स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)
Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan
धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगांव होते ही थे। 1964 में तंजोर में लोगों ने बताया कि उनके यहाँ 100 समुदाय
गांव तो आज भी हैं। स्वदेशी की अभिव्यक्ति तो राजनीति में होनी थी। हम लोग
तो उसकी आर्थिक अभिव्यक्ति करने में ही लग गए और मारे गए। स्वदेशी यानी
वही कुछ कपड़ा-वपड़ा। कुछ तेल-वेल, खाने-वाने की बातें। इसमें तंत्र,
व्यवस्था, मर्यादा पर-प्राथमिकताओं पर बात नहीं थी। स्वदेशी तो प्राथमिकताएं
होती हैं। वे तय होंगी, तो उन्हें कैसे पूरा करना है, इसका रास्ता बनेगा। इस
काम के लिए कुछ उधार भी लेना होता तो लेकर उसे अपने में मिला लेते।
उसका स्वदेशीकरण हो जाता। 1905 की स्वदेशी की बंगाल वाली विचारधारा
सतह पर ही थी। नीचे धँसती तो बहस होती। अरविंद जैसे लोग कुछ सैद्धांतिक
व्याख्या कर गए। बस।
स्वदेशी क्या हो, इसे तय करने के लिए राज्य और समाज कैसे
व्यवस्थित हो, इस सवाल पर जाना होगा। इनके आपसी रिश्ते क्या हों, और
इनके मूलाधार क्या हों, यह तय करना होगा। अपने यहाँ जातियां ही नहीं रहीं,
उनमें अंदरूनी विभाजन भी जोर का रहा है। 1911 की जनगणना में पंजाब में
1700 खानों में जाट बँटे हैं। ये शायद 1700 कुल रहे होंगे। यह कुल प्राथमिक
इकाई रही है परिवार नहीं, कुल। फैसले इसी इकाई में होते हैं। ये कुल इकट्ठा
होते हैं तो कुछ संघीय-सा संयोजक ढांचा बनता है। इस ढांचे में फैसलों की
प्रक्रिया कई स्तरों में रही होगी। 100-200-500 साल पहले के कुलों की रक्षा,
विदेशी नीति आदि की जरूरतें दूसरी थीं। आज हमारी जरूरतें दूसरी हैं। पर
इस बात की सोच नहीं बढ़ी। यह मानने की आदत से कि भारत ऐसा रहा है और
ऐसा ही रहेगा। फिर छोटे समूह में रहने की आदत थी। ढेर सारे कुल थे। गुरू
की चेलहाई के आधार पर। पंथ के आधार पर। पर यह नहीं कि इन कुलों का
आपस में कोई संबंध नहीं है। आपस में शादी, ब्याह और खान-पान नहीं हैं पर
इसका अर्थ यह नहीं कि वे एक-दूसरे को छोटा मानते हैं। भिन्नता वहीं तक है।
बाकी सब बातों के लिए लोग इकट्ठे होते होंगे और व्यवस्था का संचालन होता
होगा।
फिर यह विभाजन कि लड़ने का काम केवल क्षत्रिय का है, आदि-आदि,
तो यह बात मूल में नहीं रही होगी। मूल में तो लड़ाई के तंत्र में तमाम लोग लगे
थे। इस बात को समझकर ही ढांचा बनाया जाना था। 1800 का भारत ऐसा ही
था और वही अपने हिसाब की संरचनाएं बनाई गई होतीं तो दो-चार पीढ़ियों में
स्वदेशीकरण हो जाता। यह आज भी हो सकता है। पर यह समझकर कि
ज्यादातर लोगों का वास्ता भौतिक उन्नति से ही है। उन्हें वह चाहिए। और यह
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दिया जा सकता है। दूसरे यह कि दुश्मन तो कभी खत्म होते नहीं। इनसे बचाव
तो करना ही होगा। इस खाके में भौतिक ढांचे (उत्पादन वगैरह) की बात चलती
तो कहीं पहुंचा जा सकता था। स्वदेशी का वह जो ठेठ अर्थ है कि इलाके में बना
सामान ही खरीदना चाहिए आदि-आदि, वह गिर जाता है। राजनीति और
व्यवस्था उससे नहीं मिलती तो उसे सहारा नहीं मिलता। 1915-16 में महात्मा
गांधी ने यह जो चरखे की बात पकड़ी तो गुजरात में उस वक्त चरखे का चलन
नहीं रहा होगा। पर पंजाब वगैरह में तो 1850-60 तक चर्खा खूब चलता ही
था। भारतीय कपड़ा उद्योग पर जो शोध हुए हैं, वे यह नहीं कहते कि आर्थिक
चुनौती से कपड़ा उद्योग हारा। हारा वह राजनैतिक पराजय से। उसकी वजह
से लगे शुल्क (कर) से।
आज का उदारीकरण यदि देश के विकास की सुविचारित रणनीति
के तौर पर हो रहा हो, पूरे मन से हो रहा हो तो इससे भी बेहतरी हो सकती है।
1950-60 में जापान इस रास्ते चला तो 5-10 साल बड़ी खलबली रही। पर
उन्होंने सैन्यीकरण भी किया। आज उसने कई मायनों में अमेरिका को पछाड़
रखा है। विश्व बाजार की प्रक्रिया पर उसने महारत हासिल कर ली। यह
महारत हमारा इरादा हो तो इस नई आर्थिक नीति के भी फल निकल सकते हैं।
पर हम लोगों ने अपने लोगों को रद्दी मान लिया है, उसकी वजह से यह मानसिकता
होगी, इसका भरोसा नहीं होता।
नई आर्थिक नीति के खिलाफ उठने वाली आवाजें बज नहीं रहीं।
कारण विरोधियों के पास मुकम्मिल सोच नहीं है। अपना मॉडल नहीं है। लोग
बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध कर रहे हैं। जैसे आजादी बचाओ आंदोलन है।
जार्ज फर्नांडीज हैं, चंद्रशेखर हैं। तो ईस्ट इंडिया कंपनी क्या थी ? बहुराष्ट्रीय
ही थी न ! यूरोप और पश्चिम तो ऐसी कंपनियों से ही चलता है। यही वहां का
चलन है। क्या इसे नहीं समझना चाहिए ? यदि चंद्रशेखर, जार्ज आदि-आदि के
पास स्वदेशी की परिभाषा होती, उसका मॉडल होता तो बहस हो जाती और
लोग सोचते। पर वह नहीं होगा। इसलिए कि व्यवस्था और तंत्र के स्वदेशीकरण
की नहीं सोची गयी है। तय तो पहले प्राथमिकताएं की जानी चाहिए। फिर कुछ
उधार भी लेना होता तो लेकर ढाला जाता। स्विच अपने हाथ में होगा तो उधार
का भी स्वदेशीकरण हो जाएगा। अभी तो पश्चिम से हम सब कुछ पैकेज में ले
रहे हैं।
इस बात की अनदेखी किए हुए कि उधार में लाई जा रही तकनीक
और सिद्धांत की अपनी भी स्वायत्तता होती है। हमें तो अपनी जरूरत की चीजों
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स्व भा - 5