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सर्वकोश
स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 50 में से

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पृष्ठ 25

मॉडल बनाकर विकास थोड़े ही हुआ था। शुरूआत तो मूल से हुई। भौतिकी
आदि के वैज्ञानिक तो उसमें से बाद में निकले। ढांचा टूटा। जाम तो वह बाद में
हुआ। और यही हमें मिला। ढांचा टूटता है तो बड़ी मार-काट होती है। हमारे
लोग पीपीएसटी जैसे समूह को उठाकर फेंक देंगे। जाम मॉडल भी तोड़ देंगे।
इन सबके बीच में यह गाब-दाब भी चलता रहेगा।
आज कांशीराम और मायावती गांधी जी के खिलाफ बोलते हैं, फिर
उनके विरोध में हम लोग बोलने लगते हैं। हमारा यह विरोध इसलिए है कि
कांशीराम और मायावती हम लोगों से ऊंची बात कर रहे हैं। वे पूरे भारतीय
समाज को गाली दें तो हम लोगों को और भी अच्छा लगेगा। यूरोप के लोग जब
हमें गाली देते हैं तो वह हम लोगों को आखिर अच्छा ही लगता है न। यह वक्त
इस हीनता से निजात पाने का है। फैसले का वक्त है।
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विकास का सवाल
(1)
तिरुपति में हाल ही में सम्पन्न भारतीय विज्ञान काँग्रेस में अनेक विशिष्ट
वैज्ञानिकों ने भारत-सरकार के, प्रौद्योगिकी नीति संबंधी ताजे वक्तव्य पर बहुत
बेचैनी प्रदर्शित की। उनमें से एक के अनुसार "हमारे यहाँ पुराने विज्ञान की ही
पढ़ाई की जाती है (स्नातक उपाधिधारियों के लिये), कई मामलों में 40 बरस
पुराने प्रयोग ही पढ़ाये जाते रहते हैं।" एक अन्य वैज्ञानिक का कहना था कि
पिछले 33 बरस में उसने वैज्ञानिक नीति पर अनेक वक्तव्य पढ़े-देखे हैं, किंतु
उनमें से एक पर भी अमल होते नहीं देखा। उनका कहना था कि "मेरी रूचि
और मेरा लगाव अपने देश के लोगों के लिये विज्ञान की प्रगति में है। पर यहाँ
फाईलें (आधिकारिक) और माध्यम हमें वहाँ ले जाते हैं जहाँ और अधिक फाईलों
के सिवाय कुछ नहीं।" एक अन्य वैज्ञानिक के अनुसार "आधिकारिक पदों पर
बैठे ज्यादातर लोगों का किसी भी ताजे शोध के प्रति रवैया यह होता है कि
"क्या और कहीं ऐसा हुआ है ? "नई सूझों, नये विचारों को कोई प्रोत्साहन नहीं
दिया जाता। यदि पश्चिम में वैसा हुआ है तो वे उसका समर्थन करेंगे। अन्यथा
नहीं। भारतीय विज्ञान समाचार एसोसिएशन के अध्यक्ष ने कहा कि नई नीति
"इच्छाजनित विश्वास" का वक्तव्य मात्र है। (देखें इंडियन एक्सप्रेस, मद्रास के
10 जनवरी, 1983 के अंक में छपी रिपोर्ट)
डॉ. नायदम्मा (जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय के पूर्व उप कुलपति)
के अनुसार "पश्चिमी ढांचे पर आधारित मौजूदा शिक्षा पद्धति ने न तो सही
किस्म की मानवीय शक्ति उत्पन्न की, और न ही जनता की शिक्षा के स्तर को
उन्नत बनाया। पारंपरिक तकनीकी और स्थानीय मेधा की अवहेलना से अपने
लोगों का आत्मविश्वास घटा है और स्थानीय प्रौद्योगिकी द्वारा बुनियादी स्तर
पर समस्याओं के समाधान की क्षमता पर भी असर पड़ा है"। (देखें हिंदू, मद्रास
10 जनवरी, 1983)
इसी अवधि में अन्यत्र सम्पन्न एक सभा में एक विशिष्ट और राजनैतिक
तथा प्रशासनिक सत्ता के बहुत करीब रहे व्यक्ति ने यह अभिमत व्यक्त किया
कि मौजूदा न्यायिक पद्धति "नागरिकों के हित संरक्षण की दृष्टि से बहुत
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