स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)
Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan
धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा
पृष्ठ 32, कुल 50 में से
संदर्भ में पढ़ेंअधिक व्यक्त न किया गया हो, पर दृष्टि यही थी। इस दृष्टि वालों में से किसी
को कभी यह याद नहीं आया कि ये वे ही भारतीय जन हैं, जिन्होंने निम्नतम
संभव पूँजी-निवेश, उपकरणों और उस पशुसम्पदा के जरिए भी भारत की रक्षा
की थी तथा पालन किया था जो उन्हीं की तरह अस्थिपंजर मात्र बना डाली
गयी थी। उनकी प्रशंसा करने और उनकी स्वीकृति प्राप्त करने के स्थान पर
उन्हें वस्तुतः यह बताया गया कि वे निकम्मे हैं। सर्वसामान्य भारतीय जन को
इस तरह रद्द कर देने और बहिष्कृत कर देने के बाद यह आश्चर्य की बात नहीं
कि इस भारतीय कुलीन वर्ग के लिये शासन प्रबन्ध और विकास की समस्याएं
इतनी बड़ी बोझ बन गयीं।
समुद्रीय वृत्त सम्बन्धी अवधारणा के लिये 28 जुलाई 1946 का हरिजन
दृष्टव्य है। इसमें "स्वराज" शीर्षक से अपने लेख में गांधी जी ने स्वराज लोकतंत्र
की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा था- "वह एक सामुद्रिक वृत्त होगा, जिसका
केन्द्र होगा व्यक्ति जो गांव के लिए उत्सर्ग को सदा तत्पर रहेगा, गांव
ग्राम-समुदाय के लिए उत्सर्ग हेतु तत्पर रहेगा, यही क्रम चलता रहेगा और
सम्पूर्ण समाज का ऐसे व्यक्तियों से बना एक अखंड जीवन होगा, जो अपने
मन्तव्य से कभी भी आक्रामक न होंगे, सदा विनययुक्त होंगे तथा उस सामुद्रिक
वृत्त की महत्ता के भागीदार होंगे, जिसकी कि वे अभिन्न इकाइयां हैं।" आगे
उन्होंने लिखा- "असंख्य गांवों (और स्वाभाविक ही कस्बों तथा शहरों) से युक्त
इस संरचना में निरन्तर फैलने वाले किन्तु कभी भी प्रभुत्व न दिखाने वाले वृत्त
होंगे। सबसे बाहर वाले वृत्त (यानी राज्य) द्वारा अपने समस्त भीतरी वृत्तों को
सुदृढ़ रखने के लिए तथा उनसे शक्ति पाने के लिये ही शक्ति-संचय किया
जायेगा, न कि उन्हें दबाने-कुचलने के लिये।"
शासन सम्बन्धी इन सुझावों की पर्याप्तता पर बहस संभव है। किन्तु
भारत की तथा साथ ही पश्चिम की सभ्यता का उनका विश्लेषण तथा अपने
स्वदेशी जनगण की तथा उनके द्वारा पोषित-समाहत नैतिक विचारों की गांधी
की समझ अतुलनीय रही है और वह आज भी उतनी ही प्रामाणिक है, जितनी
60-70 वर्ष पहले थी। (सभ्यता सम्बन्धी उनका यह विश्लेषण सर्वप्रथम 1909
में "हिन्द स्वराज" में सामने आया। यह प्रश्नोत्तर शैली में है और उसमें गांधी जी
ने उस समाज और राज्य के स्वरूप पर प्रकाश डाला है, जैसा वे स्वाधीन भारत
में देखना चाहते थे।) जिन लोगों को दरिद्र बनने को विवश किया गया है, जो
व्यापक वंचना के शिकार बनाये गये हैं और जिनका आत्मगौरव छीना गया है,
उन्हीं करोड़ों लोगों की सृजनात्मक एवं प्रवर्तनकारी मेधा को मुक्त तथा जागृत
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करके ही विकास की समस्या को हल करना संभव है। क्योंकि अंततः विकास
का मूल अभिप्राय है "भीतर के विकास" तथा "आत्मअभिव्यक्ति, आत्मविस्तार
अणु से महत् की ओर बढ़ना"। अतः विकास की परिभाषा में ही यह निहित है
कि वह तभी प्रारम्भ होगा जब भारतीय जनगण स्वयं अपना विकास करने में
सक्षम होते हैं अर्थात जब व्यक्ति-रूप में तथा समूह के अंग के रूप में वे खिलना,
प्रस्फुटित होना शुरू करते हैं।
आजादी के बाद से जो दृष्टिकोण, जो कार्यविधि तथा जो
उपकरण-व्यवस्था भारतीय मामलों में गतिशील रही है, वह अब और ज्यादा
समय तक अपेक्षित कार्य नहीं कर सकती यानी संतोषप्रद रूप में गरीबी कम
करने का तथा सर्वसामान्य भारतीय जन में आत्मगौरव तथा पहल की प्रवृत्ति
पुनःप्रतिष्ठित करने का काम नहीं कर सकती, यह कहने का अभिप्राय इन
दृष्टिकोणादिक की भर्त्सना करना नहीं है। 1947 के बाद की स्थितियों में,
विशेषकर 1945 से आगे भारत जिस दिशा में बढ़ा यहां के कुलीनवर्ग खासकर,
प्रशासन वर्ग और अर्थशास्त्री समूह ने अपनी दक्षता भर कार्य किया! इस
क्रियाशीलता से हिन्दुस्तान से अभाव, दरिद्रता और पराश्रय के समुद्र के बीचों
बीच पश्चिमोपन और अति समृद्धि के कुछ सौ नखलिस्तान तथा परकीय अन्तः
क्षेत्र विकसित हो गये हैं तथा समस्त नैतिक आचरण और मानदण्ड क्षत-विक्षत
हो चुके हैं। इन सबका दायित्व उन्हीं पर डालने की जरूरत नहीं है। किन्तु
भारत के स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए यह स्वीकार करना होगा कि ये नजरिये
वगैरह अब प्रासंगिक नहीं हैं और वे वस्तुतः भारतीय समाज के ताने-बाने को ही
नष्ट-भ्रष्ट करने वाले हैं। ऐसी परिस्थितियों में, भारतीय राजनैतिक व्यवस्था
को तथा जीवन के हर क्षेत्र में सक्रिय विचारशील भारतीयों को उन भागों तथा
साधनों को खोजना होगा, जिनमें राष्ट्र की एकता सुरक्षित रहने के साथ-साथ
देशजन को स्वतन्त्रता, अवसर और आनुपातिक राष्ट्रीय साधन-स्रोत उपलब्ध
हो सकें, जिसमें विविध स्तरों पर लोग जीवन की अधिक आवश्यक और बुनियादी
समस्याओं पर विचार करना तथा उनका समाधान करना प्रारम्भ कर सकें।
अब हमारे पास भारतीय मामलों के प्रबन्ध का पैंतीस वर्षों (अब 50
वर्षों) का अनुभव है, और साथ ही अंतरराष्ट्रीय जगत का अधिक यथार्थपरक
परिचय है और शायद, औद्योगिक क्रान्ति की उपलब्धियों की चकाचौंध से भी
हम कुछ मुक्त हुए हैं, यह तथ्य अवश्य नये मार्गों तथा साधनों के सृजन को अधि
क व्यावहारिक बना देता है। जहाँ यह सच है कि एक ओर हमारी समस्याएं
पैंतीस साल पहले की तुलना में अधिक जटिल हुई हैं और उनका दबाव बढ़ा है,
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