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सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

उपसंहार वर्णन ४३५
अन्तर से फिर ग्रहण हो सकता है ।
ग्रहात् पुनः प्रग्रहणान्तरं स्यात्ततस्तताभिरिति क्रमेण
पातर्क शीतां श्वधिमासविद्भि र्ज्ञेया ग्रहाद्या दशवत्सरान्तम् । ४५ ।
उसके बाद पुनः १५,१६५ आदि तिथि में इस प्रकार दस वर्ष में पुनः ग्रहण
हो सकता है । यह राहु, चन्द्र, रवि तथा अधिमास के द्वारा समझा जा सकता
है ।
ताराग्रहाणां समतैक वर्षे न स्याद्यतस्तद् बहुपञ्जिकानाम् ।
कार्यों बुधैः संग्रह एवमन्य कार्याणि सिद्धन्त्यपि साधुताभ्यः । ४६ ।
एक वर्ष में तारा ग्रहों (मंगल आदि) की समता नहीं आने के कारण (एक
भगण पूर्ण नहीं होने के कारण) गणित पण्डितों को बहुत वर्षों की पञ्जिका रखनी
चाहिये । इन पंजिकाओं से अनेक उपयोगी काम किये जा सकते हैं ।
सौरेण मानेन रदा (३२) ब्दतः प्राग् यथा कुजः सोऽ पि तथैष्ट वर्षे
चक्रे खनागेन्दु (१८०) कला भराढ्य एकादिराश्यन्त रितस्तु सूर्यात् । ४७ ।
वर्तमान सूर्य वर्ष के जिस मास के जिस दिन का मंगल स्फुट राशि आदि
जितना है उस दिन के ठीक ३२ वर्ष पूर्व उस मास के उसी दिन मंगल का स्फुट
राशि आदि वही था । (३२ वर्ष बाद भी वही होगा) वह सूर्य से १२ राशि पर
रहनें पर १८० कला जोड़ना पड़ेगा ।
युतः कलादि र्दश ताड़िताभिः
कुबाहुभि (२१०) भै (२७०) रसवीतिहोत्रै (३६०) ।
गजाब्धिभिः (४८०) वह्नि रसैः (६३०) कुनागैः (८१०)
स्ताभिः पुनः कार्मुक पञ्चकस्थे । ४८ ।
सूर्य से १,२,३ आदि राशि के अन्तर पर मंगल रहने पर क्रमशः २१०, २७०,
३६०, ४८०, ६३० तथा ८१० कला मंगल में जोड़ना पड़ेगा । मंगल धनु से आरम्भ
कर पांच राशियों में रहने पर
तस्मिन् क्रमात्यञ्चदशा (१५) ष्ट (८) पंच (५)
मातंग (८) तिथ्यं (१५) श समन्विता भिः ।
युग्मादि पञ्चर्क्ष गते तदंश (१५।८।५।८।१५।)
हीनाभिरे वं स्फुटता मुपैति । ४९ ।
क्रमशः १५,८,५,८,१५ अंश मंगल से घटाना पड़ेगा । इससे ३२ वर्ष बाद
मंगल स्फुट हो जायेगा ।
विश्वा (१३) ब्दतः प्राक् शशिजो यथा भूतथेष्ट वर्षेऽ त्र कियान् विशेषः
गत्यन्तरेण स्फुट सौम्य मध्य भान्वोर्वसु (८) ध्नाग्नि (३) हृतेन चेषः । ५० ।
इष्टवर्ष के इष्ट सौर मास तथा इष्ट दिन का बुध का राशि आदि वही होगा

४३६ सिद्धान्त दर्पण
जो उससे ठीक १३ वर्ष पूर्व उसी मास के उसी दिन था । इस विषय में और
भी कई बाते हैं । स्फुट बुध और मध्यासूर्य के गति अन्तर को ८ से गुणा कर ३
से भाग दें ।
युतोनितः सूर्य गतेः ५९।८ स्वभुक्ति न्यूनाधिकत्वे सतु वक्रगश्चेत् तदात्मभास्वद्
गति योग नाग (८) घाताग्नि (३) भागेन युतः स्फुटः स्यात् । ५१ ।
बुध की गति, ५९।९ से कम या अधिक होने पर इस फल को बुध के राशि
आदि में जोड़ेगे या घटायेंगे । बुध वक्री होने पर स्फुट बुध और मध्यम सूर्य की
गति योग को इसी प्रकार ८ से गुणा कर ३ से भाग देकर फल को वक्र बुध में
जोड़ने से बुध स्फुट होगा ।
वृहस्पतिर्द्वादश वर्षतः प्राग्
यथा यथा स्वार्क कलान्तरस्य
खार्काशं (१२०) युग्भिः खकुदृक् (२१०)
कलाभि स्ताभिः पुनः कर्कट पञ्चकस्थे । ५२ ।
वृहस्पति १२ वर्ष पहले जो था वही होगा । गुरु और सूर्य की अन्तर कला
को १२० से भाग देकर फल को २१० कला में जोड़े । योग को वृहस्पति में जोड़े ।
पुनः वृहस्पति कर्क आदि ५ राशियों में होने पर
तस्मिन् सुधांशो (३३) घन (१७) रुद्र (११) मेघ (१७)
देवांश (३३) हीना भिरिहैव नक्रात्
भपञ्चकस्थे तुतदंश (३३।१७।११।१७।३३) युग्भिः
समन्वितः सन् स्फुटतां प्रयाति । ५३ ।
रवि और गुरु के अन्तर को क्रमशः ३३, १७,११,१७ और ३३ से भाग देकर
फल को उस अन्तर से घटाकर शेष को वृहस्पति में जोड़ेगे । वृहस्पति मकर
आदि ५ राशियों में रहने पर इस अन्तरफल को २१० कला में योग कर उसे पुनः
गुरु से जोड़ने से वृहस्पति स्फुट होगा ।
वर्षाष्टकात् प्राग् भृगुजो यथैव मिष्टाब्दके सौर दिने च तत्र
स्फुटस्व भुक्त्यर्थम मध्य भुक्त्यन्तरेण बाण (५) घ्न भुजो (२) हृतेन । ५४ ।
इष्ट और वर्ष मास और दिन में शुक्र की राशि जो होगी वही ठीक आठ
वर्ष पहले उसी मास और उसी दिन थी । शुक्र स्फुट गति और सूर्य की मध्यम
गति के अन्तर को ५ से गुणा कर २ से भाग देंगे ।
ऊनो युते भानुगतेः स्वभुक्तो न्यूनाधिकायां क्रमतोऽ नृजुश्चेत्
युत्याशर (५) घ्नाक्षि (२) हतस्वभास्वद्
गत्यास्तदोनः स्फुटतां संगच्छेत् । ५५ ।
सूर्य मध्यम गति ५९।८ से स्फुट शुक्र गति कम या अधिक होने पर इस

उपसंहार वर्णन् ४३७
लब्धि को स्फुट शुक्र में घटाने या जोड़ने से वह स्फुट शुक्र (इष्टवर्ष का) होगा
शुक्र वक्री होने पर सूर्य मध्यम गति और शुक्र स्फुट गति के योग को ५ से गुणा
कर २ से भाग देकर फल को शुक्र से घटाने पर स्फुट होगा ।
शनिः खरामा (३०) ब्द पुरोः यथासीत्
कि न्त्वात्स सूर्यान्तर लिप्तिकानाम्
खेनांश (१२०) युग्भिः शरवाजिराम (३७५)
लिप्ताभिराभिः पुनरत्र मेषात् । ५६ ।
शनि ३० वर्ष पूर्व जिस राशि अंश आदि में था इष्ट सौर वर्ष मास दिन
आदि में वही होगा । मध्यम सूर्य और स्फुट शनि की अन्तर कला को १२० से
भाग देकर फल को ३७५ कला में जोड़ेगे । योग को स्फुट शनि में जोड़ेगे ।
पञ्चर्क्ष संस्थे नख (२०) दिग (१०) श्व (७) दशा (१०)
नखां (२०) श संयोगवती भिरस्मिन्
तुलादि पञ्चर्क्ष गते तदंश (२०।१०।७।१०।२०

४३८ सिद्धान्त दर्पण
किं वा नवाश्वै (७९) र्दिननाथ वर्षे
भौमश्रुतुः षष्टि (६४) कलाधिकः स्यात्
बुधोऽगवेदै (४६) विधुदिक् (१०१) कलोनो
गुरुस्त्रिनागै (८३) कृत सप्त (७४) हीनः । ६१ ।
मध्यम मंगल ७९ सौरवर्ष में ६४ कला अधिक होता है । बुध ६४ सौर वर्ष
में (१०१) कला कम होता है । गुरु ८३ सौर वर्ष में ७४ कला कम होता है ।
शुक्रस्त्रिसिद्धै (२४३) स्त्रिचतु (४३) ष्कलाढ्यः
शनिर्नवार्थै (५९) र्नगसायकाढ्यः (५७)
राहुस्त्रिनन्दै (९३) र्नख (२०) लिप्तिकोनः
शीघ्रो ज्ञ शुक्रा वितरेऽत्र मध्या । ६२ ।
मध्यम शुक्र (२४३) सौर वर्षों में (४३) कला बढ़ता है । शनि (५९) सौर
वर्षों में (५७) कला बढ़ता है। राहु (९३) सौर वर्षों में (२०) कला कम होता है।
बुध और शुक्र का शीघ्रोच्च तथा अन्य ग्रहों के मध्यम मान ठीक आते हैं ।
तिथ्यादिभूक्ताः प्रति सौर मास्य यायाहतिः स्वर्णविनाड़िकाप्ताः
ग्राह्येऽष्टषत्सार्क युगान्तरार्द्धयुक्तेष्टषट्‌सार्थम मासतस्स्युः ६३ ।
सौर मास के तिथि नक्षत्र आदि के लिये जो भाग विधि या दण्ड जोड़ने
घटाने के विषय में कहा गया है, उसे रखें । ग्राह्य तथा इष्ट दिन सम्बन्धी स्पष्ट
सूर्य के अन्तर के आधे को जोड़ने पर इष्ट दिन का सूर्य जिस राशि में जायेगा
उसी मास से उन तिथियों की गिनती होगी तथा अन्य संस्कार होंगे ।
तारामहेष्वंशभिरेन्दु भान्वोः कला प्रभेद स्तिथि योग भेषु
फल प्रभेदोऽत्र बुधैर्नगण्यः कृतिर्मदीया यद सावपूर्वा । ६४ ।
कौतुक पंजिका में मंगल आदि तारा ग्रहों में अंश की त्रुटि हो सकती है ।
चन्द्र, सूर्य में कला का अन्तर तथा तिथि योग और नक्षत्र में लिप्ता का अन्तर
विज्ञ गणक नगण्य मानेंगे ।
स्नानादि योगां श्चिरकालतोऽस्या भविष्यतो ज्ञातुमलं नरः स्यात्
मृषाप्यतः कौतुक पंजिकेयं महोपकाराय सतांसदास्ताम् । ६५ ।
पहले किसी ने इस प्रकार की कौतुक पंजिका नहीं बतायी थी । लोग इससे
आगामी तीर्थ स्नान आदि योग बहुत पहले जान पायेंगे । अतः यह कौतुक पंजिका
स्थूल होने पर भी इससे सज्जनों का बहुत उपकार हो यह मेरी इच्छा है ।
सलक्षणोदाहरणं वितत्य सिद्धान्त मध्येऽत्रकुतूहलाय
उद्देश्यतो भूय उदीर्यतेऽसौयतोऽतिवेशाद् विषय ग्रहः स्यात् । ६६ ।
इस सिद्धान्त दर्पण में उदाहरण के साथ अनेक लक्षण विस्तार से दिये गये
हैं । तथापि इसके विषय वस्तु को शीघ्र जानने के लिए उद्देश्य से संक्षेप में सभी

उपसंहार वर्णन ४३९
बातें पुनः कही जा रही हैं ।
प्रोक्तं प्रकाशे प्रथमे प्रमाणं त्रुट् यदि कालस्य लयान्तिमस्य
सिद्धान्त सल्लक्षण सृष्टि काल सहांग चक्राणि च सप्रशंसम् । ६७ ।
प्रथम प्रकाश में ये विषय है- त्रुटि आदि से आरम्भ कर प्रलय के अन्त तक
का काल मान, सिद्धान्त का लक्षण, सृष्टिकाल, वेद उसका अंग विभाग, उसकी
प्रशंसा ।
संख्या द्वितीये भगणोत्करस्य कल्पाब्दमास द्युमिति र्निरुक्ता
नभश्चराणां दिन भुक्ति लिप्तास्तत्साधनं पर्ययघस्रकृप्तिः । ६८ ।
द्वितीय प्रकाश में ये विषय हैं । ग्रह उच्च, और पात आदि की भगण संख्या,
कल्प में वर्ष, मास और दिन की संख्या, ग्रह उच्च और पात आदि की दैनिक
मध्यमगति कला और उसे निकालने की विधि, भगण का दिन परिमाण ।
उक्त स्तुतीये कुदिनौघ इष्टे दिनाब्द मासाधिप मध्य खेटा
जैवास्तथाब्दा द्विविधा ग्रहादि ध्रुवा द्युषत्पात मृदूच्चहाराः । ६९ ।
तृतीय प्रकाश के विषय हैं-इष्ट अहर्गण निकालने की विधि, दिन, मास,
वर्ष आदि के अधिपति निकालने की विधि, मध्यम ग्रह, बार्हस्पत्य वर्ष, ग्रह उच्च
और पात का ध्रुव तथा उच्च पात का हार ।
तुर्ये महीवेष्टन देश नाड़ी वार प्रवृत्तीष्ट धनर्ण लिप्ताः
भुजान्तराख्या वदयान्तरारूया श्ररोद् भवा सत्पदकं ध्रुवादौ । ७० ।
चतुर्थ प्रकाश में भू परिधि, देशान्तर दण्ड, वार प्रवृत्ति और योग वियोग
कला, भुजान्तर कला, उदयान्तर कला, चर कला और द्वापरान्त ध्रुवपदक हैं ।
इत्थं चतुर्भिर्गदित प्रकाशैर्मध्याधिकारः सुरवर्त्मगानाम्
अथ प्रकाश द्वितीयेन तेषा मुद्दिष्यते विस्फुटताधिकारः । ७१ ।
इस प्रकार प्रथम चार प्रकाशों में आकाश चारी ग्रहों का मध्यमाधिकार पूरा
हुआ । इसके बाद २ प्रकाशों में ग्रह स्फुट करने के बारे में जो कहा गया है
उसके बारे में संक्षेप में कहूँगा ।
पश्चात् पुरः खेट गतिः प्रमाणं तदुच्च पातोत्थ पृथग्गति त्वम्
ज्या पञ्चमे दोः फल भुक्ति खण्डाः परिध्युपात्तास्तिथि भादि सर्वः । ७२ ।
पंचम प्रकाश में ग्रहों की पूर्व और पश्चिम गति का मान, उच्च और पात के
कारण ग्रहों का गति भेद, क्रम और उत्क्रम ज्या साधन, भुजफल निकालने के
लिये गति खण्ड, परिधि और उसकी मन्द और शीघ्र परिधि, तिथि और नक्षत्र
आदि पंचांग कहा गया है ।

४४० सिद्धान्त दर्पण
षष्ठेऽर्क चन्द्रर्क्षज सूक्ष्मपंजी तिथ्यादिसन्धिः प्रतिमण्डलाद्या
चलांशकाः क्रान्तिमही द्युजीवाश्चराणि लग्ना विविधाश्चदेशैः । ७३ ।
षष्ठ प्रकाश में रवि, चन्द्र और नक्षत्र की सूक्ष्म पञ्जिका, तिथि, नक्षत्र और
राशि की सन्धि, वृत्त और प्रतिवृत्त, अयनांश, शीघ्र फल, क्रान्ति ज्या, द्युज्या और
भूज्या, चर और स्थान विशेष का लग्न कहा गया है ।
दिग्भूमि शुद्धिर्भुजकोटिकर्ण लम्बाक्ष काग्राः सममण्डलाद्याः
दिग् देश काल स्फुट सूर्य बोधो ना सप्तमे कोण भवः करण्याः । ७४ ।
७ म प्रकाश में दिग् और भूमि शुद्धि, भुज कोटि और कर्ण, लम्बज्या, अक्षज्या
और अग्रा, सममण्डल आदि वृत्त, दिग् और देश समय और स्फुट रवि निकालना,
करणी, कोण शंकु आदि कहा गया है ।
अथाष्टमे सूर्य विधूक्ष माभा मानश्रुतीषूस्थिति मर्दकाले
चन्द्रग्रहोक्ति र्वलने सयुक्तो चान्द्रंदिनं ग्रास ज्ञ वर्णभेदाः । ७५ ।
अष्टम प्रकाश में, सूर्य, चन्द्र, भूछाया बिम्ब परिमाण, रविचन्द्र मन्दकर्ण, शर
स्थिति, मर्दकाल और इन सबके द्वारा चन्द्रग्रहण, युक्ति सहित आयन औरर आक्ष
वलन चान्द्र दिन तथा विभिन ग्रास के बारे में कहा गया है ।
युक्ति र्नते वित्रिभ लग्न शंकोर्द्विधोदितं लम्बन मिन्दु भान्वोः
नतिस्तमो मानभिदा नरोत्थाग्रहः स्वराशोर्नवमेकिलेति । ७६ ।
नवम प्रकाश में नति, वित्रिभ लग्न का शंकु, रवि और चन्द्र का दो प्रकार
का लम्बन, शंकु के अनुसार छाया मान में भेद तथा सूर्य ग्रहण के बारे में कहा
गया है ।
कालोन्नतेर्मानि भिदाथ वृत्त त्रयं सरण्या सवशात् समक्षः
लेखस्थलेच्छेदक नामधेया ग्रहस्य सिद्धो दशम प्रकाशे । ७७ ।
दशम प्रकाश में उदय आदि, उन्नत काल भेद से दृश्य बिम्ब मान में भेद,
शर के अनुसार तीन वृत्तों के विषय में तथा ग्रहण का परिलेख दिया गया है ।
एकादशेखेचर तुल्यतादौ दृक् कर्मयुग्म स्फुट दिक् कलम्बैः
द्युष द्युति र्बिम्बमितेर्भिदोक्ता युद्धप्रभेदानलकादि सिद्धिः । ७८ ।
एकादश प्रकाश में स्फुट ग्रहों की समानता, ग्रह स्फुट करना और उससे
आयन और आक्ष दृक् कर्म निकालना, ग्रह युति (योग), ग्रह बिम्ब के भेद, ग्रह
युद्ध के भेद, ग्रहयुद्ध देखने के लिये नलिका के व्यवहार के बारे में कहा गया
है ।
भानां युति द्वादश के खगेन्द्रे र्ध्रुवाः शराश्चाकृतयो भ संख्याः
तद् बिम्बमानानि च योग ताराः सप्तर्ष्यगस्त्य प्रमुखाः प्रदिष्टाः । ७९ ।

उपसंहार वर्णन् ४४१
बारहवें प्रकाश में नक्षत्र और ग्रह योग, ग्रह नक्षत्र का ध्रुव, दक्षिण और उत्तर
शर, ग्रह नक्षत्र का आकार, तारा संख्या, नक्षत्र बिम्ब परिमाण, योगतारा, सप्तर्षि,
अगस्त्य, लुब्धक आदि तारों के बारे में विशेष रूप से कहा गया है।
त्रयोदशे प्राक् परदिग् गृहार्क्ष समुद् गमा स्तं गमने निरुक्ते ।
क्षेत्रांश कालांशक चक्र भागे भास्वनिश्शेषा स्फुजितां प्रकाशाः । ८० ।
१३ वें प्रकाश में पूर्व और पश्चिम में ग्रह नक्षत्र का उदय और अस्त, क्षेत्रांश
कालांश और मानांश तथा सूर्य चन्द्र और शुक्र के प्रकाश के बारे में विशेष वर्णन
है ।
चतुर्दशे सूक्ष्म रवीन्दु मध्य कालां शतश्चन्द्रसमुद् गभास्तौ
चन्द्रक्षयो द्वौः परिलेख इन्दोः शृंगोन्नतिः साबुध शुक्रयोश्च । ८१ ।
१४ वें प्रकाश में स्पष्ट सूर्य और चन्द्र का कालांश से चन्द्र का उदय और
अस्त, चन्द्र की क्षय और वृद्धि का परिलेख, चन्द्र शृंगोन्नति और बुध तथा शुक्र
की शृंगोन्नति भी कहा गया है ।
पातो महान् पञ्चदशे निरुक्तो द्विरूप इत्थं नवभिः प्रकाशैः
त्रिप्रश्नमाधिकृतिभिः समाप्ता पूर्वं नभः सद् गणिताख्य मर्द्धम् । ८२ ।
पन्द्रहवें प्रकाश में वैधृति तथा व्यतीपात इन महापातों की कथा है । इस
प्रकार ९ प्रकाशों में त्रिप्रश्नाधिकार समाप्त हुआ है । यहां ग्रन्थ का पूर्वार्द्ध समाप्त
हुआ ।
अथोदिताः षोड़ शकेऽनुयोगाः स्थिराचला का क्षितिरित्यनेकैः
मतैः स्वसन्देह मुदस्तुकम्य कार्याण्यवैतुं सह वासिनाभिः । ८३ ।
सोलहवें प्रकाश में बहुत मतों का उल्लेख कर पृथ्वी की गति शीलता, सृष्टि
रचना आदि के सम्बन्ध में अनेक प्रश्न किये गये हैं ।
प्रत्युक्तयः सप्तदशे निरुक्ता बौद्धादि नानामत खण्डनोत्थाः
भ्रान्तिर्विभोः स ग्रह भास्वतश्च खान्तर्भुवः स्थानमवादि युक्त्या । ८४ ।
सत्रहवें प्रकाश में उक्त प्रश्नों के उत्तर, बौद्ध मत आदि का खण्डन, चन्द्र
और अन्य ग्रहों के साथ सूर्य का भ्रमण तथा आकाश शून्य में पृथ्वी की स्थिति
के बारे में कहा गया है ।
अष्टादशे सृष्टि रथस्वरूपाण्यकादिकानां गिरितुंगतोक्तिः
संस्थान मानानि भुवः सहाब्धेः सयुक्तिकक्षेत्र फल व्रजोक्तिः । ८५ ।
अठारहवें प्रकाश में सृष्टि चर्चा सूर्य आदि ग्रहों का स्वरूप, पर्वत आदि की
उच्चता, समुद्र सहित पृथ्वी का परिणाम और स्थिति, युक्ति के साथ वृत्त क्षेत्र
तथा पृथ्वी पृष्ठ आदि का फल निकालने का वर्णन हुआ है ।

४४२ \qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad सिद्धान्त दर्पण
एकोन विंशे ग्रह भास्वकक्षा युक्तिः प्रमाणं श्रुति मण्डलानाम्
वर्षेश मासेशदिनेश होराधिपक्रमो दृष्टि कर प्रसाराः । ८६ ।
उन्नीसवें प्रकाश में ग्रह नक्षत्र और आकाश कक्षा का प्रमाण और उसकी
युक्ति, ग्रह नक्षत्रों का कर्ण परिमाण, वर्ष, मास, दिन और होरा के अधिपतियों
का क्रम, शंकु की दृष्टि सीमा और सूर्य किरण की प्रसार सीमा कही गयी है ।
विंशे द्विधा गोलक यन्त्र कॢप्ति गोलार्द्ध चक्र प्रभृति प्रभेदैः
कालस्य राश्यादि मितेश्च सिद्धिः स्वयं वहत्यौ पयिक प्रकारः । ८७ ।
बीसवें प्रकाश में दो प्रकार के गोल यन्त्रों की कल्पना, गोलार्द्ध, चक्र आदि
यन्त्रों द्वारा समय और ग्रह राशि आदि निकालना तथा स्वयं वह यन्त्र बनाने की
विधि कही गयी है ।
गोलेऽनुमुक्तिर्गदितेक विंशे देवादिमानस्यतनोः स्फुटादेः ।
विकल्प चक्राण्युततोऽक्षि सिद्धाः स्ववासना घर्धन मूलकर्म । ८८ ।
इक्कीसवें प्रकाश में युक्ति के साथ गोल में देव और दानवों की अहोरात्रिका
मान, मेष आदि लग्नों की स्फुटता और उसकी अनुभूति, विकल्प ग्रह भगण,
प्रत्यक्ष होते वसन्त आदि ऋतु और घन मूल निकालने की विधि कही गयी है ।
षड् भिः प्रकाशै रिति संगृहीतो गोलाधिकार स्त्रिभिरुच्यतेऽथ
कालः संहार्थः किल वत्सराद्या द्वाविंश के मानभिदार्क चाराः । ८९ ।
इस प्रकार ६ प्रकाशों में गोलाधिकार समाप्त हुआ । अब अन्तिम तीन प्रकाशों
के बारे में कहा जाता है । बाइस वें प्रकाश में अर्थ के साथ संवत्सर, मास,
तिथि, सौर सावन और चान्द्र, नाक्षत्र वर्ष आदि का परिमाण भेद तथा सौर
संक्रान्ति आदि के बारे में कहा गया है ।
प्रोक्ता त्रयोविंशतमेस्तवालिः कालात्मनः कालनगेन्द्र भर्तुः
सवेश्मनः सावरणस्य पारावारादि साम्येन च दोष हत्यैः । ९० ।
२३ वें प्रकाश में पाप नष्ट करने के लिए काल रूपी नीलाद्रि नाथ मन्दिर
सहित आवरण (आकाश) और समुद्र आदि सहित उनकी समानता दिखा कर
स्तोत्र वर्णन किया गया है । इसमें पुरी श्री जगन्नाथ मन्दिर का विशेष वर्णन है ।
अन्त्ये चतुर्विंश इह स्फुटीभूदनुक्रमः कौतुक पञ्जिकादिः
कालाधिकारोऽयमगात् परार्द्धं गोलादिशब्दं गणितं यदाहुः । ९१ ।
अन्तिम २४ वें प्रकाश में कौतुक पञ्चिका और ग्रन्थ के विषयों का संक्षेप
में वर्णन है । इस प्रकार तीन प्रकाशों में कालाधिकार समाप्त हुआ । इस प्रकार
गोल अर्थात् गोलार्द्ध समाप्त हुआ । गणित और गोल इन दो प्रधान खण्डों का
यह ग्रन्थ समाप्त हुआ ।

उपसंहार वर्णन् ४४३
केचित्पठिष्यन्त्युप संहृतिं तदुद्देशतो भूरिपदार्थ जातम्
मयोदितं राजकुमार कादेर्वेदांगपाठोत्थ फलाय सौख्यात् । ९२ ।
कोई कोई पूरा ग्रन्थ न पढ़कर केवल उपसंहार ही पढ़ते हैं । सुकुमार मति
राजकुमार आदि धनाढ्य लोग सहज से ही वेद की आंख रुपी ज्योतिष तथा
उसका फल जान पायें इसके लिये उपसंहार में सभी विषय संक्षेप में कहा गया
है ।
दिग् देश कालावगतिः प्रकाशात् स्यात् सप्तमादेव तथापि धीरा
न लोक सिद्ध स्थल बोध हीना ग्रहादि संदर्शयितुं यदीशाः । ९३ ।
सप्तम प्रकाश में दिग्, स्थान और काल आदि के विषयों में विस्तार से कहा
गया है । तथापि संसार में प्रसिद्ध सभी स्थानों को पण्डित लोग भी नहीं जान
पाते हैं । अतः कहां पर कब ग्रहण आदि होगा यह बताने में वे असमर्थ हो जाते
हैं ।
प्रधान नगरेश्वतो धरणि मध्य रेखा पुरः
परान्त रवि नाड़िकाः पल कलाश्च वच्मि क्रमात्
यतो

४४४ सिद्धान्त दर्पण
तथा (५) जलालाबाद का उत्तर अक्षकला क्रमशः (१-१२९४), (२-१३७१),
(३-१४२८), (४-१६४३), तथा (५-२०६७) है ।
आकेन्द्रमेतत् समसूत्र निष्ठ भूमौ न देशान्तर संस्कृति स्यात्
प्राग् भूविभागे खलु गुर्जराष्ट्रे (६) देशान्तरं बाण मिता विनाड्यः । ९७ ।
ये ५ स्थान पृथ्वी के केन्द्र से एक ही उत्तर दक्षिण वृत्त या देशान्तर रेखा पर
स्थित है । अतः इन स्थानों का देशान्तर संस्कार नहीं किया जाता है । यहां पर
उज्जैन के बदले जूनागढ आदि से गुजरती देशान्तर रेखा से दूरी कही गयी है) ।
इस रेखा के पूर्व भाग में गुजरात (६) का देशान्तर ५ कला है ।
तत्राक्षलिप्ता शरदन्त चन्द्राः (१३२५)
ऊनापुरे (७) ऽश्वाः (७) शरबाण सूर्याः (१२५५)
श्रीनर्मदा तोयधि संगमे (८) ऽक्षि
पक्षाः (२२) खशून्यज्वलनौषधीशाः (१३००) । ९८ ।
(६) गुजरात की अक्षकला उत्तर (१३२५) है । (७) उनापुर का देशान्तर (७)
पूर्व तथा अक्षकला (१२५५) उत्तर है । (८) नर्मदा सागर संगम का देशान्तर (२२
कला पूर्व) तथा अक्षकला (१३०० उत्तर ) है ।
बोम्बायिपुर्यां (९) त्रिभुजा (२३) नगाग्नी
शा (११३७) श्रोदया रूयानपुरे (१०) खरामाः (३०)
खाद्रयब्धि चन्द्रा (१४७०) अथ षट्क् रामा (३६)
लाहोर के (११) पूर्ण खनन्द चन्द्राः (१९००) । ९९ ।
(९) बम्बई का (२३ कलापूर्व) तथा ११३७ कला उत्तर है । (१०) उदयपुर
का ३० कलापूर्व तथा १४७० कला उत्तर है (११) लाहौर का (३६ कला पूर्व) तथा
१९०० कला उत्तर है ।
काश्मीरज श्रीनगर (१२) त्रिवेदा (४३)
रामाशुगव्योम विलोचनानि (२०५३)
जम्बां (१३) त्रिवेदो (४३) द्विशरांकचन्द्रा (१९५२)
वस्वब्धयः (४८) खाक्षिनृपा (१६२०) जयादौ । १०० ।
(१२) कश्मीर के श्रीनगर का ४३ कला पूर्व तथा २०५३ कला उत्तर है ।
(१३) जम्मू का ४३ कला पूर्व तथा १९५२ कला उत्तर है । (१४) जयपुर का ४८
कला पूर्व तथा १६२० कला उत्तर है ।
पुर्यु (१४) ज्ञयिन्यां (१५) खशरा (५०) खनन्द
विश्वे (१३९०) ऽथ विन्ध्याचल मध्य देशे (१६)
द्युर्थाः (५२) खबाणाग्नि भुवः (१३५०) कुरुणां
क्षेत्रे (१७) रसार्था (५६) खनवाद्रि चन्द्राः (१७९०) । १०१ ।

उपसंहार वर्णन् ४४५
(१५) उज्जियिनी का ५० कलापूर्व तथा १३९० कला उत्तर है । (१६ ) मध्यदेश
में विन्ध्याचल का ५२ कला पूर्व तथा १३५० कला उत्तर है । (१७) कुरुक्षेत्र का
५६ कला पूर्व तथा १७९० कला उत्तर है ।
श्रीरंग के (१८) द्व्यंगमिता (६२) द्विवेदा
द्वयो (७४२)ऽर्थषट्का (६५) नगरामशैलाः (७३७)
कर्णाटके (१९) ऽथो गजसाह्वये (२०) ऽङ्ग
षट्का (६६) नगक्ष्माद्रि भुवः (१७१७) प्रदिष्टाः । १०२ ।
(१८) श्रीरंग (पट्टन) का ६२ कला पूर्व तथा ७४२ कला उत्तर है । (१९)
कर्नाटक का ६५ कलापूर्व तथा ७३७ कला उत्तर है । (२०) गाजियाबाद का ६६
कला पूर्व तथा १७१७ कला उत्तर है । ( दिल्ली के पास उत्तर प्रदेश में)
कुमारिका नामनि चान्तरीपे (२१)
गजर्तवो (६८) नाग भुजाब्धि (४२८) संख्याः
भूपालके (२२) नन्दशराः (६९) खखेन्द्राः (१४००)
ब्रजे (२३) खशैलाः (७०) खरसांग चन्द्राः (१६६०) । १०३ ।
(२१) कन्याकुमारी अन्तरीप का ६८ कला पूर्व तथा ४२८ कला उत्तर है ।
(२२) भोपाल का ६९ कला पूर्व तथा १४०० कला उत्तर है । (२३) ब्रज का ७०
कला पूर्व तथा १६६० कला उत्तर है ।
आग्रापुरे (२४) वेदनगः (७४) कुराम
भूपाश्च (१६३१) काञ्च्या (२५) त्रिगजाः (८३) खषट् षट् (६६०)
श्री वेंकटे (२६) खाष्ट (८०) नभोऽष्टशैला (७८०)
रामेश्वरे (२७)ऽगोष्ट (८७) रसार्थ बाणाः (५५६) । १०४ ।
(२४) आगरा का ७४ कला पूर्व तथा १६३१ कला उत्तर है । (२५) काञ्ची
पुरी का ८३ कला पूर्व तथा ६६० कला उत्तर है । (२६) श्रीवेंकट (तिरुपति) का
८० कला पूर्व तथा ७८० कला उत्तर है । (२७) रामेश्वरम् का ८७ कला पूर्व
तथा ५५६ कला उत्तर है ।
तद्द्वाविड़े (२८)ऽद्व्यष्ट (८७) खषट्क षट्काः (६६०)
बुन्देल के (२९)ऽगोष्ठ (८७) खखार्थ चन्द्राः (१५००)
श्रीनर्मदा सौम्यतटे जबल्लपुरे (३०) तथा भारतवर्ष मध्ये । १०५ ।
(२८) द्राविड़ मध्य का ८७ कला पूर्व तथा ६६० कला उत्तर है । (२९)
बुन्देलखण्ड का ८७ कला पूर्व तथा १५०० कला उत्तर है । (३०) भारत वर्ष के
मध्य में तथा श्रीनर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित जबलपुर का
त्र्यंका (९३) शरांगाग्नि भुवो (१३९५)ऽथ चेन्न
(३१) पुर्यां नगांकाः (९७) कृतनागशैलाः (७८४)

४४६ सिद्धान्त दर्पण
कृष्णाब्धि संगे (३२) द्विदिशः (१०२) खबाण
॰नन्दा (९५०) अथो राय पुरे नवाशाः (१०९) । १०६ ।
(३०) जबलपुर का ९३ कला पूर्व तथा १३९५ कला उत्तर है । (३१) चेन्नपुर
या चन्द्र पुर का ९७ कला पूर्व और ७८४ कला उत्तर है । (३२) कृष्णा सागर
संगम का १०२ कला पूर्व तथा ९५० कला उत्तर है । (३३) रायपुर का १०९ कला
पूर्व तथा
गोऽगारुणा (१२६९) राजमहेन्द्र पूर्या (३४)
रुद्रेन्दवो (१११) द्विद्विदिशः (१०२२) प्रयागे (३५)
चन्द्रेश्वराः (१११) खाक्षिशरेन्दव (१५२०) श्चा
योध्यापुरे (३६) रत्नपुरे (३७) ऽर्थ रुद्राः (११५) । १०७ ।
१२६९ कला उत्तर है । (३४) राजमहेन्द्री का १११ कला पूर्व तथा १०२२ कला
उत्तर है । (३५) प्रयाग १११ कला पूर्व तथा १५२० कला उत्तर है । (३६) अयोध्या
का ११५ कलापूर्व तथा (३७) रत्नपुर का भी ११५ कला पूर्व -
शराग्नभूपा (१६०५) क्षकलाः षडंग
विश्वे (१३६६) ऽथ गोदावरी सिन्धुसंगे (३८)
घनेन्दवो (११७) ऽङ्गाभ्र दिशो (१००६) ऽथ काश्यां (३९ )
सिद्धेन्दवो (१२४) ऽद्रीन्दुशरेन्दु (१५१७) संख्याः । १०८ ।
(३६) अयोध्या का अक्षकला १६०५ उत्तर तथा (३७) रत्नपुर का १३६६ कला
उत्तर है । (३८) गोदावरी सागर संगम का ११७ कला पूर्व तथा १००६ कला उत्तर
है । (३९) काशी का १२४ कला पूर्व तथा १५१७ कला उत्तर है ।
अथोदिता रायगढे (४०) ऽद्रिसूर्या (१२७)
नागाग्निविश्वे (१३०८) ऽथविशाख पुर्याम् । (४१)
नागारुणा (१२७) द्व्यंगदिशः (१०६२) समल्ल-
पुरे (४२) खविश्वे (१३०) त्रिगजाक्षि चन्द्राः (१२८३) । १०९ ।
(४०) रायगढ़ का १२७ कला पूर्व तथा १३०८ कला उत्तर है । (४१ )
विशाखापत्तन का १२७ कला पूर्व तथा १०६२ कला उत्तर है । ( ४२) सम्वलपुर
का १३० कला पूर्व तथा १२८३ कला उत्तर है ।
श्रीकाकुले (४३) रामगुणौ षधीशाः (१३३)
समुद्रनन्दाम्बर शीतभासः (१०९४)
नेपालमध्ये (४४) कृतरामरूपा (१३४)
स्यष्टाष्टभूपा (१६८८) श्व महेन्द्रशैले (४५) । ११० ।
(४३) श्रीकाकुलम का १३३ कला पूर्व तथा १०९४ कला उत्तर (४४) नेपाल
मध्य का १३४ कलापूर्व तथा १६८८ कला उत्तर है । (४५) महेन्द्र गिरिका

! तु र ग ष ड् ध र ण ् य ः->तुरगषड्धरण्यः! तुरग = ७ (horses, like Saptashva)! षड् = ६! धरणी = १! तुरग (७) षड् (६) धरणी (१) = १६७! WOW! That is fantastic! तुरगषड्धरण्यः! Let's check the letters: तु र ग ष ड् ध र ण ् य ःYes,तुरगषड्धरण्यः`!

Line 31:
खार्थाग्निचन्द्रा (१३५०) अथवर्द्धमाने (५७)
Wait, ख (०) अर्थ (५) अग्नि (३) चन्द्रा (१) = १३५०!
खार्थाग्निचन्द्रा (१३५०) अथवर्द्धमाने (५७)
Wait, अथवर्द्धमाने or अथवर्द्धमाने? अथवर्द्धमाने.

Line 32:
द्व्यंगेन्दवः (१७२) खांकगुणेन्दवश्च (१३९०)
Wait, द्व्यङ्ग (२, ७?)
द्वि (२) अङ्ग

४४८ सिद्धान्त दर्पण
१३५० कला उत्तर है । (५७) वर्द्धमान का १७२ कला पूर्व तथा १३९० कला
उत्तर है । (५८) गंगा सागर संगम का १७५ कला पूर्व तथा १३२५ कला उत्तर
है । (५९) नवद्वीप पुर (नदिया) का १७७ कला पूर्व तथा
कृताम्बरेन्द्रश्च (१४०४) कलिकतायां (६०)
कुमृद्घना (१७७) वेदशराग्नि चन्द्राः (१३४५)
बंगस्थ रंगाद्युपुरे (६१)ऽगनागः
चन्द्रा (१८६) रसाम्भोधि शरेन्दु संख्या (१५४६) । ११६ ।
१४४० कला उत्तर है । (६०) कलकत्ता का १७७ कलापूर्व तथा १३५४ कला
उत्तर है । (६१) बंगाल के रंगपुर का १८६ कला पूर्व तथा १५४६ कला उत्तर है ।
ढाकापुरे (६२) नन्द नवेन्दवश्च (१९९)
शरेक्ष्णाम्पः पति रात्रिनाथाः (१४२५)
श्रीहट्टके (६३) विश्वभुजाः (२१३ शरांक
वेदेन्दवो (१४९५) लोहित नाम नद्याम् (६४) । ११७ ।
(६२) ढाका का १९९ कलापूर्व तथा १४२५ कला उत्तर है । (६३) श्रीहट्ट
(सिलहट) का २१३ कलापूर्व तथा १४९५ कला उत्तर है । (६४) लोहित नदी
(अरुणाचल)
द्व्यब्धीक्षणा (२४२) न्यब्धिशरांग चन्द्रा (१६५४) इतीरिताभारतपूर्वभागे
कथ्यन्त एतत् पर भाग देशा भूमध्यरेखान्तिकतः क्रमेण । ११८ ।
का २४२ कलापूर्व तथा १६५४ कला उत्तर है । ये सब भारत के पूर्व क्षेत्र के
स्थान हैं । अब भूमध्य रेखा (रामगढ़, जूनागढ़ आदि की देशान्तर रेखा) से पश्चिम
के देशों का क्रम से अक्षांश देशान्तर कहा जाता है ।
रणे (६५) भुजौ (२) खाम्बुधि वेद चन्द्राः (१४४०)
कच्छे (६६)ऽद्रयः (७) सर्पगजाग्नि चन्द्राः (१३८८)
सिन्धौ (६७) किलेन्द्राः (१४) खरसार्थ चन्द्राः (१५६०)
श्रीद्वारका (६८) काबुलयोः (६९) शरक्षमाः (१५) । ११९ ।
(६५) रण (कच्छ प्रान्त में) का २ कला पश्चिम तथा १४४० कला उत्तर है ।
(६६) कच्छ का ७ कला पश्चिमम तथा (१३८८) कला उत्तर हैं । (६७) सिन्धु का
१४ कला पश्चिम तथा १५६० कला उत्तर है । (६८) द्वारका तथा (६९) काबुल
दोनों का १५ कला पश्चिम
गजामरक्ष्मा (१३३८) श्वरसानखाश्च (२०६७)
स्थानाफ गान्यां (७०) नवभूमयः (१९) स्युः ।
शरोमहीभृद् वसु भूमयश्च (१८७५)
नद्यब्धि संगे (७१)ऽब्धि भुजा (२४) घनेन्द्राः (१४२७) । १२० ।

उपसंहार वर्णन् ४४९
तथा अक्षांश क्रमशः १३३८ (द्वारका) तथा २०६७ (काबुल) कला उत्तर है ।
(७०) अफगानिस्तान का १९ कला पश्चिम तथा १८७५ कला उत्तर है । (७१)
सिन्धु और सागर संगम का २४ कलापश्चिम तथा १४१७ कलाउत्तर है ।
स देह यज्ञस्य (७२) नगाग्न्य (३७) श्व
भुजंगमातंग नभो भुजाश्च (२०८८)
प्राग् भारतस्याप्यथ ब्रह्म देश
मध्ये (७३)ऽद्रितत्त्वानि (२५७) गुणाभ्ररुद्राः (११०३) । १२१ ।
(७२) देह यज्ञ का ३७ कला पश्चिम तथा २०८८ कला उत्तर है । ( ७३)
भारत के पूर्व में ब्रह्मदेश (बर्मा या म्याम्मार) के मध्य का २५७ कला पूर्व तथा
११०३ कला उत्तर है ।
(७४) इरावती सागर संगमेऽस्या याम्येऽष्टवेदांक
(९४८) मिताक्षलिप्ते पारस्यके (७५) भारत पश्चिमस्थे
नगार्थ चन्द्रा (१५७) नखनन्द चन्द्राः (१९२०) । १२२ ।
(७४) इरावती और सागर का संगम ब्रह्मदेश के दक्षिण अर्थात् उतना ही
२५७ कला पूर्व और ९४८ कला उत्तर है । (७५) भारत के पश्चिम में स्थित पारस्य
(ईरान) का १५७ कला पश्चिम तथा १९२० कला उत्तर है ।
आरव्यमध्ये (७५)ऽद्रिगुणे क्षणानि (२३७)
दिग् वासवा (१४१०) श्चाथ तुरुष्क भूमौ (७७)
नगाग्नि रामाः (३३७) खनगेन्दु पक्षा (२१९०)
याम्यस्थ लंकापुरी (७८) खाभ्रचन्द्राः (१००) । १२३ ।
(७६) अरब मध्य का २३७ कला पश्चिम तथा १४१० कला उत्तर है । (७७)
तुरुष्क भूमि (तुर्की) का ३३७ कला पश्चिम तथा २१९० कला उत्तर है । (७८)
दक्षिण में स्थित लंकापुरी (श्रीलंका) का (१००) कला पूर्व
प्राच्या विध्वष्योऽष्ट गजाब्धि (४८८) लिप्ता
वर्षोत्तरे हिन्दुकुशाद्रि मध्यो (७९)
नृपाः (१६) शरार्काक्षिमता (२१२५) हिमाद्रेः (८०)
परेऽष्टरामाः (३८) कृतदिग् दृशौ (२१०४)ऽशे । १२४ ।
तथा ४८८ कला उत्तर हैं । (७९) हिन्दुकुश पर्वत का मध्य १६ कला पूर्व
तथा २१२५ कला उत्तर है । (८०) हिमालय का पश्चिमी भाग ३८ कला पूर्व तथा
२१०४ कला उत्तर है ।
पूर्वे (८१)ऽग्निसिद्धा (२४३) नगनाग भूपा (१६८७)
मध्ये (८२) शशीन्द्रा (१४१) स्त्रिगुणाद्रि चन्द्राः (१७३३)

शृंगस्य गौर्यादिकं शंकरस्या (८३)
ष्टाब्ध्यग्नि गोचन्द्र (१९३४८) करोन्नयस्य । १२५ ।
(८१) हिमालय का पूर्व भाग २४३ कला पूर्व तथा १६८७ कला उत्तर है ।
(८२) हिमालय का मध्य भाग १४१ कला पूर्व तथा १७३३ कला उत्तर है । (८३)
इसकी चोटी गौरीशंकर (एवरेस्ट) का ऊंचाई (१९३४८) हाथ है ।
खार्थेन्दवः (१५०) आम्रघना (१७००) नगेश
सौम्येहदे मानस नामधेये (८३)
षट्खेन्दवः (१०६) खांबुधि नाग चन्द्राः (१८४०)
सप्तांग षड् जिष्णु (१४६६७) करोन्नतेस्तु । १२६ ।
तथा स्थिति १५० कला पूर्व और १७०० कला उत्तर है । (८४) पर्वतराज के
उत्तर में मानस नामक सरोवर १०६ कला पूर्व तथा १८४० कला उत्तर में स्थित
है । इसकी ऊंचाई (१४,६६७) हाथ है ।
कैलाश शैलस्य (८५) दिगिन्दवो (११०) ऽर्थ
शैलाष्ट चन्द्रा (१८७५) श्रतदुत्तरस्थे ।
देशे पुर स्तिब्बत नाम्नि (८६) राम
गोब्ज्याः (१९३) खबाणां क भुवो (१९५०) ऽथ चीने (८७) । १२७ ।
(८५) कैलाश चोटी का ११० कला पूर्व तथा १८७ कला उत्तर है । (८६)
इसके पूर्व तिब्बत देश १९३ कला पूर्व तथा १९५० कला उत्तर है । (८७) चीन
का मध्यभाग
त्रिनन्दरामाः (३९३) खरसाष्ट चन्द्रा (१८६०)
सौम्ये स्थितः तस्य चराजधानी (८८)
शून्याप्रसिद्धा (२४००) अथ रूस मध्ये (८९)
त्र्यंकाब्धयः (४९३) पूर्णनवांकरामाः (३९९०) । १२८ ।
३९३ कला पूर्व तथा १८६० कला उत्तर है । (८८) इसकी राजधानी और
उत्तर में अर्थात् ३९३ कला पूर्व तथा २४०० कला उत्तर है । (८९) रूस का मध्य
भाग ४९३ कला पूर्व तथा ३९९, कला उत्तर है ।
इत्येशियानाम महीमहांश
स्थानानि पश्चादि यूरोप नाम्नः
भागस्य मध्य (९०) परदिग् विधूष्यः
सप्ताम्र बाणाः (५०७) खधृतित्रि (३१८०) लिप्ताः । १२९ ।
ये सब एशिया महादेश के स्थानों का वर्णन है । इसके पश्चिम में यूरोप है ।
(९०) यूरोप के मध्य भाग की स्थिति ५०७ कलापश्चिम तथा ३१८० कला उत्तर
है ।

उपसंहार वर्णन् ४५१
तत् पश्चिमे द्वीप मुदन्वदन्तरं लडनामास्ति तदन्तरस्थे
पुरोत्तमे लण्डन नाम्ब्य (९१) गाभ्र
शैलाः (७०७) खनन्दाभ्रगुणः (३०९०) प्रदिष्टः । १३० ।
उसके पश्चिम में अति प्रसिद्ध इंग्लैण्ड द्वीप है जिसमें लण्डन नाम का श्रेष्ठ
नगर है । (९१) लण्डन ७०७ कला पश्चिम तथा ३०९० कला उत्तर है ।
तद् याम्यगेखण्ड इहीफ्रि काख्ये (९२)
सप्ताभ्रबाणाश्च (५०७) निरक्ष मन्ता ।
त्रयः कुभागा उदिताहि जम्बू
द्वीपस्य याम्यांशतयाः प्रसिद्धं । १३१ ।
उसके दक्षिण के खण्ड का नाम अफ्रीका है । (९२) अफ्रीका तट विषुव से
५०७ कला उत्तर है । इस प्रकार तीन महोदेशों के बारे में कहा गया । अफ्रीका
जम्बू द्वीप के दक्षिण में प्रसिद्ध है ।
अमेरिका धो द्विविधोत्तरास्य
सौम्यांश (९३) भक्ता परदिग् विधक्ष्यः
तन्मध्य एवाद्रि ख सप्त चन्द्राः (१७०७)
खखाभ्ररामा (३०००) अथदक्षिणस्याः । १३२ ।
पश्चिम दिशा में अमेरिका उत्तर और दक्षिण दो भागों में बंटा हुआ है । (९३)
उत्तर अमेरिका का मध्य भाग १७०७ कला पश्चिम तथा ३००० कला उत्तर है ।
(९४) दक्षिण अमेरिका का
मध्ये (९४)ऽद्रि नागाक्षि भुवो (१२८७)ऽक्षलिप्ताः
सौम्य खदन्तेन्दव (१३२०) आसुराशेः
आस्ट्रेलियान्त (९५) स्त्रिभुजांग संख्याः (६२३)
प्राच्य खखार्थाक्षितयश्च (१५००) याभ्याः । १३३ ।
मध्य भाग १२८७ लिप्ता पश्चिम तथा १३२० कला दक्षिण है । (९५) आस्ट्रेलिया
६२३ कला पूर्व तथा १५०० कला दक्षिण है ।
अथार्क सूक्ष्म

४५२ सिद्धान्त दर्पण
(९६) बौद्ध का १३७ कला पूर्व तथा १२५० कला उत्तर है ।
मञ्जूषिकायां (९७) खकृतेन्दवो (१४०)ऽर्थ
विश्वेन्दवो (११३५)ऽथानुगुले (९८) कृतेन्द्रा (१४४)
सप्ताब्धि सूर्या (१२४७) नवदुर्गके (९९)ऽर्थ
शक्रा (१४५) नगाभ्रेक्षण रूप (१२०७) संख्याः । १३५ ।
(९७) मंजूषा (१४०) कला पूर्व तथा ११३५ कला उत्तर है । (९८) अनुगुल
१४४ कला पूर्व तथा १२४७ कला उत्तर है । (९९) नयागढ़ (नवदुर्ग) १४५ कला
पूर्व तथा १२०७ कला उत्तर है ।
खण्डादिसप्ततनके (१००)ऽङ्गशक्रा (१४६)
नृपाक्षिचन्द्रा (१२१६) अथ तालचेरे (१०१)
षड्जिष्णवो (१४६)ऽष्टेष्व रुणाश्च (१२५८)
पारि द्वीपे (१०२)ऽद्रिशक्रा (१४७) विधुनागरुद्राः (११८१) । १३६ ।
(१००) खण्डपड़ा १४६ कला पूर्व तथा १२१६ कला उत्तर है । (१०१) तालचेर
१४६ कला पूर्व तथा १२५८ कला उत्तर है । (१०२) पारीकुद (१४७) कला पूर्व
तथा ११८१ कला उत्तर है ।
पुरेरणाह्वे (१०३)ऽद्रिकृतेन्दवो (१४७)ऽर्थ
पूर्णाक्षि चन्द्राः (१२०५) वृहदम्बिकायाम् । (१०४)
शैलाब्धि चन्द्राः (१४७) कृतनेत्र सूर्या (१२२४)
ढेकादिनाले (१०५) खशरेन्दवः (१५०) स्युः । १३७ ।
(१०३) रणपुर १४७ कलापूर्व तथा १२०५ कला उत्तर है । (१०४) बड़म्बा १४७
कला पूर्व तथा १२२४ कला उत्तर है । (१०५) ढेकानाल (१५०) कला पूर्व
वसुत्रि सूर्याः (१२३८) शरतद् भुवस्तु (१५५)
कोणार्क (१०६) एवाग्नि नवेश्वराश्च (११९३)
सुनिश्चिता याजपुरे (१०७)ऽष्टबाण ।
चन्द्रा (१५८) महीबाण भुजा धरित्र्यः (१२५१) । १३८ ।
तथा १२३८ कला उत्तर है । (१०६) कोणार्क का १५५ कला पूर्व तथा ११९३
कला उत्तर है । (१०७) याजपुर का (१५८) कला पूर्व तथा १२५१ कला उत्तर है
मयूर भञ्जे (१०८) ऽष्टशरेन्दवो (१५८)ऽर्क
रामेन्दवो (१३१२) नीलगिरौ (१०९) खभूपाः (१६०)
नगाष्टसूर्य (१२८७) इतिसत्सुखार्थम्
नवाधिकं स्थान शतं मयोक्तम् । १३९ ।

उपसंहार वर्णन् ४५३
(१०८) मयूर भञ्ज का १५८ कला पूर्व तथा १३१२ कलाउत्तर है । (१०९)
नीलगिरि का १६० कला पूर्व तथा १२८७ कला उत्तर है । इस प्रकार सज्जनों की
सुविधा के लिए मैंने १०९ स्थानों के बारे में कहा ।
अत्रेप्सितस्थल युगान्तर मार्ग मान मानेन्दु
मक्ष कलिका विवरं विनिघ्नम् ।
भूवेष्टनेन महता (५०२६) हत मृक्षचक्र
लिप्ताचयेन (२१६००) फलामात्महतं पृथक् स्तम् । १४० ।
दो स्थानों की अक्ष कला के अन्तर को ५०२६ से गुणा कर २१६० से भाग
देकर फल को वर्ग करेंगे ।
प्राक् प्रत्यगन्तर हत क्षिति वृत्त (५०२६) मग्न
खांगाग्नि (३६०) हृद् विपद् मध्य जयाहतं तत्
लम्बज्यया त्रिगुण (३४३८) हृत् स्वहतं द्विवर्ग
योगात् पदं हि पदयो ऋजुमध्यमार्गः । १४१ ।
पुनः दोनों स्थानों के पूर्व पश्चिम अन्तर कला को ५०२६ से गुणाकर ३६० से
भाग देंगे । फल को दोनों स्थानों की लम्बज्या के योगार्द्ध से गुणा कर त्रिज्या
(३४३८) से भाग देंगे । फल को वर्ग करेंगे । इस वर्ग को पिछले वर्ग के साथ
जोड़कर मूल निकालेंगे । वह उन दोनों स्थानों के बीच की सीधी दूरी होगी ।
ज्योतिस्तत्वविदो वदन्ति परम क्रान्तेश्चरानेहसा
यत्किञ्चित्तनुतो ऋते परम विक्षेपस्य खेटावलेः
याम्योदग् ध्रुव पश्चिम भ्रमपथस्यात्रानु भूत्यागम
प्राणाण्येन विनाव्यलेखिनमया तत्तत् कलानिर्णयः । १४२ ।
प्राचीन काल से ज्योतिषियों ने ग्रहों का परमशर, दक्षिण तथा उत्तर ध्रुव का
पूर्व पश्चिम मार्ग अर्थात् अयन चलन आदि के बारे में जो कुछ लिखा है, उसमें
किसी को भी बिना प्रमाण के मैंने स्वीकार नहीं किया है । सभी बातें प्रत्यक्ष
(वेध द्वारा) देखकर ही लिखी हैं ।
ऊर्ध्वोर्ध्वाम्बर सूत्रगो दिनमणिः स्याद्यद्दिनाद्धे तदा
सद् भार्द्धेव स्थिरन्ध्रग क्षिति पतत्तद् भानुनिष्ठाजवलात्
उद् गच्छत् किरणस्य रन्ध्र समतां दृष्ट्वा तदा त्वार्कजा
क्रान्ति स्वाक्षतयो दितैव मखिलं देशेष वेद्यं बुधैः । १४३ ।
मध्याह्न में खस्वस्तिक में रवि को देखकर (रवि के सबसे ऊपर विन्दु पर)
अन्धेरे कमरे में एक छोटा छेद करते हैं । छेद से आती किरण के नीचे एक पानी
का बर्तन रखते हैं । किरण दूसरी स्थान पर वापस होगी । सूर्य से आती किरण
का भूमि से जो कोण होगा वही कोण लौटती किरण का भी होगा । यह कोण

४५४ सिद्धान्त दर्पण
अपने स्थान से सूर्य की स्पष्ट क्रान्ति होगी। उसमें उत्तर क्रान्ति जोड़ने या दक्षिण
क्रान्ति घटाने से अपने स्थान का अक्षांश आयेगा।
दृशा दृष्टि विरुद्ध मन्यगणितं त्राणाय धर्मस्यवा
भ्रान्तिं तथ्यतया भुवः प्रवदतां वाग् भंगिभांगायवा
विद्वत्सं सदिमत् प्रलायज परीहास प्रकाशायवा
येनाहं हृदितिष्ठता मुखरितः कस्मै चिदस्मै नमः। १४४।
आचार्यों ने कई प्रकार से यह ग्रन्थ बनाने की प्रेरणा दी है- प्राचीन ग्रह
गणित दृक् सिद्ध नहीं होना, धर्म की रक्षा के लिए, पृथ्वी का भ्रमण स्वीकार
करने वालों के खण्डन के लिये या मेरे प्रलाप का पण्डित सभा में परिहास द्वारा
इन प्रेरणाओं के लिए मैं उन्हें नमस्कार करता हूं।
आसीत् पासीन्द्र काशीश्वर मिहिर तनु जन्मराजाधिराज
स्वराट् प्रत्यार्थे पृथ्युधव दहन पक्षत् पत्र मात्रोत्थ गात्रः
प्राप्तशीमर्द्दराज भ्रमरवर पदः सत्तमात् सार्वभौमा
धीमान् वैरागी नाम स्फुटत महिमा मण्डलः खण्डपुर्याः। १४५।
वरुणा, इन्द्र, रुद्र, यम कुबेर, नैऋति, अग्नि और पवन इन आठ लोक पालों
के अंश से उत्पन्न वैरागी नामक एक राजा खण्ड पड़ा में हुए। उनकी उपलब्धियों
के कारण स्वयं पुरी राजा ने उन्हें मर्दराज और भ्रमरवर की उपाधि दी थी। वह
खण्डपड़ा में चन्द्र के समान शासन करते थे। उनकी बुद्धि और महिमा चारों
तरफ फैली हुई थी।
तस्मात् कृष्णाम तृष्णा दजनि शुभजनिर्गांग भंगा वगाही
भीष्मानुष्कार कोष्मा ज्मत पर विजयः श्रील नीलाद्रि सिंह
तत्सानुः शुभ्र भानु द्युमणि परिभवोद्दाम कीर्ति प्रतापः
प्राप प्राक् श्री नृसिंहः पदमजित पदध्यान नीलत्रिपातः। १४६।
इन कृष्ण भक्त वैरागी की इच्छा भगवान् कृष्ण ने पूर्ण की और उनके औरस
पुत्र श्री नीलाद्रि सिंह उत्पन्न हुए जो गंगा पुत्र भीष्म के समान भयंकर तेज से
शत्रुओं को पराजित करने वाले थे। उनके पुत्र श्री नृसिंह अपने कीर्ति और प्रताप
में चन्द्र और सूर्य से भी अधिक थे। उन्होंने अपने वंश की उपाधि (मर्दराज तथा
भ्रमरवर) प्राप्त की तथा अपराजित (विष्णु) के चरणों का ध्यान कर तीन ताप
(दैहिक, दैविक और भौतिक कष्ट) दूर किये।
क्षत्राधिश्री बघेलान्वय पय उदधि प्रोद्यता पूर्णचन्द्रा
ज्योतिः सन्धान सिन्धुस्तत उदय मगच्छत् बुधः श्यामबन्धुः
स्वान्तोद्य हीन बन्धु प्रपद नख महः संहता हस्तभिन्नः
श्रीमान् सिंहान्त नामोत्कल निलय भरद्वाज गोत्राब्ज मित्रः। १४७।