स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)
Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan
धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा
गवर्नर मॉडल। गांधीजी को शायद लगा कि अंग्रेजों से लड़ाई उनके जैसा
केंद्रित मॉडल बनाकर ही लड़ी जा सकती है। तो वैसा ही मॉडल बना तो उसे
चलाने के लिए वैसे ही लोग भी आगे रखने थे।
इस युद्ध में नेहरू पश्चिमी मॉडल के प्रतीक हैं। गांधी भी उन्हें ऐसा ही
मानते हैं। पर यह भी मानते हैं कि नेहरू को मोड़ा जा सकता है। वे सोचते हैं कि
पश्चिमी मॉडल को हराने के लिए इस नेहरू को जीतना है। इसे जीत लिया तो
फिर सबको जीत लिया। उन्हें अपनी जीत का भरोसा भी होता है। पर यह जीत
वे हासिल नहीं कर पाते। गांधी अंतरराष्ट्रीय ताकतों के दखल को भी ठीक से
समझ नहीं पाए। यह मान कर चलते रहे कि उनकी कोई दखलंदाजी नहीं होगी
और सब कुछ आपस में सुलटने के लिए जस का तस स्थिर रहेगा। पर 1944 के
बाद तो इन ताकतों ने गांधीजी को हाशिए पर ठेल दिया।
नेहरू? 1945 में तो नेहरू ने साफ कहा कि गांधी के स्वदेशी राग को
उन्होंने कभी विचार के लायक भी नहीं माना। कांग्रेस ने भी स्वदेशी की बातचीत
1937 में ही छोड़ दी थी। नेहरू तब तक बड़े नेता बन चुके थे। गांधी मूल में
सभ्यता का संघर्ष तो लड़ रहे थे, पर उनका मूल प्रश्न पहले आजादी हासिल
करने का था। उन्हें समझौते करके चलना पड़ता था। उनकी मजबूरी उस
सेनापति की मजबूरी थी, जो अपनी सेना की टूट नहीं चाहता। वे सोचते थे कि
युद्ध में सबको साथ लेकर चलो। आजादी मिली तो फिर सब कुछ संभल
जाएगा। उन्होंने पश्चिमपरस्त लोगों और उनके नेता नेहरू को संतुलित करने
के लिए कोशिशें कम नहीं कीं। गांधी सेवा संघ बनाया गया। संघ पश्चिमपरस्त
तबके के खिलाफ दबाव बनाने का साधन था। 1938 में नेहरू जब विदेश जा
रहे थे तो उन्होंने संघ के खिलाफ हमले का बिगुल बजाया कि संघ राजनीति
कर रहा है। फिर सुभाष चंद्र बोस लाबी मजबूत बनी तो महात्मा गांधी को 1940
में संघ को सस्पेंड करना पड़ा। विसर्जित उन्होंने नहीं किया। कहा कि फिर
जिंदा करने की जरूरत पड़ सकती है। गांधी पर सबसे बड़ा दबाव तो टैगोर का
पड़ता था। सुभाष नेशनल प्लानिंग कमेटी गठित करना और नेहरू को उसका
अध्यक्ष बनाना चाहते थे। तो मेघनाद साहा जुटे। टैगोर से बात हुई। टैगोर ने
गांधी को मनाया। नेहरू अध्यक्ष बने। नतीजतन विकास का पश्चिमी मॉडल
कांग्रेस के नीति मॉडल में हावी हो गया। और गांधीजी ने नेहरू को अपना
उत्तराधिकारी ही कौन-सा घोषित किया। 1940 की कांग्रेस कार्यसमिति में
गांधी बोस वगैरह के खिलाफ अपने लोगों की एकतरफा जीत चाहते हैं। नेहरू
समर्थक एक तिहाई हैं। तो समर्थन लेने के लिए बातचीत में कह देते हैं कि मेरा
26
उत्तराधिकार तो नेहरू को ही मिलेगा। असली खेल बाद में हुआ। कुछ दिनों
बाद अखबारवाले गांधी के पास पहुंचते हैं। और उनसे सवाल पूछ-पूछ कर मुंह
से निकली बात को कबूलवाया जाता है। बात रिकार्ड में ला दी जाती है। नेहरू
इसे गांठ में बांध लेते हैं। और जब वक्त पड़ता है तब यह बात 1944 में उछालकर
सामने ला दी जाती है।
महात्मा गांधी जब ताकत में रहते हैं, उनके सामने सब कुछ दबा रहता
है। पर ताकत कम होते ही मामला उलट जाता है। 1927 में नेहरू विदेश प्रवास
से लौटकर आते हैं तो उनको आगे कर आजादी का प्रस्ताव पास किया जाता
है। आजाद रूप से। इसमें गांधीजी के स्वदेशी, स्वराज आदि के संदर्भों में
उन्होंने 1920 से जो कुछ किया, उसको चुनौती है। गांधी चौंकते हैं। और फिर
जनवरी 1928 में एक-दूसरे को चिट्ठियां लिखी जाती हैं। गांधी आर-पार
लड़ाई की चुनौती दे डालते हैं। आजादी बनाम स्वराज का लेख लिखते हैं।
जानते हैं कि आज कौन लड़ेगा। सबक सिखा रहे हैं। और मामला वहीं खत्म
कर देते हैं। पर दूसरे ? दो टूक शब्दों में कहूं तो नेहरू और उनके लोगों ने
पिछले 50 साल में गांधी के साथ चौतरफा बदला लिया है। उन पर गिन-गिन
कर अनगिनत हमले किए हैं। उन्हें अपमानित करने की कोई चेष्टा नहीं छोड़ी
है। गांधी से उनका युद्ध अभी भी जारी है।
27
द्वितीय खण्ड: विदेशी आर्थिक शोषण बनाम स्वदेशी विकेन्द्रीकरण
हिंदुस्तानी तासीर दफनाने के लिए
अंग्रेजों ने बनवाई कांग्रेस
स्वदेशी और स्वदेश को जानने-समझने के लिए क्या पिछली
दो-तीन सदियों के इतिहास को उघाड़ने की फौरी जरूरत है? लेकिन
अगर इस काम से एक से एक मूर्धन्य महापुरुषों का मानभंजन हो गया
तो?
मुझे इस काम से कोई एतराज नहीं है। बल्कि देश में बेहतर मानवीय,
सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक संबंध कायम करने के लिए मैं इसे जरूरी
मानता हूं। कहाँ थी कुचाल ? लॉर्ड विलियम 1830 में कहता है कि हमारे
प्रयासों का भारतीयों पर असर तो पड़ा है। लोगों ने अंग्रेजियत अपनाई है।
उनकी परंपराएं टूटी हैं। अंग्रेजीदाँ वर्ग में पैसा यूरोपीय तर्ज के मनोरंजनों पर
बहाया जा रहा है। 1870 आते-आते यह अंग्रेजीदाँ वर्ग इस बात के लिए
अकुलाने लगा कि जब हम अंग्रेजों की तरह रहना जानते हैं, उन्हीं की तरह
अंग्रेजी बोल लेते हैं, राजनीति और दर्शन वगैरह पर भी बात कर लेते हैं, तो फिर
वे हमें थोड़ा बराबरी का दर्जा क्यों नहीं देते? रिचर्ड टेंपुल 1880-82 में कहता
है कि इन लोगों को कानून वगैरह पढ़ा देने से ऐसा हुआ है। थोड़े होशियार हुए
हैं तो होशियारी दिखा रहे हैं और बराबरी की मांग करते हैं। अब इन्हें जरा
विज्ञान की झलक दिखानी चाहिये, जिससे यह लोग हमारी बौद्धिक दासता
स्वीकार करें।
भारतीय तासीर का अंग्रेजी शासन और अंग्रेजियत के खिलाफ मौलिक
विरोध के रूप में 1870 के आसपास उत्तर प्रदेश और बिहार में गौहत्या के
खिलाफ जबरदस्त जन आंदोलन उठ खड़ा हुआ। तत्कालीन वायसराय के
मुताबिक इसकी ताकत 1857 के स्वाधीनता संग्राम जैसी ही थी। रानी उसे
चिट्ठी भेज कर सावधान रहने को कहती हैं कि आंदोलन हमारे ही खिलाफ है,
मुसलमानों के खिलाफ नहीं। गोमांस हम अंग्रेज ही ज्यादा खाते हैं। देश के
दूसरे हिस्सों में भी इस तरह के दूसरे देशी विरोध उठ रहे थे। इसे मोड़ कर नष्ट
करने और अंग्रेजीदाँ वर्ग में उठी बराबरी की मांग को संतोष देने के लिए ही
कांग्रेस का जन्म हुआ। स्वदेशी को खत्म करना तो कांग्रेस के गर्भनाल में है।
28
अंग्रेजों की श्रेष्ठता मान लेने से बौद्धिक वर्ग ने अंग्रेजों का काम ही
आसान किया। अंग्रेजों ने अपने राज्य को वैधता देने के सिलसिले में भारत के
हजार साल से गुलाम रहने का रट्टा खड़ा कर दिया। कब था भारत हजार साल
से गुलाम ? गजनवी वगैरह तो लूट के लिए आए। मुसलमानों का कब्जा तो
1200 से शुरू हुआ। लेकिन कितनी दूर ? उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में। वह
भी पाकेट्स में। ऐसा नहीं था कि साग-बथुए की तरह यहां के लोग दब गए थे
और मुस्लिम निजाम चारों ओर पसर गया था। मुसलमानों को अंग्रेजों की तरह
जिला-जिला पहुँच कर प्रशासन की सीढ़ी बनाना नहीं आता था। इसे अंत तक
देखें। हिंदुस्तान कोई मुसलमानों के हाथ से अंग्रेजों के हाथ में नहीं गया।
हिंदुओं के हाथ से गया। मराठों ने दिया। बंगाल के राजाओं ने दिया। सिराजुद्दौला
वगैरह की तो नाम मात्र की सत्ता थी।
फिर अंग्रेजों ने हमें अपने नजदीकी समयबोध से भी काट दिया। जैसे
हिंदुस्तान में 2000-3000 साल की अवधि में सामाजिक संरचनाओं का समय
के मुताबिक कोई विकास ही नहीं हुआ। पुराणों, उपनिषदों और संहिताओं से
उदाहरण ढूंढ कर हमारी अठारहवीं सदी का फैसला होने लगा। भारतीय
धर्मशास्त्रों के कमाल-कमाल के विशेषज्ञ निकल आये। यह साबित किया जाने
लगा कि मनुस्मृति में वर्णित वर्णाश्रम धर्म ही समाज का मानक है। मनु उभार कर
सामने लाए गए तो दलित आशंकाएं भी उभरीं। अठारहवीं सदी के हिंदुस्तानी
समाज की क्या कोई तस्वीर नहीं थी ? थी। शोध साबित करते हैं कि उन बुरे
दिनों में भी हिंदुस्तानी मजदूर की मजदूरी इंग्लैंड में दी जा रही मजदूरी से
ज्यादा थी। बंगाल पर पूरे कब्जे के बाद 1765 में सवाल उठा कि किसानों से
मालगुजारी क्या ली जाए ? ये किसान तब छटा-आठवां हिस्सा ही देते थे।
जबकि इंग्लैंड में तब के बंटाईदार जमींदार को आधा हिस्सा देते थे। अब
अंग्रेजों को वसूलना आधा है तो फिर उसके लिए चलो पुराने टैक्स्ट (TEXT)
ढूंढ़ो। तो अलाउद्दीन खिलजी के जमाने में पहुंचते हैं। वहां सवाल-जवाब में
सलाहकार खिलजी को बता रहे हैं कि गैरमुसलमान से राजा उत्पाद का 50
फीसदी हिस्सा भी कर में ले लें तो गलत नहीं है। खिलजी का यह सवाल-जवाब
प्रमाण बना दिया गया। यह कह कर के कि जब अच्छा प्रशासन होता है तो लोग
50 फीसदी कर देते हैं। अब तक छठा-आठवां हिस्सा इसलिए देते थे कि अब
तक अच्छा प्रशासन नहीं था। 1780-85 में बनारस में एक ब्राह्मण पर हत्या का
इलजाम लगा। यह कुछ धरने वगैरह में हुई मौत थी। काफी पहले से हमारे यहाँ
इस प्रकार के दण्डों के लिये काला टीका करके देश निकाला देने का रिवाज
था। मामला कलकत्ता जाता है। विलियम जोन्स के पास। वे भारतीय धर्मशास्त्र
के विशेषज्ञ हैं न ! वे वह सब जानते हैं जो इस देश के धर्मशास्त्री नहीं जानते ! तो
29
वे बताते हैं कि नहीं, इनके यहां तो ऐसे मामले में तप्त लोहे से दागे जाने का
रिवाज है। काले टीके की बात उन्हें इसलिए नहीं जमती कि उस समय इंग्लैंड
में गरम लोहे से दाग कर सजा देने का आम रिवाज था। वे उसकी बराबरी की
सजा ढूंढ रहे हैं। तो अपने हिसाब से करने के लिए पीछे, और पीछे, और पीछे
चलने का मॉडल बना दिया गया। बहुत मजबूत था यह मॉडल। जे पी और
लोहिया से मेरी कई बार इस सिलसिले में बातें हुईं। अंग्रेजों के इस खेल को
भांपते थे वे। पर जब मंच पर चढ़ जाते थे तो फिर पहले ही वाक्य से वहीं शुरू
हो जाते थे- हजारों साल पुरानी सभ्यता है हमारी। और फिर वहीं हजारों
साल पहले ठहर कर रह जाते थे हम।
क्या था अंग्रेजों के जमाने के अठारहवीं सदी के भारत का नक्शा?
यह दलित (डिप्रेस्ड) समाज तो अंग्रेजों का किया वर्गीकरण है। हमारे यहां तो
अलग-अलग जातियां थीं और उनके अलग-अलग रीति-रिवाज थे। दलित
वर्ग कहां से निकला, इस बारे में आंबेडकर लिखते हैं कि मुसलमानों का एक
प्रतिनिधिमंडल अंग्रेजों से मिला था। उसने कहा कि हिंदू अछूत, दलित और
सवर्ण-तीन खाने में है। इसलिये मुसलमान को आबादी के गणित में हिंदुओं के
बराबर ही माना जाना चाहिए। 1911 की जनगणना में अंग्रेजों ने इस वर्गीकरण
को ठूंस दिया। 1916-17 में शिक्षा पर हुए किसी सम्मेलन में सामाजिक-शैक्षणिक
पिछड़ेपन की चर्चा उठी। तो बाद की जनगणना में अछूतों और कुछ दलितों को
मिलाकर अनुसूचित जाति का एक वर्ग बना दिया गया। जबकि 18 वीं सदी के
भारत में 5-7 से ज्यादा जातियां अछूत नहीं थीं। चमार तो अछूत नहीं ही थे।
1931 की जनगणना में उनकी आबादी ब्राह्मणों के बराबर है। और जातिवार
यही दोनों सबसे बड़े आबादी समूह हैं। कुछ चांडाल, भंगी, मेहतर ही अछूत थे।
फिर 1800 तक जातियों में परस्पर पिछड़ापन कोई ज्यादा नहीं था। शादी-ब्याह
के दायरे सबके अपने-अपने थे। पर समाज में सबकी स्थिति तकरीबन बराबर
की थी और व्यवस्था में हरेक की हिस्सेदारी थी। दक्षिण भारत में तो गांव के
झगड़े तय करने का काम पेरियार का ही था। उसके न्याय को चुनौती नहीं दी
जा सकती थी। गांव की सुरक्षा का जिम्मा महार्रों का था। 18 वीं सदी में इनके
घरों का घेरा देखिए तो वह किसी और हिंदू के घर से कम नहीं है। बल्कि
कहीं-कहीं ज्यादा भी है। खेती भी है उनके पास। इसे कहिए तो लोगों को बड़ा
झटका लगता है। मैंने जाँचा कि दक्षिण में 18 वीं सदी में कुल शिक्षितों में 80
फीसदी गैरब्राह्मण हैं। इस पर नानाजी देशमुख को यकीन नहीं हुआ। वे कहने
लगे कि ऐसा कैसे हो सकता है? और दलित नेता भी इसे कैसे मानेंगे? उन्हें
किसी ने यह बताया ही नहीं।
30
अपना नियंत्रण खत्म हुआ तो न
स्वायत्तता रहेगी न स्वावलंबन
क्या राजनीति और सबको साथ लेकर चलने की मजबूरियों के
अलावा भी गांधी किसी ऐसे कारण से मजबूर थे कि स्वदेशी वृक्ष के लिए
कोई ऐसा थाला नहीं बन सका, जिसे नेहरू जैसे लोग मिटा न पाते, और
वृक्ष पनपता-बढ़ता चला जाता? जिसे उनके बाद सर्वोदयी, गांधीवादी,
समतावादी, समाजवादी, मानवतावादी, राष्ट्रवादी आदि-आदि सब मिलकर
संभाल लेते, और आज भारत की एक नई तस्वीर बनी होती ?
गांधी की गांव की कल्पना उधार की है और किताबी है। मेटकाफ
जैसे का लिखा पढ़ कर ही उन्होंने भारत के गांव जाने हैं। और यह जो पढ़ा-लिखा
है, वह बहुत महत्व का नहीं है। पर उनकी अंतर्दृष्टि विलक्षण है और हर
पढ़े-लिखे-देखे को जोड़-जाड़कर चमका देती है। 1891 में वे लंदन की एक
गोष्ठी में जाते हैं तो हिंदुस्तान के लिए नमक के महत्व का मुद्दा उठाते हैं। फिर
बताते हैं कि गाय की वहां पूजा होती है। उसका मारा जाना ठीक नहीं। यह
बात अंतर्दृष्टि से ही उठ रही है। बाद में वे इन्हीं बातों का विस्तार करते हैं।
नेटाल कांग्रेस की ओर से दिए गए ज्ञापन में वे दक्षिण अफ्रीका के हिंदुस्तानियों
की बाबत कहते हैं कि ये महान लोग हैं। हजारों साल पुरानी सभ्यता के हिस्से।
वही हजारों साल पुरानी सभ्यता। तो तुरंत का बीता तो यहाँ भी लोप हो जाता
है। लिहाजा स्वदेशी की जो अवधारणा या कार्य रेखा बनती है, ढेर सारी चीजों
को बटोर कर अंग्रेजों के सामने तो, वह एक बड़ी ताकतवर चीज के रूप में रख
दी जाती है, उसका एक ढाँचा भी खड़ा कर दिया जाता है, पर मामला ऊपर ही
ऊपर है, जड़ें नदारद हैं। ताश के पत्तों का एक ऐसा महल बनता है, जिसे तो
गिरना ही था।
नतीजा-स्वदेशी की अवधारणा को गांधी के वे अनुयाई भी नहीं चला
पाए, जिनके पास सतही लिबास भी था और गांधी का बनाया ढाँचा भी। बस
रूटीन में मंत्र की तरह स्वदेशी का जाप होता रहा। स्वदेशी की चेतना भूत,
भविष्य और वर्तमान से ठीक से जोड़ी नहीं गई। विनोबा ने समुदाय की,
ग्रामदान की बात की। तो पहले क्या होता था? अपने यहाँ तो समुदाय के कुछ
31
गांव होते ही थे। 1964 में तंजोर में लोगों ने बताया कि उनके यहाँ 100 समुदाय
गांव तो आज भी हैं। स्वदेशी की अभिव्यक्ति तो राजनीति में होनी थी। हम लोग
तो उसकी आर्थिक अभिव्यक्ति करने में ही लग गए और मारे गए। स्वदेशी यानी
वही कुछ कपड़ा-वपड़ा। कुछ तेल-वेल, खाने-वाने की बातें। इसमें तंत्र,
व्यवस्था, मर्यादा पर-प्राथमिकताओं पर बात नहीं थी। स्वदेशी तो प्राथमिकताएं
होती हैं। वे तय होंगी, तो उन्हें कैसे पूरा करना है, इसका रास्ता बनेगा। इस
काम के लिए कुछ उधार भी लेना होता तो लेकर उसे अपने में मिला लेते।
उसका स्वदेशीकरण हो जाता। 1905 की स्वदेशी की बंगाल वाली विचारधारा
सतह पर ही थी। नीचे धँसती तो बहस होती। अरविंद जैसे लोग कुछ सैद्धांतिक
व्याख्या कर गए। बस।
स्वदेशी क्या हो, इसे तय करने के लिए राज्य और समाज कैसे
व्यवस्थित हो, इस सवाल पर जाना होगा। इनके आपसी रिश्ते क्या हों, और
इनके मूलाधार क्या हों, यह तय करना होगा। अपने यहाँ जातियां ही नहीं रहीं,
उनमें अंदरूनी विभाजन भी जोर का रहा है। 1911 की जनगणना में पंजाब में
1700 खानों में जाट बँटे हैं। ये शायद 1700 कुल रहे होंगे। यह कुल प्राथमिक
इकाई रही है परिवार नहीं, कुल। फैसले इसी इकाई में होते हैं। ये कुल इकट्ठा
होते हैं तो कुछ संघीय-सा संयोजक ढांचा बनता है। इस ढांचे में फैसलों की
प्रक्रिया कई स्तरों में रही होगी। 100-200-500 साल पहले के कुलों की रक्षा,
विदेशी नीति आदि की जरूरतें दूसरी थीं। आज हमारी जरूरतें दूसरी हैं। पर
इस बात की सोच नहीं बढ़ी। यह मानने की आदत से कि भारत ऐसा रहा है और
ऐसा ही रहेगा। फिर छोटे समूह में रहने की आदत थी। ढेर सारे कुल थे। गुरू
की चेलहाई के आधार पर। पंथ के आधार पर। पर यह नहीं कि इन कुलों का
आपस में कोई संबंध नहीं है। आपस में शादी, ब्याह और खान-पान नहीं हैं पर
इसका अर्थ यह नहीं कि वे एक-दूसरे को छोटा मानते हैं। भिन्नता वहीं तक है।
बाकी सब बातों के लिए लोग इकट्ठे होते होंगे और व्यवस्था का संचालन होता
होगा।
फिर यह विभाजन कि लड़ने का काम केवल क्षत्रिय का है, आदि-आदि,
तो यह बात मूल में नहीं रही होगी। मूल में तो लड़ाई के तंत्र में तमाम लोग लगे
थे। इस बात को समझकर ही ढांचा बनाया जाना था। 1800 का भारत ऐसा ही
था और वही अपने हिसाब की संरचनाएं बनाई गई होतीं तो दो-चार पीढ़ियों में
स्वदेशीकरण हो जाता। यह आज भी हो सकता है। पर यह समझकर कि
ज्यादातर लोगों का वास्ता भौतिक उन्नति से ही है। उन्हें वह चाहिए। और यह
32
दिया जा सकता है। दूसरे यह कि दुश्मन तो कभी खत्म होते नहीं। इनसे बचाव
तो करना ही होगा। इस खाके में भौतिक ढांचे (उत्पादन वगैरह) की बात चलती
तो कहीं पहुंचा जा सकता था। स्वदेशी का वह जो ठेठ अर्थ है कि इलाके में बना
सामान ही खरीदना चाहिए आदि-आदि, वह गिर जाता है। राजनीति और
व्यवस्था उससे नहीं मिलती तो उसे सहारा नहीं मिलता। 1915-16 में महात्मा
गांधी ने यह जो चरखे की बात पकड़ी तो गुजरात में उस वक्त चरखे का चलन
नहीं रहा होगा। पर पंजाब वगैरह में तो 1850-60 तक चर्खा खूब चलता ही
था। भारतीय कपड़ा उद्योग पर जो शोध हुए हैं, वे यह नहीं कहते कि आर्थिक
चुनौती से कपड़ा उद्योग हारा। हारा वह राजनैतिक पराजय से। उसकी वजह
से लगे शुल्क (कर) से।
आज का उदारीकरण यदि देश के विकास की सुविचारित रणनीति
के तौर पर हो रहा हो, पूरे मन से हो रहा हो तो इससे भी बेहतरी हो सकती है।
1950-60 में जापान इस रास्ते चला तो 5-10 साल बड़ी खलबली रही। पर
उन्होंने सैन्यीकरण भी किया। आज उसने कई मायनों में अमेरिका को पछाड़
रखा है। विश्व बाजार की प्रक्रिया पर उसने महारत हासिल कर ली। यह
महारत हमारा इरादा हो तो इस नई आर्थिक नीति के भी फल निकल सकते हैं।
पर हम लोगों ने अपने लोगों को रद्दी मान लिया है, उसकी वजह से यह मानसिकता
होगी, इसका भरोसा नहीं होता।
नई आर्थिक नीति के खिलाफ उठने वाली आवाजें बज नहीं रहीं।
कारण विरोधियों के पास मुकम्मिल सोच नहीं है। अपना मॉडल नहीं है। लोग
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध कर रहे हैं। जैसे आजादी बचाओ आंदोलन है।
जार्ज फर्नांडीज हैं, चंद्रशेखर हैं। तो ईस्ट इंडिया कंपनी क्या थी ? बहुराष्ट्रीय
ही थी न ! यूरोप और पश्चिम तो ऐसी कंपनियों से ही चलता है। यही वहां का
चलन है। क्या इसे नहीं समझना चाहिए ? यदि चंद्रशेखर, जार्ज आदि-आदि के
पास स्वदेशी की परिभाषा होती, उसका मॉडल होता तो बहस हो जाती और
लोग सोचते। पर वह नहीं होगा। इसलिए कि व्यवस्था और तंत्र के स्वदेशीकरण
की नहीं सोची गयी है। तय तो पहले प्राथमिकताएं की जानी चाहिए। फिर कुछ
उधार भी लेना होता तो लेकर ढाला जाता। स्विच अपने हाथ में होगा तो उधार
का भी स्वदेशीकरण हो जाएगा। अभी तो पश्चिम से हम सब कुछ पैकेज में ले
रहे हैं।
इस बात की अनदेखी किए हुए कि उधार में लाई जा रही तकनीक
और सिद्धांत की अपनी भी स्वायत्तता होती है। हमें तो अपनी जरूरत की चीजों
33
स्व भा - 5
से ही सरोकार रखना था। चौथे दशक की नेशनल प्लानिंग की उपसमिति की
वर्धा बैठक में गांधी जी ने कहा कि पहले उत्पादन का लक्ष्य तय किया जाए।
फिर यह आपस में तय हो जाएगा कि कितना उत्पादन देशी तरीके से होना है
और कितना औद्योगिक तरीके से। मामला बस इतना होगा कि संसाधन बाहर
से नहीं आएंगे। दोनों क्षेत्र भीतर के ही संसाधन बरतेंगे। तो व्यवहार को मानक
बनाएं तो कहीं कोई दिक्कत नहीं है। पर नियंत्रण अपना होना चाहिए। अपना
नियंत्रण खत्म हुआ तो न स्वायत्तता रहेगी और न स्वावलंबन।
34
आम आदमी की ताकत
पहचानने से ही बनेगा स्वदेशी माडल
गांधीजी खुद स्वदेशी का एक कच्चा-सा मॉडल बना पाये थे। पश्चिमी
रंग में रंगे नेहरू के लिए तो इस कच्चे मॉडल को आगे बढ़ाने का सवाल ही नहीं
था। इसलिए कांग्रेस में नेहरू के शक्तिशाली होते ही गांधीजी का यह कच्चा
मॉडल भी धराशायी हो गया।
देश न स्वदेशी मॉडल पर दृढ़ रह सका और न विदेशी मॉडल अपना
सका। और उसके हाथ में भीख का कटोरा ही है। इसके पीछे क्या कोई और
कारण हैं? आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू और उन जैसे लोगों ने देश की
आम जनता को फिर से उसी आत्महीनता की ओर ठेल दिया, जिस ओर विदेशी
शासन उन्हें पहले ही ठेल चुका था। लोगों को बार-बार इस बात का अहसास
कराया गया कि आप तो 200 साल पिछड़े हो। दरिद्र हो। कमजोर हो। बेकार
हो। जो अच्छा है, और अच्छा हुआ है, वह तो पश्चिम में है। विदेशी शासन के
दौरान देश को बचाए रखने के लिए अपने लोगों की तारीफ करने का तो सवाल
ही नहीं रहा। नेहरू और उन जैसे लोग कभी इस बात के शुक्रगुजार नहीं रहे
कि इन्हीं भुखे और दरिद्र लोगों ने अपनी हड्डियों को निचोड़-निचोड़ कर इस
देश को बचाया है। इन्हीं की कुर्बानी के कारण गुलामी की जंजीरों के बीच भी
यह देश बचा रहा है।
इतना ही नहीं, आजादी की लड़ाई में उमड़े जनसमुदाय को भी यह
कह दिया गया कि जाइए, आपका काम पूरा हुआ। जाकर अपनी खेती-किसानी
करिए। देश हमारे ऊपर छोड़ दीजिए। देश हम संभाल लेंगे। इस बात की कोई
भावना नहीं रही कि आप सबने मिल कर बड़ा काम किया। कुछ विकृतियाँ आई
हैं। आइए, उन्हें हम और आप मिल कर दूर कर लें। लोगों को अहसास कराया
गया कि न्याय तो दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, लखनऊ, पटना, भोपाल से
ही हो सकता है। देश सेंट स्टीफेंस में पढ़े लोग ही चला सकते हैं। आम हिंदुस्तानी
में वह माद्दा कहाँ। वह तो ड्राइंग रूम में ठीक से फर्नीचर रखना भी नहीं जानता।
देश बनाने में उसकी चली तो वह तो देश को बरबाद करके ही रख देगा। 1920
तक तो इस देश के आम आदमी को हीन कहा ही जा रहा था। नेहरू ने लोगों में
35
वह हीनता फिर से भर दी। उनका यह सबसे बड़ा योगदान है कि उन्होंने लोगों
के मन में यह बिठा दिया कि तुम दरिद्र हो। बेकार हो। नतीजा? गाँव में पंचायत
भी बनेंगी तो उसे वह सुपरवाइजर चाहिए जो सब कुछ सरकारी जुबान में
बदल कर रख दे।
जब तक हम इस खोए हुए आत्मविश्वास को फिर से वापस नहीं लाते
तब तक न देश स्वदेशी चल सकता है और न विदेशी। चीजों को देखने का पूरा
नजरिया ही बदल गया है। आज बहुत से लोग यह कहने में संकोच नहीं करते
कि हिंदुस्तानी तो फेंकी हुई पालीथीन की थैली से भी नई थैली बना लेता है।
यह कहने वालों की भी कमी नहीं है कि इसमें लगे लोग अच्छी तरह कमाई भी
कर लेते हैं। पर वे यह नहीं देखते कि यह तो कंगाली का ही आलम है। ऐसा
काम कोई प्रेम से नहीं किया जा रहा है। ये भंगार (कूड़ा–करकट) बीनने–बटोरने
वाले कैसी जिंदगी जी रहे हैं, यह भी आंखों से ओझल कर दिया जाता है। हम
यह भूल जाते हैं कि इससे जो चीज साबित होती है, वह यह है कि हमारे लोगों
में जीवट अदम्य है। आम लोगों को हिकारत से देखने का नजरिया कलेक्टरों,
ऊँचे वर्गों और राजनीतिज्ञों में ही नहीं है, सेवाग्राम और पवनार जैसी ऊंची
जगहों में भी आए नवयुवकों को यही सिखाया जाता है कि गांव वालों से ज्यादा
संपर्क न करो। ये अच्छे लोग नहीं हैं। जरूरी नहीं कि यह मानसिकता अंग्रेजों
की ही दी हुई हो। यह मानसिकता हमारी वर्णव्यवस्था और मनुवाद से भी
निकली हुई हो सकती है। पर जब तक यह मानसिकता बरकरार है, तब तक
देश का आम आदमी खड़ा नहीं हो सकता। और जब तक वह नहीं खड़ा होता,
तब तक न तो स्वदेशी चल सकता है न विदेशी।
अपने को हीन देखने और अपनेपन को छोड़ने की यह बुराई क्रमशः
विकसित हुई है। दरअसल, यह 500–600 साल पुरानी ही है। कमजोरी पहले
भी रही होगी। पर जब तक अपने तरीके से काम चलता रहा, आक्रमणकारी
आते रहे और इसी व्यवस्था में जातियों आदि के खाने में खपते रहे, मूल्यों पर
कोई बड़ा आक्रमण नहीं हुआ, तब तक शिथिलता सामने नहीं आई। मुसलमानों
का प्रभावी राज्य तो 1700 के आसपास ही खत्म हो गया। इसके बाद तो
राजे–रजवाड़े जगह–जगह खड़े हो गए। देश को पुनर्जीवित करने की कोशिशें
भी हुईं। इस प्रकार की कोशिशें विजयनगर साम्राज्य ने की। मराठों ने भी की।
चैतन्य जैसे लोगों ने किया। पर समय नहीं मिला। 1748 में तो यूरोप का बड़ा
हमला ही देश पर हो गया। इस बीच 100 साल भी मिल गया होता तो भारत
पश्चिम को उसी तरह समझ लेता जैसे जापान ने समझा। लोग बिलकुल ही सो
36
नहीं रहे थे। 1754–55 में बंगाल के नवाब अलीवर्दी खां कहते हैं कि ये यूरोपियन
कहते तो यह हैं कि वे लड़ आपस में रहे हैं। पर कब्जा हमारी जमीन पर करते
जा रहे हैं। और अंग्रेज तो इनमें सबसे खतरनाक हैं। तो हमारे लोगों में समझनेवालों
की कमी नहीं थी पर उन्हें कुछ करने का वक्त नहीं मिल पाया।
अंग्रेजों ने राज्य मुसलमानों से नहीं छीना। राज उन्होंने इन हिंदू
राजे–रजवाड़ों से ही छीना। पर उन्हें मुसलमानों से राज छीना दिखा कर अपने
शासन के लिए वैधता कायम करनी थी। राजनीति में मुसलमान कोण घुसाना
था। इसलिए बार–बार दिल्ली से राज लेने की बात कही गई; 1756 से पहले
फारसी बंगाल की भाषा नहीं थी। कर वसूली में फारसी लिपि अंग्रेज लाए।
मुस्लिम प्रतीकों को दक्षिण में मुसलमान भी नहीं ले जा सके थे। अंग्रेजों ने इन
प्रतीकों को दक्षिण में भी कायम कर दिया। सर थामस रों जहांगीर के दरबार में
आता है। और जहांगीर उससे कहता है कि सूरत वगैरह से पश्चिम में व्यापार
के लिए जाने वाले हमारे जहाजों की आप रक्षा कीजिए। तो दिल्ली की बादशाहत
तो उसी दिन खत्म हो गई। ऐसा इसलिए किया गया कि जहांगीर का भारत से
लगाव नहीं था। तुम भी विदेशी और हम भी विदेशी। अकेले जहांगीर ही नहीं,
ऐसे लोग और भी रहे हो सकते हैं। हमें समय मिलता तो हम भी सुधर जाते।
1855 में जापान को समर्पण करने का अमेरिकी अल्टीमेटम मिलता है। समर्पण
करना पड़ता है। 10–15 साल वहां भी समाज में तूफान चलता है पर जापान
पश्चिम के तरीके से सैन्यीकरण के रास्ते पर चलने का फैसला करता है। अपने
लोगों को सीखने के लिए बाहर भेजता है। थोड़े समय के लिए प्रशिक्षण देने को
बाहर के लोग बुलाए जाते हैं। और आज कई मामलों में वह अमेरिका से आगे
है। जापान की जीत पर गांधीजी बहुत खुश होते हैं। हिंसा–अहिंसा का सवाल
नहीं उठाते। उसांस भरकर यही कहते हैं कि पर हिंदुस्तान में ऐसा नहीं हो
सकता।
अंग्रेजों ने हमारी मानसिकता को पश्चिमीकरण की ओर सायास मोड़ा।
मानसिकता बदलने का काम उन्होंने 100–150 साल में किया। इसके लिए
आधार भी हमारी पोथियों में ही जुटाए गए। हर पुराने समाज में हर तरह के
विचार पड़े रहते हैं। जो हित के होते हैं, वे उभर कर रहते हैं। बाकी कोने में पड़े
रहते हैं। उन कोने में पड़े विचारों की पोथियां भी बनी हो सकती हैं। विदेशी
शासन अपनी वैधता ढूंढने के सिलसिले में उस समाज के भीतर से ही अपने हित
के मूल्य इस तरह से ढूंढता है कि वे विदेशी और थोपे हुए न लगें। इस कोशिश
में उन्होंने मनु को हमारे समाज के मानक के तौर पर उठा कर सामने रख दिया।
37
1750 के पहले मनुस्मृति हमारे लिए कोई बड़ी बात नहीं थी। 1784 में मनुस्मृति
का पहली बार अंग्रेजी अनुवाद हुआ। 10-12 और भी ग्रंथ छापे गए। 1812 में
सवाल उठा कि इस काम को आगे जारी रखना है क्या ? तो लंदन से हुक्म आया
कि इसे ज्यादा करने की जरूरत नहीं है पर मनुस्मृति को रीप्रिंट किया जा
सकता है। भारतीय समाज की परिभाषा के लिए मनुस्मृति उनके माकूल बैठती
थी। जबकि अपना ढांचा दूसरा था। भारतीय समाज की वर्णव्यवस्था मनुस्मृति
की वर्णव्यवस्था नहीं थी। पर अंग्रेजों ने 18 वीं सदी के अपने समाज की
अवधारणाओं को हमारे समाज पर लाद दिया। हमारे गांवों में आमदनी की
विषमता एक और तीन के अनुपात से अधिक नहीं थी। अंग्रेजों ने जो समाज
बनाया उसमें 1840-50 के बाद कारीगरों आदि के रहने की गुंजाइश गांवों में
बची ही नहीं। उनके अधिकारों में कटौती कर दी गई। आमदनी में एक और दस
का फर्क हो गया। जमीनें छीन ली गई। लोगों को दास बनाने की कोशिश हुई
तो वे गांवों से भागे। अब हमारे सर्वोदयी रोते हैं कि गांवों से तेल की घानी गायब
हो गई। जुलाहे गायब हो गए। चमड़े का काम करने वाले गायब हो गए। तो
100 साल से जब हमारी मानसिकता लोगों को गुलाम बनाने वाली हो गई और
उसमें मनुस्मृति भिड़ा दी गई तो कारीगर गायब क्यों नहीं होंगे ? स्वदेशी मॉडल
तो तभी बन सकता है जब आर्थिक और सामाजिक बराबरी बने। इसके बगैर
इस बात की कल्पना करना बेमानी है।
38
पश्चिमीकरण को मानने वाले आज
भी दो फीसदी
स्वदेशी और पश्चिम की पूरी अवधारणा को समझने के लिए 18 वीं
सदी के अंग्रेजी समाज को समझना जरूरी है। पश्चिम का विकास का मॉडल
केंद्रीकृत रहा है। अधिकार और धन के केंद्रीयकरण का। जिनके पास इनका
केंद्रीयकरण रहा, उन्हीं के पास ज्ञान और व्यापार का भी केंद्रीकरण हुआ।
उनके सामंती समाज के उन्हीं 10-12 प्रतिशत बड़े लोगों की वहां के व्यापार में
भी हिस्सेदारी रही। दुनिया भर से दौलत निचोड़ कर आई तो 1750 के आसपास
यहां व्यापारी वर्ग का विस्तार हुआ। पर हुकूमत सामंतशाही के हाथ में ही रही।
1830 तक तो इंग्लैंड में दसियों चुनाव क्षेत्र ऐसे थे जिनमें मतदाता 10-12 से
ज्यादा नहीं थे। 5000 से ज्यादा मतदाता तो किसी भी क्षेत्र में नहीं थे। चुनाव
स्थानीय लार्ड्स की जेब में ही रहते। कुल मिलाकर पूरी राजनीति, समाज और
व्यापार उन अभिजात्य परिवारों के ही हाथ में था, जो 5-500 साल से स्थापित
थे। अपने यहां 30-40 साल के सर्वोदय के काम पर हरिवल्लभ पारीख जिस
तरह कई चुनाव क्षेत्रों में अपने लोगों को जिताकर लाते थे, इसी तरह से अंग्रेजों
के ये सामंती परिवार करते थे। तो इसी तरह जब ज्ञान का भी केंद्रीकरण हो
जाता है तो उसमें से लाइब्रेरी बनती होगी, रिफरेंस कार्ड बनता होगा। ज्ञान का
और इजाफा होता होगा। एक व्यवस्था बनती है। और उसमें से प्रयोगशालाएं
निकलती हैं।
इसी मानस ने मनु को हमारे समाज पर थोपा। पश्चिमीकरण की
अवधारणा सिलसिलेवार उतारी गई। शुरू में हजार में एक ने माना होगा।
विद्वता और सत्ता से जुड़े समाज ने इसे अंगीकार करना शुरू किया। शुरू में
सोचा होगा मानसिकता ले लें, जीवन पद्धति छोड़ दें। पर जीवनपद्धति के साथ
मानसिकता तो अपने-आप उतरने लगती है। इसलिए यह ताज्जुब की बात
नहीं कि हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा आज जीन्स और स्कर्ट पर जीने लगा
है। इस प्रक्रिया में तो अभेद्य किले भी टूट जाते हैं। मारवाड़ियों को, जैनियों को,
दक्षिण के ब्राह्मणों के वे तबके जिनके बारे में माना जाता था कि वे नहीं टूटेंगे,
उनकी भी जीवनपद्धति बदली है।
39
पर आज भी पश्चिमीकरण को मानने वालों की संख्या हमारे समाज में
दो फीसदी से ज्यादा नहीं है। ऊपरी तबके के कुछ लोगों के अलावा ये सरकारी
और गैरसरकारी संगठित क्षेत्र में केंद्रीकृत व्यवस्था में जी रहे जो तीन करोड़
लोग हैं, उनकी तनख्वाह दूसरों से तिगुनी है, पश्चिमीकरण का व्यामोह उनमें ही
है। उनमें निचले स्तर पर तो देखादेखी का ही मामला है। फिर विदेशों में गए
हमारे कुछ व्यावसायिक क्षेत्रों से जुड़े लोग हैं। और उनके यहाँ के नाते-रिश्तेदार
हैं, जो उनकी उपलब्धियां बखानते जी रहे हैं। हमारे यहां विदेश रिटर्न होना भी
उपलब्धि माना जाता है न इसलिए ! गांधीवादी आश्रमों में भी विदेश आते-जाते
हिंदुस्तानी को सफल हिंदुस्तानी कहा जाता है न ! बीच में 1954 में यह होने
लगा था कि विनोबा के बारे में पश्चिम क्या सोचता है ? इस विसंगति पर पूछने
पर अंदरखाने बताया जाता था कि पश्चिम में आदर मिल जाता है तो इसलिये
यहां दिल्ली में भी सुनवाई होने लगती है। अपनी बात के समर्थन में किसी
पश्चिम के व्यक्ति की बात न आए तो फिर क्या। आजकल तो भाजपा वालों के
भी भाषण विदेशियों के दो दर्जन उद्धरणों के बगैर पूरे नहीं होते। लेकिन इन
सबमें से कुल मिलाकर पश्चिमीकरण के असली हिमायतियों की संख्या दो
फीसदी के भीतर ही है।
पर पश्चिमी मॉडल हमारी व्यवस्था में बैठ गया है। यह व्यवस्था तो
ऊपर के स्तर पर अफसरों से बात करने के लिए बनी थी। पर वही चली आ रही
है। कांग्रेस ने ही नहीं, समाजवादियों, भाजपा आदि सबने वही मॉडल लिया।
वकीलों, डॉक्टरों आदि की भी संस्थाएं उसी मॉडल पर बनीं। 70-80 साल में
जिन लोगों ने मॉडल बनाया वे हिंदुस्तानी मॉडल को समझ ही नहीं सके। बनाने
वाले लोग थे तो वही विद्वान लोग। सेंट स्टीफेंस वाले। पर इनका नाता अपने
समाज से टूट गया था। हमारे यहाँ यह जो अति पर न जाने की बात है, चीजों
को जो नाशवान देखा जाता है, जो संयम बरतने की बात है, वह तुलसीदास का
बरसात की रात में ससुराल पहुंच जाना जो उनकी पत्नी को भी नहीं भाया न,
उसे देखते हुए यह परखने की कोशिश ही नहीं हुई कि इस व्यवस्था में भी
शक्ति और सत्य का शिखर बनाया जा सकता है ? कोशिश होती तो शायद
कोई संभावना उसके भीतर से भी निकलती। पर बात तो ऐसी बैठी है कि अब
सहकारी संस्थाओं का जो साल फसलों से जुड़ा था, 30 जून को पूरा होता था,
वह भी अब 31 मार्च को पूरा होने लगा है। तमिलनाडु सरकार लोगों को पानी
पीने के लिए जो मटके बांटती है, वे भी प्लास्टिक के ही होते हैं। देहातों तक में
आज 90 फीसदी माल हिंदुस्तानी नहीं रहा है।
40
यह स्वदेशी वाले अब रोते हैं कि गाँव उजड़ गए। दस्तकार उजड़
गए। 30-40 साल पहले कोई बहुत बड़ी गलती हो गई। लेकिन सबसे बड़ी
गलती जो हुई कि गांधी जी को उनके ही लोगों ने जकड़ लिया। गांधी को बहते
व्यक्ति के बदले एक बंद व्यक्ति में तब्दील कर दिया गया। गांधी समय के
हिसाब से चीजों को ढालते हैं, यह भुला दिया गया।
लड़ाई के दौरान कांग्रेस का ढाँचा ब्रिटिश साम्राज्य के ढांचे पर बना।
जिससे लड़ना था, उससे लड़ने के लिए समानता ढूंढ़ी गई। पश्चिमी तरीके के
लोग उसमें रखे गए। माना गया होगा कि समय इन्हें बदल देगा। जो गांधी खादी
को आंदोलन का प्रतीक बनाते हैं, वे ही 1944 में खादी के सम्मेलन में कहते हैं
कि मैं तो कृषि को प्रतीक चाहता था पर दिक्कत देखते हुए खादी को प्रतीक
बनाया। खादी जो बनाए, वही पहनें। बाकी न पहनें। फिर कहते हैं कि गांव में
एक ऐसा आदमी होना चाहिए जिसके पूछे वग़ैर बाहरी व्यक्ति वहां हस्तक्षेप न
कर सके। फिर नई तालीम में 1946 में वे हिंदुस्तान की व्यवस्था के लिए
ओसियानिक सर्कल्स (Oceanic Circles) की बात करते हैं जिसमें सबसे
महत्वपूर्ण समूह इलाका होगा। फिर 1947 में वे काँग्रेस को खत्म करने की बात
करते हैं। इसलिए नहीं कि उसमें बहुत दोष आ गया था। दोष तो 1924 की
बेलगांव काँग्रेस के जमाने में भी था। काँग्रेस को खत्म करने की बात वे इसलिए
करते हैं कि जिस काम के लिए उसका ढांचा बना था, वह काम पूरा हुआ। अब
आजादी के बाद के काम के लिए दूसरे ढाँचे की जरूरत है। उनके करीबी लोगों
ने लोकसेवक संघ आदि बनाकर यह काम करने की कोशिश भी की। गांधी
1946 में जब नोआखाली जाते हैं तो निर्मल बोस उनके साथ रहते हैं। तब गांधी
जी का रोज का कहा या तो रिकार्ड किया जाता है या फिर गांधी जी उसे खुद
लिखते हैं। उस समय के कहे को देखें तो जैसा दुखी उस समय उन्हें हम लोग
मानते हैं, वैसे दुखी वे दिखते नहीं। हिंदू-मुसलमान की कोई बात नहीं। वे तो
इस बात की चर्चा में लगे हैं कि आने वाले भारत को किस तरह का बनाया जाना
चाहिए। फिर 47 में विदेशियों से मिलते हैं। वहां भी यही पुनर्रचना की बात। वे
जो पाकिस्तान जाने की बात करते हैं वह भी वही पुनर्रचना की ही बात है। कोई
मरे हुए लोगों को जिंदा करने नहीं जा रहे हैं वे। जरूरी नहीं कि उससे कुछ
निकलता। पर क्रिया थी। लेकिन उनकी उन्हीं हिंदू-मुसलमान की बातों को
उभार दिया गया और उनकी पुनर्रचना की बात पीछे छोड़ दी गई। इन सबको
समझने की कोशिश होती तो गांधीवादियों की समझ में भी यह आ सकता था
कि पिछले 20-25 सालों में गांधी ने एक कच्चा मॉडल ही बनाया था। और
41
स्व भा -6
इसके कच्चेपन को वे बखूबी जानते थे। पर गांधी को तो 'सीज' कर दिया गया।
यह भी भुला दिया गया कि हिंदुस्तानी समाज जमा हुआ समाज नहीं है। उसकी
गति अलग किस्म की है पर गति है। लेकिन चूंकि गति की परिभाषा बदल गई,
आधुनिकीकरण ही उसका पैमाना हो गया, इसलिए अपने समाज के ऐडवेंचर्स,
उसके खूंटे, उसका बहाव नहीं दिखाई पड़ा। तो इसमें तो फिर दरिद्रता ही
दिखाई देती है।
गांधीजी खुद जानते थे कि जो ढांचा लड़ाई के दौरान वे बना रहे हैं
वह कच्चा है। और इसे बदलना है। लोगों ने जब कहा कि अंत्यज शब्द खराब
है इसे बदल देना चाहिए। तो गांधी जी ने कहा कि पहले तो ठीक ही रहा होगा।
फिर लोगों के सुझाव पर हरिजन शब्द लाते हैं। इसलिए नहीं कि यह शब्द
हजारों साल चलने वाला है। इस शब्द से उन्हें कोई विशेष लगाव नहीं है। वे तो
समय के हिसाब से व्यवस्थाएं बना रहे हैं। और हरिजन शब्द समय के मुताबिक
सही लगता है, तो मान लेते हैं।
42
भारतीय मॉडल सपत्ति जाडने
का नहीं बंटवारे का है
विकास के स्वदेशी और पश्चिमी मॉडल के बीच का असली फर्क
क्या है? यह फर्क केंद्रीकृत और विकेंद्रीकृत मॉडल का है। फर्क संपन्नता का
नहीं है। केदारनाथ मंदिर की संपत्ति के कागजात लंदन में पड़े हैं। नेपाल के
राजा ने कुछ जमीन मंदिर के नाम की थी। मंदिर का मुख्य खर्च यात्रियों को
खाना खिलाना था। संपत्ति पत्र में इस बात का भी निर्देश है कि हर यात्री को
खाने का खर्च कितना देना है। वहाँ आय जोड़ने का प्रावधान नहीं है। कुछ बच
जाए तो फिर उसे 12 साल में जो कुंभ होता, उसमें खर्च ही कर देना है।
सम्राट हर्ष वर्धन का मामला भी सामने ही है। हर साल की आय वे
खर्च कर देते हैं। और स्थिति यह रहती है कि यमुना में नहाकर बाहर निकलने
पर बहन राजश्री की ओर से भेंट में दिया वस्त्र ही उनकी कुल पूंजी होता है।
भारतीय मॉडल इन सबसे निकलता है या ये सब उस मॉडल के प्रतीक हैं।
भारतीय मॉडल संपत्ति जोड़ने का नहीं है, उसके बंटवारे का है।
मुगल बादशाहों के खर्चे के हिसाब देखने के लिए पड़े हैं। बादशाह का
खर्च उसके निजी खर्च, कुछ बनवा रहे हों तो उसके खर्च और लोगों को खाना
खिलाने के खर्च तक का ही था। औरंगजेब ने राज्य के आय-व्यय के हिसाब में
लिखा है कि अकबर कुछ धन छोड़ गए थे। जहांगीर आए तो आय 60 लाख
रुपये हुई। खर्च डेढ़ करोड़ रुपये का रहा। अकबर के बचाए धन में से खर्च
होता रहा। शाहजहां ने खर्च थोड़ा घटाया और आय डेढ़ करोड़ पर पहुंची।
अब पहली नजर में लगता है कि औरंगजेब यह क्या लिख रहे हैं? बादशाहत
की आय तो 10-12 करोड़ रुपए की थी। पर गौर से देखें तो औरंगजेब हकीकत
बखान रहे हैं। बादशाहत की आय में से नीचे के स्तरों पर क्रमिक तौर पर खर्च
चलता था। ऊपर बादशाह के पास 6 से 15 फीसदी के बीच ही कोई रकम
पहुंचती थी। औरंगजेब ने इसे 15 फीसदी पर पहुंचाया होगा। उनके अलोकप्रिय
होने का एक बड़ा कारण यह भी है। यह ऊपर से नीचे पहुँचाना भारतीय
अवधारणा नहीं है। यह ऊपर से नीचे पहुँचाना पश्चिमी मॉडल है। अब राजाओं
के पास कुछ सुरक्षा तामझाम को छोड़ दें तो कोई स्थायी सेना नहीं होती थी।
43
जो राजा जितना लोकप्रिय हुआ, जरूरत पड़ने पर आम जनता के बीच से
लड़ने के लिए उतने लोग खड़े हो जाते थे। वही सेना बन जाती थी। स्थायी
सेना तो यूरोप में भी 1700 के आसपास ही खड़ी होती है।
भारतीय समाज की मूल इकाई 'कुल' हैं। कुल रक्त संबंधों या फिर
कर्मकांड के प्रतीकों से जुड़े थे। दूसरी मूल इकाई इलाका रही होगी। 1891 की
जनगणना में अंग्रेज बड़े पैमाने पर जातिगत वर्गीकरण करते हैं। प्रारम्भ में
50,000 जातियों की गिनती है। जाटों में 11,000 जातियों की और राजपूतों में
8500 की। लगता है कुलों की गणना जाति के बतौर की गई है। शुरू में दो लाख
के आसपास कुल रहे होंगे जो बाद में 5-7 लाख तक पहुंचे होंगे। पर यह कुल
सात पीढ़ी तक ही स्थिर रहता है। श्राद्ध में तो तीन पीढ़ियों तक ही नाम स्मरण
चलता है। फिर बाकी के लिए अनाम श्रद्धांजलि दे दी जाती है। अब रघु के कुल
की बात चलती है। लेकिन वह बड़ी इकाई है। आपसी पहचान के लिए बीच में
से किसी दादा-परदादा का नाम निकलेगा। तो इस इलाके और कुल के योग से
स्थानीय राजनीतिक इकाई बनती होगी। वही बढ़ कर राज्य बनता होगा।
राज्य भारत बनता होगा। और उसमें से चक्रवर्ती निकलता रहा होगा। अगर
रघु दिग्विजय के लिए निकलते हैं तो कोई विशेष लड़ाई नहीं हुई होगी। जैसे
तूफान के आगे पौधे झुक जाते हैं, फिर खड़े हो जाते हैं, वैसे ही होता होगा।
दिग्विजयी कोई अपने गवर्नर-कलेक्टर तय नहीं करता। केवल आधिपत्य जम
जाने और साल में कुछ भेंट वगैरह आने की बात थी। इस भारतीय मॉडल में
किसी को मिटाने की बात नहीं है। उसे चूस कर कोष भरने की भी बात नहीं है।
कुल और इलाका जुड़े हैं। एक गांव में एक ही कुल के लोग हो सकते हैं। और
कई कुलों के लोग भी। बसावट अक्सर स्वपूरक समूह के रूप में होती थी।
कभी-कभी किसी इलाके में जो प्रभावी कुल रहा, दूसरे भी उसी कुल के कहलाने
लगे। अब जाटों की जहाँ मजबूत खापें हैं, वहाँ गैर जाट भी उसी खाप के मान
लिए जाते हैं। 1891 की जनगणना में अग्रवाल नाम बीसों जातियों में मिलता है।
जातियां बंधी नहीं थीं। बढ़ई का लड़का 20 पीढ़ी बढ़ई ही नहीं रहता
होगा। ब्राह्मण के लिए भी तो मुख्य काम न कर सके तो 20 और काम गिनाए गए
हैं। ऐसे ही काम दूसरी जातियों के लिए भी बताए गए हैं। अंतरजातीय बहाव
कम नहीं रहा होगा। गांधीजी ही जब हरिजन शब्द निकालने लगे तो हरिजनों में
से बहुतों ने कहा कि हम जब बाहर जाते हैं और टीका वगैरह लगाते हैं तो हमें
कोई दिक्कत नहीं होती। गांधी जी ने कहा कि यह भी एक रास्ता है। यह नहीं
कहा कि यह तो धोखा देना हुआ। यह जो चांडाल के अपने को चांडाल कहते
44
चलने के किस्से हैं, वे सही नहीं होंगे। ऐसा कहने की जरूरत नहीं थी। इलाके
में हर आदमी जानता है कि कौन क्या है। कोई 500 मील दूर जाकर बसे तो
अपने पिछले को बताना उसके लिए जरूरी नहीं है।
तो जो नया राजनीतिक-सामाजिक उभार आया है, लोगों में
आत्मविश्वास झलका है, वह - या यह मंदिरों के इर्द-गिर्द युवा लोगों
की त्योहारों पर जो भीड़ बढ़ रही है वह - क्या यह वर्ग देश के अपनेपन
की ओर ले जाएगा? मुझे लगता है कि इसमें अपनेपन की और वापसी का
कोई रास्ता बन रहा है। इस समूह की दिशा को जांचा जाना चाहिए। इसे युवा
वर्ग को यदि लगता है कि हमारे बाप-दादा जो कर रहे थे, वह आज के लिए
ठीक नहीं है और इसे यह जो कुछ नया हो रहा है, वह करना चाहिए, तो वह
उसी ओर आगे बढ़ेगा। उदाहरण के लिए यह मद्रास का पीपीएसटी समूह
देखें। एक अमेरिकन महिला उन्हें देखने के बाद लिखती है कि लेकिन ये लोग
क्या कर सकते हैं, ये तो ब्राह्मण हैं। इनकी सुनेगा कौन ? जिस बात को वह
महिला समझी, उसे हम लोग नहीं समझे। तो हम जैसे द्विज मानसिकता के कुछ
लोगों की प्राथमिकता स्वदेशी हो सकती है। पर यदि नए उभरते हुए लोग
अमेरिकी तर्ज पर चलना चाहें तो उनकी बात चलनी चाहिए। और यह जो
बढ़ती धार्मिकता की बात है तो यूरोप में भी विज्ञान के साथ जन्मकुंडली चल
रही है। ये युवा ऐडवेंचर के तौर पर मंदिरों में जाते हों तो उससे स्वदेशी ही नहीं,
दूसरी चीजें भी निकल सकती हैं। नवरात्रि जागरण और फैक्स मशीन बनाने के
गणित में वे शायद मेल बिठा ले रहे होंगे। अभी यह दोनों तरह का दिमाग चल
सकता है। पर समस्या अंत में 100-50 साल बाद आ सकती है। यह
आत्मविश्वास पश्चिमीकरण की गति को तेज भी कर सकता है। अब ये पंजाब
के कारीगर जो छोटी मशीनें जोड़ लेते हैं, वे सिखाने पर हवाई जहाज भी जोड़
सकते हैं। उनकी ओर से नई खोजें भी सामने आ सकती हैं।
यह फैसले का वक्त है। मॉडल पर जनमत संग्रह हो जाना चाहिए।
अगर ज्यादातर लोगों को लगता है कि प्लास्टिक युग में ही जाने में भलाई है,
पिछले पर लौटने में फजीहत है, बाहरी ताकतें पिछले पर साबुत नहीं लौटने
देंगी तो दूसरों को समाज को इस दिशा में जाने में रोड़ा नहीं बनना चाहिए।
ताकि यह काम 10-20 साल में ही पूरा हो जाय। बल्कि कोशिश इस दिशा में
जाने की गति बढ़ाने की होनी चाहिये। वैसे भी समाज उस दिशा में चलना
चाहेगा तो न उसे सर्वोदयी रोक पाएंगे और न समाजवादी। और न संघी।
समाज आगे बढ़कर उसमें से भी रास्ता निकाल लेगा। अब पश्चिम में भी कोई
45
मॉडल बनाकर विकास थोड़े ही हुआ था। शुरूआत तो मूल से हुई। भौतिकी
आदि के वैज्ञानिक तो उसमें से बाद में निकले। ढांचा टूटा। जाम तो वह बाद में
हुआ। और यही हमें मिला। ढांचा टूटता है तो बड़ी मार-काट होती है। हमारे
लोग पीपीएसटी जैसे समूह को उठाकर फेंक देंगे। जाम मॉडल भी तोड़ देंगे।
इन सबके बीच में यह गाब-दाब भी चलता रहेगा।
आज कांशीराम और मायावती गांधी जी के खिलाफ बोलते हैं, फिर
उनके विरोध में हम लोग बोलने लगते हैं। हमारा यह विरोध इसलिए है कि
कांशीराम और मायावती हम लोगों से ऊंची बात कर रहे हैं। वे पूरे भारतीय
समाज को गाली दें तो हम लोगों को और भी अच्छा लगेगा। यूरोप के लोग जब
हमें गाली देते हैं तो वह हम लोगों को आखिर अच्छा ही लगता है न। यह वक्त
इस हीनता से निजात पाने का है। फैसले का वक्त है।
46
विकास का सवाल
(1)
तिरुपति में हाल ही में सम्पन्न भारतीय विज्ञान काँग्रेस में अनेक विशिष्ट
वैज्ञानिकों ने भारत-सरकार के, प्रौद्योगिकी नीति संबंधी ताजे वक्तव्य पर बहुत
बेचैनी प्रदर्शित की। उनमें से एक के अनुसार "हमारे यहाँ पुराने विज्ञान की ही
पढ़ाई की जाती है (स्नातक उपाधिधारियों के लिये), कई मामलों में 40 बरस
पुराने प्रयोग ही पढ़ाये जाते रहते हैं।" एक अन्य वैज्ञानिक का कहना था कि
पिछले 33 बरस में उसने वैज्ञानिक नीति पर अनेक वक्तव्य पढ़े-देखे हैं, किंतु
उनमें से एक पर भी अमल होते नहीं देखा। उनका कहना था कि "मेरी रूचि
और मेरा लगाव अपने देश के लोगों के लिये विज्ञान की प्रगति में है। पर यहाँ
फाईलें (आधिकारिक) और माध्यम हमें वहाँ ले जाते हैं जहाँ और अधिक फाईलों
के सिवाय कुछ नहीं।" एक अन्य वैज्ञानिक के अनुसार "आधिकारिक पदों पर
बैठे ज्यादातर लोगों का किसी भी ताजे शोध के प्रति रवैया यह होता है कि
"क्या और कहीं ऐसा हुआ है ? "नई सूझों, नये विचारों को कोई प्रोत्साहन नहीं
दिया जाता। यदि पश्चिम में वैसा हुआ है तो वे उसका समर्थन करेंगे। अन्यथा
नहीं। भारतीय विज्ञान समाचार एसोसिएशन के अध्यक्ष ने कहा कि नई नीति
"इच्छाजनित विश्वास" का वक्तव्य मात्र है। (देखें इंडियन एक्सप्रेस, मद्रास के
10 जनवरी, 1983 के अंक में छपी रिपोर्ट)
डॉ. नायदम्मा (जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय के पूर्व उप कुलपति)
के अनुसार "पश्चिमी ढांचे पर आधारित मौजूदा शिक्षा पद्धति ने न तो सही
किस्म की मानवीय शक्ति उत्पन्न की, और न ही जनता की शिक्षा के स्तर को
उन्नत बनाया। पारंपरिक तकनीकी और स्थानीय मेधा की अवहेलना से अपने
लोगों का आत्मविश्वास घटा है और स्थानीय प्रौद्योगिकी द्वारा बुनियादी स्तर
पर समस्याओं के समाधान की क्षमता पर भी असर पड़ा है"। (देखें हिंदू, मद्रास
10 जनवरी, 1983)
इसी अवधि में अन्यत्र सम्पन्न एक सभा में एक विशिष्ट और राजनैतिक
तथा प्रशासनिक सत्ता के बहुत करीब रहे व्यक्ति ने यह अभिमत व्यक्त किया
कि मौजूदा न्यायिक पद्धति "नागरिकों के हित संरक्षण की दृष्टि से बहुत
47
संवेदनाहीन, बेहद धीमी, और बेहद खर्चीली है”। बेंगलोर में राजाजी जयन्ती पर
व्याख्यान देते हुए जम्मू कश्मीर के राज्यपाल बी. के. नेहरू ने इसी सिलसिले में
आगे कहा कि भारतीय संविधान को अपूर्ण कहने का कोई उपयोग नहीं है।
उन्होंने सुझाव दिया कि हमें अब ऐसी संस्थायें बनानी होंगी, जो अपने समाज में
अंतर्निहित प्रवृत्तियों के अनुरूप हों। साधारण नेतृत्व इन्हें नहीं समझ सकता।
जिस बड़े नये परिवर्तन का उन्होंने सुझाव दिया, वह था "परोक्ष निर्वाचन की
पद्धति के साथ-साथ विधायिकाओं के चुनावों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की
व्यवस्था। सीधे चुनाव सिर्फ पंचायतों या नोटीफाईड एरिया कमेटियों या नगर
पालिकाओं अथवा नगर निगमों के लिये हो। इससे अगली कड़ी इस पद्धति में
होंगी जिल्हा परिषदें जो कि विधानमंडलों को चुनेंगी। राज्य विधान मंडल द्वारा
केंद्रीय विधायका की लोकसभा का निर्वाचन किया जायेगा।” (देखें हिंदु, मद्रास,
जनवरी, 1983)
कुछ ही समय पहले भारत एशियाड 1982 की मेजबानी कर चुका है।
यह सच है कि उसकी तैयारी तीन-चार साल चली और इस संदर्भ में अस्सी
करोड़ से बारह सौ करोड़ रुपयों तक खर्च होने की कथाएँ कही गई हैं। यह
रकम दिल्ली महानगर को एशियाड 82 के लिए तैयार करने में खर्च हुई। उसके
बाद, जैसा कि स्पष्ट हुआ, इस तैयारी का भारतीय खेल क्षमता पर कोई प्रभाव
नहीं पड़ा दिखता। खेलों में उँचा स्थान भारत को नहीं पूर्वी एशिया के चीनी
गणतंत्र और दोनों कोरिया जैसे देशों को मिला। जापान का अग्रणी रहना तो
अप्रत्याशित नहीं था। खेलों में तो भारत बेहतर भूमिका नहीं निभा पाया पर तो
भी हिसाब लगाने में दक्ष लोग हिसाब लगाकर बता रहे हैं कि एशियाड की
मेजबानी से हमें क्या-क्या लाभ हुए। सामान्यतः यह दावा किया गया है कि इस
एशियाड की तैयारी में हमने अपनी उस तकनीकी दक्षता का अनुभव बढ़ाया जो
कि विकसित देश ही रखते हैं। यातायात नियंत्रण को अबाध बनाये रखने और
एशियाई खेलों के दौरान कानून और व्यवस्था के विधाताओं द्वारा साधारण
भारतीय पदयात्री के साथ सहानुभूति व्यक्त करने में भी हम विकसित देशों
द्वारा ऐसे अवसरों पर किये जाने वाले व्यवहार से पीछे नहीं रहे। अंतरराष्ट्रीय
व्यापार में तथा विश्व मामलों की हमारी सरकारी समझ में प्रगति के भी लाभ
गिनाये जाते हैं। इन खेलों का विशेषतः जिमनास्टिक और कसरती संस्कृति
वाले खेलों का भारत के सामान्य बच्चों की खेल-चेतना पर क्या प्रभाव पड़ा यह
जानकारी महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है।
एशियाड 82 की मेजबानी जैसी अनेक घटनाएं विभिन्न क्षेत्रों में भारत
48
की उपलब्धियों के तौर पर गिनाई जा सकती हैं। और इनमें से अधिकतर, मार्च
1950 में प्रथम योजना आयोग के गठन के जरिए प्रारंभ योजना एवं विकास की
प्रक्रिया का परिणाम बताई जा सकती हैं। बहरहाल पिछले दो दशकों से भारत
में इस नियोजित विकास के प्रति विक्षोभ जगा है। हाल ही में यह विक्षोभ तीव्रतर
हुआ है। यह विक्षोभ सिर्फ हमारी आवश्यकता को देखते हुए अत्यधिक पर्याप्त
विकास के कारण ही नहीं है बल्कि इससे भी ज्यादा इस बात को लेकर है कि
क्या सिर्फ इन्हीं परिणामों के लिए भारत में 1920, 1930 तथा 1940 के दशकों
में स्वाधीनता-आंदोलन छेड़ा था।
इसी संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि संविधान सभा में नवम्बर
1948 में इस प्रश्न पर गरम झड़प हो गई थी कि संविधान में भारतीय गाँवों का
स्थान क्या हो ? संविधान का मसविदा वकीलों की एक समिति ने तैयार किया
था। इनमें से सिर्फ एक ने ही समिति के वास्तविक विचार-विमर्श में जमकर
भाग लिया। इस मसविदे से संविधान सभा के बहुत कम सदस्यों को संतोष
हुआ। सदस्यों का सामान्य अभिमत यह था कि यह मसविदा भारतीय चिंतन
एवं विचार का विरोधी है। सदस्यों ने आश्चर्य से पूछा कि यह किसके कल्याण
के लिये है ? श्री टी. प्रकाशम् ने पूछा- "यह मुट्ठीभर लोगों के हित-साधन के
लिये है या इसमें उन करोड़ों लोगों के भी हित का कहीं विचार है, जो राजस्व
और कर देते हैं?” कुछ अन्य लोगों का मत था - "गांधीजी का और काँग्रेस का
दृष्टिकोण यह रहा है कि भारत का भावी संविधान पिरामिड - जैसी संरचना
वाला होगा और ग्राम पंचायत उसकी बुनियाद होगी।" इस स्तर पर संविधान
सभा के सदस्यों और मसविदा समिति के बीच मध्यस्थता-सी कर रहे श्री के.
संथानम् तक का यह मत था कि ग्राम पंचायतों के अस्तित्व को संविधान में
मान्यता देनी होगी, क्योंकि "आगे चलकर हर गाँव की स्थानीय स्वायत्तता से ही
इस देश की भावी स्वाधीनता का आधारभूत ढाँचा निर्मित होगा।" बहरहाल,
अनेक कारणवश यह संविधान बदला नहीं गया। जिनमें से एक कारण यह कहा
जाता है कि बुनियादी मसौदे को बदलने की दृष्टि से बहुत विलम्ब हो चुका था।
लेकिन शायद बड़ा कारण यह था कि इस परिवर्तन के प्रति डॉ. भीमराव
अम्बेडकर जैसे लोग और संभवतः पंडित नेहरू तथा सरदार पटेल भी (दोनों ही
इस पूरी बहस में मौन रहे थे) अनुत्साही, अनादर-युक्त तथा आक्रामक दिख
रहे थे। किया सिर्फ इतना गया कि संविधान सभा के विक्षुब्ध सदस्यों को शांत
करने हेतु संविधान में एक अतिरिक्त अनुच्छेद जोड़ा गया (वर्तमान में अनुच्छेद
40)। इसमें राज्य से कहा गया था कि "ग्राम पंचायतों को संगठित करने के लिए
49
कदम उठाये जाएं और वे स्वायत्त-शासन की इकाइयों के रूप में काम करने में
सक्षम रहें, इस दृष्टि से उन्हें आवश्यक अधिकार और सत्ता सौंपी जाय।"
नियोजित विकास की उपलब्धियों के मूल्यांकन के लिए या कि विक्षोभ
की पद्धति को समझने के लिए भी, शायद यह जरूरी है कि भारत के हाल के
अतीत में कुछ झांका जाय। सन् 1929 तक भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की
घोषित प्रेरणा थी, तत्कालीन ब्रिटिश राजनैतिक पद्धति के अंतर्गत ही किसी
तरह की समानता की उपलब्धि। किंतु दिसम्बर 1929 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
ने ब्रिटिश राज्य से पूर्ण स्वतंत्रता की उपलब्धि का लक्ष्य निश्चित किया और
महात्मा गांधी द्वारा तैयार स्वातन्त्र्य-प्रतिज्ञा में कहा गया - "हमारा विश्वास है
कि हर एक समाज की तरह, भारतीय जन का भी यह अहस्तान्तरकरणीय
अधिकार है कि वह स्वाधीन रहे और अपने परिश्रम के फल का आनन्द ले तथा
जीवन की जरूरतों से इस प्रकार युक्त रहें कि उनके पास विकास के संपूर्ण
अवसर हों। हमारा यह भी विश्वास है कि यदि कोई सरकार लोगों को इन अधि
कारों से वंचित करती है और उनका उत्पीड़न करती है, तो लोगों को यह अधि
कार भी है कि वे उस सरकार को बदल दें या समाप्त कर दें। भारत में ब्रिटिश
सरकार ने न केवल भरतीय जनों को स्वाधीनता से वंचित किया, अपितु जन
समुदायों के शोषण की भी अपनी बुनियाद बनायी है तथा भारत का आर्थिक,
राजनैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विनाश किया है। इसीलिए हमारा
विश्वास है कि भारत को ब्रिटिश संबंध तोड़ देना चाहिए और पूर्ण स्वराज प्राप्त
करना चाहिए (गांधी वाङ्मय, अंग्रेजी, खंड 42 पृष्ठ 427) ।" यहाँ, स्मरणीय है
कि इस समय तक और आगे भी सन् 1934 तक जब तक कि गांधीजी काँग्रेस
की सदस्यता से मुक्त नहीं हो गये; सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज और प्रस्ताव गांधी
जी स्वयं तैयार करते थे।
अंग्रेजों ने भारत का आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक
विनाश किया है और पूर्ण स्वराज पाने पर ही भारतीय जन विकास के पूर्ण
अवसर पायेंगे, यह मुद्दा एक हद तक उस भारतीय संविधान द्वारा भी पुनः पुष्ट
किया गया जो कि भारत ने जनवरी 1950 से अपने पर लागू किया। उसमें
प्रतिज्ञा की गयी थी कि सभी नागरिकों के लिए सुनिश्चित होगा -
न्याय : सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक।
स्वाधीनता : विचारों, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और उपासना
की।
समता : स्थिति और अवसरों की तथा सभी के बीच बढ़ायी जायेगी
50
व्यक्ति की गरिमा और देश की एकता को आश्वस्त रखने वाली बन्धुता।
इन्हीं विचारों और प्रतिज्ञाओं के अनुकूल प्रथम योजना आयोग के
गठन संबंधी भारत सरकार के मार्च 1950 के प्रस्ताव में कहा गया था- "भारतीय
संविधान ने अपने देश के नागरिकों को कतिपय बुनियादी अधिकारों की गारंटी
दी है तथा राज्य के कुछ नीति-निर्देशक सिद्धांत प्रतिपादित किये हैं। विशेषकर
यह कि सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय वाली सामाजिक व्यवस्था
की प्राप्ति और सुरक्षा के जरिए लोगों के कल्याण के प्रोत्साहन हेतु राज्य
प्रयासरत रहे एवं राष्ट्रीय जीवन की समस्त संस्थाओं को इससे अवगत कराये
तथा अन्य के साथ ही, इन बातों की प्राप्ति की दिशा में अपनी नीतियां निर्देशित
करें :
(अ) कि समस्त नागरिक नर-नारियों को समान रूप से आजीविका का
उचित जरिया पाने का अधिकार हो।
(ख) कि समाज के भौतिक साधन-स्रोतों के स्वामित्व और नियंत्रण का
वितरण ऐसे किया जाय कि सर्वोत्तम रीति से सबका सामान्य हित
पोषित हो।
(ग) कि आर्थिक व्यवस्था इस तरह से क्रियाशील हो कि उसके फल
स्वरूप सर्वसाधारण के लिए हानिकारक रूप में धन और उत्पादन के
साधनों का केंद्रीकरण न होने पाये।" (प्रथम पंचवर्षीय योजना दिसंबर
1952, भूमिका)।
यद्यपि 1930 की स्वाधीनता की प्रतिज्ञा की शब्दावली का किसी सीमा
तक संविधान में समावेश किया गया और वह भारत के नियोजित विकास का
निर्देशक विचार (सिद्धांत) बनी, तथापि ऐसा प्रतीत होता है और पिछले तीन
दशकों की प्रवृत्तियों तथा घटनाओं से पुष्ट भी होता है कि व्यवहार में उसे
अधिक गंभीरता से नहीं लिया गया, विशेषकर उनमें से ज्यादातर लोगों के द्वारा
जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में नेतृत्व के पदों पर अथवा स्वाधीनता पाने पर
दिल्ली में बनी सरकार के प्रमुख पदों पर थे। शायद उनके लिये यह प्रतिज्ञा
वाग्मिता थी या आलंकारिक उक्ति। पूर्ववर्ती यथार्थ का या भविष्य के लक्ष्यों
का कथन शायद उनकी दृष्टि में उस प्रतिज्ञा में अभिव्यक्त नहीं हुआ था। यह
सही है कि भारत के राजनैतिक और आर्थिक विनाश के प्रेक्षण को बड़े पैमाने
पर मान्यता मिली। किन्तु, भारत का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विनाश किया
गया है, और जिसका निहित अर्थ है कि इस समाज को विघटित और विस्थापित
किया गया है, और उसके जनसाधारण के आत्मगौरव का अत्यंत हनन हुआ है,
51
यहाँ दोनों पृष्ठों का संपूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
[पृष्ठ 52]
प्रतिष्ठा समाप्त की गई है तथा उनकी पहल की क्षमता रौंदी गई है, प्रतिज्ञा के
इस आशय वाले वाक्यांश की उन लोगों के बीच और काम पर कोई अनुकूल
प्रतिक्रिया नहीं परिलक्षित हुई, जिन्होंने 1986 के बाद आगे भारत में शासन
करना शुरू किया। लगता है कि वे (और सचमुच इनमें व्यावहारिक रूप से
भारत के विशेषाधिकार भोगी हर तबके के लोग शामिल थे, भले ही वे किसी भी
विचारधारा का अनुमोदन करते हों) अपने आसपास के संसार की चकाचौंध से
ज्यादा ही चौंधिया गये थे। साथ ही जिन सामाजिक और आर्थिक सैद्धांतिक
स्थापनाओं से उनके विचारों की बुनियाद रची गयी और जो इतिहास उन्होंने
पढ़ा (इनमें से ज्यादातर इतिहास-ग्रन्थों का उद्गम पश्चिम में मुख्यतः
अंग्रेजी-भाषी इलाकों में हुआ था) उसमें वे अभिभूत दिखते हैं। यहां तक कि
दिसम्बर 1953 में भी पंडित जवाहरलाल नेहरू का विश्वास था कि "पिछले दो
हजार वर्षों के विश्व-इतिहास के मानव-जीवन को परिवर्तित करने वाला कोई
भी तत्व, इतना शक्तिशाली नहीं रहा, जितना कि औद्योगिक क्रांति और उसकी
अनुगामी क्रियाएं"। जरूर वे यह भी सोचते थे कि अपने जोखिम भरे नजरिये के
सिलसिले में वे "जनता के विशाल समूह को विश्वास में लें" और उन्होंने देखा
कि "जनता के विशाल समूह में यह उत्तेजना भरनी होगी कि वे राष्ट्र को गतिशील
रखने के विराट उद्यम के सहभागी हैं, सरकार में और उद्योग में साझेदार हैं।"
(दृष्टव्य-जवाहरलाल नेहरूः भाषण (अंग्रेजी में) खंड 3, पृष्ठ 59, 60, "बैलगाड़ी,
मोटर गाड़ी, जेट विमान, "1958 में प्रकाशित)।
ऐसी सहभागिता के लिये पंचायती राज इत्यादि विविध कार्यक्रमों के
जरिए आधे-अधूरे मन से प्रयास किये गये। किन्तु इन योजनाओं और कार्यक्रमों
का भी गठन शेष भारतीय राज्य पद्धति की ही तरह हुआ था और शीघ्र ही वे भी
उसी गतिरोध की स्थिति में जा फंसे।
विकास में लोगों की भौतिक शारीरिक सहभागिता की कुछ गुंजाइश
जरूर थी, किंतु चाहे सिर्फ शासन तंत्र हो या विकास का मामला, किसी में भी
हम ऐसे मार्ग नहीं खोज पाये, जिनके जरिए भारत के छत्तीस करोड़ (उपर्युक्त
भाषण-पुस्तक के पृष्ठ 4 के छपे भाषण का, जो पंडित नेहरू द्वारा 13 अक्टूबर
1954 को दिया गया था, शीर्षक 'छत्तीस करोड़ समस्याएं') लोग सामूहिक तौर
पर अपनी मेधा एवं प्रतिभा उस दिशा में तथा उन कामों में लगा सकें, जिन्हें वे
उपर्युक्त समझते हैं तथा जो वे सृजन करना चाहते हैं। यह बात अब भलीभांति
विदित हो चुकी है कि जो नई वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं स्वाधीन भारत में स्थापित
हुईं तथा जिन महान वैज्ञानिकों ने उन्हें संचालित-निर्देशित किया, उनके पास
52
[पृष्ठ 53]
कम से कम 1950 के दशक तक जन सामान्य की महत्वपूर्ण समस्याओं की
तरफ ध्यान देने की फुरसत नहीं थी। एक अर्थ में, लोगों को फिर सन् 1915 की
स्थिति में धकेल दिया गया, जबकि सार्वजनिक सामाजिक जीवन में महात्मा
गांधी का उदय हुआ था और तब उन्हें सार्वजनिक जीवन में वापस लाया गया
था। अपने शुभेच्छु विदेशी मित्रों की तरह, जो तब भी ऐसा सोचते थे और अब
भी सोचते हैं, हम लोग भी यह मान बैठे कि ये सामान्य भारतीय देशवासी अपनी
मानसिक क्षमता पूरी तरह खो बैठे हैं और सांगठनिक मामलों में या कि तकनीकी
के क्षेत्र में किसी सृजनात्मक योगदान की उनमें क्षमता नहीं है। हां, वे दैहिक बल
या यांत्रिक दुहराव की अपेक्षा वाले कार्यक्रमों में अपना योगदान दे सकते हैं।
यहां यह उल्लेख भी प्रासंगिक होगा कि आधुनिकता की शक्तिशाली
धार के दबाव से अप्रभावित अनेक व्यक्ति एवं समूह 1950 में, और आगे भी,
भारत में मौजूद रहे हैं (व्यक्तियों में से कुछ-एक के नाम गिनाने हों तो राममनोहर
लोहिया, जयप्रकाश नारायण और आचार्य विनोबा भावे के नाम लिये जा सकते
हैं)। ऐसे अनेक व्यक्ति थे जिन्होंने दिल्ली के शक्ति केन्द्र द्वारा संचालित प्रक्रिया
के विरुद्ध व्यापक सार्वजनिक असहमति को वाणी दी थी। कई समूहों ने,
विशेषकर समाजवादियों ने, छोटी मशीनों की बात भी कही (शायद भारत के
लिये उपयुक्त प्रौद्योगिकी के संदर्भ में, जो कि स्वदेशी उपकरण, माल तथा
साधनों से विकसित हो सके) तथा "चौखम्भा राज्य" आदि शब्दावलियों के
सहारे देश के लिये अधिक उपयुक्त राजनैतिक ढांचे की बात कही और
दीर्घकालिक सामाजिक एवं रचनात्मक सेवा-कार्य के लिये विशाल भूमिसेना
की बात की। सम्पूर्ण गांव की ग्राम सभा, ग्राम-समुदाय तथा लोक-शक्ति के
विचार के आधार पर भारतीय राजनैतिक स्वरूप (पॉलिटी) को पुष्ट करने वाला
सर्वोदय आंदोलन भी उभरा। किन्तु सामान्यतः बड़े पैमाने पर इन विचारों का
स्वर अधिकांशतः अस्पष्ट और अस्फुट था। इन संदर्भ में एक बुनियादी
दस्तावेज जो 1958 में सामने आया वह था-जयप्रकाश नारायण लिखित "ए
प्ली फॉर द रिकन्स्ट्रक्शन ऑफ इंडियन पोलिटी"।
(2)
जो लोग किसी न किसी तरह भारत के मामलों के प्रबंध से जुड़े हैं,
सार्वजनिक तौर पर उनके द्वारा कही गयी बातें सुनी जायें, साथ ही उनकी
53
निजी प्रतिक्रियाएं देखी जाएं तो ज्ञात होता है कि जो काम उन्होंने अपने जिम्मे
ले रखा है वह उनके लिये बड़ा बोझ बना हुआ है। आकाशवाणी दूरदर्शन पर
समाचार प्रसारणों के पूर्व अक्सर प्रसारित होने वाले नेताओं के वक्तव्यों और
संदेशों में यह दुहराया जाता रहता है कि 1921 में भारत की आबादी इतनी थी
और अब इतनी है, तथा 2001 में इतनी होगी। इन वक्तव्यों में यह अपेक्षा ध्वनित
होती है कि श्रोता इस महान त्रासदी पर, इस शोधप्रद विभीषिका पर विचार
करें। पश्चिम ने अपने बारे में बहु प्रचारित किया कि यूरोपीय मनुष्य का इतिहास
और उसकी प्रेरणायें तथा सैद्धांतिक निरूपण सार्वभौम हैं। हमने इसे कबूल कर
लिया। फलतः हम यह मानने लगे कि पश्चिम ने अपने 1000 वर्षों के इतिहास में
जो कुछ किया है उसे अपने यहाँ दोहराने में हम भी समर्थ हैं। पश्चिमी मनुष्य की
जो छवि हमारे मन में बस गई है वह या तो सोलहवीं, सत्रहवीं और अठाहरवीं
शताब्दी के लुटेरे व्यक्तियों की है, या फिर बीसवीं शताब्दी के परिष्कृत,
दुनियादार, दूसरों का लिहाज रखने वाले, परोपकारी तथा कम से कम सैद्धांतिक
स्तर पर सभी लोगों के बीच समता और बंधुता की वकालत करने वाले व्यक्ति
की। हम यह समझने को तत्पर नहीं दिखते कि इस छवि के अतिरिक्त भी
यथार्थ बहुत कुछ है और पश्चिमी मनुष्य का विकास उन विश्वासों और
विचारधाराओं (दर्शन) में से हुआ है, जिनका भीतरी रूप कठोर है। भले ही
बाहरी हिस्से सौम्य दिखें। पश्चिम की वर्तमान सर्वमान्य समृद्धि तथा कल्याणवाद
मुश्किल से 50 साल पुराने हैं। वस्तुतः यह विचारणीय है कि क्या पश्चिम की
मौजूदा समृद्धि तथा कल्याणवाद इन तथ्यों की दिशा में पश्चिम के अनुपालन
का सीधा परिणाम है अथवा वह ऐसे प्रयासों और हलचलों का एक अनिवार्य
परोक्ष परिणाम है, जिनमें लक्ष्य पूर्णतः अलग तरह के हैं। हम समझ नहीं पाते कि
आज की चकाचौंध भरी स्थिति तक पहुँचने के लिये पश्चिम को कठोर, क्रूर और
शोषक होना पड़ा है। यह शोषकवृत्ति और यह क्रूरता सिर्फ गैर पश्चिमी संसार
के प्रति नहीं थी, अपितु शताब्दियों तक पश्चिमी शासक समूह अपने ही समाजों
का क्रूर शोषण करते रहे।
यह अनुमान कि पश्चिम आज के लोकतांत्रिक और कल्याणकारी
प्रबंधों तक इसलिए पहुँचा है, क्योंकि यह गुण तथा यह लक्ष्य इसके मध्य कालिक
तथा प्रारंभिक-आधुनिक दौर में अंतर निहित थे, वैसी ही कपोल कल्पित कथा
है, जैसी कि यह कपोल कल्पित कथा कि भारतीय जनगण हजारों वर्षों से
दरिद्रता तथा राजनैतिक उत्पीड़न का जीवन जीते रहा है।
ईसवी सन् 1800 के आसपास, जब भारतीय समाज के बड़े हिस्से को
54
यूरोपीय राजनैतिक शक्ति ने छिन्न-भिन्न कर दमित कर रखा था, उस समय भी
भारत के अधिकांश हिस्सों में लोगों के बीच अधिक समानता थी, और यहाँ के
साधारण श्रमिक ब्रिटेन के जनसाधारण से अधिक मेहनताना पाते थे। यह तथ्य
इस काल के अनेक अध्येताओं के अध्ययन से जाना जा सकता है।
थॉमस मुनरो के अनुसार बेलारी जिले में उच्च, मध्यम और निम्न वर्गों
में प्रतियक्ति उपभोग-ढांचा 17 : 9 : 7 के अनुपात में था। 1822-25 में मद्रास
प्रेसिडेंसी में स्वदेशी शिक्षा संबंधी एक सर्वेक्षण के अनुसार वहां उन दिनों स्कूल
में पढ़ रहे लड़कों का एक चौथाई भाग प्रेसिडेंसी की 12000 पाठशालाओं में
शिक्षा प्राप्त कर रहा था। इसके साथ ही, घर पर बड़ी संख्या में शेष बच्चे पढ़
रहे थे (मद्रास शहर में की गई एक गणना के अनुसार शालाओं में जाने वाले
बच्चों की संख्या से चार गुने बच्चे घरों में पढ़ रहे थे)। तमिलभाषी क्षेत्र में
पाठशालाओं में (यहां सर्वत्र आशय देशी पाठशालाओं से है, अंगरेजी व्यवस्था
द्वारा संचालित स्कूल तब नहीं थे) पढ़ रहे कुल बच्चों में शूद्र जाति के और
तथाकथित अन्त्यज जातियों के बच्चों की संख्या 60 से 80 प्रतिशत थी। 1804
के "एडिनबरो रिव्यू" के अनुसार ईसवी सन् 1800 के आसपास भारतीय खेतिहर
श्रमिक की वास्तविक मजदूरी दरें ब्रिटेन के खेतिहर मजदूरों से बहुत अधिक
थी। यह तथ्य भी अब सुविदित हो चुका है और स्वीकार किया जाता है कि
1800 के आसपास भारतीय कृषि उत्पादन ब्रिटेन के कृषि उत्पादन से बहुत अधि
िक था; भारतीय इस्पात अधिक श्रेष्ठ स्तर का था और देश के बहुत से इलाकों
में उसका उत्पादन होता था तथा भारत के बुवाई-हल (वपित्र) जैसे कुछ
कृषि-उपकरणों की क्षमता तत्कालीन ब्रिटेन की ऐसी वस्तुओं से कहीं अधिक
थी। "एडिनबरो रिव्यू" के ही अनुसार उन दिनों गेहूं आदि के बीज की दरें ब्रिटेन
में वही थीं, जो कि भारत में थी; किंतु भारत का उत्पादन बहुत अधिक था।
संभवतः बौद्धिक प्रमादवश, हममें से वे लोग जो देश का प्रबंध कर रहे
हैं, राजनैतिक संगठन अथवा विकास या कि शिक्षा, इतिहास एवं विज्ञान के
सिद्धांतों के बारे में अपने उन आधारवाक्यों पर पुनर्विचार हेतु प्रस्तुत नहीं हैं;
जिन पर कि 35-40 वर्ष या और अधिक समय से वे चिपके रहे हैं। शायद हम
यह सोचकर घबरा उठते हैं कि यदि हमने इस तरह की जिज्ञासा और प्रश्न
भाव विकसित किया; ऐसे-ऐसे सवाल स्वयं से करने लगे, तो फिर जिन बातों
के आधार पर हम चलते रहे हैं और चल रहे हैं (पिछले 40 या अधिक वर्षों से),
वे रेत पर बने महल की तरह भरभराकर ढह जायेंगी। क्योंकि हमारा यह महल,
यह दुर्ग एक ऐसी इमारत है, जिसकी कोई वास्तविक नींव है ही नहीं। न तो वह
55
भारतीय अनुभवों की नींव पर खड़ा किया गया है, न राष्ट्रीय चरित्र के अनुकूल
और न ही भारतीय जन की प्राथमिकताओं का विचार कर।
इस प्रकार "भारत के विकास के परिप्रेक्ष्य" को लेकर उठी किसी भी
बहस के सामने यह एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है। यह नहीं कि पिछले तीस साल से
ज्यादा समय से जारी नियोजित विकास ने भारतीय राष्ट्र की शक्ति में कोई
वृद्धि नहीं की है, उसे कुछ अधिक आत्मविश्वासयुक्त नहीं बनाया है अथवा
विविध क्षेत्रों में व्यवसायदक्ष लोगों तथा विशेषज्ञों को बड़ी संख्या नहीं पैदा
किया है। ऐसा तो हुआ है। साथ ही, औद्योगिक उत्पादन और कृषि दोनों में
गुणात्मक वृद्धि भी हुई है। किंतु साथ ही इस प्रक्रिया ने व्यापक पैमाने पर
जंगलों का विनाश, भूमि क्षय तथा बाढ़ और सूखे की लगातार वृद्धि भी की है।
इसी प्रक्रिया में पर्यावरण अधिकाधिक विषाक्त होता जा रहा है। अधिक सुरुचिपूर्ण
और अधिक व्यवस्थित जीवन का सृजन करने के स्थान पर इस प्रक्रिया ने
वस्तुतः साधारण जीवन को अधिक अस्थिर, अधिक असुरक्षित और निश्चय ही
ज्यादा बदसूरत बना डाला है। यह कहना शायद गलत न होगा कि हमारे
कस्बों, शहरों और महानगरों में भी कुछ सौ वर्ग मीलों में फैले केंद्रीय क्षेत्रों और
[L16
यहाँ दोनों पृष्ठों का लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
रही समझी जाती है। इसका परिणाम यद्यपि बिल्कुल निराशाजनक नहीं रहा
है, तथापि ऐसा भी नहीं है कि हम दावा कर सकें कि हम एक पश्चिम जैसा
समाज बनाने जा रहे हैं। यह तो हो सकता है कि लगभग पाँच-पचास लाख
भारतीय घरों में आज टेलीविजन सेट हों, रेफ्रीजरेटर हो, गैस या बिजली के
चूल्हे हों, शायद दस लाख कारें हों तथा ऐसा ही कुछ और हो, लेकिन इन्हीं
(सत्तावर्गीय) स्रोतों के अनुसार भारतीय जनता का आधा हिस्सा 'गरीबी रेखा'
के नीचे रहता है और 'गरीबी रेखा' से ऊपर वाले लोगों का अधिकांश हिस्सा
घंटों तक परिवहन, दूध, चीनी, मिट्टी के तेल, खाद्य पदार्थ आदि के लिए लाईन
लगाने में खर्च करने को विवश है।
इन गतिविधियों के पिछले तीस वर्षों की प्रशंसा में अधिक से अधिक
कुछ कहा जा सकता है, तो यही कि इस दौरान भारत को वे चलाये रखे रही हैं।
यह संभव है कि भाग्यवश हम इसी रास्ते पर चलते हुए कुछ समय तक और
जिंदा रह लें।
(3)
लेकिन जिस रास्ते पर हम चलते रहे हैं, उसी पर चलते रहकर शायद
भारत एक राजनैतिक इकाई बना भी रहे, तो भी भारत के जनसाधारण की
यानि कुल आबादी के लगभग 95 प्रतिशत की, बुनियादी जरूरतों तक की पूर्ति
की संभावना इस रास्ते में अत्यंत अल्प है। इससे भी बुरी बात यह है कि इस
मार्ग के अवलंबन से भारतीय जन बहुत अधिक पराश्रित हो गये हैं। यहाँ तक कि
आज का किसान भी नई संकर खेती और उसकी जरूरतों के संदर्भ में कम
सृजनात्मक और नवाचार में कम समर्थ हो गया है। उसकी स्वयं की सृजनात्मकता
तथा नवाचार की मेधा आज उससे भी अधिक अवरुद्ध कर दी गयी है, और
बौनी बना दी गयी है, जितनी और जैसी कि ब्रिटिश राज्य के आरंभ में की गई
थी। यदि भारत को एक सभ्य समाज के रूप में बचे रहना है तो उसे वर्तमान
प्रक्रिया के फलस्वरूप उत्पन्न आज की इस किंकर्तव्य-विमूढ़ता की दिशा में से
कोई और रास्ता निकालना होगा। एक ओर जनसंख्या के बहुत बड़े हिस्से के
कल्याण की तो बात ही क्या, उसे भोजन, वस्त्र और निवास तक दे पाने में
केंद्रीयकरण अक्षम हो चुका है और दूसरी ओर समस्त साधन स्रोतों तथा
संगठनात्मक ढाँचों पर एकाधिकार और विनियोजन के कारण यह केन्द्रीयकरण
जनगण द्वारा स्वप्रबंध के रास्ते में रूकावट बना खड़ा है। 19 वीं शताब्दी में तथा
58
20 वीं शताब्दी के आरंभ में भी यानि उस संपूर्ण अवधि में भी जब भारतीय
किसान की अपने खेतों में निवेश की क्षमता निम्नतम बिंदु तक पहुँचा दी जा
चुकी थी, और उसके कृषि औजार तथा माल-मवेशी बड़ी मात्रा में बरबाद कर
दुर्दशाग्रस्त बनाये जा चुके थे, किसान ने देश को पर्याप्त अनाज देकर जीवित
रखा, यह तथ्य उसकी सामर्थ्य और प्रतिभा का पर्याप्त दृष्टांत है। यही बात
भारतीय शिल्पियों, कारीगरों के बारे में भी सच है।
भारतीय जनगण अपेक्षाकृत सौम्य प्रकृति का है। और कई पीढ़ियों
तक उन्हें दबाकर रखा गया, उनकी खिल्ली उड़ाई गई, उन्हें पीसा जाता रहा
तथा उनकी सार्वजनिक क्रियाशीलता प्रतिबंधित रही। फलतः 19 वीं और
प्रारंभिक 20 वीं शताब्दी के प्रारंभ में भारतीय जन अपनी निजी सीमा में ही
सिमट गये थे। इसका यह मतलब नहीं कि वे अन्याय और अनुचित्त का बुरा
नहीं मान रहे थे। जैसा कि मार्च 1944 में किसी ने गांधीजी से कहा था, भारतीय
दृश्य पर उनके उदय से पूर्व तक फिरोज शाह मेहता जैसे लोग भी अंग्रेजों से
बोलते वक्त दब्बू और विनीत होते थे। गांधीजी ने स्वीकार किया कि 1915 तक
ऐसी स्थिति थी, पर साथ ही यह भी कहा कि "मैंने जो कहना शुरू किया, वह
वही था, जो लोग दिलों में महसूस करते थे, पर अपनी बात खुद कहने में समर्थ
नहीं थे" इस प्रकार 1916 के बाद से, अगले 30 बरसों तक वे जनता के प्रवक्ता
थे। वे भारतीय जनता की प्रशंसा करते और आवश्यकतानुसार झिड़कते भी।
पर दुर्भाग्यवश उनके उत्तराधिकारियों ने, विशेषकर जो स्वाधीन भारत के प्रबंध-
क बने, उन्होंने ब्रिटिश राज्य के समय का व्यवहार का ढांचा अपना लिया।
(उन्होंने ऐसा क्यों किया, यह मनोविश्लेषकों पर छोड़ देना ही बेहतर होगा। या
शायद यह कारण रहा हो कि ब्रिटिश शिक्षा और ट्रेनिंग की उन पर उससे अधि-
क गहरी छाप थी, जितनी गांधीजी के साथ बिताये गये उनके समय की छाप
उन पर थी)। वे पश्चिम से अभिभूत थे, फिर यह सोवियत संघ हो या अमरीका
अथवा यूरोपीय औद्योगिक क्रांति का प्रारंभ हो, इस संदर्भ में इन सबका एक ही
अर्थ है। इस कारण उन्हें भारत की हर वस्तु अदिमकालीन अतः अपरिष्कृत,
संकीर्ण, अंधविश्वास-युक्त इत्यादि प्रतीत होती थी। उनकी दृष्टि से जिसे वे
भारत का अभिमान या प्रगति समझते थे; उसकी राह में भारत के लोग वस्तुतः
एक व्यवधान थे, राह के रोड़े थे और इसलिए ये भारतीय जन निर्णय और कर्म
के क्षेत्र से (सिवाय लकड़ियां चीरने, पानी खींचने और कभी-कभी इस-उस
की साजसज्जा के काम से) जितना ही दूर रहें, उतना ही उनके सपनों के भारत
के लिए बेहतर है। यह संभव है कि यह दृष्टिकोण सार्वजनिक तौर पर खुलकर
59
अधिक व्यक्त न किया गया हो, पर दृष्टि यही थी। इस दृष्टि वालों में से किसी
को कभी यह याद नहीं आया कि ये वे ही भारतीय जन हैं, जिन्होंने निम्नतम
संभव पूँजी-निवेश, उपकरणों और उस पशुसम्पदा के जरिए भी भारत की रक्षा
की थी तथा पालन किया था जो उन्हीं की तरह अस्थिपंजर मात्र बना डाली
गयी थी। उनकी प्रशंसा करने और उनकी स्वीकृति प्राप्त करने के स्थान पर
उन्हें वस्तुतः यह बताया गया कि वे निकम्मे हैं। सर्वसामान्य भारतीय जन को
इस तरह रद्द कर देने और बहिष्कृत कर देने के बाद यह आश्चर्य की बात नहीं
कि इस भारतीय कुलीन वर्ग के लिये शासन प्रबन्ध और विकास की समस्याएं
इतनी बड़ी बोझ बन गयीं।
समुद्रीय वृत्त सम्बन्धी अवधारणा के लिये 28 जुलाई 1946 का हरिजन
दृष्टव्य है। इसमें "स्वराज" शीर्षक से अपने लेख में गांधी जी ने स्वराज लोकतंत्र
की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा था- "वह एक सामुद्रिक वृत्त होगा, जिसका
केन्द्र होगा व्यक्ति जो गांव के लिए उत्सर्ग को सदा तत्पर रहेगा, गांव
ग्राम-समुदाय के लिए उत्सर्ग हेतु तत्पर रहेगा, यही क्रम चलता रहेगा और
सम्पूर्ण समाज का ऐसे व्यक्तियों से बना एक अखंड जीवन होगा, जो अपने
मन्तव्य से कभी भी आक्रामक न होंगे, सदा विनययुक्त होंगे तथा उस सामुद्रिक
वृत्त की महत्ता के भागीदार होंगे, जिसकी कि वे अभिन्न इकाइयां हैं।" आगे
उन्होंने लिखा- "असंख्य गांवों (और स्वाभाविक ही कस्बों तथा शहरों) से युक्त
इस संरचना में निरन्तर फैलने वाले किन्तु कभी भी प्रभुत्व न दिखाने वाले वृत्त
होंगे। सबसे बाहर वाले वृत्त (यानी राज्य) द्वारा अपने समस्त भीतरी वृत्तों को
सुदृढ़ रखने के लिए तथा उनसे शक्ति पाने के लिये ही शक्ति-संचय किया
जायेगा, न कि उन्हें दबाने-कुचलने के लिये।"
शासन सम्बन्धी इन सुझावों की पर्याप्तता पर बहस संभव है। किन्तु
भारत की तथा साथ ही पश्चिम की सभ्यता का उनका विश्लेषण तथा अपने
स्वदेशी जनगण की तथा उनके द्वारा पोषित-समाहत नैतिक विचारों की गांधी
की समझ अतुलनीय रही है और वह आज भी उतनी ही प्रामाणिक है, जितनी
60-70 वर्ष पहले थी। (सभ्यता सम्बन्धी उनका यह विश्लेषण सर्वप्रथम 1909
में "हिन्द स्वराज" में सामने आया। यह प्रश्नोत्तर शैली में है और उसमें गांधी जी
ने उस समाज और राज्य के स्वरूप पर प्रकाश डाला है, जैसा वे स्वाधीन भारत
में देखना चाहते थे।) जिन लोगों को दरिद्र बनने को विवश किया गया है, जो
व्यापक वंचना के शिकार बनाये गये हैं और जिनका आत्मगौरव छीना गया है,
उन्हीं करोड़ों लोगों की सृजनात्मक एवं प्रवर्तनकारी मेधा को मुक्त तथा जागृत
60
करके ही विकास की समस्या को हल करना संभव है। क्योंकि अंततः विकास
का मूल अभिप्राय है "भीतर के विकास" तथा "आत्मअभिव्यक्ति, आत्मविस्तार
अणु से महत् की ओर बढ़ना"। अतः विकास की परिभाषा में ही यह निहित है
कि वह तभी प्रारम्भ होगा जब भारतीय जनगण स्वयं अपना विकास करने में
सक्षम होते हैं अर्थात जब व्यक्ति-रूप में तथा समूह के अंग के रूप में वे खिलना,
प्रस्फुटित होना शुरू करते हैं।
आजादी के बाद से जो दृष्टिकोण, जो कार्यविधि तथा जो
उपकरण-व्यवस्था भारतीय मामलों में गतिशील रही है, वह अब और ज्यादा
समय तक अपेक्षित कार्य नहीं कर सकती यानी संतोषप्रद रूप में गरीबी कम
करने का तथा सर्वसामान्य भारतीय जन में आत्मगौरव तथा पहल की प्रवृत्ति
पुनःप्रतिष्ठित करने का काम नहीं कर सकती, यह कहने का अभिप्राय इन
दृष्टिकोणादिक की भर्त्सना करना नहीं है। 1947 के बाद की स्थितियों में,
विशेषकर 1945 से आगे भारत जिस दिशा में बढ़ा यहां के कुलीनवर्ग खासकर,
प्रशासन वर्ग और अर्थशास्त्री समूह ने अपनी दक्षता भर कार्य किया! इस
क्रियाशीलता से हिन्दुस्तान से अभाव, दरिद्रता और पराश्रय के समुद्र के बीचों
बीच पश्चिमोपन और अति समृद्धि के कुछ सौ नखलिस्तान तथा परकीय अन्तः
क्षेत्र विकसित हो गये हैं तथा समस्त नैतिक आचरण और मानदण्ड क्षत-विक्षत
हो चुके हैं। इन सबका दायित्व उन्हीं पर डालने की जरूरत नहीं है। किन्तु
भारत के स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए यह स्वीकार करना होगा कि ये नजरिये
वगैरह अब प्रासंगिक नहीं हैं और वे वस्तुतः भारतीय समाज के ताने-बाने को ही
नष्ट-भ्रष्ट करने वाले हैं। ऐसी परिस्थितियों में, भारतीय राजनैतिक व्यवस्था
को तथा जीवन के हर क्षेत्र में सक्रिय विचारशील भारतीयों को उन भागों तथा
साधनों को खोजना होगा, जिनमें राष्ट्र की एकता सुरक्षित रहने के साथ-साथ
देशजन को स्वतन्त्रता, अवसर और आनुपातिक राष्ट्रीय साधन-स्रोत उपलब्ध
हो सकें, जिसमें विविध स्तरों पर लोग जीवन की अधिक आवश्यक और बुनियादी
समस्याओं पर विचार करना तथा उनका समाधान करना प्रारम्भ कर सकें।
अब हमारे पास भारतीय मामलों के प्रबन्ध का पैंतीस वर्षों (अब 50
वर्षों) का अनुभव है, और साथ ही अंतरराष्ट्रीय जगत का अधिक यथार्थपरक
परिचय है और शायद, औद्योगिक क्रान्ति की उपलब्धियों की चकाचौंध से भी
हम कुछ मुक्त हुए हैं, यह तथ्य अवश्य नये मार्गों तथा साधनों के सृजन को अधि
क व्यावहारिक बना देता है। जहाँ यह सच है कि एक ओर हमारी समस्याएं
पैंतीस साल पहले की तुलना में अधिक जटिल हुई हैं और उनका दबाव बढ़ा है,
61
तृतीय खण्ड: ग्राम-स्वराज्य, स्थानीय उत्पादन एवं स्वावलम्बी भारत
दूसरी ओर पहले से बड़ी संख्या में हमारे युवकजन अब और अधिक बौद्धिक
तथा व्यावसायिक दक्षता से युक्त हैं तथा शायद उनमें संकल्प निर्णय और
मौलिकता भी है, जिससे वे वांछित परिवर्तन और रद्दोबदल करने में समर्थ हो
सकते हैं। यह ध्यान में रखते हुए कि यदि हम चाह भी लें तो भी हम विश्व के
दबावों से सहसा अलग-थलग पड़कर नहीं रह सकते, यह हो सकता है कि
कुछ समय तक हमें दो भिन्न-भिन्न रास्तों पर सक्रिय रहना पड़े। एक मार्ग है
बाहरी दबावों और रिश्तों से व्यवहार का और दूसरा हमारे नैतिक और सामाजिक
मूल्यों के अनुकूल है। इस प्रकार हम दैनंदिन जीवन में सहभागिता और
सृजनात्मकता का प्रवर्त्तन कर सकते हैं तथा एक या दो दशकों में अपने समाज
को पूर्ण स्वस्थ बना सकते हैं।
किन्तु ऐसे समझौते और तालमेल वाले मार्ग को अपनाने पर भी
पाँच-सितारा संस्कृति के परित्याग की आवश्यकता तो पड़ेगी ही तथा कम से
कम कुछ दशकों के लिए हम सभी को अधिकांश मामलों में ग्रामीण झोपड़ी के
जीवन जैसा जीवन अपनाना होगा। यह तो सभी जानते हैं कि अन्य समाजों में
भी ऐसे ही प्रयास हुए हैं और उन्हें उल्लेखनीय सफलता मिली है।
यह संभव है कि आगामी दशकों में भारत स्वयं किसी तरह की
आधुनिकता को तथा उपयुक्त विज्ञान और प्रौद्योगिकी को चुने। भारतीय
योजना-निर्माताओं तथा उनके स्वामियों और प्रेरकों की बहुत गंभीर गलती यह
रही है कि उन्होंने देवताओं की तरह व्यवहार करने का प्रयास किया (या
आधुनिक बिम्ब-विधान से बात करें तो कहना होगा कि उन्होंने उस महान श्वेत
मनुष्य की तरह व्यवहार करने की कोशिश की, जो संसार के जंगली लोगों के
लिए दिव्य उपहारों का बोझ लेकर आया बताया जाता है।) उन्होंने उस जनता
के लिये जिसे उसने अपना श्रद्धालु भक्त समझ लिया था, योजना और विकास
का वरदान लेकर आने वाले जैसा व्यवहार किया। पर क्योंकि न तो वह भूरा
साहब था, न तो देवता, अतः अचरज नहीं कि स्थितियां इस तरह की हो गयीं।
शायद यह समय है जबकि हम वैज्ञानिक दृष्टि के साथ ही सामान्य बुद्धि का
प्रयोग करें और आज की कठोर वास्तविकता से एक-एक कदम आगे बढ़ें।
जैसा कि गांधी जी करते थे, तथा हर बार यह भली भाँति देख लें कि जो कदम
हम उठा रहे हैं वह ठोस आधार पर टिका है तथा हमारे उद्देश्य की दिशा में और
उसका पोषक है। एक बार हमारा समाज क्रियाशील हो उठे, अर्थात जब उसके
उत्पादन मात्र उसके भौतिक निवेश का परिणाम न हो अपितु अधिक सृजनशीलता
तथा प्रवीणता का फल हो, तब फिर अमूर्त मुद्दों पर बहस के लिए पर्याप्त समय
बना रहेगा।
62
भारतीय समाज बनाम पश्चिमी
समाज व्यवस्था - 1
हमारे देश में या तीसरी दुनिया के दूसरे देशों में परिवार, शिक्षा और
समाज की जो अवधारणाएं आज प्रचलित हैं उनकी नींव ग्रेट ब्रिटेन या अमेरिका
में 19 वीं सदी के दौरान पड़ी थी। उन दिनों वहां जो सिद्धांत बनाए जा रहे थे
और जो विचार शक्ल ले रहे थे उन्हीं से इनका अर्थ निश्चित हुआ था। पुराने
यूनानी दिनों से लगा कर 19 वीं शताब्दी के मध्य तक यूरोप में परिवार और
शिक्षा का संबंध राजनैतिक सत्ता या संपत्ति हासिल करने से जुड़ा रहा है।
यूरोप में संपत्ति और राजनैतिक शक्ति बहुत थोड़े से लोगों में ही सीमित रही है।
इन थोड़े से लोगों ने ही अपने व्यक्तिगत जीवन में या उन्होंने जो साहित्य लिखा
उसमें परिवार या शिक्षा से होने वाले लाभ के बारे में सोचा-समझा है।
पिछले दो हजार साल में परिवार का स्वरूप, उसका ढांचा और उसका
अर्थ बदलता रहा है। यही बात शिक्षा के बारे में भी कही जा सकती है। प्लेटो या
अरस्तू ने यूरोपीय ढांचे में परिवार की जो अवधारणा की थी वह सामंती, अभिजात,
व्यापारिक या मध्यकालीन पश्चिमी यूरोप के साहूकार परिवारों से बहुत ज्यादा
मिलती-जुलती नहीं दिखाई देती। इसी तरह प्लेटो की अकादमी 19 वीं शताब्दी
के आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से बिल्कुल अलग दिखाई दे सकती है। लेकिन
पुराने स्पार्टा में, जहां नब्बे प्रतिशत आबादी दास या अजनबी लोगों की थी और
जिन्हें कोई नागरिक अधिकार हासिल नहीं थे या 19 वीं शताब्दी के ब्रिटेन में,
जहां सिर्फ एक प्रतिशत लोग जेंटलमैन समझे जाते थे, परिस्थितियां बहुत
अलग नहीं थीं। परिवार या शिक्षा की सारी समझ 18 वीं शताब्दी के आरंभ से
शुरू हुए यूरोपीय पुनर्जागरण काल तक इन्हीं थोड़े से ताकतवर लोगों के
दृष्टिकोण पर आधारित थी।
अठारहवीं शताब्दी के पुनर्जागरण के दौरान जो बहसें चलीं और उनमें
से जो सिद्धांत निकले उन्होंने इस संभावना की तरफ इशारा करना शुरू किया
कि परिवार और शिक्षा रूपी इन दोनों विशेषाधिकार को पश्चिमी यूरोप के सभी
या अधिकांश लोगों तक फैलाया जा सकता है। क्रांति के डर ने उन्हें ईसाई व
दूसरी नैतिक मान्यताओं को आम लोगों तक फैलाने के लिए प्रेरित किया। इसी
63
भय से उन्हें परिवार की अवधारणा को आम लोगों में फैलाने की जरूरत महसूस
हुई ताकि वैधानिक रूप से स्थापित हुई सत्ता की अधीनता मानने की आदत
लोगों में डाली जा सके। इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए ही उनमें शिक्षा के
प्रसार की बात सोची गई थी। और उनमें नई तर्कवादी मान्यताओं का प्रसार
किया गया था। पुनर्जागरण काल के तर्कवाद ने इस धारणा को भी पैदा किया
कि अगर उचित संस्थाएं खड़ी कर दी जाएं और उचित माहौल बना दिए जाए
तो सभी लोग संपत्तिवान और ताकतवर हो सकते हैं। इस तरह की मान्यताएं
बनाने के लिए नई अवधारणाओं और नए मिथकों की जरूरत थी। इसी से
परिवार और शिक्षा की मौजूदा अवधारणाओं को जन्म मिला।
यूरोप में एक और ताकतवर विचार प्रचलित था। यह विचार है भौतिक
जीवन में व्यक्ति को स्वतंत्र मानना। इस विचार का यूरोप की केन्द्रीय नियंत्रण
की प्रवृत्ति से गहरा संबंध रहा है। व्यक्ति की स्वतंत्रता के विचार के आधार पर
यूरोप में कुछ लोगों को बिना किसी बंधन और मर्यादा की अड़चन महसूस किए
सत्ता और संपत्ति पर केंद्रीय नियंत्रण संभव बनाने में काफी आसानी हुई।
दूसरी तरफ लोगों को समुदायों की जैविक इकाइयों से तोड़ कर अकेला कर
दिया गया। 19 वीं शताब्दी तक भौतिक जीवन में स्वतंत्रता का उपभोग मुट्ठी
भर लोगों तक ही सीमित था। फिर भी जो लोग बहुत दुस्साहसी, उद्यमी या
हताश होते थे, ऐसे लोगों की संख्या चाहे कितनी ही मामूली क्यों न निकले पर
बहुसंख्यक आबादी के ऐसे लोग भी अपने देश के भीतर या दूरदराज इलाकों में
राजनैतिक सत्ता या संपत्ति हासिल करने में सफल हो जाते थे। ऐसे लोगों के
किस्से आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के दौर की शुरुआत से पहले भी मिल
जाएंगे। उन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता का फायदा उठाने का मौका मिल जाता था।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी का दौर शुरू होने के बाद ऐसे लोगों की संख्या में
हजारों गुना वृद्धि हो गई होगी।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उपभोग का दायरा बढ़ जाने के कारण और
विज्ञान व प्रौद्योगिकी की विशाल उपलब्धियों के कारण 19 वीं शताब्दी में जो
आदर्शवादी ढांचे बनाए गए थे उनसे भी मुक्ति पाने में मदद मिली है। इसका
सबसे ज्यादा असर परिवार पर पड़ा है। इन परिवारों का कोई व्यापक या
गहरा कुलीय आधार तो था नहीं। न ही उन पर देसी समाज के रीति-रिवाजों
का कोई बंधन था। उनका आधार तो संपत्ति और सत्ता ही रहा था। इसलिए
परिवार की आदर्शीकृत अवधारणा तो टूटनी ही थी। लेकिन यूरोप या अमेरिकी
परिवार में जो वास्तविक परिवर्तन हुआ है वह ऐतिहासिक रूप से उतना
64
चौंकाने वाला नहीं है जितना आज हमें बताया जाता है। आज के पश्चिम में
परिवार कुछ-कुछ सराय जैसा दिखाई देता है जिसमें रहने वाले लोगों में
कुलीय भावना जैसी कोई चीज नहीं होती। इन परिवारों में आमतौर पर संपत्ति
जैसा कुछ नहीं दिखाई देता। मगर पहले भी हालात कोई इससे बहुत अलग
नहीं रहे। यह बात विशेष कर उन लोगों को समझनी चाहिए जो पश्चिमी समाज
को अपने लिए प्रकाश पुंज जैसा समझते हैं कि वहां खासतौर पर ब्रिटेन और
अमेरिका में बहुत कमजोर पारिवारिक व्यवस्था रही है।
दास प्रथा, सामंतवाद या सर्वहारा जैसी परिस्थितियों के कारण पश्चिमी
समाज में पारिवारिक संबंधों के पनप सकने लायक माहौल ही नहीं रहा। आज
हम यूरोप में जिस परिवार के टूटने की इतनी बात करते हैं वह केवल परिवार
की एक 19 वीं सदी वाली आदर्शीकृत अवधारणा का टूटना ही है। यही वजह है
कि इस टूट की या तो पश्चिमी समाज के वे मध्य स्तरीय लोग ज्यादा बात करते
हैं जिन्हें अपनी शिक्षा-दीक्षा के दौरान परिवार की यह आदर्शीकृत अवधारणा
घुटाई गई थी या फिर हमारे जैसे लोग उसकी ज्यादा बात करते हैं जो इस तरह
की रूमानी अवधारणाओं को पाले हुए हैं। पश्चिम का सामान्य व्यक्ति जिसे
अपने यहां की परिस्थितियों का सहज ज्ञान है परिवार के टूटने की ऐसी बात
करके चिंतित नहीं होता।
पश्चिमी यूरोप या अमेरिका में सत्ता और संपत्ति के केंद्रीकरण व
व्यक्तिगत स्वतंत्रता संबंधी विचारों ने इस बात की तो कोई गुंजाइश ही नहीं
छोड़ी थी कि वहां समाज जैसी कोई चीज उभर सके। यूरोप के स्लाव इलाकों
में समुदाय बनाने की तरफ प्रवृत्ति जरूर दिखाई देती है जैसा कि रूसी मीर से
दिखता है। हो सकता है कि कुछ जर्मन इलाकों में भी ऐसी ही प्रवृत्ति रही हो
जैसी कि जर्मन मार्क से लगता है। इसके अलावा सत्ता और संपत्ति के केंद्रीकरण
व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विचार के बावजूद पश्चिमी यूरोप में समाज की मान्यता
पूरी तरह नहीं मर पाई। समय-समय पर विभिन्न समुदाय बनते रहे। लेकिन वे
ज्यादातर असहमत लोगों द्वारा बनाए गए। उन लोगों द्वारा जो उस समय के
धार्मिक या वैचारिक आग्रहों के खिलाफ खड़े हुए थे। यह समुदाय एक केंद्रीकृत
और व्यक्तिवादी ढांचे में दुर्लभ सामाजिक इकाइयों की तरह थे।
भारत और एशिया व अफ्रीका के बहुत से इलाकों में, यहां तक कि
यूरोपीय लोगों का नियंत्रण होने से पहले तक, अमेरिका में भी समाज की
अवधारणा गहरे स्तर पर रही है। इसलिए यहां व्यक्ति की स्वतंत्रता को एक
दूसरी दृष्टि से देखा गया। परिवार और शिक्षा के स्वरूप और उनकी संस्थाओं
65