स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)
Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan
धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा
पृष्ठ 15, कुल 50 में से
संदर्भ में पढ़ेंगवर्नर मॉडल। गांधीजी को शायद लगा कि अंग्रेजों से लड़ाई उनके जैसा
केंद्रित मॉडल बनाकर ही लड़ी जा सकती है। तो वैसा ही मॉडल बना तो उसे
चलाने के लिए वैसे ही लोग भी आगे रखने थे।
इस युद्ध में नेहरू पश्चिमी मॉडल के प्रतीक हैं। गांधी भी उन्हें ऐसा ही
मानते हैं। पर यह भी मानते हैं कि नेहरू को मोड़ा जा सकता है। वे सोचते हैं कि
पश्चिमी मॉडल को हराने के लिए इस नेहरू को जीतना है। इसे जीत लिया तो
फिर सबको जीत लिया। उन्हें अपनी जीत का भरोसा भी होता है। पर यह जीत
वे हासिल नहीं कर पाते। गांधी अंतरराष्ट्रीय ताकतों के दखल को भी ठीक से
समझ नहीं पाए। यह मान कर चलते रहे कि उनकी कोई दखलंदाजी नहीं होगी
और सब कुछ आपस में सुलटने के लिए जस का तस स्थिर रहेगा। पर 1944 के
बाद तो इन ताकतों ने गांधीजी को हाशिए पर ठेल दिया।
नेहरू? 1945 में तो नेहरू ने साफ कहा कि गांधी के स्वदेशी राग को
उन्होंने कभी विचार के लायक भी नहीं माना। कांग्रेस ने भी स्वदेशी की बातचीत
1937 में ही छोड़ दी थी। नेहरू तब तक बड़े नेता बन चुके थे। गांधी मूल में
सभ्यता का संघर्ष तो लड़ रहे थे, पर उनका मूल प्रश्न पहले आजादी हासिल
करने का था। उन्हें समझौते करके चलना पड़ता था। उनकी मजबूरी उस
सेनापति की मजबूरी थी, जो अपनी सेना की टूट नहीं चाहता। वे सोचते थे कि
युद्ध में सबको साथ लेकर चलो। आजादी मिली तो फिर सब कुछ संभल
जाएगा। उन्होंने पश्चिमपरस्त लोगों और उनके नेता नेहरू को संतुलित करने
के लिए कोशिशें कम नहीं कीं। गांधी सेवा संघ बनाया गया। संघ पश्चिमपरस्त
तबके के खिलाफ दबाव बनाने का साधन था। 1938 में नेहरू जब विदेश जा
रहे थे तो उन्होंने संघ के खिलाफ हमले का बिगुल बजाया कि संघ राजनीति
कर रहा है। फिर सुभाष चंद्र बोस लाबी मजबूत बनी तो महात्मा गांधी को 1940
में संघ को सस्पेंड करना पड़ा। विसर्जित उन्होंने नहीं किया। कहा कि फिर
जिंदा करने की जरूरत पड़ सकती है। गांधी पर सबसे बड़ा दबाव तो टैगोर का
पड़ता था। सुभाष नेशनल प्लानिंग कमेटी गठित करना और नेहरू को उसका
अध्यक्ष बनाना चाहते थे। तो मेघनाद साहा जुटे। टैगोर से बात हुई। टैगोर ने
गांधी को मनाया। नेहरू अध्यक्ष बने। नतीजतन विकास का पश्चिमी मॉडल
कांग्रेस के नीति मॉडल में हावी हो गया। और गांधीजी ने नेहरू को अपना
उत्तराधिकारी ही कौन-सा घोषित किया। 1940 की कांग्रेस कार्यसमिति में
गांधी बोस वगैरह के खिलाफ अपने लोगों की एकतरफा जीत चाहते हैं। नेहरू
समर्थक एक तिहाई हैं। तो समर्थन लेने के लिए बातचीत में कह देते हैं कि मेरा
26
उत्तराधिकार तो नेहरू को ही मिलेगा। असली खेल बाद में हुआ। कुछ दिनों
बाद अखबारवाले गांधी के पास पहुंचते हैं। और उनसे सवाल पूछ-पूछ कर मुंह
से निकली बात को कबूलवाया जाता है। बात रिकार्ड में ला दी जाती है। नेहरू
इसे गांठ में बांध लेते हैं। और जब वक्त पड़ता है तब यह बात 1944 में उछालकर
सामने ला दी जाती है।
महात्मा गांधी जब ताकत में रहते हैं, उनके सामने सब कुछ दबा रहता
है। पर ताकत कम होते ही मामला उलट जाता है। 1927 में नेहरू विदेश प्रवास
से लौटकर आते हैं तो उनको आगे कर आजादी का प्रस्ताव पास किया जाता
है। आजाद रूप से। इसमें गांधीजी के स्वदेशी, स्वराज आदि के संदर्भों में
उन्होंने 1920 से जो कुछ किया, उसको चुनौती है। गांधी चौंकते हैं। और फिर
जनवरी 1928 में एक-दूसरे को चिट्ठियां लिखी जाती हैं। गांधी आर-पार
लड़ाई की चुनौती दे डालते हैं। आजादी बनाम स्वराज का लेख लिखते हैं।
जानते हैं कि आज कौन लड़ेगा। सबक सिखा रहे हैं। और मामला वहीं खत्म
कर देते हैं। पर दूसरे ? दो टूक शब्दों में कहूं तो नेहरू और उनके लोगों ने
पिछले 50 साल में गांधी के साथ चौतरफा बदला लिया है। उन पर गिन-गिन
कर अनगिनत हमले किए हैं। उन्हें अपमानित करने की कोई चेष्टा नहीं छोड़ी
है। गांधी से उनका युद्ध अभी भी जारी है।
27