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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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४३८ सिद्धान्त दर्पण
किं वा नवाश्वै (७९) र्दिननाथ वर्षे
भौमश्रुतुः षष्टि (६४) कलाधिकः स्यात्
बुधोऽगवेदै (४६) विधुदिक् (१०१) कलोनो
गुरुस्त्रिनागै (८३) कृत सप्त (७४) हीनः । ६१ ।
मध्यम मंगल ७९ सौरवर्ष में ६४ कला अधिक होता है । बुध ६४ सौर वर्ष
में (१०१) कला कम होता है । गुरु ८३ सौर वर्ष में ७४ कला कम होता है ।
शुक्रस्त्रिसिद्धै (२४३) स्त्रिचतु (४३) ष्कलाढ्यः
शनिर्नवार्थै (५९) र्नगसायकाढ्यः (५७)
राहुस्त्रिनन्दै (९३) र्नख (२०) लिप्तिकोनः
शीघ्रो ज्ञ शुक्रा वितरेऽत्र मध्या । ६२ ।
मध्यम शुक्र (२४३) सौर वर्षों में (४३) कला बढ़ता है । शनि (५९) सौर
वर्षों में (५७) कला बढ़ता है। राहु (९३) सौर वर्षों में (२०) कला कम होता है।
बुध और शुक्र का शीघ्रोच्च तथा अन्य ग्रहों के मध्यम मान ठीक आते हैं ।
तिथ्यादिभूक्ताः प्रति सौर मास्य यायाहतिः स्वर्णविनाड़िकाप्ताः
ग्राह्येऽष्टषत्सार्क युगान्तरार्द्धयुक्तेष्टषट्‌सार्थम मासतस्स्युः ६३ ।
सौर मास के तिथि नक्षत्र आदि के लिये जो भाग विधि या दण्ड जोड़ने
घटाने के विषय में कहा गया है, उसे रखें । ग्राह्य तथा इष्ट दिन सम्बन्धी स्पष्ट
सूर्य के अन्तर के आधे को जोड़ने पर इष्ट दिन का सूर्य जिस राशि में जायेगा
उसी मास से उन तिथियों की गिनती होगी तथा अन्य संस्कार होंगे ।
तारामहेष्वंशभिरेन्दु भान्वोः कला प्रभेद स्तिथि योग भेषु
फल प्रभेदोऽत्र बुधैर्नगण्यः कृतिर्मदीया यद सावपूर्वा । ६४ ।
कौतुक पंजिका में मंगल आदि तारा ग्रहों में अंश की त्रुटि हो सकती है ।
चन्द्र, सूर्य में कला का अन्तर तथा तिथि योग और नक्षत्र में लिप्ता का अन्तर
विज्ञ गणक नगण्य मानेंगे ।
स्नानादि योगां श्चिरकालतोऽस्या भविष्यतो ज्ञातुमलं नरः स्यात्
मृषाप्यतः कौतुक पंजिकेयं महोपकाराय सतांसदास्ताम् । ६५ ।
पहले किसी ने इस प्रकार की कौतुक पंजिका नहीं बतायी थी । लोग इससे
आगामी तीर्थ स्नान आदि योग बहुत पहले जान पायेंगे । अतः यह कौतुक पंजिका
स्थूल होने पर भी इससे सज्जनों का बहुत उपकार हो यह मेरी इच्छा है ।
सलक्षणोदाहरणं वितत्य सिद्धान्त मध्येऽत्रकुतूहलाय
उद्देश्यतो भूय उदीर्यतेऽसौयतोऽतिवेशाद् विषय ग्रहः स्यात् । ६६ ।
इस सिद्धान्त दर्पण में उदाहरण के साथ अनेक लक्षण विस्तार से दिये गये
हैं । तथापि इसके विषय वस्तु को शीघ्र जानने के लिए उद्देश्य से संक्षेप में सभी