स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)
Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan
धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा
पृष्ठ 37, कुल 50 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहले आजादी हासिल करने के लिये या जैसा कि अंग्रेजों ने कहा है सत्ता के
हस्तांतरण के लिये जिस तरह की बातचीत चली और जिस तरह के समझौते
किये गये, उनका बाद में जो कुछ परिणाम हमारे सामने आ रहा है उस पर
काफी असर पड़ा है। इन समझौतों का मुख्य उद्देश्य उन लोगों के पक्ष में इतिहास
का चक्र मोड़ना था जो पश्चिमी विचारों के ढांचे में ढल चुके थे, और उन लोगों
को किनारे करना था जो देसी तौर तरीकों की वकालत करते रहते थे। पश्चिमी
विचारों में ढले हुए आधुनिकतावादी और अपने समाज से कटे हुए लोग कोई
रातों रात नहीं पैदा हो गये थे। वे लोग कोई एक शताब्दी में फले फूले हैं।
विशेषकर 1829 में जब ब्रिटिश गर्वनर जनरल बेंटिक ने यह लिखा था कि -
पुराने जमाने में जो साधन गरीबों और ब्राह्मणों को बांटने में खर्च किये जाते थे
उन्हें अब यूरोपीय लोगों के स्वागत और मनोरंजन पर खर्च किया जाता है।
बेंटिक इस समाचार से संतुष्ट हुआ था कि निरर्थक कामों में खर्च किया जाने
वाला पैसा बहुत बड़ी हद तक घटा दिया गया है।
1946 से 1949 के बीच स्वतंत्र भारत का संविधान जिस तरह तैयार
किया जा रहा था उससे भी इन परिस्थितियों को समझा जा सकता है। स्वतंत्र
भारत के जन प्रतिनिधि इस संविधान पर विचार करने के लिये संविधान सभा के
रूप में बैठे जरूर पर करीब-करीब हर मामले में उन्हें अंगूठा लगाने की ही
भूमिका निभानी पड़ी। इस संविधान को बनाने के लिये विशेषज्ञों की कई समितियां
बनाई गयी थीं। मगर उनके अधिकांश सदस्य दूसरे कामों में व्यस्त थे। इसलिये
हमारे संविधान का प्रारूप भारत पर शासन करने के लिये खड़े किये गये अंग्रेजी
ढांचे के आधार पर ही बनाया गया था। उसमें जहाँ-तहाँ यूरोप के देशों या
अमेरिका के संविधान की कुछ विशेषताओं को यहाँ-वहाँ चिपका दिया गया।
संविधान सभा में संविधान के प्रारूप के अनेक पहलुओं पर काफी गरमागरम
बहस हुई। लेकिन उसके बुनियादी ढांचे में कोई खास परिवर्तन नहीं किया जा
सका। इसके लिये तर्क यह दिया गया की कोई बड़े परिवर्तन किये गये तो
संविधान निश्चित कर दी गयी तारीख तक तैयार नहीं हो पायेगा और लटक
जायेगा। संविधान का यह प्रारूप दो लोगों ने --- कानून मंत्री और संवैधानिक
सलाहकार ने तैयार किया था।
पहले से तय की गयी निश्चित तारीख तक संविधान बना देने की
मजबूरी की बात संवैधानिक सलाहकार ने संविधान सभा के अध्यक्ष के सामने
तब रखी जब इस बात को लेकर गरमा-गरम बहस छिड़ी हुई थी कि हमारे नये
राजनैतिक ढांचे की बुनियादी इकाई क्या होनी चाहिए। वे स्थानीय इकाइयां
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जो पुराने जमाने से हमारे राजनैतिक ढांचे की बुनियाद बनी हैं या कि बालिग
व्यक्ति जैसा कि पश्चिमी दुनिया में होता है। इस मुद्दे पर पूरी तरह विचार नहीं
होने दिया गया। संविधान बनाने की तारीख को कुछ इस तरह पवित्र मानकर
यह बहस रोक दी गई जैसे कि कोई शुभ मुहूर्त टल जाने वाला हो। संविधान के
प्रारूप में नयी बातें जोड़ी जरूर गयीं लेकिन उनसे संविधान का परिमाण ही
बढ़ा होगा और उस संविधान को तकनीकी दृष्टि से चुस्त दुरूस्त बनाया गया
होगा। लेकिन जहां तक भारतीय पद्धतियों के अनुरूप ढालने की बात है कुछ
नहीं किया गया। भारतीय जरूरतों के लिहाज से यह संविधान बिल्कुल ही
बेमेल है और अनजाने ही उसने हमारे राजनैतिक ढांचे को अंग्रेजी शासन वाले
जमाने से भी ज्यादा जड़ बना दिया है।
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