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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 50 में से

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पृष्ठ 44

अपनी संस्थाओं, मान्यताओं को बिना किसी कुंठा के समझना होगा।
अपनी 'पालिटी' को, अपने राजनीति-तंत्र को, सही-सही समझना होगा। हमारे
बारे में जो-जो सिखाया-पढ़ाया गया है, उसके बारे में सन्देह करना भी सीखें,
सबको निर्दोष मानकर स्वीकार न करते चलें, यह बहुत जरूरी है।
यूरोप ने हमें जिस तरह से देखना सिखाया, उसे पुष्ट करने वाले तंत्र
भी उन्होंने रचे; उनका यह स्वभाव ही है। संयुक्त राज्य अमेरिका में रेडइंडियनों
(वहाँ के मूल निवासियों) की गणना पुरानी जनगणनाओं में कभी की ही नहीं
जाती थी, क्योंकि यूरोप से आए लोग रेडइंडियनों को मनुष्य नहीं मानते थे।
इसी दृष्टि के फलस्वरूप करोड़ों की संख्या वाले रेडइंडियनों का वंशनाश ही
कर डाला। अफ्रीका से लाये गये 'ब्लैक्स' को भी वे पूर्ण मानव नहीं मानते थे।
1850 के करीब शायद 5 'ब्लैक्स' को मिलाकर एक मनुष्य मानते रहे। मनुष्य
पूरी तरह तो वे केवल खुद को मानते हैं, बाकी उनके लिए आदिम, पिछड़े, बर्बर,
अविकसित मनुष्य, कमतर मनुष्य हैं।
भारत में भी ब्रिटिश जनगणना उनकी ही दृष्टि के हिसाब से की जाती
रही। हमारे यहां जाति तो कभी समाज की उस रूप में इकाई रही नहीं; 'जात'
शब्द का प्रयोग कुल-विशेष में जन्मे व्यक्तियों के अर्थ में ही किया जाता रहा है।
जाति व वर्ण कोई सामाजिक वर्ग कभी नहीं रहा। पर अंग्रेजों ने उसे इसी तरह
से दिखाया। 1881 व 1891 की जनगणना में अनेक जातियों में कई-कई हजार
उपजातियां दिखाई गई; यह तब के 'कुल' रहे होंगे, ऐसा लगता है। पंजाब में
1881 में जाटों में 10 हजार के करीब उपजातियां दिखाई गई थीं। वे सम्भवतः
आज कही जाने वाली खाप थीं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में 1881 की जनगणना
में अनेक जातियों में दो-दो चार-चार हजार उपजातियां दिखाई गई। ऐसा ही
तमिलनाडु में रहा। स्पष्ट है कि यह 'कुल-समूह' ही थे, जिन्हें उपजाति कहा
जा रहा था। बाद में कई उपजातियों को एकजुट करके दर्ज किया जाने लगा।
फिर जाति ही मूल इकाई बताई जाने लगी। फलतः हमारा शिक्षित वर्ग भी उसे
ही प्राचीन और स्वाभाविक मौलिक इकाई मानने लगा।
इस तरह हर क्षेत्र में हमने समाज की अपनी स्वाभाविक
आत्माभिव्यक्ति को अवरुद्ध किया, बाधित किया। दूसरी ओर, बाहर से भी जो
लिया, उसे ठीक से आत्मसात् नहीं कर पाये, अपना नहीं बना पाये। संसार में
सभी समाज और सभ्यताएं एक दूसरे से सीखते रहते हैं, पर वे सीखी हुई विद्या,
जानकारी और हुनर को अपना बना लेते हैं। आत्मसात् करने का यह काम भी
हम नहीं कर पाए। इससे केवल कबाड़ और बोझ बढ़ता रहा।
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1940 में महात्मा गांधी, राष्ट्रीय योजना समिति (नेशनल प्लानिंग
कमेटी) की ग्रामोद्योग उप-समिति (विलेज इंडस्ट्रीज सब-कमिटी) की वर्धा की
बैठक में मौजूद थे। निर्मल कुमार बोस के अनुसार उस समय गांधी जी की
सलाह थी कि परंपरागत (ट्रेडिशनल) और आधुनिक (मार्डेन), दोनों आस्थाओं व
विचारों के लोग अपनी-अपनी समयबद्ध विस्तृत योजना बना लें, और बतलायें
कि उनमें से क्या निकलेगा और काम शुरू करें। इस सुझाव में गांधी जी की शर्त
थी कि यह दोनों योजनाएं विदेशों से किसी तरह से धन व साधन नहीं लेंगी और
जो भी धन व साधन जरूरी होंगे, वे भारत के अन्दर से ही लिए जाएंगे। मुझे
लगता है कि गांधी जी के इस सुझाव पर, आज फिर विचार और खुली चर्चा
होनी आवश्यक है।
पिछले 150-200 वर्षों में यूरोप की सभ्यता ने भीमकाय और चमकीले
ढांचे तो अवश्य बनाये। उन्हें अधिक उत्पादक भी माना जाता है और कहा जाता
है कि वे मनुष्य की मेहनत को हल्का और आसान करते हैं। यूरोप का स्वचालन
(आटोमेशन) का विचार तो 2300 वर्ष पहले अरस्तू ने भी उठाया था। परन्तु, यह
यूरोप के बनाये तंत्र व ढांचे कुल मिलाकर विश्व को व मनुष्य समाजों को
कितना अधिक देते हैं, इस पर विचार करना आवश्यक है। 40-50 वर्ष पहले
हमारे मित्र रामस्वरूप ने अपनी पुस्तक 'कम्युनिज्म एंड द पीजैण्ट्री' में आधुनिक
उत्पादन (मॉडर्न प्रोडक्शन) के विषय में कुछ प्रश्न उठाये थे। उनका कहना था
कि इसका भीमकाय रूप, तेज रफ्तार और चमक्रीलापन एक भ्रम पैदा करता है
और इसकी जड़ें इसी भ्रम पर टिकी हैं! उनका मानना था कि कुल मिलाकर
मॉडर्निज्म से अधिक उत्पादन नहीं होता, उसका भ्रम ही रहता है। रामस्वरूप ने
इसको 'साइक्लिक प्रोडक्शन' का नाम दिया था। हमें इस तरह के मूलभूत
प्रश्नों पर भी सोचना शुरू करना चाहिये।
प्रश्न उठता है कि आगे क्या करें? आज के संसार से हमारे पश्चिमीकृत
वर्ग ने जो ज्यादा ही सम्बन्ध बना लिया है, वह अभी टूटता दिखता नहीं। अतः
कुछ समय तक तो पश्चिमीकृत समुदाय या वर्ग भी रहेगा और वृहत् समाज भी
रहेगा। भारतीय मान्यताओं में तो संसार ने सभी तरह के जीवों को, लोगों को
और समाजों को रहना ही है। हिंसकों के लिए भी यहां जगह है; हिंसा पूरी तरह
समाप्त हो, यह सम्भव नहीं है; लेकिन हिंसा मर्यादित रहे, यह आवश्यक है।
आज की स्थिति में यह विचारणीय एवं आवश्यक लगता है कि भारत
में वृहत् समाज को समुचित साधन व स्वतंत्रता मिले, जिससे वृहत् समाज की
इकाइयां अपनी मान्यताओं, व्यवस्था की अपनी प्रणालियों और अपने तकनीकी
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