सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 50 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 38

पृष्ठ 72

भारत का पुनर्निर्माण
कुछ वर्ष पहले हमारे देश में स्वतंत्रता की पचासवीं वर्षगाँठ का उत्सव
धूमधाम से मनाया गया। उत्सव के शुरू में चार-पाँच दिन तो भारत की लोकसभा
व राज्य सभा में इस स्वतंत्रता की परिभाषा और आधारों को लेकर काफी कुछ
कहा गया। देश के अपने आदर्शों मर्यादाओं, विज्ञान और तकनीक पर चर्चा
रही। वर्ष के अंत में देश की अपनी कला से संबंधित उत्सव हुए, और इनमें न
केवल भारत के कोने-कोने के गान, नृत्य, कथायें सामने आईं अपितु निकटवर्ती
बौद्ध देशों के विद्वानों और कलाकारों ने भी भाग लिया। काशी में रामायण और
मध्यप्रदेश में आल्हा-ऊदल प्रमुख रहे और कुछ ही दिन पहले केरल में एक वर्ष
का भगवद्गीता का अभियान भी आरंभ हुआ।
इस तरह का उत्सव मनाना तो ठीक है। लेकिन इस पचास बरस की
स्वतंत्रता के बाद अधिकांश लोगों को, शायद जो भारत का तंत्र चलाने में लगे हैं
उनको भी, लगा – कि इस पचास वर्ष की उपलब्धियाँ नये भारत को खड़ा करने
में उसका आधार बनाने में काफी नहीं हैं। 1942 में, जब कि भारत में जोरों से
कहा जा रहा था 'अंग्रेजों वापिस जाओ,' उस समय अंग्रेजी और अमरीकी
सरकार के बीच भारत का क्या किया जाए इस विषय में कुछ बातचीत चलती
थी। उस समय अगस्त 1942 में अमरीका के राष्ट्रपति रुजवेल्ट का अंग्रेजों को
यह सुझाव था कि वे चाहे जो भी कदम भारत के बारे में उठाएँ लेकिन उन्हें यह
ध्यान रहे कि (अन्त में पश्चिमी दृष्टि यह है कि) भविष्य का भारतवर्ष पश्चिम की
'ऑरबिट' में, छत्रछाया में जीए। रुजवेल्ट ने तो यहाँ तक कहा कि भारतवर्ष के
लोग एशियाटिक (एशिया के) नहीं कहे जा सकते, वे तो इंडो-यूरोपियन हैं,
और इसलिए यूरोप और अमरीका के करीब हैं, और संबंधी जैसे हैं।
1947 में हम जाने-अनजाने, रुजवेल्ट की इस सोच पर चलने लगे
और जैसा पश्चिम चाहता था उसकी ऑरबिट में, छत्रछाया में रहने लगे। इससे
हम देश के और स्वतंत्रता के ध्येय से तो हटे ही, अंग्रेजों द्वारा स्थापित किए गए
शासन व तंत्र से (जिसमें शिक्षा, सफाई, स्वास्थ्य, बैंक, स्टॉक मार्केट और अंत में
कृषि व पशुपालन भी बँध गया।) घनिष्ठता से बंध जाने के कारण देश के
90-95 फीसदी लोगों से भी अलग हो गए। परिणाम हुआ कि अब हमारे यहाँ
शासन व तंत्र से जुड़े लोग ही (जिन्हें शासन पालता-पोसता है) पहले दर्जे के
72


पृष्ठ 73

नागरिक रह गये। बाकी सब तो देश में रहते हुए भी, दूसरे दर्जे के बन गए। जो
साहस, आत्मविश्वास, देश को बनाने का उत्साह, सन् 1947 से पहले आया था,
उस पर पिछले पचास बरस ने बहुत हद तक पानी फेर दिया। जब 1942 में
रुजवेल्ट ने यह सुझाव दिया कि भारतवर्ष पश्चिमी, 'ऑरबिट' में (छत्रछाया में)
रहे, तो उनका व अंग्रेजों का शायद यह तात्पर्य नहीं रहा होगा कि हम उनकी
तरह शक्तिशाली, संपन्न व आधुनिक बन जाएँ। लेकिन जब हमने अपने से
1945-47 में उनका रास्ता पकड़ा तब अगर हमारे में, यूरोप कैसे बना, इसकी
समझ व शक्ति होती तो हो सकता है हम इन पचास बरसों में यूरोप व अमरीका
जैसे बन जाते, जैसे कि जापान 1885 से 1930 के दौरान बन ही गया। लेकिन
हमारे में ऐसी शक्ति व समझ न तब थी, न अब दिखती है।
आज देश में जो हो रहा है वह तो एक बहुत निचले स्तर का यूरोप व
अमरीका का अनुकरण हो रहा है। यूरोप का वैचारिक प्रभाव तो हमारे यहाँ
1820 से शुरू हो गया था; यह क्रमशः बढ़ता गया और शायद 1900 तक देश के
राजनैतिक, शैक्षणिक व व्यापारिक नेतृत्व इससे प्रभावित लोगों के हाथों में चला
गया। शायद 25-30 बरस (1915-1945 तक) यह प्रभाव कुछ घटा और दब-सा
भी गया। लेकिन 1945 के बाद तो पश्चिमी प्रभाव में आए लोग फिर से आगे
आए और 1947 में उन्होंने ही देश को चलाने की बागडोर संभाली। वृहत समाज
और उसका नेतृत्व व संचालन करने वाले पीछे खदेड़ दिए गए। अगर उनमें से
कुछ राजनीति में रह भी गए तो उनका काम केवल हाथ उठाने का रह गया है।
पिछले 50 बरस में यूरोपीय वैचारिक प्रभाव में पढ़े लोगों की संख्या व नेतृत्व
बढ़ा ही है। केवल उनमें यूरोपीय शक्ति व समझ अनेक कारणों से कुंठित रह
गई है।
आज हम अपने वृहत समाज व जन को भी पश्चिमी विचार की, विज्ञान
की, तकनीकी की, व्यवस्थाओं की जंजीरों से बाँधकर पूरे दासत्व की ओर ले
जा रहे हैं। यूरोप और अमरीका की तो प्लेटो और अरस्तू के समय से ही
मान्यता है कि दासत्व ही साधारण मानव-समाजों के लिए उचित व्यवस्था है।
यूनानी और ईसाइयत के विचार से भी समग्र प्रकृति, उसके पर्वत, नदियाँ, झरने,
समुद्र, वृक्ष, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, इत्यादि मनुष्य के उपयोग के लिए ही बने
हैं। मनुष्य उन्हें जैसे चाहे रखे। यूनानियों और यहूदियों के 'ओल्ड टेस्टामेंट' के
हिसाब से (जिसे ईसाई व इस्लाम दोनों मानते हैं) मनुष्य-मनुष्य में भी फर्क है।
कुछ थोड़े ही मनुष्य-मनुष्य माने जा सकते हैं, बाकी तो पशु व शेष प्रकृति के
समान हैं। आवश्यकता होने पर राजपुरुष उन्हें बगैर किसी कानूनी व्यवस्था में
73