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स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

स्वदेशी और भारतीयता (धरमपाल एवं राजीव दीक्षित - स्वावलम्बी अर्थनीति एवं ग्राम-स्वराज्य दर्शन)

Swadeshi Aur Bhartiyata: Swavalambi Arthniti evam Gram Swarajya Darshan

धरमपाल एवं राजीव दीक्षित विचार पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished50 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 50 में से

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पृष्ठ 23

इसके कच्चेपन को वे बखूबी जानते थे। पर गांधी को तो 'सीज' कर दिया गया।
यह भी भुला दिया गया कि हिंदुस्तानी समाज जमा हुआ समाज नहीं है। उसकी
गति अलग किस्म की है पर गति है। लेकिन चूंकि गति की परिभाषा बदल गई,
आधुनिकीकरण ही उसका पैमाना हो गया, इसलिए अपने समाज के ऐडवेंचर्स,
उसके खूंटे, उसका बहाव नहीं दिखाई पड़ा। तो इसमें तो फिर दरिद्रता ही
दिखाई देती है।

गांधीजी खुद जानते थे कि जो ढांचा लड़ाई के दौरान वे बना रहे हैं
वह कच्चा है। और इसे बदलना है। लोगों ने जब कहा कि अंत्यज शब्द खराब
है इसे बदल देना चाहिए। तो गांधी जी ने कहा कि पहले तो ठीक ही रहा होगा।
फिर लोगों के सुझाव पर हरिजन शब्द लाते हैं। इसलिए नहीं कि यह शब्द
हजारों साल चलने वाला है। इस शब्द से उन्हें कोई विशेष लगाव नहीं है। वे तो
समय के हिसाब से व्यवस्थाएं बना रहे हैं। और हरिजन शब्द समय के मुताबिक
सही लगता है, तो मान लेते हैं।

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भारतीय मॉडल सपत्ति जाडने

का नहीं बंटवारे का है

विकास के स्वदेशी और पश्चिमी मॉडल के बीच का असली फर्क
क्या है? यह फर्क केंद्रीकृत और विकेंद्रीकृत मॉडल का है। फर्क संपन्नता का
नहीं है। केदारनाथ मंदिर की संपत्ति के कागजात लंदन में पड़े हैं। नेपाल के
राजा ने कुछ जमीन मंदिर के नाम की थी। मंदिर का मुख्य खर्च यात्रियों को
खाना खिलाना था। संपत्ति पत्र में इस बात का भी निर्देश है कि हर यात्री को
खाने का खर्च कितना देना है। वहाँ आय जोड़ने का प्रावधान नहीं है। कुछ बच
जाए तो फिर उसे 12 साल में जो कुंभ होता, उसमें खर्च ही कर देना है।

सम्राट हर्ष वर्धन का मामला भी सामने ही है। हर साल की आय वे
खर्च कर देते हैं। और स्थिति यह रहती है कि यमुना में नहाकर बाहर निकलने
पर बहन राजश्री की ओर से भेंट में दिया वस्त्र ही उनकी कुल पूंजी होता है।
भारतीय मॉडल इन सबसे निकलता है या ये सब उस मॉडल के प्रतीक हैं।
भारतीय मॉडल संपत्ति जोड़ने का नहीं है, उसके बंटवारे का है।

मुगल बादशाहों के खर्चे के हिसाब देखने के लिए पड़े हैं। बादशाह का
खर्च उसके निजी खर्च, कुछ बनवा रहे हों तो उसके खर्च और लोगों को खाना
खिलाने के खर्च तक का ही था। औरंगजेब ने राज्य के आय-व्यय के हिसाब में
लिखा है कि अकबर कुछ धन छोड़ गए थे। जहांगीर आए तो आय 60 लाख
रुपये हुई। खर्च डेढ़ करोड़ रुपये का रहा। अकबर के बचाए धन में से खर्च
होता रहा। शाहजहां ने खर्च थोड़ा घटाया और आय डेढ़ करोड़ पर पहुंची।
अब पहली नजर में लगता है कि औरंगजेब यह क्या लिख रहे हैं? बादशाहत
की आय तो 10-12 करोड़ रुपए की थी। पर गौर से देखें तो औरंगजेब हकीकत
बखान रहे हैं। बादशाहत की आय में से नीचे के स्तरों पर क्रमिक तौर पर खर्च
चलता था। ऊपर बादशाह के पास 6 से 15 फीसदी के बीच ही कोई रकम
पहुंचती थी। औरंगजेब ने इसे 15 फीसदी पर पहुंचाया होगा। उनके अलोकप्रिय
होने का एक बड़ा कारण यह भी है। यह ऊपर से नीचे पहुँचाना भारतीय
अवधारणा नहीं है। यह ऊपर से नीचे पहुँचाना पश्चिमी मॉडल है। अब राजाओं
के पास कुछ सुरक्षा तामझाम को छोड़ दें तो कोई स्थायी सेना नहीं होती थी।

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