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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 50 में से

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भारतीय अनुभवों की नींव पर खड़ा किया गया है, न राष्ट्रीय चरित्र के अनुकूल
और न ही भारतीय जन की प्राथमिकताओं का विचार कर।
इस प्रकार "भारत के विकास के परिप्रेक्ष्य" को लेकर उठी किसी भी
बहस के सामने यह एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है। यह नहीं कि पिछले तीस साल से
ज्यादा समय से जारी नियोजित विकास ने भारतीय राष्ट्र की शक्ति में कोई
वृद्धि नहीं की है, उसे कुछ अधिक आत्मविश्वासयुक्त नहीं बनाया है अथवा
विविध क्षेत्रों में व्यवसायदक्ष लोगों तथा विशेषज्ञों को बड़ी संख्या नहीं पैदा
किया है। ऐसा तो हुआ है। साथ ही, औद्योगिक उत्पादन और कृषि दोनों में
गुणात्मक वृद्धि भी हुई है। किंतु साथ ही इस प्रक्रिया ने व्यापक पैमाने पर
जंगलों का विनाश, भूमि क्षय तथा बाढ़ और सूखे की लगातार वृद्धि भी की है।
इसी प्रक्रिया में पर्यावरण अधिकाधिक विषाक्त होता जा रहा है। अधिक सुरुचिपूर्ण
और अधिक व्यवस्थित जीवन का सृजन करने के स्थान पर इस प्रक्रिया ने
वस्तुतः साधारण जीवन को अधिक अस्थिर, अधिक असुरक्षित और निश्चय ही
ज्यादा बदसूरत बना डाला है। यह कहना शायद गलत न होगा कि हमारे
कस्बों, शहरों और महानगरों में भी कुछ सौ वर्ग मीलों में फैले केंद्रीय क्षेत्रों और
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