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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 50 में से

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हैं। लेकिन इन देशों की सोच व स्वभाव हमारे देश की सोच व स्वभाव से बहुत
मिलता-जुलता है। यहाँ तक कि इन सब देशों में गौतम बुद्ध का प्रभाव भारत से
गया। उसी समय या उससे भी पहले से इनमें से अधिक देशों में रामायण व
महाभारत का प्रसार भी रहा, और इन सब में भी अयोध्या नाम के नगर तो मिलते
ही हैं, मथुरा के नाम के भी। अयोध्या व मथुरा के नाम के नगर तो तकरीबन
1500 तक इन देशों की राजधानियाँ हुआ करती थीं।
अपने को समझने और पहचानने के लिए अपने पुराने समाज और
जीवन के भौतिक तथ्य जानना भी आवश्यक है। यह काम शीघ्र ही विद्या-केंद्रों
के द्वारा पी.एच.डी., व इसी तरह के अध्ययन-कार्यक्रम में होने चाहिए। अगले
6-7 महीने देश के 10-20 क्षेत्रों, जिलों, इत्यादि में ऐसी खोज शुरू की जा सके
तो 5-7 बरस के अंदर हमें अपने पुराने समाज की व्यवस्था, उसका जीवन,
विद्या, हुनर इत्यादि के बारे में काफी जानकारी मिल जाएगी।
नए भारत की रचना तभी ठीक तरह से संभव होगी जब हम अपनी
परंपराओं, मान्यताओं, धारणाओं और स्वभाव को समझ पाएंगे। कहा जाता है
कि महाभारत के युद्ध के बाद, उसमें जो हुआ और उससे जो परिणाम निकला,
उन्हें समझने के लिए हमारे ऋषि व दूसरे विद्वान बरसों तक नैमिषारण्य में बैठे
और आने वाले समय को केन्द्र में रखकर बीते उक्त काल खंड को समझने में
लगे रहे। आज का समय भी महाभारत के उक्त काम से कुछ मिलता-जुलता
ही है। हमारी परंपराओं, दर्शन और गए समय पर आज ध्यान रखते हुए विचार
आवश्यक है। इसके लिए 3-4 नए विद्या केंद्र स्थापित हों तो हम भविष्य में कैसे
क्या करना है, यह निश्चित कर सकेंगे।
अगर सब देशों के दार्शनिक, समाजशास्त्री, मनुष्य की आज की स्थिति
को और पिछले 500 वर्षों में जो स्थिति बनी है, कैसे मनुष्य (पुरुष और स्त्री दोनों)
का आत्मसम्मान घटा है, अकेलापन बढ़ा है और कैसे दोनों एक दूसरे के लिए
केवल क्षणिक भोग की वस्तु रह गए हैं, को समझने का प्रयास करते तो हो
सकता है पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों का आत्मसम्मान कुछ लौटता और उनके
छोटे-छोटे प्राकृतिक समूहों में परस्परता फिर से पनपने लगती और व्यक्तियों
का आलस्य व उदासीनता कम होती। लेकिन ऐसा तो अधिकतर संसार में अभी
होता दिखता नहीं है। फिर भी यह संभव है कि जिन क्षेत्रों में बौद्ध मत का प्रभाव
रहा है और जहाँ भारतीय व चीनी (इसमें जापान, कोरिया, कंब्रोज, इंडोनेशिया
सभी आ जाते हैं) मान्यताओं व परंपराओं का असर रहा है, वहाँ सब जीवों का
आत्मसम्मान, उनकी अपने समूहों में पारस्परिकता व स्वतंत्रता काफी हद तक
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शीघ्र ही वापस लाई जा सकती है। आर्थिक समृद्धि अपने में जरूरी है, विशेषतः
ऐसे क्षेत्रों में जो पिछले 200-300 बरसों में छिन्न-भिन्न हो गए हैं और जहाँ
अधिक लोगों में पिछले 150-200 बरस से कंगाली का बोलबाला है। लेकिन
आत्मसम्मान, परस्परता और सामूहिक स्वतंत्रता आएगी तो आर्थिक समृद्धि भी
क्रमशः आ ही जाएगी और समृद्धि की परिभाषा भी नए रूप लेने लगेगी।
जहाँ तक भारतवर्ष की बात है उसका पहला काम तो आज
आत्मसम्मान, साहस, परस्परता और सामूहिक स्वतंत्रता को देश में शीघ्रातिशीघ्र
स्थापित करना है। यह हो जाएगा तो अन्य जटिल प्रश्न भी हल होने लगेंगे।
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