सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपसंहार वर्णन् ४५३
(१०८) मयूर भञ्ज का १५८ कला पूर्व तथा १३१२ कलाउत्तर है । (१०९)
नीलगिरि का १६० कला पूर्व तथा १२८७ कला उत्तर है । इस प्रकार सज्जनों की
सुविधा के लिए मैंने १०९ स्थानों के बारे में कहा ।
अत्रेप्सितस्थल युगान्तर मार्ग मान मानेन्दु
मक्ष कलिका विवरं विनिघ्नम् ।
भूवेष्टनेन महता (५०२६) हत मृक्षचक्र
लिप्ताचयेन (२१६००) फलामात्महतं पृथक् स्तम् । १४० ।
दो स्थानों की अक्ष कला के अन्तर को ५०२६ से गुणा कर २१६० से भाग
देकर फल को वर्ग करेंगे ।
प्राक् प्रत्यगन्तर हत क्षिति वृत्त (५०२६) मग्न
खांगाग्नि (३६०) हृद् विपद् मध्य जयाहतं तत्
लम्बज्यया त्रिगुण (३४३८) हृत् स्वहतं द्विवर्ग
योगात् पदं हि पदयो ऋजुमध्यमार्गः । १४१ ।
पुनः दोनों स्थानों के पूर्व पश्चिम अन्तर कला को ५०२६ से गुणाकर ३६० से
भाग देंगे । फल को दोनों स्थानों की लम्बज्या के योगार्द्ध से गुणा कर त्रिज्या
(३४३८) से भाग देंगे । फल को वर्ग करेंगे । इस वर्ग को पिछले वर्ग के साथ
जोड़कर मूल निकालेंगे । वह उन दोनों स्थानों के बीच की सीधी दूरी होगी ।
ज्योतिस्तत्वविदो वदन्ति परम क्रान्तेश्चरानेहसा
यत्किञ्चित्तनुतो ऋते परम विक्षेपस्य खेटावलेः
याम्योदग् ध्रुव पश्चिम भ्रमपथस्यात्रानु भूत्यागम
प्राणाण्येन विनाव्यलेखिनमया तत्तत् कलानिर्णयः । १४२ ।
प्राचीन काल से ज्योतिषियों ने ग्रहों का परमशर, दक्षिण तथा उत्तर ध्रुव का
पूर्व पश्चिम मार्ग अर्थात् अयन चलन आदि के बारे में जो कुछ लिखा है, उसमें
किसी को भी बिना प्रमाण के मैंने स्वीकार नहीं किया है । सभी बातें प्रत्यक्ष
(वेध द्वारा) देखकर ही लिखी हैं ।
ऊर्ध्वोर्ध्वाम्बर सूत्रगो दिनमणिः स्याद्यद्दिनाद्धे तदा
सद् भार्द्धेव स्थिरन्ध्रग क्षिति पतत्तद् भानुनिष्ठाजवलात्
उद् गच्छत् किरणस्य रन्ध्र समतां दृष्ट्वा तदा त्वार्कजा
क्रान्ति स्वाक्षतयो दितैव मखिलं देशेष वेद्यं बुधैः । १४३ ।
मध्याह्न में खस्वस्तिक में रवि को देखकर (रवि के सबसे ऊपर विन्दु पर)
अन्धेरे कमरे में एक छोटा छेद करते हैं । छेद से आती किरण के नीचे एक पानी
का बर्तन रखते हैं । किरण दूसरी स्थान पर वापस होगी । सूर्य से आती किरण
का भूमि से जो कोण होगा वही कोण लौटती किरण का भी होगा । यह कोण