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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 50 में से

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पृष्ठ 31

यहाँ दोनों पृष्ठों का लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

रही समझी जाती है। इसका परिणाम यद्यपि बिल्कुल निराशाजनक नहीं रहा
है, तथापि ऐसा भी नहीं है कि हम दावा कर सकें कि हम एक पश्चिम जैसा
समाज बनाने जा रहे हैं। यह तो हो सकता है कि लगभग पाँच-पचास लाख
भारतीय घरों में आज टेलीविजन सेट हों, रेफ्रीजरेटर हो, गैस या बिजली के
चूल्हे हों, शायद दस लाख कारें हों तथा ऐसा ही कुछ और हो, लेकिन इन्हीं
(सत्तावर्गीय) स्रोतों के अनुसार भारतीय जनता का आधा हिस्सा 'गरीबी रेखा'
के नीचे रहता है और 'गरीबी रेखा' से ऊपर वाले लोगों का अधिकांश हिस्सा
घंटों तक परिवहन, दूध, चीनी, मिट्टी के तेल, खाद्य पदार्थ आदि के लिए लाईन
लगाने में खर्च करने को विवश है।
इन गतिविधियों के पिछले तीस वर्षों की प्रशंसा में अधिक से अधिक
कुछ कहा जा सकता है, तो यही कि इस दौरान भारत को वे चलाये रखे रही हैं।
यह संभव है कि भाग्यवश हम इसी रास्ते पर चलते हुए कुछ समय तक और
जिंदा रह लें।
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लेकिन जिस रास्ते पर हम चलते रहे हैं, उसी पर चलते रहकर शायद
भारत एक राजनैतिक इकाई बना भी रहे, तो भी भारत के जनसाधारण की
यानि कुल आबादी के लगभग 95 प्रतिशत की, बुनियादी जरूरतों तक की पूर्ति
की संभावना इस रास्ते में अत्यंत अल्प है। इससे भी बुरी बात यह है कि इस
मार्ग के अवलंबन से भारतीय जन बहुत अधिक पराश्रित हो गये हैं। यहाँ तक कि
आज का किसान भी नई संकर खेती और उसकी जरूरतों के संदर्भ में कम
सृजनात्मक और नवाचार में कम समर्थ हो गया है। उसकी स्वयं की सृजनात्मकता
तथा नवाचार की मेधा आज उससे भी अधिक अवरुद्ध कर दी गयी है, और
बौनी बना दी गयी है, जितनी और जैसी कि ब्रिटिश राज्य के आरंभ में की गई
थी। यदि भारत को एक सभ्य समाज के रूप में बचे रहना है तो उसे वर्तमान
प्रक्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न आज की इस किंकर्तव्य-विमूढ़ता की दिशा में से
कोई और रास्ता निकालना होगा। एक ओर जनसंख्या के बहुत बड़े हिस्से के
कल्याण की तो बात ही क्या, उसे भोजन, वस्त्र और निवास तक दे पाने में
केंद्रीयकरण अक्षम हो चुका है और दूसरी ओर समस्त साधन स्रोतों तथा
संगठनात्मक ढाँचों पर एकाधिकार और विनियोजन के कारण यह केन्द्रीयकरण
जनगण द्वारा स्वप्रबंध के रास्ते में रूकावट बना खड़ा है। 19 वीं शताब्दी में तथा
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20 वीं शताब्दी के आरंभ में भी यानि उस संपूर्ण अवधि में भी जब भारतीय
किसान की अपने खेतों में निवेश की क्षमता निम्नतम बिंदु तक पहुँचा दी जा
चुकी थी, और उसके कृषि औजार तथा माल-मवेशी बड़ी मात्रा में बरबाद कर
दुर्दशाग्रस्त बनाये जा चुके थे, किसान ने देश को पर्याप्त अनाज देकर जीवित
रखा, यह तथ्य उसकी सामर्थ्य और प्रतिभा का पर्याप्त दृष्टांत है। यही बात
भारतीय शिल्पियों, कारीगरों के बारे में भी सच है।
भारतीय जनगण अपेक्षाकृत सौम्य प्रकृति का है। और कई पीढ़ियों
तक उन्हें दबाकर रखा गया, उनकी खिल्ली उड़ाई गई, उन्हें पीसा जाता रहा
तथा उनकी सार्वजनिक क्रियाशीलता प्रतिबंधित रही। फलतः 19 वीं और
प्रारंभिक 20 वीं शताब्दी के प्रारंभ में भारतीय जन अपनी निजी सीमा में ही
सिमट गये थे। इसका यह मतलब नहीं कि वे अन्याय और अनुचित्त का बुरा
नहीं मान रहे थे। जैसा कि मार्च 1944 में किसी ने गांधीजी से कहा था, भारतीय
दृश्य पर उनके उदय से पूर्व तक फिरोज शाह मेहता जैसे लोग भी अंग्रेजों से
बोलते वक्त दब्बू और विनीत होते थे। गांधीजी ने स्वीकार किया कि 1915 तक
ऐसी स्थिति थी, पर साथ ही यह भी कहा कि "मैंने जो कहना शुरू किया, वह
वही था, जो लोग दिलों में महसूस करते थे, पर अपनी बात खुद कहने में समर्थ
नहीं थे" इस प्रकार 1916 के बाद से, अगले 30 बरसों तक वे जनता के प्रवक्ता
थे। वे भारतीय जनता की प्रशंसा करते और आवश्यकतानुसार झिड़कते भी।
पर दुर्भाग्यवश उनके उत्तराधिकारियों ने, विशेषकर जो स्वाधीन भारत के प्रबंध-
क बने, उन्होंने ब्रिटिश राज्य के समय का व्यवहार का ढांचा अपना लिया।
(उन्होंने ऐसा क्यों किया, यह मनोविश्लेषकों पर छोड़ देना ही बेहतर होगा। या
शायद यह कारण रहा हो कि ब्रिटिश शिक्षा और ट्रेनिंग की उन पर उससे अधि-
क गहरी छाप थी, जितनी गांधीजी के साथ बिताये गये उनके समय की छाप
उन पर थी)। वे पश्चिम से अभिभूत थे, फिर यह सोवियत संघ हो या अमरीका
अथवा यूरोपीय औद्योगिक क्रांति का प्रारंभ हो, इस संदर्भ में इन सबका एक ही
अर्थ है। इस कारण उन्हें भारत की हर वस्तु अदिमकालीन अतः अपरिष्कृत,
संकीर्ण, अंधविश्वास-युक्त इत्यादि प्रतीत होती थी। उनकी दृष्टि से जिसे वे
भारत का अभिमान या प्रगति समझते थे; उसकी राह में भारत के लोग वस्तुतः
एक व्यवधान थे, राह के रोड़े थे और इसलिए ये भारतीय जन निर्णय और कर्म
के क्षेत्र से (सिवाय लकड़ियां चीरने, पानी खींचने और कभी-कभी इस-उस
की साजसज्जा के काम से) जितना ही दूर रहें, उतना ही उनके सपनों के भारत
के लिए बेहतर है। यह संभव है कि यह दृष्टिकोण सार्वजनिक तौर पर खुलकर
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