स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)
Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan
धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा
पृष्ठ 24, कुल 50 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो राजा जितना लोकप्रिय हुआ, जरूरत पड़ने पर आम जनता के बीच से
लड़ने के लिए उतने लोग खड़े हो जाते थे। वही सेना बन जाती थी। स्थायी
सेना तो यूरोप में भी 1700 के आसपास ही खड़ी होती है।
भारतीय समाज की मूल इकाई 'कुल' हैं। कुल रक्त संबंधों या फिर
कर्मकांड के प्रतीकों से जुड़े थे। दूसरी मूल इकाई इलाका रही होगी। 1891 की
जनगणना में अंग्रेज बड़े पैमाने पर जातिगत वर्गीकरण करते हैं। प्रारम्भ में
50,000 जातियों की गिनती है। जाटों में 11,000 जातियों की और राजपूतों में
8500 की। लगता है कुलों की गणना जाति के बतौर की गई है। शुरू में दो लाख
के आसपास कुल रहे होंगे जो बाद में 5-7 लाख तक पहुंचे होंगे। पर यह कुल
सात पीढ़ी तक ही स्थिर रहता है। श्राद्ध में तो तीन पीढ़ियों तक ही नाम स्मरण
चलता है। फिर बाकी के लिए अनाम श्रद्धांजलि दे दी जाती है। अब रघु के कुल
की बात चलती है। लेकिन वह बड़ी इकाई है। आपसी पहचान के लिए बीच में
से किसी दादा-परदादा का नाम निकलेगा। तो इस इलाके और कुल के योग से
स्थानीय राजनीतिक इकाई बनती होगी। वही बढ़ कर राज्य बनता होगा।
राज्य भारत बनता होगा। और उसमें से चक्रवर्ती निकलता रहा होगा। अगर
रघु दिग्विजय के लिए निकलते हैं तो कोई विशेष लड़ाई नहीं हुई होगी। जैसे
तूफान के आगे पौधे झुक जाते हैं, फिर खड़े हो जाते हैं, वैसे ही होता होगा।
दिग्विजयी कोई अपने गवर्नर-कलेक्टर तय नहीं करता। केवल आधिपत्य जम
जाने और साल में कुछ भेंट वगैरह आने की बात थी। इस भारतीय मॉडल में
किसी को मिटाने की बात नहीं है। उसे चूस कर कोष भरने की भी बात नहीं है।
कुल और इलाका जुड़े हैं। एक गांव में एक ही कुल के लोग हो सकते हैं। और
कई कुलों के लोग भी। बसावट अक्सर स्वपूरक समूह के रूप में होती थी।
कभी-कभी किसी इलाके में जो प्रभावी कुल रहा, दूसरे भी उसी कुल के कहलाने
लगे। अब जाटों की जहाँ मजबूत खापें हैं, वहाँ गैर जाट भी उसी खाप के मान
लिए जाते हैं। 1891 की जनगणना में अग्रवाल नाम बीसों जातियों में मिलता है।
जातियां बंधी नहीं थीं। बढ़ई का लड़का 20 पीढ़ी बढ़ई ही नहीं रहता
होगा। ब्राह्मण के लिए भी तो मुख्य काम न कर सके तो 20 और काम गिनाए गए
हैं। ऐसे ही काम दूसरी जातियों के लिए भी बताए गए हैं। अंतरजातीय बहाव
कम नहीं रहा होगा। गांधीजी ही जब हरिजन शब्द निकालने लगे तो हरिजनों में
से बहुतों ने कहा कि हम जब बाहर जाते हैं और टीका वगैरह लगाते हैं तो हमें
कोई दिक्कत नहीं होती। गांधी जी ने कहा कि यह भी एक रास्ता है। यह नहीं
कहा कि यह तो धोखा देना हुआ। यह जो चांडाल के अपने को चांडाल कहते
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चलने के किस्से हैं, वे सही नहीं होंगे। ऐसा कहने की जरूरत नहीं थी। इलाके
में हर आदमी जानता है कि कौन क्या है। कोई 500 मील दूर जाकर बसे तो
अपने पिछले को बताना उसके लिए जरूरी नहीं है।
तो जो नया राजनीतिक-सामाजिक उभार आया है, लोगों में
आत्मविश्वास झलका है, वह - या यह मंदिरों के इर्द-गिर्द युवा लोगों
की त्योहारों पर जो भीड़ बढ़ रही है वह - क्या यह वर्ग देश के अपनेपन
की ओर ले जाएगा? मुझे लगता है कि इसमें अपनेपन की और वापसी का
कोई रास्ता बन रहा है। इस समूह की दिशा को जांचा जाना चाहिए। इसे युवा
वर्ग को यदि लगता है कि हमारे बाप-दादा जो कर रहे थे, वह आज के लिए
ठीक नहीं है और इसे यह जो कुछ नया हो रहा है, वह करना चाहिए, तो वह
उसी ओर आगे बढ़ेगा। उदाहरण के लिए यह मद्रास का पीपीएसटी समूह
देखें। एक अमेरिकन महिला उन्हें देखने के बाद लिखती है कि लेकिन ये लोग
क्या कर सकते हैं, ये तो ब्राह्मण हैं। इनकी सुनेगा कौन ? जिस बात को वह
महिला समझी, उसे हम लोग नहीं समझे। तो हम जैसे द्विज मानसिकता के कुछ
लोगों की प्राथमिकता स्वदेशी हो सकती है। पर यदि नए उभरते हुए लोग
अमेरिकी तर्ज पर चलना चाहें तो उनकी बात चलनी चाहिए। और यह जो
बढ़ती धार्मिकता की बात है तो यूरोप में भी विज्ञान के साथ जन्मकुंडली चल
रही है। ये युवा ऐडवेंचर के तौर पर मंदिरों में जाते हों तो उससे स्वदेशी ही नहीं,
दूसरी चीजें भी निकल सकती हैं। नवरात्रि जागरण और फैक्स मशीन बनाने के
गणित में वे शायद मेल बिठा ले रहे होंगे। अभी यह दोनों तरह का दिमाग चल
सकता है। पर समस्या अंत में 100-50 साल बाद आ सकती है। यह
आत्मविश्वास पश्चिमीकरण की गति को तेज भी कर सकता है। अब ये पंजाब
के कारीगर जो छोटी मशीनें जोड़ लेते हैं, वे सिखाने पर हवाई जहाज भी जोड़
सकते हैं। उनकी ओर से नई खोजें भी सामने आ सकती हैं।
यह फैसले का वक्त है। मॉडल पर जनमत संग्रह हो जाना चाहिए।
अगर ज्यादातर लोगों को लगता है कि प्लास्टिक युग में ही जाने में भलाई है,
पिछले पर लौटने में फजीहत है, बाहरी ताकतें पिछले पर साबुत नहीं लौटने
देंगी तो दूसरों को समाज को इस दिशा में जाने में रोड़ा नहीं बनना चाहिए।
ताकि यह काम 10-20 साल में ही पूरा हो जाय। बल्कि कोशिश इस दिशा में
जाने की गति बढ़ाने की होनी चाहिये। वैसे भी समाज उस दिशा में चलना
चाहेगा तो न उसे सर्वोदयी रोक पाएंगे और न समाजवादी। और न संघी।
समाज आगे बढ़कर उसमें से भी रास्ता निकाल लेगा। अब पश्चिम में भी कोई
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