स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)
Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan
धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा
संसद, विधान सभायें इत्यादि तो मूलतः दोबारा बनानी ही होंगी, लेकिन जब तक
यह सब नया ढांचा बने तब तक कुछ कदम तो उठाने ही पड़ेंगे। उनमें एक कदम
तो सांसद इत्यादि को स्वतंत्र कर देना और उनको उनके क्षेत्रों से जोड़ देना
होगा। दूसरा कदम, यह आवश्यक है कि संसद, विधानसभा इत्यादि जितने
वर्षों के लिये चुनी जाये, उतने वर्ष अवश्य चले। सरकार की किसी विषय पर
बात नहीं मानी जाय तो ऐसा होना हर समय उसकी हार नहीं मानी जानी
चाहिये। बात नहीं माने जाने का मतलब है कि वह अपना रास्ता बदले। उससे
फिर भी काम न चले तो उसी संसद व विधानसभा में से दूसरी व तीसरी सरकार
बन जाय। देश को साधारणतः व्यवस्थित रखना और प्रजा को अभय जैसा रहे,
यह संविधान का, संसद का, विधानसभाओं का और राजनीतिक गिरोहों का
प्रथम काम है।
अखिल भारतीय राजनीतिक गिरोहों का या दूसरे वैज्ञानिक, आर्थिक,
व्यावसायिक गिरोहों का दबदबा व झूठी प्रतिष्ठा जितनी भी कम हो उतना देश
के लिये अच्छा है। क्षेत्रों की देखभाल तो प्रदेश ही कर सकेंगे और प्रदेश मिलकर
ही भारत को संभाल सकेंगे, सुव्यवस्थित रख सकेंगे, समृद्धि दे सकेंगे और विश्व
के परिप्रेक्ष्य में शक्तिशाली और बराबर का रख सकेंगे। भारतीय केंद्र व्यवस्था
से यह कभी होने का नहीं है, यह तो एक प्रवंचना है। केंद्र तो प्रदेशों का संघ ही
चला सकेगा, और ऐसा संघ ही तय कर सकेगा कि केन्द्र को कौन - कौन काम
सौंपे जायें, क्या-क्या साधन उसे उपलब्ध कराये जायें।
प्रदेशों में भी आज की राजनीतिक व अन्य संस्कृति उसे दिशा देती है
व और दूसरी सभ्यताओं से कैसा संबंध बनाये, यह बताती है। यह अवश्य है कि
हमें शक्तिशाली होने की आवश्यकता है। लेकिन शक्ति तो कई तरह से बनती
है, केवल हावी व लुटेरे लोगों के रास्ते से ही नहीं। इस पर ध्यान देना हमारे
विद्वानों व मनीषियों का काम है।
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