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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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४५४ सिद्धान्त दर्पण
अपने स्थान से सूर्य की स्पष्ट क्रान्ति होगी। उसमें उत्तर क्रान्ति जोड़ने या दक्षिण
क्रान्ति घटाने से अपने स्थान का अक्षांश आयेगा।
दृशा दृष्टि विरुद्ध मन्यगणितं त्राणाय धर्मस्यवा
भ्रान्तिं तथ्यतया भुवः प्रवदतां वाग् भंगिभांगायवा
विद्वत्सं सदिमत् प्रलायज परीहास प्रकाशायवा
येनाहं हृदितिष्ठता मुखरितः कस्मै चिदस्मै नमः। १४४।
आचार्यों ने कई प्रकार से यह ग्रन्थ बनाने की प्रेरणा दी है- प्राचीन ग्रह
गणित दृक् सिद्ध नहीं होना, धर्म की रक्षा के लिए, पृथ्वी का भ्रमण स्वीकार
करने वालों के खण्डन के लिये या मेरे प्रलाप का पण्डित सभा में परिहास द्वारा
इन प्रेरणाओं के लिए मैं उन्हें नमस्कार करता हूं।
आसीत् पासीन्द्र काशीश्वर मिहिर तनु जन्मराजाधिराज
स्वराट् प्रत्यार्थे पृथ्युधव दहन पक्षत् पत्र मात्रोत्थ गात्रः
प्राप्तशीमर्द्दराज भ्रमरवर पदः सत्तमात् सार्वभौमा
धीमान् वैरागी नाम स्फुटत महिमा मण्डलः खण्डपुर्याः। १४५।
वरुणा, इन्द्र, रुद्र, यम कुबेर, नैऋति, अग्नि और पवन इन आठ लोक पालों
के अंश से उत्पन्न वैरागी नामक एक राजा खण्ड पड़ा में हुए। उनकी उपलब्धियों
के कारण स्वयं पुरी राजा ने उन्हें मर्दराज और भ्रमरवर की उपाधि दी थी। वह
खण्डपड़ा में चन्द्र के समान शासन करते थे। उनकी बुद्धि और महिमा चारों
तरफ फैली हुई थी।
तस्मात् कृष्णाम तृष्णा दजनि शुभजनिर्गांग भंगा वगाही
भीष्मानुष्कार कोष्मा ज्मत पर विजयः श्रील नीलाद्रि सिंह
तत्सानुः शुभ्र भानु द्युमणि परिभवोद्दाम कीर्ति प्रतापः
प्राप प्राक् श्री नृसिंहः पदमजित पदध्यान नीलत्रिपातः। १४६।
इन कृष्ण भक्त वैरागी की इच्छा भगवान् कृष्ण ने पूर्ण की और उनके औरस
पुत्र श्री नीलाद्रि सिंह उत्पन्न हुए जो गंगा पुत्र भीष्म के समान भयंकर तेज से
शत्रुओं को पराजित करने वाले थे। उनके पुत्र श्री नृसिंह अपने कीर्ति और प्रताप
में चन्द्र और सूर्य से भी अधिक थे। उन्होंने अपने वंश की उपाधि (मर्दराज तथा
भ्रमरवर) प्राप्त की तथा अपराजित (विष्णु) के चरणों का ध्यान कर तीन ताप
(दैहिक, दैविक और भौतिक कष्ट) दूर किये।
क्षत्राधिश्री बघेलान्वय पय उदधि प्रोद्यता पूर्णचन्द्रा
ज्योतिः सन्धान सिन्धुस्तत उदय मगच्छत् बुधः श्यामबन्धुः
स्वान्तोद्य हीन बन्धु प्रपद नख महः संहता हस्तभिन्नः
श्रीमान् सिंहान्त नामोत्कल निलय भरद्वाज गोत्राब्ज मित्रः। १४७।