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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 50 में से

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पृष्ठ 27

कदम उठाये जाएं और वे स्वायत्त-शासन की इकाइयों के रूप में काम करने में
सक्षम रहें, इस दृष्टि से उन्हें आवश्यक अधिकार और सत्ता सौंपी जाय।"
नियोजित विकास की उपलब्धियों के मूल्यांकन के लिए या कि विक्षोभ
की पद्धति को समझने के लिए भी, शायद यह जरूरी है कि भारत के हाल के
अतीत में कुछ झांका जाय। सन् 1929 तक भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की
घोषित प्रेरणा थी, तत्कालीन ब्रिटिश राजनैतिक पद्धति के अंतर्गत ही किसी
तरह की समानता की उपलब्धि। किंतु दिसम्बर 1929 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
ने ब्रिटिश राज्य से पूर्ण स्वतंत्रता की उपलब्धि का लक्ष्य निश्चित किया और
महात्मा गांधी द्वारा तैयार स्वातन्त्र्य-प्रतिज्ञा में कहा गया - "हमारा विश्वास है
कि हर एक समाज की तरह, भारतीय जन का भी यह अहस्तान्तरकरणीय
अधिकार है कि वह स्वाधीन रहे और अपने परिश्रम के फल का आनन्द ले तथा
जीवन की जरूरतों से इस प्रकार युक्त रहें कि उनके पास विकास के संपूर्ण
अवसर हों। हमारा यह भी विश्वास है कि यदि कोई सरकार लोगों को इन अधि
कारों से वंचित करती है और उनका उत्पीड़न करती है, तो लोगों को यह अधि
कार भी है कि वे उस सरकार को बदल दें या समाप्त कर दें। भारत में ब्रिटिश
सरकार ने न केवल भरतीय जनों को स्वाधीनता से वंचित किया, अपितु जन
समुदायों के शोषण की भी अपनी बुनियाद बनायी है तथा भारत का आर्थिक,
राजनैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विनाश किया है। इसीलिए हमारा
विश्वास है कि भारत को ब्रिटिश संबंध तोड़ देना चाहिए और पूर्ण स्वराज प्राप्त
करना चाहिए (गांधी वाङ्मय, अंग्रेजी, खंड 42 पृष्ठ 427) ।" यहाँ, स्मरणीय है
कि इस समय तक और आगे भी सन् 1934 तक जब तक कि गांधीजी काँग्रेस
की सदस्यता से मुक्त नहीं हो गये; सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज और प्रस्ताव गांधी
जी स्वयं तैयार करते थे।
अंग्रेजों ने भारत का आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक
विनाश किया है और पूर्ण स्वराज पाने पर ही भारतीय जन विकास के पूर्ण
अवसर पायेंगे, यह मुद्दा एक हद तक उस भारतीय संविधान द्वारा भी पुनः पुष्ट
किया गया जो कि भारत ने जनवरी 1950 से अपने पर लागू किया। उसमें
प्रतिज्ञा की गयी थी कि सभी नागरिकों के लिए सुनिश्चित होगा -
न्याय : सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक।
स्वाधीनता : विचारों, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और उपासना
की।
समता : स्थिति और अवसरों की तथा सभी के बीच बढ़ायी जायेगी
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व्यक्ति की गरिमा और देश की एकता को आश्वस्त रखने वाली बन्धुता।
इन्हीं विचारों और प्रतिज्ञाओं के अनुकूल प्रथम योजना आयोग के
गठन संबंधी भारत सरकार के मार्च 1950 के प्रस्ताव में कहा गया था- "भारतीय
संविधान ने अपने देश के नागरिकों को कतिपय बुनियादी अधिकारों की गारंटी
दी है तथा राज्य के कुछ नीति-निर्देशक सिद्धांत प्रतिपादित किये हैं। विशेषकर
यह कि सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय वाली सामाजिक व्यवस्था
की प्राप्ति और सुरक्षा के जरिए लोगों के कल्याण के प्रोत्साहन हेतु राज्य
प्रयासरत रहे एवं राष्ट्रीय जीवन की समस्त संस्थाओं को इससे अवगत कराये
तथा अन्य के साथ ही, इन बातों की प्राप्ति की दिशा में अपनी नीतियां निर्देशित
करें :
(अ) कि समस्त नागरिक नर-नारियों को समान रूप से आजीविका का
उचित जरिया पाने का अधिकार हो।
(ख) कि समाज के भौतिक साधन-स्रोतों के स्वामित्व और नियंत्रण का
वितरण ऐसे किया जाय कि सर्वोत्तम रीति से सबका सामान्य हित
पोषित हो।
(ग) कि आर्थिक व्यवस्था इस तरह से क्रियाशील हो कि उसके फल
स्वरूप सर्वसाधारण के लिए हानिकारक रूप में धन और उत्पादन के
साधनों का केंद्रीकरण न होने पाये।" (प्रथम पंचवर्षीय योजना दिसंबर
1952, भूमिका)।
यद्यपि 1930 की स्वाधीनता की प्रतिज्ञा की शब्दावली का किसी सीमा
तक संविधान में समावेश किया गया और वह भारत के नियोजित विकास का
निर्देशक विचार (सिद्धांत) बनी, तथापि ऐसा प्रतीत होता है और पिछले तीन
दशकों की प्रवृत्तियों तथा घटनाओं से पुष्ट भी होता है कि व्यवहार में उसे
अधिक गंभीरता से नहीं लिया गया, विशेषकर उनमें से ज्यादातर लोगों के द्वारा
जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में नेतृत्व के पदों पर अथवा स्वाधीनता पाने पर
दिल्ली में बनी सरकार के प्रमुख पदों पर थे। शायद उनके लिये यह प्रतिज्ञा
वाग्मिता थी या आलंकारिक उक्ति। पूर्ववर्ती यथार्थ का या भविष्य के लक्ष्यों
का कथन शायद उनकी दृष्टि में उस प्रतिज्ञा में अभिव्यक्त नहीं हुआ था। यह
सही है कि भारत के राजनैतिक और आर्थिक विनाश के प्रेक्षण को बड़े पैमाने
पर मान्यता मिली। किन्तु, भारत का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विनाश किया
गया है, और जिसका निहित अर्थ है कि इस समाज को विघटित और विस्थापित
किया गया है, और उसके जनसाधारण के आत्मगौरव का अत्यंत हनन हुआ है,
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