स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)
Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan
धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा
पृष्ठ 20, कुल 50 में से
संदर्भ में पढ़ेंवह हीनता फिर से भर दी। उनका यह सबसे बड़ा योगदान है कि उन्होंने लोगों
के मन में यह बिठा दिया कि तुम दरिद्र हो। बेकार हो। नतीजा? गाँव में पंचायत
भी बनेंगी तो उसे वह सुपरवाइजर चाहिए जो सब कुछ सरकारी जुबान में
बदल कर रख दे।
जब तक हम इस खोए हुए आत्मविश्वास को फिर से वापस नहीं लाते
तब तक न देश स्वदेशी चल सकता है और न विदेशी। चीजों को देखने का पूरा
नजरिया ही बदल गया है। आज बहुत से लोग यह कहने में संकोच नहीं करते
कि हिंदुस्तानी तो फेंकी हुई पालीथीन की थैली से भी नई थैली बना लेता है।
यह कहने वालों की भी कमी नहीं है कि इसमें लगे लोग अच्छी तरह कमाई भी
कर लेते हैं। पर वे यह नहीं देखते कि यह तो कंगाली का ही आलम है। ऐसा
काम कोई प्रेम से नहीं किया जा रहा है। ये भंगार (कूड़ा–करकट) बीनने–बटोरने
वाले कैसी जिंदगी जी रहे हैं, यह भी आंखों से ओझल कर दिया जाता है। हम
यह भूल जाते हैं कि इससे जो चीज साबित होती है, वह यह है कि हमारे लोगों
में जीवट अदम्य है। आम लोगों को हिकारत से देखने का नजरिया कलेक्टरों,
ऊँचे वर्गों और राजनीतिज्ञों में ही नहीं है, सेवाग्राम और पवनार जैसी ऊंची
जगहों में भी आए नवयुवकों को यही सिखाया जाता है कि गांव वालों से ज्यादा
संपर्क न करो। ये अच्छे लोग नहीं हैं। जरूरी नहीं कि यह मानसिकता अंग्रेजों
की ही दी हुई हो। यह मानसिकता हमारी वर्णव्यवस्था और मनुवाद से भी
निकली हुई हो सकती है। पर जब तक यह मानसिकता बरकरार है, तब तक
देश का आम आदमी खड़ा नहीं हो सकता। और जब तक वह नहीं खड़ा होता,
तब तक न तो स्वदेशी चल सकता है न विदेशी।
अपने को हीन देखने और अपनेपन को छोड़ने की यह बुराई क्रमशः
विकसित हुई है। दरअसल, यह 500–600 साल पुरानी ही है। कमजोरी पहले
भी रही होगी। पर जब तक अपने तरीके से काम चलता रहा, आक्रमणकारी
आते रहे और इसी व्यवस्था में जातियों आदि के खाने में खपते रहे, मूल्यों पर
कोई बड़ा आक्रमण नहीं हुआ, तब तक शिथिलता सामने नहीं आई। मुसलमानों
का प्रभावी राज्य तो 1700 के आसपास ही खत्म हो गया। इसके बाद तो
राजे–रजवाड़े जगह–जगह खड़े हो गए। देश को पुनर्जीवित करने की कोशिशें
भी हुईं। इस प्रकार की कोशिशें विजयनगर साम्राज्य ने की। मराठों ने भी की।
चैतन्य जैसे लोगों ने किया। पर समय नहीं मिला। 1748 में तो यूरोप का बड़ा
हमला ही देश पर हो गया। इस बीच 100 साल भी मिल गया होता तो भारत
पश्चिम को उसी तरह समझ लेता जैसे जापान ने समझा। लोग बिलकुल ही सो
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नहीं रहे थे। 1754–55 में बंगाल के नवाब अलीवर्दी खां कहते हैं कि ये यूरोपियन
कहते तो यह हैं कि वे लड़ आपस में रहे हैं। पर कब्जा हमारी जमीन पर करते
जा रहे हैं। और अंग्रेज तो इनमें सबसे खतरनाक हैं। तो हमारे लोगों में समझनेवालों
की कमी नहीं थी पर उन्हें कुछ करने का वक्त नहीं मिल पाया।
अंग्रेजों ने राज्य मुसलमानों से नहीं छीना। राज उन्होंने इन हिंदू
राजे–रजवाड़ों से ही छीना। पर उन्हें मुसलमानों से राज छीना दिखा कर अपने
शासन के लिए वैधता कायम करनी थी। राजनीति में मुसलमान कोण घुसाना
था। इसलिए बार–बार दिल्ली से राज लेने की बात कही गई; 1756 से पहले
फारसी बंगाल की भाषा नहीं थी। कर वसूली में फारसी लिपि अंग्रेज लाए।
मुस्लिम प्रतीकों को दक्षिण में मुसलमान भी नहीं ले जा सके थे। अंग्रेजों ने इन
प्रतीकों को दक्षिण में भी कायम कर दिया। सर थामस रों जहांगीर के दरबार में
आता है। और जहांगीर उससे कहता है कि सूरत वगैरह से पश्चिम में व्यापार
के लिए जाने वाले हमारे जहाजों की आप रक्षा कीजिए। तो दिल्ली की बादशाहत
तो उसी दिन खत्म हो गई। ऐसा इसलिए किया गया कि जहांगीर का भारत से
लगाव नहीं था। तुम भी विदेशी और हम भी विदेशी। अकेले जहांगीर ही नहीं,
ऐसे लोग और भी रहे हो सकते हैं। हमें समय मिलता तो हम भी सुधर जाते।
1855 में जापान को समर्पण करने का अमेरिकी अल्टीमेटम मिलता है। समर्पण
करना पड़ता है। 10–15 साल वहां भी समाज में तूफान चलता है पर जापान
पश्चिम के तरीके से सैन्यीकरण के रास्ते पर चलने का फैसला करता है। अपने
लोगों को सीखने के लिए बाहर भेजता है। थोड़े समय के लिए प्रशिक्षण देने को
बाहर के लोग बुलाए जाते हैं। और आज कई मामलों में वह अमेरिका से आगे
है। जापान की जीत पर गांधीजी बहुत खुश होते हैं। हिंसा–अहिंसा का सवाल
नहीं उठाते। उसांस भरकर यही कहते हैं कि पर हिंदुस्तान में ऐसा नहीं हो
सकता।
अंग्रेजों ने हमारी मानसिकता को पश्चिमीकरण की ओर सायास मोड़ा।
मानसिकता बदलने का काम उन्होंने 100–150 साल में किया। इसके लिए
आधार भी हमारी पोथियों में ही जुटाए गए। हर पुराने समाज में हर तरह के
विचार पड़े रहते हैं। जो हित के होते हैं, वे उभर कर रहते हैं। बाकी कोने में पड़े
रहते हैं। उन कोने में पड़े विचारों की पोथियां भी बनी हो सकती हैं। विदेशी
शासन अपनी वैधता ढूंढने के सिलसिले में उस समाज के भीतर से ही अपने हित
के मूल्य इस तरह से ढूंढता है कि वे विदेशी और थोपे हुए न लगें। इस कोशिश
में उन्होंने मनु को हमारे समाज के मानक के तौर पर उठा कर सामने रख दिया।
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