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सर्वकोश
स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 50 में से

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से ही सरोकार रखना था। चौथे दशक की नेशनल प्लानिंग की उपसमिति की
वर्धा बैठक में गांधी जी ने कहा कि पहले उत्पादन का लक्ष्य तय किया जाए।
फिर यह आपस में तय हो जाएगा कि कितना उत्पादन देशी तरीके से होना है
और कितना औद्योगिक तरीके से। मामला बस इतना होगा कि संसाधन बाहर
से नहीं आएंगे। दोनों क्षेत्र भीतर के ही संसाधन बरतेंगे। तो व्यवहार को मानक
बनाएं तो कहीं कोई दिक्कत नहीं है। पर नियंत्रण अपना होना चाहिए। अपना
नियंत्रण खत्म हुआ तो न स्वायत्तता रहेगी और न स्वावलंबन।
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आम आदमी की ताकत
पहचानने से ही बनेगा स्वदेशी माडल
गांधीजी खुद स्वदेशी का एक कच्चा-सा मॉडल बना पाये थे। पश्चिमी
रंग में रंगे नेहरू के लिए तो इस कच्चे मॉडल को आगे बढ़ाने का सवाल ही नहीं
था। इसलिए कांग्रेस में नेहरू के शक्तिशाली होते ही गांधीजी का यह कच्चा
मॉडल भी धराशायी हो गया।
देश न स्वदेशी मॉडल पर दृढ़ रह सका और न विदेशी मॉडल अपना
सका। और उसके हाथ में भीख का कटोरा ही है। इसके पीछे क्या कोई और
कारण हैं? आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू और उन जैसे लोगों ने देश की
आम जनता को फिर से उसी आत्महीनता की ओर ठेल दिया, जिस ओर विदेशी
शासन उन्हें पहले ही ठेल चुका था। लोगों को बार-बार इस बात का अहसास
कराया गया कि आप तो 200 साल पिछड़े हो। दरिद्र हो। कमजोर हो। बेकार
हो। जो अच्छा है, और अच्छा हुआ है, वह तो पश्चिम में है। विदेशी शासन के
दौरान देश को बचाए रखने के लिए अपने लोगों की तारीफ करने का तो सवाल
ही नहीं रहा। नेहरू और उन जैसे लोग कभी इस बात के शुक्रगुजार नहीं रहे
कि इन्हीं भुखे और दरिद्र लोगों ने अपनी हड्डियों को निचोड़-निचोड़ कर इस
देश को बचाया है। इन्हीं की कुर्बानी के कारण गुलामी की जंजीरों के बीच भी
यह देश बचा रहा है।
इतना ही नहीं, आजादी की लड़ाई में उमड़े जनसमुदाय को भी यह
कह दिया गया कि जाइए, आपका काम पूरा हुआ। जाकर अपनी खेती-किसानी
करिए। देश हमारे ऊपर छोड़ दीजिए। देश हम संभाल लेंगे। इस बात की कोई
भावना नहीं रही कि आप सबने मिल कर बड़ा काम किया। कुछ विकृतियाँ आई
हैं। आइए, उन्हें हम और आप मिल कर दूर कर लें। लोगों को अहसास कराया
गया कि न्याय तो दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, लखनऊ, पटना, भोपाल से
ही हो सकता है। देश सेंट स्टीफेंस में पढ़े लोग ही चला सकते हैं। आम हिंदुस्तानी
में वह माद्दा कहाँ। वह तो ड्राइंग रूम में ठीक से फर्नीचर रखना भी नहीं जानता।
देश बनाने में उसकी चली तो वह तो देश को बरबाद करके ही रख देगा। 1920
तक तो इस देश के आम आदमी को हीन कहा ही जा रहा था। नेहरू ने लोगों में
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