सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४२ \qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad सिद्धान्त दर्पण
एकोन विंशे ग्रह भास्वकक्षा युक्तिः प्रमाणं श्रुति मण्डलानाम्
वर्षेश मासेशदिनेश होराधिपक्रमो दृष्टि कर प्रसाराः । ८६ ।
उन्नीसवें प्रकाश में ग्रह नक्षत्र और आकाश कक्षा का प्रमाण और उसकी
युक्ति, ग्रह नक्षत्रों का कर्ण परिमाण, वर्ष, मास, दिन और होरा के अधिपतियों
का क्रम, शंकु की दृष्टि सीमा और सूर्य किरण की प्रसार सीमा कही गयी है ।
विंशे द्विधा गोलक यन्त्र कॢप्ति गोलार्द्ध चक्र प्रभृति प्रभेदैः
कालस्य राश्यादि मितेश्च सिद्धिः स्वयं वहत्यौ पयिक प्रकारः । ८७ ।
बीसवें प्रकाश में दो प्रकार के गोल यन्त्रों की कल्पना, गोलार्द्ध, चक्र आदि
यन्त्रों द्वारा समय और ग्रह राशि आदि निकालना तथा स्वयं वह यन्त्र बनाने की
विधि कही गयी है ।
गोलेऽनुमुक्तिर्गदितेक विंशे देवादिमानस्यतनोः स्फुटादेः ।
विकल्प चक्राण्युततोऽक्षि सिद्धाः स्ववासना घर्धन मूलकर्म । ८८ ।
इक्कीसवें प्रकाश में युक्ति के साथ गोल में देव और दानवों की अहोरात्रिका
मान, मेष आदि लग्नों की स्फुटता और उसकी अनुभूति, विकल्प ग्रह भगण,
प्रत्यक्ष होते वसन्त आदि ऋतु और घन मूल निकालने की विधि कही गयी है ।
षड् भिः प्रकाशै रिति संगृहीतो गोलाधिकार स्त्रिभिरुच्यतेऽथ
कालः संहार्थः किल वत्सराद्या द्वाविंश के मानभिदार्क चाराः । ८९ ।
इस प्रकार ६ प्रकाशों में गोलाधिकार समाप्त हुआ । अब अन्तिम तीन प्रकाशों
के बारे में कहा जाता है । बाइस वें प्रकाश में अर्थ के साथ संवत्सर, मास,
तिथि, सौर सावन और चान्द्र, नाक्षत्र वर्ष आदि का परिमाण भेद तथा सौर
संक्रान्ति आदि के बारे में कहा गया है ।
प्रोक्ता त्रयोविंशतमेस्तवालिः कालात्मनः कालनगेन्द्र भर्तुः
सवेश्मनः सावरणस्य पारावारादि साम्येन च दोष हत्यैः । ९० ।
२३ वें प्रकाश में पाप नष्ट करने के लिए काल रूपी नीलाद्रि नाथ मन्दिर
सहित आवरण (आकाश) और समुद्र आदि सहित उनकी समानता दिखा कर
स्तोत्र वर्णन किया गया है । इसमें पुरी श्री जगन्नाथ मन्दिर का विशेष वर्णन है ।
अन्त्ये चतुर्विंश इह स्फुटीभूदनुक्रमः कौतुक पञ्जिकादिः
कालाधिकारोऽयमगात् परार्द्धं गोलादिशब्दं गणितं यदाहुः । ९१ ।
अन्तिम २४ वें प्रकाश में कौतुक पञ्चिका और ग्रन्थ के विषयों का संक्षेप
में वर्णन है । इस प्रकार तीन प्रकाशों में कालाधिकार समाप्त हुआ । इस प्रकार
गोल अर्थात् गोलार्द्ध समाप्त हुआ । गणित और गोल इन दो प्रधान खण्डों का
यह ग्रन्थ समाप्त हुआ ।