं होती थी, तो पुलिस को
जिस व्यक्ति का सामान खोया होता था उसे हर्जाना देना पड़ता था। अंग्रेजी
व्यवस्था ने भारतीय पुलिस व्यवस्था को खत्म कर दिया और उसकी जगह नई
केन्द्रीकृत व्यवस्था लागू की। ऐसा करते ही हर्जाने की बात तो पूरी तरह से
समाप्त ही हो गयी। उल्टे कुछ दिनों के बाद ऐसा होने लगा कि अंग्रेजी पुलिस,
जिनका कुछ खो जाता था और जो शिकायत दर्ज करवाते थे, उन्हीं के साथ
मारपीट करने लगती थी। इसके साथ-साथ ही जमीन का लगान अंग्रेजी
व्यवस्था ने तिगुना-चौगुना बढ़ा दिया और सन् 1790 के आसपास जमीन की
मिल्कियत कुछ थोड़े से लोगों को दे दी, जिन्हें जमींदार कहा गया। वैसे इंग्लैंड
में 700 वर्षों से जमींदार होते रहे थे, लेकिन ये जमींदार किसान से कुल फसल
का 50-80 प्रतिशत तक लगान के रूप में ले लेते थे, सरकार को कुल फसल का
लगभग 10 प्रतिशत देते थे। शेष अपने पास रखते थे। लेकिन बंगाल इत्यादि में
जो जमींदार अंग्रेजों ने बनाये वे किसानों से उनकी उपज का करीब 50 प्रतिशत
वसूल करते थे और उसमें से 90 प्रतिशत ब्रिटिश सरकार को कर के रूप में देते
थे। उनके अपने पास किसान से वसूल किये गए लगान का 10 प्रतिशत ही
बचता था।
किसान से लगान वसूली की दर में तिगुनी-चौगुनी वृद्धि अंग्रेजों के
जमाने में हुई। इसलिए इतना ऊँचा कर वसूल करना असंभव सा हो गया।
इसका एक और कारण भी था। भारतीय व्यवस्था में लगान, जिसकी दर वैसे
भी काफी कम थी, अनाज के रूप में ही लिया जाता था। परन्तु अंग्रेजों ने बढ़ते
हुए लगान को, अनाज के बजाय पैसे में लेना शुरू किया। पिछले 10 वर्षों की
फसल का दाम इत्यादि निकाल कर भूमिकर पैसे के रूप में निर्धारित किया
गया। अंग्रेजी व्यवस्था के आने से गरीबी में जो भारी बढ़ोत्तरी हुई और उसकी
फसल के दाम गिर गये। इसका असर भी किसान पर दोतरफा हुआ क्योंकि
उसे लगान अब फसल के बजाय पैसे में देना होता था। मन्दी के कारण फसल
की कीमत कम होने की वजह से वास्तविक लगान की दर 80 से 90 प्रतिशत
तक होने लगी, यानी किसान के पास सिर्फ 10 से 20 प्रतिशत ही बचता था।
इस वजह से लगान वसूली में मुश्किलें आने लगीं। इसलिए अंग्रेजी तंत्र ने सन्
1792 में फैसला किया और जमींदार को यह हक दिया कि वह जब चाहे
खेतिहर को जमीन से बेदखल कर सकता है। इससे पहले भारत में कभी भी
खेतिहर को इस तरह से उनकी जमीन से बेदखल करने का रिवाज नहीं था।
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