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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 50 में से

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पृष्ठ 28

यहाँ दोनों पृष्ठों का संपूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

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प्रतिष्ठा समाप्त की गई है तथा उनकी पहल की क्षमता रौंदी गई है, प्रतिज्ञा के
इस आशय वाले वाक्यांश की उन लोगों के बीच और काम पर कोई अनुकूल
प्रतिक्रिया नहीं परिलक्षित हुई, जिन्होंने 1986 के बाद आगे भारत में शासन
करना शुरू किया। लगता है कि वे (और सचमुच इनमें व्यावहारिक रूप से
भारत के विशेषाधिकार भोगी हर तबके के लोग शामिल थे, भले ही वे किसी भी
विचारधारा का अनुमोदन करते हों) अपने आसपास के संसार की चकाचौंध से
ज्यादा ही चौंधिया गये थे। साथ ही जिन सामाजिक और आर्थिक सैद्धांतिक
स्थापनाओं से उनके विचारों की बुनियाद रची गयी और जो इतिहास उन्होंने
पढ़ा (इनमें से ज्यादातर इतिहास-ग्रन्थों का उद्गम पश्चिम में मुख्यतः
अंग्रेजी-भाषी इलाकों में हुआ था) उसमें वे अभिभूत दिखते हैं। यहां तक कि
दिसम्बर 1953 में भी पंडित जवाहरलाल नेहरू का विश्वास था कि "पिछले दो
हजार वर्षों के विश्व-इतिहास के मानव-जीवन को परिवर्तित करने वाला कोई
भी तत्व, इतना शक्तिशाली नहीं रहा, जितना कि औद्योगिक क्रांति और उसकी
अनुगामी क्रियाएं"। जरूर वे यह भी सोचते थे कि अपने जोखिम भरे नजरिये के
सिलसिले में वे "जनता के विशाल समूह को विश्वास में लें" और उन्होंने देखा
कि "जनता के विशाल समूह में यह उत्तेजना भरनी होगी कि वे राष्ट्र को गतिशील
रखने के विराट उद्यम के सहभागी हैं, सरकार में और उद्योग में साझेदार हैं।"
(दृष्टव्य-जवाहरलाल नेहरूः भाषण (अंग्रेजी में) खंड 3, पृष्ठ 59, 60, "बैलगाड़ी,
मोटर गाड़ी, जेट विमान, "1958 में प्रकाशित)।
ऐसी सहभागिता के लिये पंचायती राज इत्यादि विविध कार्यक्रमों के
जरिए आधे-अधूरे मन से प्रयास किये गये। किन्तु इन योजनाओं और कार्यक्रमों
का भी गठन शेष भारतीय राज्य पद्धति की ही तरह हुआ था और शीघ्र ही वे भी
उसी गतिरोध की स्थिति में जा फंसे।
विकास में लोगों की भौतिक शारीरिक सहभागिता की कुछ गुंजाइश
जरूर थी, किंतु चाहे सिर्फ शासन तंत्र हो या विकास का मामला, किसी में भी
हम ऐसे मार्ग नहीं खोज पाये, जिनके जरिए भारत के छत्तीस करोड़ (उपर्युक्त
भाषण-पुस्तक के पृष्ठ 4 के छपे भाषण का, जो पंडित नेहरू द्वारा 13 अक्टूबर
1954 को दिया गया था, शीर्षक 'छत्तीस करोड़ समस्याएं') लोग सामूहिक तौर
पर अपनी मेधा एवं प्रतिभा उस दिशा में तथा उन कामों में लगा सकें, जिन्हें वे
उपर्युक्त समझते हैं तथा जो वे सृजन करना चाहते हैं। यह बात अब भलीभांति
विदित हो चुकी है कि जो नई वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं स्वाधीन भारत में स्थापित
हुईं तथा जिन महान वैज्ञानिकों ने उन्हें संचालित-निर्देशित किया, उनके पास
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कम से कम 1950 के दशक तक जन सामान्य की महत्वपूर्ण समस्याओं की
तरफ ध्यान देने की फुरसत नहीं थी। एक अर्थ में, लोगों को फिर सन् 1915 की
स्थिति में धकेल दिया गया, जबकि सार्वजनिक सामाजिक जीवन में महात्मा
गांधी का उदय हुआ था और तब उन्हें सार्वजनिक जीवन में वापस लाया गया
था। अपने शुभेच्छु विदेशी मित्रों की तरह, जो तब भी ऐसा सोचते थे और अब
भी सोचते हैं, हम लोग भी यह मान बैठे कि ये सामान्य भारतीय देशवासी अपनी
मानसिक क्षमता पूरी तरह खो बैठे हैं और सांगठनिक मामलों में या कि तकनीकी
के क्षेत्र में किसी सृजनात्मक योगदान की उनमें क्षमता नहीं है। हां, वे दैहिक बल
या यांत्रिक दुहराव की अपेक्षा वाले कार्यक्रमों में अपना योगदान दे सकते हैं।
यहां यह उल्लेख भी प्रासंगिक होगा कि आधुनिकता की शक्तिशाली
धार के दबाव से अप्रभावित अनेक व्यक्ति एवं समूह 1950 में, और आगे भी,
भारत में मौजूद रहे हैं (व्यक्तियों में से कुछ-एक के नाम गिनाने हों तो राममनोहर
लोहिया, जयप्रकाश नारायण और आचार्य विनोबा भावे के नाम लिये जा सकते
हैं)। ऐसे अनेक व्यक्ति थे जिन्होंने दिल्ली के शक्ति केन्द्र द्वारा संचालित प्रक्रिया
के विरुद्ध व्यापक सार्वजनिक असहमति को वाणी दी थी। कई समूहों ने,
विशेषकर समाजवादियों ने, छोटी मशीनों की बात भी कही (शायद भारत के
लिये उपयुक्त प्रौद्योगिकी के संदर्भ में, जो कि स्वदेशी उपकरण, माल तथा
साधनों से विकसित हो सके) तथा "चौखम्भा राज्य" आदि शब्दावलियों के
सहारे देश के लिये अधिक उपयुक्त राजनैतिक ढांचे की बात कही और
दीर्घकालिक सामाजिक एवं रचनात्मक सेवा-कार्य के लिये विशाल भूमिसेना
की बात की। सम्पूर्ण गांव की ग्राम सभा, ग्राम-समुदाय तथा लोक-शक्ति के
विचार के आधार पर भारतीय राजनैतिक स्वरूप (पॉलिटी) को पुष्ट करने वाला
सर्वोदय आंदोलन भी उभरा। किन्तु सामान्यतः बड़े पैमाने पर इन विचारों का
स्वर अधिकांशतः अस्पष्ट और अस्फुट था। इन संदर्भ में एक बुनियादी
दस्तावेज जो 1958 में सामने आया वह था-जयप्रकाश नारायण लिखित "ए
प्ली फॉर द रिकन्स्ट्रक्शन ऑफ इंडियन पोलिटी"।

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जो लोग किसी न किसी तरह भारत के मामलों के प्रबंध से जुड़े हैं,
सार्वजनिक तौर पर उनके द्वारा कही गयी बातें सुनी जायें, साथ ही उनकी
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