स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)
Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan
धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा
पृष्ठ 22, कुल 50 में से
संदर्भ में पढ़ेंपर आज भी पश्चिमीकरण को मानने वालों की संख्या हमारे समाज में
दो फीसदी से ज्यादा नहीं है। ऊपरी तबके के कुछ लोगों के अलावा ये सरकारी
और गैरसरकारी संगठित क्षेत्र में केंद्रीकृत व्यवस्था में जी रहे जो तीन करोड़
लोग हैं, उनकी तनख्वाह दूसरों से तिगुनी है, पश्चिमीकरण का व्यामोह उनमें ही
है। उनमें निचले स्तर पर तो देखादेखी का ही मामला है। फिर विदेशों में गए
हमारे कुछ व्यावसायिक क्षेत्रों से जुड़े लोग हैं। और उनके यहाँ के नाते-रिश्तेदार
हैं, जो उनकी उपलब्धियां बखानते जी रहे हैं। हमारे यहां विदेश रिटर्न होना भी
उपलब्धि माना जाता है न इसलिए ! गांधीवादी आश्रमों में भी विदेश आते-जाते
हिंदुस्तानी को सफल हिंदुस्तानी कहा जाता है न ! बीच में 1954 में यह होने
लगा था कि विनोबा के बारे में पश्चिम क्या सोचता है ? इस विसंगति पर पूछने
पर अंदरखाने बताया जाता था कि पश्चिम में आदर मिल जाता है तो इसलिये
यहां दिल्ली में भी सुनवाई होने लगती है। अपनी बात के समर्थन में किसी
पश्चिम के व्यक्ति की बात न आए तो फिर क्या। आजकल तो भाजपा वालों के
भी भाषण विदेशियों के दो दर्जन उद्धरणों के बगैर पूरे नहीं होते। लेकिन इन
सबमें से कुल मिलाकर पश्चिमीकरण के असली हिमायतियों की संख्या दो
फीसदी के भीतर ही है।
पर पश्चिमी मॉडल हमारी व्यवस्था में बैठ गया है। यह व्यवस्था तो
ऊपर के स्तर पर अफसरों से बात करने के लिए बनी थी। पर वही चली आ रही
है। कांग्रेस ने ही नहीं, समाजवादियों, भाजपा आदि सबने वही मॉडल लिया।
वकीलों, डॉक्टरों आदि की भी संस्थाएं उसी मॉडल पर बनीं। 70-80 साल में
जिन लोगों ने मॉडल बनाया वे हिंदुस्तानी मॉडल को समझ ही नहीं सके। बनाने
वाले लोग थे तो वही विद्वान लोग। सेंट स्टीफेंस वाले। पर इनका नाता अपने
समाज से टूट गया था। हमारे यहाँ यह जो अति पर न जाने की बात है, चीजों
को जो नाशवान देखा जाता है, जो संयम बरतने की बात है, वह तुलसीदास का
बरसात की रात में ससुराल पहुंच जाना जो उनकी पत्नी को भी नहीं भाया न,
उसे देखते हुए यह परखने की कोशिश ही नहीं हुई कि इस व्यवस्था में भी
शक्ति और सत्य का शिखर बनाया जा सकता है ? कोशिश होती तो शायद
कोई संभावना उसके भीतर से भी निकलती। पर बात तो ऐसी बैठी है कि अब
सहकारी संस्थाओं का जो साल फसलों से जुड़ा था, 30 जून को पूरा होता था,
वह भी अब 31 मार्च को पूरा होने लगा है। तमिलनाडु सरकार लोगों को पानी
पीने के लिए जो मटके बांटती है, वे भी प्लास्टिक के ही होते हैं। देहातों तक में
आज 90 फीसदी माल हिंदुस्तानी नहीं रहा है।
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यह स्वदेशी वाले अब रोते हैं कि गाँव उजड़ गए। दस्तकार उजड़
गए। 30-40 साल पहले कोई बहुत बड़ी गलती हो गई। लेकिन सबसे बड़ी
गलती जो हुई कि गांधी जी को उनके ही लोगों ने जकड़ लिया। गांधी को बहते
व्यक्ति के बदले एक बंद व्यक्ति में तब्दील कर दिया गया। गांधी समय के
हिसाब से चीजों को ढालते हैं, यह भुला दिया गया।
लड़ाई के दौरान कांग्रेस का ढाँचा ब्रिटिश साम्राज्य के ढांचे पर बना।
जिससे लड़ना था, उससे लड़ने के लिए समानता ढूंढ़ी गई। पश्चिमी तरीके के
लोग उसमें रखे गए। माना गया होगा कि समय इन्हें बदल देगा। जो गांधी खादी
को आंदोलन का प्रतीक बनाते हैं, वे ही 1944 में खादी के सम्मेलन में कहते हैं
कि मैं तो कृषि को प्रतीक चाहता था पर दिक्कत देखते हुए खादी को प्रतीक
बनाया। खादी जो बनाए, वही पहनें। बाकी न पहनें। फिर कहते हैं कि गांव में
एक ऐसा आदमी होना चाहिए जिसके पूछे वग़ैर बाहरी व्यक्ति वहां हस्तक्षेप न
कर सके। फिर नई तालीम में 1946 में वे हिंदुस्तान की व्यवस्था के लिए
ओसियानिक सर्कल्स (Oceanic Circles) की बात करते हैं जिसमें सबसे
महत्वपूर्ण समूह इलाका होगा। फिर 1947 में वे काँग्रेस को खत्म करने की बात
करते हैं। इसलिए नहीं कि उसमें बहुत दोष आ गया था। दोष तो 1924 की
बेलगांव काँग्रेस के जमाने में भी था। काँग्रेस को खत्म करने की बात वे इसलिए
करते हैं कि जिस काम के लिए उसका ढांचा बना था, वह काम पूरा हुआ। अब
आजादी के बाद के काम के लिए दूसरे ढाँचे की जरूरत है। उनके करीबी लोगों
ने लोकसेवक संघ आदि बनाकर यह काम करने की कोशिश भी की। गांधी
1946 में जब नोआखाली जाते हैं तो निर्मल बोस उनके साथ रहते हैं। तब गांधी
जी का रोज का कहा या तो रिकार्ड किया जाता है या फिर गांधी जी उसे खुद
लिखते हैं। उस समय के कहे को देखें तो जैसा दुखी उस समय उन्हें हम लोग
मानते हैं, वैसे दुखी वे दिखते नहीं। हिंदू-मुसलमान की कोई बात नहीं। वे तो
इस बात की चर्चा में लगे हैं कि आने वाले भारत को किस तरह का बनाया जाना
चाहिए। फिर 47 में विदेशियों से मिलते हैं। वहां भी यही पुनर्रचना की बात। वे
जो पाकिस्तान जाने की बात करते हैं वह भी वही पुनर्रचना की ही बात है। कोई
मरे हुए लोगों को जिंदा करने नहीं जा रहे हैं वे। जरूरी नहीं कि उससे कुछ
निकलता। पर क्रिया थी। लेकिन उनकी उन्हीं हिंदू-मुसलमान की बातों को
उभार दिया गया और उनकी पुनर्रचना की बात पीछे छोड़ दी गई। इन सबको
समझने की कोशिश होती तो गांधीवादियों की समझ में भी यह आ सकता था
कि पिछले 20-25 सालों में गांधी ने एक कच्चा मॉडल ही बनाया था। और
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