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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 50 में से

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पृष्ठ 26

संवेदनाहीन, बेहद धीमी, और बेहद खर्चीली है”। बेंगलोर में राजाजी जयन्ती पर
व्याख्यान देते हुए जम्मू कश्मीर के राज्यपाल बी. के. नेहरू ने इसी सिलसिले में
आगे कहा कि भारतीय संविधान को अपूर्ण कहने का कोई उपयोग नहीं है।
उन्होंने सुझाव दिया कि हमें अब ऐसी संस्थायें बनानी होंगी, जो अपने समाज में
अंतर्निहित प्रवृत्तियों के अनुरूप हों। साधारण नेतृत्व इन्हें नहीं समझ सकता।
जिस बड़े नये परिवर्तन का उन्होंने सुझाव दिया, वह था "परोक्ष निर्वाचन की
पद्धति के साथ-साथ विधायिकाओं के चुनावों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की
व्यवस्था। सीधे चुनाव सिर्फ पंचायतों या नोटीफाईड एरिया कमेटियों या नगर
पालिकाओं अथवा नगर निगमों के लिये हो। इससे अगली कड़ी इस पद्धति में
होंगी जिल्हा परिषदें जो कि विधानमंडलों को चुनेंगी। राज्य विधान मंडल द्वारा
केंद्रीय विधायका की लोकसभा का निर्वाचन किया जायेगा।” (देखें हिंदु, मद्रास,
जनवरी, 1983)
कुछ ही समय पहले भारत एशियाड 1982 की मेजबानी कर चुका है।
यह सच है कि उसकी तैयारी तीन-चार साल चली और इस संदर्भ में अस्सी
करोड़ से बारह सौ करोड़ रुपयों तक खर्च होने की कथाएँ कही गई हैं। यह
रकम दिल्ली महानगर को एशियाड 82 के लिए तैयार करने में खर्च हुई। उसके
बाद, जैसा कि स्पष्ट हुआ, इस तैयारी का भारतीय खेल क्षमता पर कोई प्रभाव
नहीं पड़ा दिखता। खेलों में उँचा स्थान भारत को नहीं पूर्वी एशिया के चीनी
गणतंत्र और दोनों कोरिया जैसे देशों को मिला। जापान का अग्रणी रहना तो
अप्रत्याशित नहीं था। खेलों में तो भारत बेहतर भूमिका नहीं निभा पाया पर तो
भी हिसाब लगाने में दक्ष लोग हिसाब लगाकर बता रहे हैं कि एशियाड की
मेजबानी से हमें क्या-क्या लाभ हुए। सामान्यतः यह दावा किया गया है कि इस
एशियाड की तैयारी में हमने अपनी उस तकनीकी दक्षता का अनुभव बढ़ाया जो
कि विकसित देश ही रखते हैं। यातायात नियंत्रण को अबाध बनाये रखने और
एशियाई खेलों के दौरान कानून और व्यवस्था के विधाताओं द्वारा साधारण
भारतीय पदयात्री के साथ सहानुभूति व्यक्त करने में भी हम विकसित देशों
द्वारा ऐसे अवसरों पर किये जाने वाले व्यवहार से पीछे नहीं रहे। अंतरराष्ट्रीय
व्यापार में तथा विश्व मामलों की हमारी सरकारी समझ में प्रगति के भी लाभ
गिनाये जाते हैं। इन खेलों का विशेषतः जिमनास्टिक और कसरती संस्कृति
वाले खेलों का भारत के सामान्य बच्चों की खेल-चेतना पर क्या प्रभाव पड़ा यह
जानकारी महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है।
एशियाड 82 की मेजबानी जैसी अनेक घटनाएं विभिन्न क्षेत्रों में भारत
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की उपलब्धियों के तौर पर गिनाई जा सकती हैं। और इनमें से अधिकतर, मार्च
1950 में प्रथम योजना आयोग के गठन के जरिए प्रारंभ योजना एवं विकास की
प्रक्रिया का परिणाम बताई जा सकती हैं। बहरहाल पिछले दो दशकों से भारत
में इस नियोजित विकास के प्रति विक्षोभ जगा है। हाल ही में यह विक्षोभ तीव्रतर
हुआ है। यह विक्षोभ सिर्फ हमारी आवश्यकता को देखते हुए अत्यधिक पर्याप्त
विकास के कारण ही नहीं है बल्कि इससे भी ज्यादा इस बात को लेकर है कि
क्या सिर्फ इन्हीं परिणामों के लिए भारत में 1920, 1930 तथा 1940 के दशकों
में स्वाधीनता-आंदोलन छेड़ा था।
इसी संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि संविधान सभा में नवम्बर
1948 में इस प्रश्न पर गरम झड़प हो गई थी कि संविधान में भारतीय गाँवों का
स्थान क्या हो ? संविधान का मसविदा वकीलों की एक समिति ने तैयार किया
था। इनमें से सिर्फ एक ने ही समिति के वास्तविक विचार-विमर्श में जमकर
भाग लिया। इस मसविदे से संविधान सभा के बहुत कम सदस्यों को संतोष
हुआ। सदस्यों का सामान्य अभिमत यह था कि यह मसविदा भारतीय चिंतन
एवं विचार का विरोधी है। सदस्यों ने आश्चर्य से पूछा कि यह किसके कल्याण
के लिये है ? श्री टी. प्रकाशम् ने पूछा- "यह मुट्ठीभर लोगों के हित-साधन के
लिये है या इसमें उन करोड़ों लोगों के भी हित का कहीं विचार है, जो राजस्व
और कर देते हैं?” कुछ अन्य लोगों का मत था - "गांधीजी का और काँग्रेस का
दृष्टिकोण यह रहा है कि भारत का भावी संविधान पिरामिड - जैसी संरचना
वाला होगा और ग्राम पंचायत उसकी बुनियाद होगी।" इस स्तर पर संविधान
सभा के सदस्यों और मसविदा समिति के बीच मध्यस्थता-सी कर रहे श्री के.
संथानम् तक का यह मत था कि ग्राम पंचायतों के अस्तित्व को संविधान में
मान्यता देनी होगी, क्योंकि "आगे चलकर हर गाँव की स्थानीय स्वायत्तता से ही
इस देश की भावी स्वाधीनता का आधारभूत ढाँचा निर्मित होगा।" बहरहाल,
अनेक कारणवश यह संविधान बदला नहीं गया। जिनमें से एक कारण यह कहा
जाता है कि बुनियादी मसौदे को बदलने की दृष्टि से बहुत विलम्ब हो चुका था।
लेकिन शायद बड़ा कारण यह था कि इस परिवर्तन के प्रति डॉ. भीमराव
अम्बेडकर जैसे लोग और संभवतः पंडित नेहरू तथा सरदार पटेल भी (दोनों ही
इस पूरी बहस में मौन रहे थे) अनुत्साही, अनादर-युक्त तथा आक्रामक दिख
रहे थे। किया सिर्फ इतना गया कि संविधान सभा के विक्षुब्ध सदस्यों को शांत
करने हेतु संविधान में एक अतिरिक्त अनुच्छेद जोड़ा गया (वर्तमान में अनुच्छेद
40)। इसमें राज्य से कहा गया था कि "ग्राम पंचायतों को संगठित करने के लिए
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