स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)
Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan
धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा
पृष्ठ 17, कुल 50 में से
संदर्भ में पढ़ेंवे बताते हैं कि नहीं, इनके यहां तो ऐसे मामले में तप्त लोहे से दागे जाने का
रिवाज है। काले टीके की बात उन्हें इसलिए नहीं जमती कि उस समय इंग्लैंड
में गरम लोहे से दाग कर सजा देने का आम रिवाज था। वे उसकी बराबरी की
सजा ढूंढ रहे हैं। तो अपने हिसाब से करने के लिए पीछे, और पीछे, और पीछे
चलने का मॉडल बना दिया गया। बहुत मजबूत था यह मॉडल। जे पी और
लोहिया से मेरी कई बार इस सिलसिले में बातें हुईं। अंग्रेजों के इस खेल को
भांपते थे वे। पर जब मंच पर चढ़ जाते थे तो फिर पहले ही वाक्य से वहीं शुरू
हो जाते थे- हजारों साल पुरानी सभ्यता है हमारी। और फिर वहीं हजारों
साल पहले ठहर कर रह जाते थे हम।
क्या था अंग्रेजों के जमाने के अठारहवीं सदी के भारत का नक्शा?
यह दलित (डिप्रेस्ड) समाज तो अंग्रेजों का किया वर्गीकरण है। हमारे यहां तो
अलग-अलग जातियां थीं और उनके अलग-अलग रीति-रिवाज थे। दलित
वर्ग कहां से निकला, इस बारे में आंबेडकर लिखते हैं कि मुसलमानों का एक
प्रतिनिधिमंडल अंग्रेजों से मिला था। उसने कहा कि हिंदू अछूत, दलित और
सवर्ण-तीन खाने में है। इसलिये मुसलमान को आबादी के गणित में हिंदुओं के
बराबर ही माना जाना चाहिए। 1911 की जनगणना में अंग्रेजों ने इस वर्गीकरण
को ठूंस दिया। 1916-17 में शिक्षा पर हुए किसी सम्मेलन में सामाजिक-शैक्षणिक
पिछड़ेपन की चर्चा उठी। तो बाद की जनगणना में अछूतों और कुछ दलितों को
मिलाकर अनुसूचित जाति का एक वर्ग बना दिया गया। जबकि 18 वीं सदी के
भारत में 5-7 से ज्यादा जातियां अछूत नहीं थीं। चमार तो अछूत नहीं ही थे।
1931 की जनगणना में उनकी आबादी ब्राह्मणों के बराबर है। और जातिवार
यही दोनों सबसे बड़े आबादी समूह हैं। कुछ चांडाल, भंगी, मेहतर ही अछूत थे।
फिर 1800 तक जातियों में परस्पर पिछड़ापन कोई ज्यादा नहीं था। शादी-ब्याह
के दायरे सबके अपने-अपने थे। पर समाज में सबकी स्थिति तकरीबन बराबर
की थी और व्यवस्था में हरेक की हिस्सेदारी थी। दक्षिण भारत में तो गांव के
झगड़े तय करने का काम पेरियार का ही था। उसके न्याय को चुनौती नहीं दी
जा सकती थी। गांव की सुरक्षा का जिम्मा महार्रों का था। 18 वीं सदी में इनके
घरों का घेरा देखिए तो वह किसी और हिंदू के घर से कम नहीं है। बल्कि
कहीं-कहीं ज्यादा भी है। खेती भी है उनके पास। इसे कहिए तो लोगों को बड़ा
झटका लगता है। मैंने जाँचा कि दक्षिण में 18 वीं सदी में कुल शिक्षितों में 80
फीसदी गैरब्राह्मण हैं। इस पर नानाजी देशमुख को यकीन नहीं हुआ। वे कहने
लगे कि ऐसा कैसे हो सकता है? और दलित नेता भी इसे कैसे मानेंगे? उन्हें
किसी ने यह बताया ही नहीं।
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अपना नियंत्रण खत्म हुआ तो न
स्वायत्तता रहेगी न स्वावलंबन
क्या राजनीति और सबको साथ लेकर चलने की मजबूरियों के
अलावा भी गांधी किसी ऐसे कारण से मजबूर थे कि स्वदेशी वृक्ष के लिए
कोई ऐसा थाला नहीं बन सका, जिसे नेहरू जैसे लोग मिटा न पाते, और
वृक्ष पनपता-बढ़ता चला जाता? जिसे उनके बाद सर्वोदयी, गांधीवादी,
समतावादी, समाजवादी, मानवतावादी, राष्ट्रवादी आदि-आदि सब मिलकर
संभाल लेते, और आज भारत की एक नई तस्वीर बनी होती ?
गांधी की गांव की कल्पना उधार की है और किताबी है। मेटकाफ
जैसे का लिखा पढ़ कर ही उन्होंने भारत के गांव जाने हैं। और यह जो पढ़ा-लिखा
है, वह बहुत महत्व का नहीं है। पर उनकी अंतर्दृष्टि विलक्षण है और हर
पढ़े-लिखे-देखे को जोड़-जाड़कर चमका देती है। 1891 में वे लंदन की एक
गोष्ठी में जाते हैं तो हिंदुस्तान के लिए नमक के महत्व का मुद्दा उठाते हैं। फिर
बताते हैं कि गाय की वहां पूजा होती है। उसका मारा जाना ठीक नहीं। यह
बात अंतर्दृष्टि से ही उठ रही है। बाद में वे इन्हीं बातों का विस्तार करते हैं।
नेटाल कांग्रेस की ओर से दिए गए ज्ञापन में वे दक्षिण अफ्रीका के हिंदुस्तानियों
की बाबत कहते हैं कि ये महान लोग हैं। हजारों साल पुरानी सभ्यता के हिस्से।
वही हजारों साल पुरानी सभ्यता। तो तुरंत का बीता तो यहाँ भी लोप हो जाता
है। लिहाजा स्वदेशी की जो अवधारणा या कार्य रेखा बनती है, ढेर सारी चीजों
को बटोर कर अंग्रेजों के सामने तो, वह एक बड़ी ताकतवर चीज के रूप में रख
दी जाती है, उसका एक ढाँचा भी खड़ा कर दिया जाता है, पर मामला ऊपर ही
ऊपर है, जड़ें नदारद हैं। ताश के पत्तों का एक ऐसा महल बनता है, जिसे तो
गिरना ही था।
नतीजा-स्वदेशी की अवधारणा को गांधी के वे अनुयाई भी नहीं चला
पाए, जिनके पास सतही लिबास भी था और गांधी का बनाया ढाँचा भी। बस
रूटीन में मंत्र की तरह स्वदेशी का जाप होता रहा। स्वदेशी की चेतना भूत,
भविष्य और वर्तमान से ठीक से जोड़ी नहीं गई। विनोबा ने समुदाय की,
ग्रामदान की बात की। तो पहले क्या होता था? अपने यहाँ तो समुदाय के कुछ
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