सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
पुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४१५
(शेष) को घर बनाये हैं । नाग का घर समुद्र है । दोनों अमृत के भण्डार हैं ।
भगवान ने मत्स्य कच्छप आदि प्रत्येक रूप धारण किया था, ये सबी रूप वाले
प्राणी समुद्र ने भी धारण किये हैं । इन्द्र वज्र से रक्षा के लिए पर्वत (गोवर्द्धन)
का आश्रय कृष्ण ने लिया था-समुद्र ने भी वज्र से रक्षा के लिए पर्वत (मैनाक)
को आश्रय दिया था । विष्णु से गंगा की उत्पत्ति (नख से हुयी), समुद्र में गंगा
मिलती है, अतः दोनों गंगा के स्वामी हैं । भगवान के हाथो में शंख, पद्म आदि
है जो समुद्र में भी है । सृष्टि के अन्त में वे दोनों भुवनों को जनप्लावित करते
हैं । वे सभी तीर्थों के राजा हैं । वे दोनों दुःख शान्ति के लिए सुख (जल) का
विवरण करें ।
यत्रास्ते सानुबिम्बादित सित किरण प्रोज्ज्वलं नेत्रयुग्मं
नासाबाहूदरांह्रिं स्फुरति च विविध द्वीप शोभानुकारि
वारीतं श्यामल श्रीमर्कर सुरुचिरे कुण्डले वाड़वाग्नि-
ज्वाले वाद्यत् किरीटं तरणिव दधरः सोऽस्तु शान्त्यै कृपाब्धिः । २२ ।
जिसके दोनों नेत्र उदय होते हुए सूर्य और चन्द्र बिम्बों के समान है । (कृष्ण
नेत्र गोल तेजस्वी हैं) । समुद्र में भी दोनों उदय होते सम उसके नेत्र समान दीखते
हैं । जिसके नाक, भुजा, पेट और पैर आदि प्रत्येक द्वीपों के समान है (कृष्ण के
भुजा, पैर आदि द्विप अर्थात् हाथी के समान विशाल हैं) समुद्र के द्वीप उसके
अंगों के समान बाहर निकले हैं । जिनकी श्यामल शोभा है (कृष्ण और समुद्र
दोनों नीले हैं) जो मकर कुण्डल धारण किये हैं (कृष्ण के कुण्डल का आकार
मकर जैसा है । समुद्र के भीतर मकरों का समूह है), जिसका किरीट् बड़वानल
के समान तेजस्वी है (कृष्ण की मणि किरीट का तेज अग्नि के समान है, समुद्र
का बड़वानल उसकी मणि के समान है), जिसका नौका के समान अधर है ।
कृष्ण के ओठ नौका के समान सामान्य वक्र हैं, समुद्र का प्रवेश द्वार नौका है-
मुख के प्रवेश की तरह)- वे दया सागर (कृष्ण और समुद्र) हमारी शान्ति के
लिये विराजमान रहें ।
ब्रह्माण्ड साम्यम्
विभ्रद् वस्त्र क्षपे शौ नयन युग मिषादगभ शोभामदभ्रां
शुभ्र श्री वक्त्र दम्भादधर पुर रुचि व्याजतः सान्ध्यवेलाम्
तिर्यग् विस्तीर्ण वृत्तातुल भुजबल यच्छद् मनश्चक्र वालं
शैलं मध्यच्छला काञ्छल मुपरि नुतात् विश्वभर्त्ता शुभंनः । २३ ।
ब्रह्माण्ड के सूर्य चन्द्र की तरह कृष्ण के दो नेत्र हैं । ब्रह्माण्ड के मेघ की
तरह कृष्ण भी श्यामल है । ब्रह्माण्ड (आकाश) के समान कृष्ण का स्वच्छ तेज
है । ब्रह्माण्ड की सन्ध्या के समान लाल रंग कृष्ण के अधरों का है । भगवान
की दोनों भुजायें ब्रह्माण्ड के दिगवलय की तरह तिर्यक् फैली हुयी, गोल और
४१६ सिद्धान्त दर्पण
अनुपम है । ब्रह्माण्ड का मेरु सुवर्णमय है, कृष्ण भी शरीर में सुवर्ण समान
पीताम्बर पहने है । इस प्रकार ब्रह्माण्ड समान ही उसके स्वामी हमारा शुभ करें ।
श्री जगन्नाथ स्य शिव साम्यम् -
भूते शो भूति भूमिर्भवज भय भरोद् भेद भेदिप्रभावो
भुवीन्द्र भोगाभरण पुर भी भावदो भूत भूतेः
भू भृद् भूमीन्द्र मौलि र्भूत वरकमलो गौर भाषेशभंग-
प्रभ्राजद् भाल भत्तिर्वृषभरणचणः सत्यदभ्राभिसन्धिः । २४ ।
कृष्ण भूत (प्राणियों) के प्रभु हैं । शिव भूत पिशाचों के । कृष्ण अणिमा आदि
विभूतियों के स्थान है, शिव भूति (भस्म या सम्पत्ति) के आश्रय स्थल । कृष्ण
संसार के कारण हुए भय (भवभीति) का नाश करने में प्रभाव शाली हैं । शिव
भूमि से निकले भयानक सर्पों को अपने शरीर से लिपटाये हैं । कृष्ण पर्वतराज
(नीलाचल) पर नील कमल के समान मुकुट रूप में विराजमान हैं । शिव पर्वत
राज (कैलाश) पर अपने मुकुट पर गंगा जल धारण किये हैं । कृष्ण का ललाट
खण्ड चन्द्र के समान उन्नत है, शिव ललाट पर खण्ड चन्द्र है । कृष्ण धर्म रूपी
वृषभ के रक्षक है अथवा वृषासुर के नाश कर्ता है । शिव वृषभ पर आरूढ़ हैं ।
कृष्ण का हृदय साधुओं के लिए अति खुला है । शिव का हृदय भाव दक्ष कन्या
सती के पास पूर्ण हुआ । कृष्ण कान्ति गौर वर्ण को नष्ट करती है अर्थात् काला
है, शिव गौर हैं । वे दोनों प्राणियों की उन्नति करें ।
श्री गौरी साम्यम्
सर्वराध्या सितक्ष्माधर परम यशोभूति विख्यात हेतू-
माता लोकस्य दृप्यन्मधुवध मुदिता दित्यगीत प्रशस्ति
पाता इण्डादि दैत्या भिभवन खर रुक् चन्द्रकान्तोत्तमांग
श्री रस्मान् सर्वदो मेश्वर उदित रतिः केलिकान्ताङ्गसंभृत् । २५ ।
लक्ष्मी पति विष्णु के लिये-सभी वस्तु देने वाले लक्ष्मीपति जगन्नाथ हमारी
रक्षा करें । वह लक्ष्मी को क्रीड़ा के लिए अपने शरीर पर धारण करते हैं । कृष्ण
से सदा अनुराग (सुगन्ध) निकलता है । वे मस्तक पर मोर पंख लगाते हैं । अति
उग्र प्रथम दैत्य हिरण्यकशिपु को मारने के लिये उन्होंने नखों आदि की शक्ति
दिखायी थी । मधु दैत्य को मारने पर देवताओं ने उनकी प्रशंसा की थी । वे १४
ब्रह्माण्ड बनाने वाले तथा सभी के पूज्य हैं । उनके कारण नीलाचल के यश
(सम्पत्ति) में वृद्धि हुयी है ।
गौरी के लिये -गौरी सभी की आराध्या, कैलाश की सभी यश सम्पत्ति का
कारण तथा लोकों की माता है । चण्ड आदि दैत्यों के को हराने के समय उनका
अत्यन्त तेज था । ईश्वर प्रति अति अनुराग के कारण उनके वाम अंग में स्थित
हुयी है । खण्डित चन्द्र से उनका (शिव का) मस्तक शोभा पाता है । उनका
पुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४१७
नाम उमा है । मधु दैत्य के वध के लिए देवताओं ने उनकी वन्दना की थी
जिनकी शक्ति से वह मारा गया ।
वाग् देवी साम्यम्
श्रीमद् गौराम्बराडम्बर रुचिर पयोराशि शित्यंग लक्ष्मी
र्लक्ष्मी सेना दृतांग स्फुट तमगमनः संगति वाङितांघ्रिः ।
ब्रह्मानन्दैक भूमिर्भ्रमशमन पटुः साश्रिता नाम विद्यां
भिद्याद् स्थूल देहा हित सकल जगद्धीरमेय स्थितिनैः । २९ ।
कृष्ण पक्ष में अर्थ - श्रीकृष्ण हमारी दुर्गति दूर करें । उनके नील शरीर पर
पीताम्बर फब रहा है । उनको लक्ष्मी, शिव और सूर्य सम्मान करते हैं । उनके
पास देवता लोग जाते हैं । सरस्वती उनके चरणों की वन्दना करती है । वे भक्तों
का अज्ञान दूर करने में दक्ष तथा ब्रह्मानन्द देते हैं । वे सूक्ष्म रूप से पूरे समाज
में व्याप्त हैं । उनकी स्थिति पण्डित लोग ही समझ सकते हैं ।
सरस्वती पक्ष में अर्थ- सरस्वती हमारी माया दूर करें । उनके धवल शरीर
पर शुक्ल वस्त्र फब रहा है । विष्णु से वह आदृत हैं तथा उन्हीं के प्रिय फूल
सरस्वती पर अर्पित हैं । भक्त उनकी चरण वन्दना करते हैं । वह भक्तों का अज्ञान
दूर कर ब्रह्मानन्द देती हैं । सूक्ष्म देह से सारे संसार में व्याप्त हैं । पण्डित ही
उनकी स्थिति के बारे में जान सकते हैं ।
गणेश साम्य-
हस्त्योद्य पुष्कर श्री श्रुति शिखर धृतोन्मत्तचित्तालिलोखो
ऽलंकर्त्ताक्षाम मध्य स्त्रिपुर हर तनुदक्ष पक्षस्य रक्षात्
सद्योऽविद्यान्धकारात् परशुधर पुरस्कार्य दुर्वार्य वीर्यो
देवः श्री पार्वती वाग् विधिं विततयशाः स्वर्गवर्गाग्रपूज्यः । २७ ।
कृष्ण आदित्यों में प्रथम (उपेन्द्र या वामन) हैं, गणेश देवताओं में प्रथम पूज्य
हैं । कृष्ण ने दुर्द्धर्ष परशुराम को पुरस्कार दिया था । गणेश ने भी परशुराम को
बहुत कठिनाई से रोका था जब वे शिव से पुरस्कार लेने जा रहे थे । कृष्ण हरि
हर मिलन में शिव के दाहिने रहते हैं । गणेश भी शिव के दाहिने रहते हैं । दोनों
के हाथ में कमल का फूल सजा हुआ है । दोनों का यश लक्ष्मी, पार्वती, सरस्वती
और ब्रह्मा फैलाते हैं । दोनों हमारे अविद्या रूपी अन्धकार को नष्ट करे ।
सूर्य साम्यम्
छाया कान्तः कृतान्तार्द्धित चरण युगः पाणिराजत् सरोजः
स्वाग्रोद्यद् वैनेतेया रजनीचर सुखोच्छाया विच्छेददक्षः
स्वच्छानन्तोंक लीलः क्षयिततम तमाः सर्वतेजोऽभिभावी
कालिन्द्यानन्द कलः प्रमुदित कमलः पातु पकांधरिर्न । २८ ।
४१८ सिद्धान्त दर्पण
कृष्ण पाप से हमारी रक्षा करें । सूर्य छाया देवी के स्वामी हैं । कृष्ण की
भी छाया के समान कान्ति है । कृष्ण का चरण यमुना धोती है । यम (सूर्य पुत्र)
सूर्य की पूजा करते हैं । कृष्ण के हाथ में कमल शोभित होता है । सूर्य किरणों
(पाणि) से कमल खिल जाते हैं । कृष्ण वैनतेय गरुड़ पर चलते हैं । सूर्य के
आगे भी वैनतेय (अरुण) सारथी उन्हें ले जाते हैं कृष्ण राक्षसों (रजनीचर) का
नाश करते हैं । सूर्य रजनी (अन्धकार) का नाश करते हैं । अनन्त (शेष नाग)
की गोद में कृष्ण विश्राम करते हैं । सूर्य अनन्त आकाश में विचरण करते हैं ।
दोनों में सभी प्रकार का तेज है । दोनों कालिन्दी को सुख देते हैं (कालिन्दी कृष्ण
की एक पत्नी, कालिन्दी यमुना सूर्य की पुत्री) । दोनों सदा पद्म को आनन्दित
करते हैं ।
नवग्रह साम्य
पद् मान दैक सद् मामृतनिधिर वनी नन्दनश्चन्द्र वंशो
तंसः स्वर्गेशवर्गोडित चरण युगः सत्कवित्वा श्रयश्च
पत्री भूतो रूपत्री जननयन चया गोचरो नीचकेतु
ज्योतिष्मान् च्युतोऽस्मानवतु द भवभया दाशु विश्वग्रहात्मा । २९ ।
कृष्ण और सूर्य दोनों पद्मानन्द देने वाले हैं (कृष्ण के आंख, हाथ पैर आदि
पद्म के समान आनन्द दायक, उनके हाथ में पद्म है, पद्मा सन में उनके ध्यान का
आनन्द होता है । सूर्य किरणों से पद्म खिलता है) । कृष्ण और चन्द्र दोनों अमृत
के भण्डार हैं । कृष्ण अवनी नन्दन (पृथ्वी को आनन्द देने वाले ) हैं, मंगल भी
अवनि (पृथ्वी) के पुत्र हैं । कृष्ण चन्द्र वंशी है, बुध, भी चन्द्र पुत्र हैं । कृष्ण-वाहन
गरुड़ तथा सूर्य सारथी अरुण दोनों वैनतेय हैं । कृष्ण देववर्ग द्वारा पूजित हैं,
वृहस्पति भी उनके गुरु में पूजित हैं । कृष्ण सृष्टि निर्माता (कवि) या कविता का
विषय है । शुक्र भी कवि (रचयिता) हैं । शनि भी गृद्ध वाहन हैं । कृष्ण का
नित्य रूप आंख से नहीं देखा जा सकता जिस प्रकार राहु को नहीं देखा जा
सकता । कृष्ण नीच (दीन) लोगों के बन्धु हैं केतु भी नीचों का अधिपति है ।
कृष्ण और सूर्य दोनों सभी ग्रहों की आत्मा और प्रकाश वाले हैं ।
गोविन्द वन्दना
वन्देबन्दारु वृन्दारक निकर शिखा रत्न नक्षत्र राजी-
रज्यात्यादा रविन्द स्फुट नखर विधु ध्वस्त चेत स्तमस्कम्
कोटि क्रीडाण्ड भाण्ड प्रकट गुण घटैः सेवितं स्वावतारै
श्रीमद् गोविन्द मिन्दिवर रुचिर तनु मिन्दिरानन्द कन्दम् । ३० ।
मैं श्रीगोविन्द को प्रणाम करता हूँ । देवताओं के सिर उनके चरणों पर प्रणाम
करने के लिये झुकते हैं, तो उनके मुकुट पर नक्षत्रों जैसे प्रकाश रत्नों से चरण
कमल प्रकाशित हो जाते हैं । उनके नखों की चन्द्र समान उज्ज्वलता से हृदय
पुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४१९
का अन्धकार दूर हो जाता है । करोड़ो ब्रह्माण्ड उन्हीं के गुणों के प्रकाश है ।
उनकी पूजा उन्हीं के अवतार भी करते हैं । उनका शरीर नील कमल जैसा सुन्दर
है तथा लक्ष्मी के आनन्द का मूल हैं ।
अथ दशावतार स्तुति मीनावतार
मीनोऽलीनो नदीनोदर उषित ऋषि व्रात गोत्रातरीस्थं
त्रातुं सत्यव्रतं वातरदिह सुमहाहार्य सन्दोह देहः ।
वेदोद्धाराय योद्धा व्यधित वधमदश्चौर वृत्रालिशत्रो-
स्त्राणं तापत्रयान्न स्त्रिपुर हर पुरस्कार पात्रं तनोतु । ३१ ।
मीन अवतार धारी भगवान तीन तापों (दैहिक, दैविक और भौतिक) से हमारी
रक्षा करें । विशाल आकार के कारण वे मीन रूप में समुद्र में भी नहीं छिप
सके । उन्होंने नौका रूप पृथ्वी में स्थित ऋषियों तथा दुःखी सत्यव्रत के उद्धार
के लिये अवतार लिया था । उन्होंने वेदों के उद्धार के लिये शंखासुर का वध
किया जो वृत्रशत्रु इन्द्र का शत्रु और चोर था । उनकी त्रिपुरारि भी पूजा करते हैं ।
कूर्मावतार
कूर्म्मेऽशर्म्मोपनिर्मोचयतु रयभर भ्रान्त मन्थस्थिराष्टृ-
द् भूरिग्रावाग्र संघटन घटित महापृष्ठ कण्डूति सौख्यः
पच्छंकोचच्छलनो च्छलित चल हृदां मिलनं स्वाश्रितेभ्यो-
ऽनर्थभ्यः प्रोत्थितास्येन च पवन समुत्थान मर्थापयन्नः । ३२ ।
कूर्म रूपी श्री जगन्नाथ हमारा अमंगल दूर करें । समुद्र मन्थन के लिये उनकी
विशाल पीठ पर मन्दराचल पर्वत के तेज घूमने से उनकी पीठ की खुजली दूर
होने का सुख हुआ । पैर संकोच करने से जिस प्रकार मन्दराचल को आश्रय मिला
था (उनकी पीठ पर) उसी प्रकार भ्रमित बुद्धि वाले लोगों की बुद्धि भी स्थिर
होती है । मुहं खोलकर हवा निकालने से समुद्र मन्थन में देवो और असुरों को
शक्ति मिली, इसी प्रकार लोगों को उस रूप से काम करने की शक्ति मिले ।
वाराहावतार
कोलं-कोलं कुगोलं दधदधि जलधी वाध उद्धृत्यदन्त
प्रान्तेऽशान्ते दुरन्ते प्रथम दितिसुते वृद्धदुर्द्धर्ष युद्धैः ।
देयादाया सहीनोद्रुहिण हरिहया द्यादितेयार्हणीयः
श्रेयो दाम्नाय गेय क्रतुनिचयमया मेघकायः श्रियः नः । ३३ ।
वाराह ने प्रबल और दुर्भेद्य दिति के प्रथम पुत्र हिरण्याक्ष जैसे दुर्वृत्त को मार
कर बिना कंठिनाई के ही समुद्र में नाव के समान अपने दांतों पर पृथ्वी को नीचे
से उठा लिया था । उस समय ब्रह्मा इन्द्र आदि ने उनकी पूजा की थी । वेद
उनकी स्तुति करते हैं । वह यज्ञ मय और अनन्त हैं । वराह रूपी भगवान हमारा
४२० सिद्धान्त दर्पण
मंगल करे ।
नृसिंहावतार
अघं संघं नृसिंहो भवतु भवहरोऽह्यसंहर्तु महें
गर्हन्निर्हादवृन्दैः प्रलय जलधर ध्यान धारा समृद्धिम्
अक्षान्त स्वीय भक्ताक्षति रमरपराध्यक्ष वक्षः क पाट
क्षोप प्रक्ष्य॑माणक्षतय भृतनखो लक्ष्यलक्ष्मीकवक्षाः । ३४ ।
संसार के (जन्म मृत्यु के) नाशक नृसिंह भगवान शीघ्र पाप समूहों का नाश
करें । उनके वक्षस्थल पर लक्ष्मी है । अपने भक्तों की क्षति या कष्ट वे नहीं सह
पाते हैं । दैत्यराज हिरण्यकशिपु के कपाट रूपी वक्ष को चीरने से निकलाहुआ
रक्त उनके नखों में लग गया था । उस समय उनकी घोर गर्जना प्रलय कालीन
मेघ से भी अधिक भयंकर थी ।
वामनावतार
खर्विकुर्वित दविं कर भुवनक गीर्वाणवर्गालियार्वी
गर्वानिर्वाक् सुपर्वार्य वनिधवमहा सम्पदं लुम्पमानः
व्यापद् व्यापञ्जयं पत्रितय रयभरा दर्धना व्याजखर्वः
सर्वं शंकादि सेव्यः स्रवद मर धुनी नीर पन्नीरजोयः । ३५ ।
वामन् भगवान हमारे विपद समूह को नष्ट करें । उनकी शिव आदि देवता
सेवा करते हैं । उनके चरण कमलों में गंगा निकली है । मांग कर छल करने के
लिए उन्होंने वामन रूप लिया था । दैत्यराज (बलि) की सम्पूर्ण सम्पत्ति (दान
में) लेकर उन्होंने अपने तीन पगों से पाताल, देवालय (स्वर्ग) और पृथ्वी-सबका
गर्व चूर्ण कर दिया था ।
परशुरामावतार
षष्ठः क्ष्माप्रेष्ठ गोष्ठी कुठ गण लुठना कुण्ठतेजः कुठारः
श्रीवैकुण्ठावतारः कठिन रणधुरादृष्ट षष्ठीश पृष्टः
तिष्ठन् कण्ठिर वाभीऽर्जुन सुभटघटा घोर मातंग यूथे
श्रेष्ठः कष्टानि निष्ठे वयतु भृगु धुवां नील कण्ठांघ्रि निष्ठः । ३६ ।
भृगुवंश के श्रेष्ठ, भगवान के षष्ठ अवतार और विष्णु के अंशरूप परशुराम
स्वयं वैकुण्ठावतार के रूप में हमारा कष्ट दूर करें । वह नील कण्ठ महादेव के
भक्त और कार्त वीर्य अर्जुन के योद्धा रूपी हाथियों के लिये सिंह के समान
पराक्रमी थे । उन्होंने निष्ठुरता से कार्तवीर्य अर्जुन को मार डाला तथा पृथ्वी के
राजाओं को वृक्षों की तरह काट गिराने में कुठार कुण्ठित नहीं हुआ ।
पुरुषोत्तम स्तव वर्णन ४२१
रामावतार
रामः श्यामाब्जधामा शमयुत सममाशर्म घर्मांश वंशो
तंसः संसार हिंसा वह महिम महाम्भोधि रम्भोज नेत्रः
शोण्डश्रुण्डीश काण्डा सनवल दलने दण्डकारण्य चारी
हारी वारीश तारी सरपर विसर प्राणहारी बुधारी । ३७ ।
भगवान राम नील कमल के समान और सूर्य वंश के भूषण हैं । वह हमारा
अमंगल दूर करें । उनकी आंखें कमल के समान सुन्दर हैं । संसार के हिंसकों
के नाश के लिये (डुबाने के लिये) महासागर के समान हैं । उन्होंने शिव धनुष
को भी सहज में मोड़ कर तोड़ दिया था । दण्डकारण्य में विचरण करने वाले
हैं तथा महासागर को पाकर उन्होंने अजेय रावण का प्राण हर लिया था । वे
सदा बाणों के साथ रहते हैं ।
बलरामावतार
उर्जेन्दु ज्योतिरुर्जस्वल विमलहराहार्यरुग् जैत्र गात्रः
सद्यः प्रोद्यहिनेश भ्रमदमदभराघूर्णिना स्तीर्ण नेत्रः
प्रत्यग्राम्भोदवन्द प्रतिभट पटभृद् भूरि भास्वद् विभूषो
भूयाद् भूगोल भारो भव भयभिद् भानु भूमेदनो नः । ३८ ।
भगवान् बलराम हमारा संसार भय दूर करें । वह कार्तिक पूर्णिमा के चन्द्र
के समान प्रकाशमान है, अथवा रोहिणी (माता) के चन्द्र (पुत्र) रूप में विख्यात
हैं । उनके शरीर की धवल कान्ति कैलाश पर्वत से भी अधिक है । उनकी आंखें
मदमस्त तथा चञ्चल है, लाल और विशाल होने के कारण उदय कालीन सूर्य
के समान दीखती हैं । नीले मेघ समूह के समान नीले रंग का वस्त्र पहनते हैं
तथा बहुत से आभूषणों से सजित हैं । शेष के रूप में वह पूरे संसार का भार
बिना कष्ट के ही सहते हैं ।
बुद्धावतार
अध्यात्मध्यान बुद्धादर विधुत धृतिध्वस्त शुद्धाध्वराध्व
श्रद्धाः क्रोधादिरोधा विधि विहित वधा साधुता सिद्ध बोधः
दध्याद् बुद्धा भिधानो मगध धरणी हल्लब्ध जन्माभिदेवो
बाधाब्ध्योद्धार धूर्या धियमघन धनं धर्मधारां धरन्तः । ३९ ।
भगवान बुद्ध के रूप में हमारी बुद्धि को बढ़ायें । मगध देश के (लुम्बिनी
के राजवंश) में जन्म होने पर भी वे दरिद्रों के धन थे । विपद् समुद्र से उद्धार
के लिये उन्होंने उपयुक्त धर्म मार्ग बनाया । सदा आत्मा में लीन रहकर कभी धैर्य
नहीं छोड़ा । उन्होंने वैदिक यज्ञ कर्मों में पशुओं की हत्या की स्पष्ट रूप से निन्दा
की । यज्ञ में पशुओं की हत्या की तुलना में अपने ही भीतर काम क्रोध आदि
४२२ सिद्धान्त दर्पण
शत्रुओं का दमन श्रेष्ठ है यह प्रतिपादित किया ।
कल्कि अवतार
निर्धूली धूमाधारा धरनि कर नभो मध्य विद्योतमानं
द्योत् प्राग् भार भास्वद् भ्रमकर कर युङ् मण्डलाग्रं प्रचण्डः
स्वाधाराधीर घोरोद्धर तुरंग सुरक्षोदित क्षोणिरेणु
च्छन्नच्छायेन ईशोदिशतु दशको म्लेच्छविच्छेदकृच्छम् । ४० ।
भगवान् अपने कल्कि अवतार द्वारा हमारा मंगल करें । धूलि, धूम और मेघ
से शून्य स्वच्छ आकाश में दशम अवतार कल्कि का प्रकाश होगा । उनके शरीर
के ऊपरी भाग से तेज निकलेगा (मुख और आंखो से अग्नि) । तथा हाथों में
तीक्ष्ण खड्ग (करवाल) सूर्य की भ्रांति भ्रमण करेगा । उनके भंयकर रूप तथा
भयानक अश्व की गति से पृथ्व खाली हो जायेगी और म्लेच्छों का संहार होगा ।
उससे उत्पन्न धूलि से स्वयं सूर्य ढंक जायेगा ।
जगन्नाथ स्तुति
मत्स्याद्या कल्कि रूपं दशविधतनू भाक् सिद्ध (२४) संख्यात्ममूर्तिद्
), then स्कृतिः? Wait, let's look at स्कृतिः: Could it be हृतिः? Look at हृतिः: हwithऋmatra isहृ! तिःisतिः! Then what is before हृतिः? क्लेशौघहृतिः? क्लेशाम्हृतिः? क्लेशापहृतिः? क्लेशसंघहृतिः? Wait, look at the letter before हृतिः: It is लं? Wait, what if it is: क्लेशलंकृतिः? Let's spell: क् ले श लं कृ तिःCount syllables ofक्लेशलंकृतिः: क्लेश (2) + लं (1) + कृतिः (2) = 5 syllables! Now count with 5 syllables: 13: लु (U) 14: ष (_) 15: क्ले (_) 16: श (U) 17: लं (_) 18: कृ (U? But 18 needs to be _!) Wait, if it's अलंकृतिः: In Sanskrit, अलंकृतिःmeans decoration/ornament. Does Krishna decorate his hair with peacock feathers? "केकिपिच्छकृत..." ->केकिपिच्छावतंस...`
ात्मा"? स, न्धि, त्ता, त्मा.
L34:
"संवित्सवातधामा निगम गण शिर स्तुत्यसत्य प्रभावः"
Wait, look at "संवित्सवातधामा":
सं-वि-त्स-वा-त-धा-मा
Wait, is it "संवित्सवातधामा" or "संवित्सारधामा"? Look at 'वा': it is definitely 'वा'!
"निगम गण शिर स्तुत्यसत्य प्रभावः"
Wait, between "निगम" and "गण" is there a space? Yes.
Between "गण" and "शिर"? Yes.
"स्तुत्यसत्य प्रभावः" - wait, is it "स्तुत्यसत्य" or "स्तुत्य सत्य"? Connected: "स्तुत्यसत्य".
Then space, "प्रभावः".
Let's double-check all lines carefully to ensure precision:
L1: ४२४ सिद्धान्त दर्पण
L2: तीनों लोकों को समाप्त कर देते हैं । कवियों ने जिनकी अनेक कीर्तियों का वर्णन
Wait, is L2 "समाप्त" or "समास"?
Let's zoom into L2:
"तीनों लोकों को समास कर देते हैं ।"
Look at the word: स (sa), म (ma), ा (aa), स (sa)!
There is NO 'प्त'! It is clearly "समास"!
Wait, "समास कर देते हैं" in Hindi means "cond
शेषा शेषांग सद्य सुरा तरुतल भात्कल्पित प्रेमरूपः
श्रीकृष्णः प्रेम भक्तिं वितरतु हृदि नः सच्चिदानन्द रूपः । ५० ।
श्री कृष्ण ह्लादिनी शक्ति श्री राधिका के सुख की सीमा हैं । उनकी शोभा
लाखों कामदेवों के समान है । वह योग शक्ति युक्त और योगेश्वर है । वेदों के
प्रधान अंग उपनिषद् उनकी स्तुति करते हैं । उनका सत्य प्रभाव (वास्तविक वही
है, बाकी अस्थायी ) है । अनन्त का पूरा अंग उनका निवास है । वह कल्प वृक्ष
के नीचे विश्राम करते हैं तथा प्रेम मूर्ति है । वही श्री जगन्नाथ सच्चिदानन्द हमारे
हृदय में प्रेम और भक्ति का वितरण करें ।
राधा साधारण श्रीकमन सुमनसं केकिपिच्छावतंसं
चन्द्रावल्यादिरागाच्छिदूर सुरनदी संग्राहागाध सिन्धुम् ।
वंशी संशीलितारुण्यं मणिमया कल्पना कल्पयन्तं
विद्युद् विद्योत् वस्त्रं नव जलद रुचिं श्री जगन्नाथ मीडे । ५१ ।
श्री कृष्ण राधा को लक्ष्मी के समान देखते थे और उनके लिए कामदेव के
समान थे । मोर पंख उनका अलंकार है । चन्द्रावली आदि गोप कन्याओं के गंगा
के प्रवाह के समान सतत प्रेमधारा के लिये वे अथाह सागर थे । वह सदा
वंशीवादन में रत थे । सोने के समान पीताम्बर और रत्न धारण किये रहते थे ।
वर्षा वाले मेघ के समान उनके श्याम शरीर पर पीताम्बर की शोभा बिजली के
समान है । उसी कृष्ण रूप जगन्नाथ की मैं पूजा करता हूँ ।
यस्य श्री विग्रहोद्यद् द्युति रिति परम ब्रह्म वेदान्त वेद्य
कोटी ब्रह्माण्ड भारी परमशिव भवः श्रीमहाविष्णुरंशः
यस्य भ्रूक्षेप मात्रात्सृजति हरिहर ब्रह्मशक्रादिदेवान्
माया पायाद पायादय मुदित दयः पुण्डरीकेश्वरोऽस्मान् । ५२ ।
जिसके सुन्दर शरीर का प्रज्वलित तेज है, वेदान्त (उपनिषद) द्वारा जिसके
परम ब्रह्म होने का ज्ञान होता है, जो करोड़ो ब्रह्माण्डों का भार उठाते हैं, जिनसे
परमशिव (या मंगल) उत्पन्न होते हैं, जो स्वंय महाविष्णु हैं, जिनके भौंह हिलाने
से ही माया या प्रकृति हरि, हर, ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओं की रचना होती है,
वही दयालु हृदय कमल के ईश्वर मरण से हमारी रक्षा करें ।
कृष्ण कृष्णाम्बुधिष्ण्याम्बुज चरण रण क्षीण गीर्वाणशत्रो
कृष्णाकृष्णादि तृष्णा हरण रणरण श्री तिरस्कार कारिन्
उष्णानुष्णांशु विस्मापन नयन युगाकार तारुण्य भारि
नस्मान् भीष्मादि कोष्मापह विहित महापातकान् पाहिपातात् । ५३ ।
हे कृष्ण ! तुमने क्षीर सागर को अपना घर बनाया है । तुम्हारे दोनों पैर कमल
के समान हैं । तुमने युद्ध में देवताओं के शत्रुओं को नष्ट कर दिया है । द्रौपदी
तथा अर्जुन का कष्ट तुम्हीं ने दूर किया था । तुम कामदेव की शोभा को भी
४२६ सिद्धान्त दर्पण
लज्जितु करते हो । तुम्हारी दो आंखें सूर्य और चन्द्र के समान चमकती हैं । तुम
सदा युवक रूप में हो । तुमने भीष्म और द्रोण आदि का गर्व (उष्मा) तोड़ा था ।
हम पापियों की पतन से रक्षा करो ।
श्री राधाकान्त कान्तानन नलिन हरे रामकृष्णावतारिन्
गोविन्दानन्द कन्दाद् भुत गुण वितते श्रीपते नीप मालिन्
कंसारेऽसार संसार सार हर हरनुता पारकारुण्य सिद्धो
दुःखान्धोरुद्धतिं मे तनु दनुज रिपोऽनुग्रहप्रग्रहेण । ५४ ।
हे राधाकान्त, तुम्हारा मुख कमल के समान सुन्दर है । हे हरि, हे गोविन्द,
तुमने राम और कृष्ण अवतार ग्रहण किया था । तुम आनन्द के आश्रय हो । तुममें
अद् भुत गुण हैं । तुम लक्ष्मी के स्वामी हो । तुम्हारे वक्षस्थल पर कदम्ब फूलों
की माला शोभित है । तुम कंस के शत्रु हो । इस असार संसार को ध्वंस करो ।
तुम असीम दया के सागर हो । तुम को शिव भी पूजते हैं । तुमने ही दैत्यों का
नाश किया था । तुम अपनी कृपा रूपी रस्सी से मुझे दुःख रूपी कुँएं से निकालो ।
पार्थानर्थ प्रमाथ प्रथित पृथुयशो मन्मथ प्रार्थ्यकान्ते
श्रीमन्नित्य स्थल स्थागम पथ पथिक प्रार्थतार्थामरेन्द्रो
शक्र प्रत्यर्थिपाथः पति मथन महामन्थ पृथ्वीधरान्तः
स्थानं नाथामि तीर्थाधिपतट वटयोः श्रीजगन्नाथ दुःस्थः । ५५ ।
हे जगन्नाथ, तुमने पाण्डवों का सभी कष्ट दूर किया । कामदेव रूप के लिए
तुम्हारी प्रार्थना करता है । सदा लक्ष्मी के साथ अपने नित्य स्थल पर विराजमान
हो । धर्म मार्ग में स्थित लोगों की कामना सूर्य करने के लिए तुम कल्पवृक्ष के
समान हो । देव और असुरों द्वारा समुद्र मन्थन करने के समय आपने मथानी को
कूर्म रूप से स्थिर किया था । मुझ दरिद्र को पुरी के कल्पवट की छाया में और
समुद्र तीर पर स्थान दो ।
दासी पाद रजां सिनिर्जर शिरोधार्याणि सूर्यात्मक
स्फूर्जदूर्ज सुदूत दर्पदमनी यत्रस्थितिः पापिनाम्
तत्रस्ता दसमोध्ूर्व वैभववति क्षेत्रोत्तमे जातुमे
नैव श्रीपुरुषोत्तमे शिवतमे स्थातुं विरोगादयः । ५६ ।
जिस श्रीक्षेत्र के सेव कीं चरणधूलि को देव अपने सिर से लगाते हैं, जहां
रहने से पापी भी यमदूतों के गर्व को खण्डित करते हैं उसी मंगलमय वैभवशाली
पुरुषोत्तम क्षेत्र में रहने पर मेरा मन सदा प्रसन्न रहे ।
इत्युत्कलोज्ज्वल नृपाल कुल प्रसूतः श्रीचन्द्रशेखर कृतौ गणिते ऽक्षिसिद्धे
सिद्धान्तदर्पण उपाहित बाल बोधे कृष्णस्तुतिस्त्रधिक विंशितः प्रकाशः
इस प्रकार उड़ीसा के प्रसिद्ध राजकुल में उत्पन्न श्रीचन्द्रशेखर द्वारा गणना
और दृष्टि में समानता तथा छात्रों की शिक्षा के लिये लिखे सिद्धान्त दर्पण में
कृष्ण स्तुति सम्बन्धी २३ वां प्रकाश समाप्त हुआ ।
चतुर्विंशः प्रकाशः
उपसंहार वर्णन्
कौतुक पञ्जिका विधानम्
उपक्रमः स्वेष्टतमस्य विष्णोः स्तवादिनादौ रचितश्रुतस्य
तत्पादनत्योपनतस्य पूर्ति मथोप संहार ममुष्य कुर्वे । १ ।
मैंने अपने इष्टतम देव श्री जगन्नाथ (विष्णु) का स्तवन कर इस ग्रन्थ का
आरम्भ किया था । अन्त में पुनःउनको प्रणाम कर इस ग्रन्थ का उपसंहार कर
रहा हूँ ।
तस्यादितः कौतुक पञ्जिकाख्यं वक्षामि किञ्चिद् गणितं मयायद् ।
कैशोर भाजां रचि पञ्जिकालिं दृष्ट्वैव पित्रा लिखितां प्रयत्नात् । २ ।
ग्रन्थ समाप्त करने से पहले कौतुक पञ्जिका नाम से कितनी गणित विधियां
मैं कहूंगा । मेरे पिता ने बहुत परिश्रम कर बहुत सी पाञ्जी बनायी थी । मैने
युवावस्था में इन्हें देखकर यह कौतुक पञ्जिका तैयार की थी ।
कौतुक पञ्जिका
पञ्चांगपाञ्जीं प्रविलोक्य चैकामन्वां ततः कल्पयितुंक्षमः स्यात्
जनो धनुर्ज्या पदकाद्यविज्ञो यथा तथायं क्रियते प्रकारः । ३ ।
चाप गणित (ज्या, कोटिज्या आदि) बिना जाने केवल पुरानी पाञ्जी (पञ्चाग)
देखकर जिस विधि से नयी पांजी बनायी जा सकती है, वह विधि कर रहा हूँ ।
कुवासरा नागशराग्नि (३५८) तुल्या नागेन्दु नाड्योरस भू (१६) विनाड्य
कृतांगरामै (३६४) स्तिथिभिः समाप्ताः स्युर्मन्द्र केन्द्रौजपदान्तगेऽर्के । ४ ।
अपने मन्दोच्च से सूर्य पूर्व या पीछे के पदान्त में रहने पर उस वर्ष के सावनदिनों
की संख्या ३५८।१८।१६ होगी । इतने दिनों में ३६४ तिथि या चन्द्र दिन समाप्त
होंगे ।
पलैस्त्रिभि (३) विश्व (१३) मितैश्च दण्डे
र्युक्तानिपूर्वोक्त महीदिनानि । ३५८।१३ । ३ ।
ऋक्षैश्चतुः पञ्चगुणैः (३५४) समाप्तं
यान्त्यत्र नेष्टं रवि मन्द केन्द्रम् । ५ ।
३५८।१३।३ सावन दिनों में ३५४ नाक्षत्र दिन होते हैं । अतः चन्द्र मन्द केन्द्र
की आवश्यकता नहीं है ।
कुवासरास्ते (३५८) सदलेन्द्र (१४।३०) नाड़ी
युक्ता खनागज्ज्वलनैः सहाद्देैः (३८०)
४२८ सिद्धान्त दर्पण
• योगैः समाप्तिं खलु यान्ति मन्द
केन्द्रौज पादान्त गते खरांशौ । ६ ।
३५८।१४।३० सावन दिन में ३८० १/२ योग होता है । यह सब मन्द केन्द्र से
विषम पादान्त में रवि रहन से होता है ।
तिथ्यर्द्धके यत्र यदिष्ट मेतत् संवत्सरान्ते करणं प्रमेयम्
नक्षत्र भोगांघ्रि विवेचनेन नवर्क्षपादान्त कराशयः स्युः । ७ ।
जिस तिथ्यर्द्ध में जो करण है, एक वर्ष बाद उसी तिथि के उसी अर्द्ध में
वही करण फिर होगा । नक्षत्र के चार पाद करने पर प्रत्येक राशि में ९ नक्षत्र पाद
होंगे ।
पूर्णेष्षतो द्वादशसु क्षपेष मासेषु यद्यन्ति विभाद्यमिष्टम्
तत्पूर्वं वर्षे हि तिथिः कृतो (४) ना ग्राह्या
गुणो (३) नं भमथापि योगः । ८ ।
१२ चान्द्र मास पूर्ण होने पर अर्थात् ३५८ सावन दिनों में ( एक सौराब्द के
अन्तः पात ३५८ सावन दिनों में) चान्द्र वर्ष की ४ तिथि अधिक होगी । पूर्ण
भगण का ३ नक्षत्र तथा पूर्ण योग में
सार्द्धद्वयो (२ १/२) नः परिगृह्यतां तद् ग्राह्यर्क्षतिथ्यन्त त एव देयाः
पुरोदितास्ता निजनाड़िकाद्या योगस्य मध्यादथ तत्तत्राढ्याः । ९ ।
. (तिथि नाड्यः (१८।१६ भनाड्यः १३।३ योगनाड्यः १४।३०)
२ १/२ योग अधिक होता है । पूर्व वर्ष में जो तिथि आदि ग्रहण करने से
वर्तमान वर्ष की इष्ट तिथि होती है । उसी को ही ग्राह्य तिथि आदि कहते हैं।
ग्राह्य नक्षत्र में १८।१६ नाड़ी, ग्राह्य तिथि में १३।३ दण्ड तथा ग्राह्य योग में १४।३०
दण्ड जोड़ेगे ।
तिथ्यादयः षष्टि घटीभ्य ऊना भवन्ति चेदिष्ट तमास्तदैकः
ग्राह्ये दिने वार इहैव देयो द्वौषष्टिदण्डाधिकता पिचेत्तौ । १० ।
यह सब योग करने पर फल यदि ६० दण्ड से कम हो तो ग्राह्य दिन में एक
एक वार जोड़ना होगा । फल ६० दण्ड से अधिक होने पर २ वार जोड़ा जायेगा ।
तद् ग्राह्यतिथ्यां तिथयश्चतस्रो योज्याश्चतस्रः किलतारकायाम्
योगे च सार्द्धद्वयमेवमिष्ट तिथ्यादयो ग्राह्यत उद् भवन्ति । ११ ।
फल की ग्राह्यतिथि में ४ तिथि, नक्षत्र में ४ तारा तथा योग में २-१/२ योग
जोड़ा जायेगा । इसके प्रकार ग्राह्य तिथि आदि से इष्ट तिथि आदि हो जायेगा ।
मासेऽत्रपक्षे ऽत्र तिथिर्मदिष्टा की दृश्य मुख्यां कथमृक्षयोगौ
इतिस्थिते प्रश्न विधौ तिथिः सा पञ्चांग मुख्या प्रतिभाति यस्मात् । १२.।
... wait:
ति थी (2) न्द्र (1) विश्वा (2) र्य (1) म (1) रु (1) द्र (1) का (1) ष्ठा (1) = 11 syllables!
Wait! The verse is divided into lines in the book to insert the numbers in brackets!
In the verse:
तिथीन्द्रविश्वार्यमरुद्रकाष्ठा-
गोदिङ्महेशोर्यमविश्वशक्रैः । १६ ।
The editor broke the verse lines to insert the numbers:
तिथी (१५) न्द्र (१४) विश्वा (१३)
र्यम (१२) रुद्र (११) काष्ठा (१०) गो (९)
दिङ् (१०) महेशो (११) र्यम (१२) विश्व ( १३) शक्रैः (१४) । १६ ।
That explains the exact layout!
Let's check line 23 again:
Is it "अथोद्धृतो" or "अथोद्धतो"?
Let's look at the third character:
It has द् and ध with an ृ (ri-matra): द्धृ.
So "अथोद्धृतो".
Let's check line 24:
"कालः क्रमान्माः सुधनुर्मुखेषु"
Wait, "क्रमान्माः" or "क्रमान्मास्"?
Look at the characters:
क ् र म ा न ् म ा
४३० सिद्धान्त दर्पण
का चर कर्म कहा जा रहा है ।
सस्रोनिते ग्राह्य दिने दिनार्द्धं यत्स्या तदेवेष्ट दिनेऽब्दतः स्यात्
तदन्तरं यद्दिन सप्तकोत्थं तद् याम्य सौम्यायन योः क्रमेण । १८ ।
ग्राह्यदिन से ७ घटाने पर जो होगा उसी दिन का दिनार्द्ध इष्ट दिन के दिनार्ध
के बराबर होगा । अतः ७ दिन (३६५-३५८) सम्बन्धी दिनार्द्ध अन्तर को दक्षिण
उत्तरायण क्रम से तिथि, नक्षत्र और योग में जोड़ना या घटाना पड़ेगा ।
तिथ्यादिषु क्षेप्यमृणं विधेय मित्यं स्फुटं स्थूलमत प्रसिद्धम् ।
तिथ्यादिकं सूक्ष्ममितोऽपि कल्प्यं पूर्वोक्तरीत्यामृदुतुङ्ग बोधात् । १९ ।
इतना करने से प्राचीन सौर आदि मतों के अनुसार तिथि आदि स्फुट होगा ।
स्थूल मत से निकाले तिथि आदि से मन्दोच्च आदि के अनुसार पूर्वोक्त रीति से
सूक्ष्मतिति आदि की कल्पना करनी होगी ।
स्याद् ग्राह्य तिथ्यादि यदीह सूक्ष्मं स्थूली कृतिस्तस्य विधातु मिष्टा
व्यस्तेतु तुंगान्तर पाक्षिकाख्ये कार्ये, फले तत्र पुनः प्रयासात् । २० ।
यदि ग्राह्य तिथि आदि सूक्ष्म है तो इस विधि से उन्हें स्थूल करना चाहिये ।
तुंगान्तर और पाक्षिक फल निकाल कर विपरीत रीति से आदि में उसका संस्कार
करना होगा । यह कष्ट साध्य होने पर भी आवश्यक है ।
नागर्तवो (६८) नागदिवाकराश्च (१२५) गोर्थेन्दवः (१५९)
षट्कनृपाः (१६६) शरेन्द्रोः (१४५) भुजंगानन्दाश्च (९८)
कलम्बरामाः (३५) क्रमोत्क्रमादाद्य तिथैर्विनाड्यः । २१ ।
प्रतिपदा से सप्तमी की तिथियों में क्रमशः ६८, १२५, १५९, १६६, १४५, ९८
तथा ३५ कला (पल) जोड़ेगे तथा उल्टे क्रम से अष्टमी से चतुर्दशीतक की तिथियों
में घटायेंगे ।
कार्याधनर्णान्यथ बाहुलिप्ताः पूर्वोक्त तुंगान्तर केन्द्र जाताः
पक्षार्द्धजास्तत्त्वयमै (२२५) विभक्ता लब्धाः स्वखण्डास्तदनुक्रमोत्थाः । २२ ।
पक्षार्द्ध में पूर्वोक्त तुंगान्तर की भुजकला को २२५ से भाग देने पर फल तुंगान्तर
केन्द्र का भुज खण्ड होगा ।
वृहस्पते र्मन्दफलस्य लिप्ता यास्ताः शरघ्नात् विहताविनाड्यः
ज्ञेयाः पराः पक्षदले पुनस्ता हताः क्रमादादि तिथे स्त्र चन्द्रैः । २३ ।
इन खण्डों के अनुसार वृहस्पति का जितना मन्दफल कला होगी उसको ५
से गुणा कर २ से भाग देने पर पक्षार्द्ध की परा आदि होगी । इस परा आदि को
प्रतिपदा से सप्तमी तक क्रमशः १३,
उपसंहार वर्णन ४३१
तत्त्वै (२-२५) कलम्बाग्निभि (३-३५) रथवेदै (४-४५)
द्व्यर्थै (५-५२) र्नगार्थै (६-५७) खरसै (७-६६०) र्विलोमम्
तथाष्टमीतः (६०।५७।५२।४५।३५।२५।१३)
खरसै (६०) र्विभक्ता वामं खतुंगान्तर वद् युतोनाः । २४ ।
२५,३५,४५,५७,६० से गुणा करेंगे । अष्टमी से चतुर्दशी तक क्रमशः
६०,५७,५२,४५,३५,२५,१३ से गुणा करेंगे । सभी फलों में ६० से भाग देने पर जो
फल होगा उसे तुंगान्तर फल के समान विपरीत रीति से सूक्ष्म फल में संस्कार
करने से स्थूल तिथि हो जायेगी ।
ग्राह्य इतिस्युस्तिथयो भमेवं तिथ्यन्त पूर्ण तदृणस्वनाड्यः
विश्वां (१३) शहीनास्तिथि भान्तयोर्यत् कालान्तरं
यात मनागतं स्यात् । २५ ।
ठीक उसी प्रकार तिथि अन्त में जो नक्षत्र पूर्ण होगा उसी तिथि में जो घटाने
या जोड़ने वाला दण्ड आदि होगा उसका १/१३ भाग कम कर व्यवहार करेंगे ।
तिथि अन्त में नक्षत्र पूर्ण नहीं होने पर तिथि और नक्षत्र के बीच के समय को
तद् घ्नं तिथि द्वन्द्व धनर्ण कालान्तरेण षष्ठ्याप्त मितैष्य दृष्ट्या
न्यूनाधिकं कार्यमथर्क्षकेषु ग्राह्येषु शोध्यः क्रमतो विनाड्यः । २६ ।
नक्षत्र से संबन्धित दोनों तिथियों के धन या ऋण कालान्तर से गुणा कर ६०
से भाग देने पर गत नक्षत्र में योग या बाकी (गम्य) में घटायेंगे । ग्राह्य स्थूल
नक्षत्र होगा ।
षड् बाहवः (२६) षण् निगमा (४६) स्त्रिबाणा (५३)
रसाब्धयो (४६) ऽङ्गाक्षि (२६) मितामृगादेः
मासेषुकर्कादिषु योजनीया
यथास्थिताः कार्मुक युग्मयोस्तु । २७ ।
ग्राह्य नक्षत्र में मकर से आरम्भ कर ५ मासों में क्रमशः २६, ४६, ५३, ४६,
२६ पल (लिप्ता) घटाना पड़ेगा । कर्क आदि ५ मासों में इन्हें क्रमशः जोड़ना
पड़ेगा । धनु और मिथुन मास में योग या घटाव नहीं होता है ।
योगेऽत्र तिथ्युक्त फलान्य गांश (७)
हीनानि कुर्याद भ इवा नुपातम्
ग्राह्येभ्य इष्टानि पुरोक्त वत् स्युः
स्थूलानि सूक्ष्मी करणन्तु तेषाम् । २८ ।
विष्कुम्भ आदि योग निकालने के समय तिथि के लिये लिखे गये धन या
ऋण फल से उसका १/७ भाग कर व्यवहार करेंगे । नक्षत्र के गत या गम्य भाग
के समान गत या गम्य कालान्तर में अनुपात किया जायेगा । इस प्रकार ग्राह्यतिथि
४३२ सिद्धान्त दर्पण
आदि से पहले के समान स्थूल इष्ट तिथि आदि हो जायेगा ।
इहोक्त तुंगान्तर पाक्षिका भ्यं स्यादंगकानां धन हानि वाम्यात्
भानान्त कर्कादि मृगादि मासधनर्णता स्यादपि वैपरीत्यात् । २९ ।
इस स्थूल तिथि आदि को सूक्ष्म करने के लिए तुंगान्तर और पाक्षिक दोनों
फलों से तिथि आदि में उल्टे क्रम से संस्कार (जोड़ या घटाव) करेंगे । नक्षत्रों
का यह संस्कार कर्क और मकर से आरम्भ कर ५-५ मासों में क्रमशः जोड़कर
या घटाकर विपरीत क्रम से होगा ।
ग्राह्येऽप्यमध्येत्वधिमास पातश्चेद् ग्राह्यमेवोत्तर मासिसर्वम् ।
रूपाद्रि रामा (३७२) स्तिथयोऽर्कवर्षे यद्यन्त पूर्तिसह षोडशांशाः । ३० ।
ग्राह्य मास और इष्ट मास के बीच अधिमास पड़ने से अधिमास के अगले
मास में तिथि आदि सभी ग्रहण किया जायेगा । इसका कारण एक सौर वर्ष में
(३७२-१/१६) चान्द्र दिन या तिथि होती हैं । (३७२।३।४५)
[L1
उपसंहार वर्णन् ४३३
यद्राशि चार स्थिति (१५) दण्ड तोऽङ्गाद्
द्विरराम (३२) संख्यैः पलकै र्युतेभ्य
तन्मास्यभीष्ट दिन एक हीने
प्राग् वर्षजात् स्पष्ट इनः पुरेव । ३४ ।
किसी मास की संक्रान्ति पिछले वर्ष की संक्रान्ति से १५।३२ दण्ड के बाद
होगी । उस मास के अभीष्ट दिन में एक घटाकर पूर्व वर्ष के उसी समय के रवि
से पहले की तरह रवि को स्फुट किया जा सकता है ।
किन्तुत्रयाः प्रोज्झ्यतया निरुक्ता लिप्तादय
(१५।१८) स्ताः स्फुटसूर्यगत्याः
हताविभक्ताः खरसैः (६०) स्फुटाः स्युस्तदूनितः
सूक्ष्मइनोऽब्दतः स्यात् । ३५ ।
किन्तु यहां (१५।१८) कला घटाने को कहा गया है । उसको स्फुट सूर्य गति
से गुणा कर ६० से भाग देने पर स्फुट होगा । उसी स्फुट कला आदि को पूर्व
वर्ष के उसी दिन के सूर्य से घटाने पर इस वर्ष के इष्ट दिन का स्फुट सूर्य होगा ।
ग्राह्यादिरर्कोज्झित एष्यघस्र सूर्यः स्फुटा भुक्ति रतोऽवशेषः
अत्येति दर्शं रविसंक्रमश्चेत्त दाधिमासः सुविघावगम्यः । ३६ ।
अतः आगामी दिन के स्पष्ट सूर्य से ग्राह्य दिन का सूर्य घटाने पर शेष सूर्य
की स्फुट गति होगी । यदि रवि संक्रान्ति अमान्त के बाद हो वह मास अधिमास
होगा ।
भमुक्त नाड्योऽष्टशतो (८००) विनिघ्नाः साद्यन्त नक्षत्रघटी विभक्ताः
गतर्क्ष संख्याश्चततो गुणाढ्या भवन्ति विस्पष्ट सुधांशु लिप्ताः । ३७ ।
इष्ट नक्षत्र के गत दण्ड आदि को ८०० से गुणा कर उस नक्षत्र के भोग (आदि
से अन्त तक) दण्ड आदि से भाग देने पर उस नक्षत्र का भुक्त (बीता हुआ) कला
आदि होगा । ज्ञात नक्षत्र से पहले के नक्षत्र संख्या को ८०० से गुणा कर उससे
ज्ञात नक्षत्र के भुक्त अंशादि को मिलाने से चन्द्र का स्फुट कला आदि होगा ।
कला में ६० से भाग देने पर अंश और उसमें १२ से भाग देने पर राशि होगी ।
सहस्रनिघ्ना भगजाष्ट पक्षाः (२८,८०,०००) साद्यन्त नक्षत्र पलै र्विभक्तः
फलं विधोर्भुक्ति रनेक वर्ष यातैष्यतिथ्यादि वदन्ति विज्ञाः । ३८ ।
(२८,८०,०००) में नक्षत्र की आदि और अन्त लिप्ता (चन्द्र की ) से भाग देने
पर चन्द्र की स्फुट गति होगी । विज्ञ गणक इस प्रकार अनेक वर्ष की गति और
एष्य तिथि आदि जान सकते हैं ।
अथेन्दु सूर्य ग्रह सम्भवाया चन्द्रार्क मात्रावगतेर हानि
आनीय वारैः परिशोधितानि स्वाभीष्ट पर्वानुगतानि तेभ्यः । ३९ ।
४३४ सिद्धान्त दर्पण
चन्द्र और सूर्य ग्रहण की सम्भावना जानने के लिए चन्द्र और सूर्य का स्फुट
राशि आदि निकालना होगा । उसके लिए पूर्णिमा या अमावास्या (चन्द्र या सूर्य
ग्रहण में ) का अहर्गण निकाल कर उसे बार शुद्ध करेंगे ।
पातं स्वगत्या (३।१०।४८) परिकल्प्य पाता
तद् भार्द्धतो वाग्निकु (१३) भाग मध्ये
पक्षान्तजेऽर्क स्थित एव चन्द्र
ग्रहो भवेत्तत् क्रम भक्त पूर्वः । ४० ।
इस अहर्गण को दैनिक ३।१०।४८ कला गति से गुणा कर चन्द्र पात (राहु)
की राशि ज्ञात होगी । अमान्त में सूर्य और पात से ६ राशि बाद की दूरी तथा
पूर्णिमान्त में स्फुट चन्द्र और पात के बीच की पूरी १३ अंश से कम होने पर ग्रहण
की सम्भावना रहती है । चन्द्र ग्रहण के बारे में पहले कहा जा चुका है ।
दर्शान्त काले क्रमतस्तु पूर्व पश्चान्नति त्र्यश विहीन युक्ते
तात्कालिक ग्लौदिगिषोस्त्रिभोन तनू नतज्या खरसां (६०) शकस्य । ४१ ।
[L1