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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 50 में से

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पृष्ठ 21

1750 के पहले मनुस्मृति हमारे लिए कोई बड़ी बात नहीं थी। 1784 में मनुस्मृति
का पहली बार अंग्रेजी अनुवाद हुआ। 10-12 और भी ग्रंथ छापे गए। 1812 में
सवाल उठा कि इस काम को आगे जारी रखना है क्या ? तो लंदन से हुक्म आया
कि इसे ज्यादा करने की जरूरत नहीं है पर मनुस्मृति को रीप्रिंट किया जा
सकता है। भारतीय समाज की परिभाषा के लिए मनुस्मृति उनके माकूल बैठती
थी। जबकि अपना ढांचा दूसरा था। भारतीय समाज की वर्णव्यवस्था मनुस्मृति
की वर्णव्यवस्था नहीं थी। पर अंग्रेजों ने 18 वीं सदी के अपने समाज की
अवधारणाओं को हमारे समाज पर लाद दिया। हमारे गांवों में आमदनी की
विषमता एक और तीन के अनुपात से अधिक नहीं थी। अंग्रेजों ने जो समाज
बनाया उसमें 1840-50 के बाद कारीगरों आदि के रहने की गुंजाइश गांवों में
बची ही नहीं। उनके अधिकारों में कटौती कर दी गई। आमदनी में एक और दस
का फर्क हो गया। जमीनें छीन ली गई। लोगों को दास बनाने की कोशिश हुई
तो वे गांवों से भागे। अब हमारे सर्वोदयी रोते हैं कि गांवों से तेल की घानी गायब
हो गई। जुलाहे गायब हो गए। चमड़े का काम करने वाले गायब हो गए। तो
100 साल से जब हमारी मानसिकता लोगों को गुलाम बनाने वाली हो गई और
उसमें मनुस्मृति भिड़ा दी गई तो कारीगर गायब क्यों नहीं होंगे ? स्वदेशी मॉडल
तो तभी बन सकता है जब आर्थिक और सामाजिक बराबरी बने। इसके बगैर
इस बात की कल्पना करना बेमानी है।
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पश्चिमीकरण को मानने वाले आज
भी दो फीसदी
स्वदेशी और पश्चिम की पूरी अवधारणा को समझने के लिए 18 वीं
सदी के अंग्रेजी समाज को समझना जरूरी है। पश्चिम का विकास का मॉडल
केंद्रीकृत रहा है। अधिकार और धन के केंद्रीयकरण का। जिनके पास इनका
केंद्रीयकरण रहा, उन्हीं के पास ज्ञान और व्यापार का भी केंद्रीकरण हुआ।
उनके सामंती समाज के उन्हीं 10-12 प्रतिशत बड़े लोगों की वहां के व्यापार में
भी हिस्सेदारी रही। दुनिया भर से दौलत निचोड़ कर आई तो 1750 के आसपास
यहां व्यापारी वर्ग का विस्तार हुआ। पर हुकूमत सामंतशाही के हाथ में ही रही।
1830 तक तो इंग्लैंड में दसियों चुनाव क्षेत्र ऐसे थे जिनमें मतदाता 10-12 से
ज्यादा नहीं थे। 5000 से ज्यादा मतदाता तो किसी भी क्षेत्र में नहीं थे। चुनाव
स्थानीय लार्ड्स की जेब में ही रहते। कुल मिलाकर पूरी राजनीति, समाज और
व्यापार उन अभिजात्य परिवारों के ही हाथ में था, जो 5-500 साल से स्थापित
थे। अपने यहां 30-40 साल के सर्वोदय के काम पर हरिवल्लभ पारीख जिस
तरह कई चुनाव क्षेत्रों में अपने लोगों को जिताकर लाते थे, इसी तरह से अंग्रेजों
के ये सामंती परिवार करते थे। तो इसी तरह जब ज्ञान का भी केंद्रीकरण हो
जाता है तो उसमें से लाइब्रेरी बनती होगी, रिफरेंस कार्ड बनता होगा। ज्ञान का
और इजाफा होता होगा। एक व्यवस्था बनती है। और उसमें से प्रयोगशालाएं
निकलती हैं।
इसी मानस ने मनु को हमारे समाज पर थोपा। पश्चिमीकरण की
अवधारणा सिलसिलेवार उतारी गई। शुरू में हजार में एक ने माना होगा।
विद्वता और सत्ता से जुड़े समाज ने इसे अंगीकार करना शुरू किया। शुरू में
सोचा होगा मानसिकता ले लें, जीवन पद्धति छोड़ दें। पर जीवनपद्धति के साथ
मानसिकता तो अपने-आप उतरने लगती है। इसलिए यह ताज्जुब की बात
नहीं कि हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा आज जीन्स और स्कर्ट पर जीने लगा
है। इस प्रक्रिया में तो अभेद्य किले भी टूट जाते हैं। मारवाड़ियों को, जैनियों को,
दक्षिण के ब्राह्मणों के वे तबके जिनके बारे में माना जाता था कि वे नहीं टूटेंगे,
उनकी भी जीवनपद्धति बदली है।
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