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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 50 में से

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निजी प्रतिक्रियाएं देखी जाएं तो ज्ञात होता है कि जो काम उन्होंने अपने जिम्मे
ले रखा है वह उनके लिये बड़ा बोझ बना हुआ है। आकाशवाणी दूरदर्शन पर
समाचार प्रसारणों के पूर्व अक्सर प्रसारित होने वाले नेताओं के वक्तव्यों और
संदेशों में यह दुहराया जाता रहता है कि 1921 में भारत की आबादी इतनी थी
और अब इतनी है, तथा 2001 में इतनी होगी। इन वक्तव्यों में यह अपेक्षा ध्वनित
होती है कि श्रोता इस महान त्रासदी पर, इस शोधप्रद विभीषिका पर विचार
करें। पश्चिम ने अपने बारे में बहु प्रचारित किया कि यूरोपीय मनुष्य का इतिहास
और उसकी प्रेरणायें तथा सैद्धांतिक निरूपण सार्वभौम हैं। हमने इसे कबूल कर
लिया। फलतः हम यह मानने लगे कि पश्चिम ने अपने 1000 वर्षों के इतिहास में
जो कुछ किया है उसे अपने यहाँ दोहराने में हम भी समर्थ हैं। पश्चिमी मनुष्य की
जो छवि हमारे मन में बस गई है वह या तो सोलहवीं, सत्रहवीं और अठाहरवीं
शताब्दी के लुटेरे व्यक्तियों की है, या फिर बीसवीं शताब्दी के परिष्कृत,
दुनियादार, दूसरों का लिहाज रखने वाले, परोपकारी तथा कम से कम सैद्धांतिक
स्तर पर सभी लोगों के बीच समता और बंधुता की वकालत करने वाले व्यक्ति
की। हम यह समझने को तत्पर नहीं दिखते कि इस छवि के अतिरिक्त भी
यथार्थ बहुत कुछ है और पश्चिमी मनुष्य का विकास उन विश्वासों और
विचारधाराओं (दर्शन) में से हुआ है, जिनका भीतरी रूप कठोर है। भले ही
बाहरी हिस्से सौम्य दिखें। पश्चिम की वर्तमान सर्वमान्य समृद्धि तथा कल्याणवाद
मुश्किल से 50 साल पुराने हैं। वस्तुतः यह विचारणीय है कि क्या पश्चिम की
मौजूदा समृद्धि तथा कल्याणवाद इन तथ्यों की दिशा में पश्चिम के अनुपालन
का सीधा परिणाम है अथवा वह ऐसे प्रयासों और हलचलों का एक अनिवार्य
परोक्ष परिणाम है, जिनमें लक्ष्य पूर्णतः अलग तरह के हैं। हम समझ नहीं पाते कि
आज की चकाचौंध भरी स्थिति तक पहुँचने के लिये पश्चिम को कठोर, क्रूर और
शोषक होना पड़ा है। यह शोषकवृत्ति और यह क्रूरता सिर्फ गैर पश्चिमी संसार
के प्रति नहीं थी, अपितु शताब्दियों तक पश्चिमी शासक समूह अपने ही समाजों
का क्रूर शोषण करते रहे।
यह अनुमान कि पश्चिम आज के लोकतांत्रिक और कल्याणकारी
प्रबंधों तक इसलिए पहुँचा है, क्योंकि यह गुण तथा यह लक्ष्य इसके मध्य कालिक
तथा प्रारंभिक-आधुनिक दौर में अंतर निहित थे, वैसी ही कपोल कल्पित कथा
है, जैसी कि यह कपोल कल्पित कथा कि भारतीय जनगण हजारों वर्षों से
दरिद्रता तथा राजनैतिक उत्पीड़न का जीवन जीते रहा है।
ईसवी सन् 1800 के आसपास, जब भारतीय समाज के बड़े हिस्से को
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यूरोपीय राजनैतिक शक्ति ने छिन्न-भिन्न कर दमित कर रखा था, उस समय भी
भारत के अधिकांश हिस्सों में लोगों के बीच अधिक समानता थी, और यहाँ के
साधारण श्रमिक ब्रिटेन के जनसाधारण से अधिक मेहनताना पाते थे। यह तथ्य
इस काल के अनेक अध्येताओं के अध्ययन से जाना जा सकता है।
थॉमस मुनरो के अनुसार बेलारी जिले में उच्च, मध्यम और निम्न वर्गों
में प्रतियक्ति उपभोग-ढांचा 17 : 9 : 7 के अनुपात में था। 1822-25 में मद्रास
प्रेसिडेंसी में स्वदेशी शिक्षा संबंधी एक सर्वेक्षण के अनुसार वहां उन दिनों स्कूल
में पढ़ रहे लड़कों का एक चौथाई भाग प्रेसिडेंसी की 12000 पाठशालाओं में
शिक्षा प्राप्त कर रहा था। इसके साथ ही, घर पर बड़ी संख्या में शेष बच्चे पढ़
रहे थे (मद्रास शहर में की गई एक गणना के अनुसार शालाओं में जाने वाले
बच्चों की संख्या से चार गुने बच्चे घरों में पढ़ रहे थे)। तमिलभाषी क्षेत्र में
पाठशालाओं में (यहां सर्वत्र आशय देशी पाठशालाओं से है, अंगरेजी व्यवस्था
द्वारा संचालित स्कूल तब नहीं थे) पढ़ रहे कुल बच्चों में शूद्र जाति के और
तथाकथित अन्त्यज जातियों के बच्चों की संख्या 60 से 80 प्रतिशत थी। 1804
के "एडिनबरो रिव्यू" के अनुसार ईसवी सन् 1800 के आसपास भारतीय खेतिहर
श्रमिक की वास्तविक मजदूरी दरें ब्रिटेन के खेतिहर मजदूरों से बहुत अधिक
थी। यह तथ्य भी अब सुविदित हो चुका है और स्वीकार किया जाता है कि
1800 के आसपास भारतीय कृषि उत्पादन ब्रिटेन के कृषि उत्पादन से बहुत अधि
िक था; भारतीय इस्पात अधिक श्रेष्ठ स्तर का था और देश के बहुत से इलाकों
में उसका उत्पादन होता था तथा भारत के बुवाई-हल (वपित्र) जैसे कुछ
कृषि-उपकरणों की क्षमता तत्कालीन ब्रिटेन की ऐसी वस्तुओं से कहीं अधिक
थी। "एडिनबरो रिव्यू" के ही अनुसार उन दिनों गेहूं आदि के बीज की दरें ब्रिटेन
में वही थीं, जो कि भारत में थी; किंतु भारत का उत्पादन बहुत अधिक था।
संभवतः बौद्धिक प्रमादवश, हममें से वे लोग जो देश का प्रबंध कर रहे
हैं, राजनैतिक संगठन अथवा विकास या कि शिक्षा, इतिहास एवं विज्ञान के
सिद्धांतों के बारे में अपने उन आधारवाक्यों पर पुनर्विचार हेतु प्रस्तुत नहीं हैं;
जिन पर कि 35-40 वर्ष या और अधिक समय से वे चिपके रहे हैं। शायद हम
यह सोचकर घबरा उठते हैं कि यदि हमने इस तरह की जिज्ञासा और प्रश्न
भाव विकसित किया; ऐसे-ऐसे सवाल स्वयं से करने लगे, तो फिर जिन बातों
के आधार पर हम चलते रहे हैं और चल रहे हैं (पिछले 40 या अधिक वर्षों से),
वे रेत पर बने महल की तरह भरभराकर ढह जायेंगी। क्योंकि हमारा यह महल,
यह दुर्ग एक ऐसी इमारत है, जिसकी कोई वास्तविक नींव है ही नहीं। न तो वह
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